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Die Straße An der Siedlung entstand 1927 beim Bau des Wohngebiet nördlich der Windmühlenstraße und wurde zunächst Friedensstraße genannt. Nach der Eingemeindung von Niedersedlitz erfolgte am 30. September 1953 die Umbenennung in An der Siedlung. Antonin-Dvorak-Straße Die Antonin-Dvorak-Straße entstand in den Dreißiger Jahren im Zusammenhang mit dem Ausbau der Niedersedlitzer Siedlung an der Windmühlenstraße. Am 20. Mai 1938 wurde sie nach dem deutschen „Turnvater“ Friedrich Ludwig Jahn (1778-1852) zunächst Ludwig-Jahn-Straße benannt. 1945 erfolgte eine Umbenennung in Gottfried-Keller-Straße. Namenspate war der schweizerische Schriftsteller Gottfried Keller (1819-1890), der vor allem durch seine Novellen bekannt wurde. Da es in Cotta jedoch bereits eine Gottfried-Keller-Straße gab, machte sich durch die Eingemeindung von Niedersedlitz 1954 eine weitere Namensänderung erforderlich. Ihren neuen Namen erhielt die Straße nach dem tschechischen Komponisten Antonin Dvorak (1841-1904). Bahnhofstraße Die Niedersedlitzer Bahnhofstraße verbindet den alten Dorfkern mit dem benachbarten Großzschachwitz. Im Bereich um den Bahnhof liegt auch das Ortszentrum mit Rathaus, Schule und dem Endpunkt der Straßenbahn. 1871 wurde östlich der Bahnhofes der Güterbahnhof angelegt. 1893 ist der Name Bahnhofstraße erstmals im Adressbuch verzeichnet und bezog sich damals nur auf den Abschnitt südlich der Eisenbahn. Der anschließende Weg nach Großzschachwitz wurde um 1900 ebenfalls ausgebaut und ab 1903 Zschachwitzer Straße genannt. 1906 entstand an Stelle des bisherigen Bahnüberganges die noch heute erhaltene Unterführung. Gleichzeitig nahm die bis 1977 über die Bahnhofstraße nach Lockwitz und Kreischa verkehrende Lockwitztalbahn ihren Betrieb auf. Außerdem entstand die nach Kleinzschachwitz führende Dresdner Vorortbahn, initiiert vom Unternehmer Oskar Ludwig Kummer. Der auf Großzschachwitzer Flur gelegene Straßenteil ist erstmals im Adressbuch von 1906 als Niedersedlitzer Straße genannt. Zwei Jahre später kam auch die bisherige Dorfstraße in Großzschachwitz hinzu. Nach Machtübernahme der Nationalsozialisten beschloss der Gemeinderat der damals noch selbständigen Ortschaft Großzschachwitz die Umbenennung dieser Straße in Killingerstraße. Manfred von Killinger war SA-Obergruppenführer und Ministerpräsident von Sachsen. 1936 wechselte die Bezeichnung erneut in Rudolf-Heß-Straße. Nach dem der Stellvertreter Hitlers 1941 nach England geflohen war und deshalb als "Verräter" betrachtet wurde, entschloss man sich per 30. Mai 1941 zur Namensänderung in Bahnhofstraße, womit der bereits in Niedersedlitz verwendete Name auch auf den Großzschachwitzer Abschnitt überging. Mit der Eingemeindung von Niedersedlitz wurden 1953 die bisherige Bahnhofstraße und die Zschachwitzer Straße vereinigt. Bereits 1941 war die frühere Niedersedlitzer Straße in Großzschachwitz, zuletzt Rudolf-Heß-Straße genannt, ebenfalls in Bahnhofstraße umbenannt worden. Gasthof "Zum Goldenen Löwen" (Nr. 5): Der Gasthof entstand um 1860 und erhielt 1898 durch Umbau und Erweiterung sein heutiges Aussehen. Im Erdgeschoss befanden sich die Gasträume, im Obergeschoss ein großer Saal. Ab 1906 brachte die Lockwitztalbahn zahlreiche Gäste direkt bis vor das Haus, wo sich bis 1914 deshalb sogar eine eigene Haltestelle befand. Besitzer war der Gastwirt Carl Beil, später Rudolf Freitag. Nach 1945 wurde das Gebäude zeitweise auch für Theateraufführungen genutzt. Statische Gründe führten 1965 zur Sperrung des Saales für eine öffentliche Nutzung, so dass dieser fortan als Lager diente. Später schloss auch die Gaststätte. Bis in die 1990er Jahren gab es jedoch noch einen Optiker und einen Schuhreparaturservice im Haus. Planungen zur Sanierung, u.a. als Burschenschaftszentrum blieben bislang unrealisiert, so dass das sich das Haus heute in einem verfallenen Zustand befindet. Blumenpflückerin:Die vom Bildhauer Otto Poertzel geschaffene Plastik „Blumenpflückerin“ entstand in den Dreißiger Jahren und wurde im April 1938 in einer kleinen Parkanlage an der Einmündung Bahnhofstraße / Lugaer Straße aufgestellt. Die Finanzierung der Figur, welche auch als „Knieender Frauenakt“ bzw. im Volksmund als „Nacksche“ bekannt ist, übernahm die damals noch selbständige Gemeinde Niedersedlitz. Das Kunstwerk besteht aus künstlichem Muschelkalkstein und kostete 550 RM. 1950 wurde die Plastik aus unbekannten Gründen von ihrem Platz entfernt und zum Hepkeplatz nach Gruna versetzt. Erst 2012 kehrte sie auf Initiative des Niedersedlitzer Heimatverein an ihren ursprünglichen Standort zurück und wurde nach Restaurierung im Juni wieder aufgestellt. Nr. 23: Zu den ersten Fabrikantenvillen des Dorfes gehörte die um 1880 erbaute Villa des Fliesenfabrikanten Otto Kaufmann Der neoklassizistische Bau diente nach 1945 viele Jahre als Kindergarten und wurde stand wegen seiner Innenausstattung im Art-deco-Stil unter Denkmalschutz. 1993 wurde das Gebäude unter Missachtung gesetzlicher Bestimmungen abgerissen. Bemerkenswert ist das Nachbargebäude Nr. 25, welches 1911/12 vom Architektenbüro Lossow & Kühne errichtet wurde. Die repräsentative Villa ist auch im Inneren noch weitgehend im Ursprungszustand erhalten. Auen-Apotheke: Die Apotheke auf Großzschachwitzer Flur wurde Mitte der Dreißiger Jahre im Wohn- und Geschäftshaus Bahnhofstraße 97 gegründet. Ihren Namen erhielt sie nach der einst hier gelegenen feuchten Aue, welche sich heute noch im Straßennamen “An der Aue” wiederfindet. Im Zusammenhang mit dem Bau eines Plattenbaugebietes wurde sie 1982 ins Erdgeschoss des Wohnblocks Schönaer Straße 34/36 verlegt und die bisherigen Räume nur noch als Lager genutzt. Bedrich-Smetana-Straße Die kurze Bedrich-Smetana-Straße wurde 1905 als Planstraße XII angelegt und am 4. April Goethestraße benannt. Nach Ausbau und Verlängerung der Straße um 1912 bestand sie aus zwei Teilabschnitten zu beiden Seiten der Lockwitztalstraße. Da das immer wieder zu Verwechslungen führte, beschloss der Niedersedlitzer Gemeinderat am 13. Februar 1915 die Umbenennung des östlichen Abschnitts in Schillerstraße. Die bisherige Schillerstraße (heute Heidenauer Straße) erhielt den Namen Hindenburgstraße. Nach der Eingemeindung von Niedersedlitz wurde die Goethestraße 1953 umbenannt. Mit dem jetzigen Namen wird an den Komponisten Bedrich Smetana (1824-1884) erinnert, der zu den Begründern der tschechischen Nationalmusik gehört. Bismarckstraße Die Bismarckstraße wurde Ende des 19. Jahrhunderts zur Erschließung der Baugebiete parallel zur Eisenbahnstrecke angelegt. Mit der 1903 erstmals nachweisbaren Namensgebung sollte an den bis 1890 amtierenden “Eisernen Kanzler” Otto von Bismarck (1815-1898) erinnert werden. Bismarck gilt als Architekt der Reichseinigung und führte in seiner Amtszeit umfassende Sozialreformen durch, bekämpfte zugleich aber die entstehende Sozialdemokratie. Nach 1945 wurde die Niedersedlitzer Bismarckstraße umbenannt und erhielt den Namen Edgar-André-Straße. Edgar André (1894-1936) gehörte ab 1923 der KPD an und galt als enger Vertrauter Ernst Thälmanns. 1936 wurde er von den Nationalsozialisten wegen seiner angeblichen Schuld am “Altonaer Blutsonntag” hingerichtet. Die Edgar-André-Straße erhielt auf Beschluss des Stadtrates am 25. Februar 1993 wieder ihren alten Namen Bismarckstraße zurück. Das Straßenbild prägen bis heute neben verschiedenen Industriebauten vor allem Fabrikantenvillen und Wohnhäuser. Zu den hier ansässigen Firmen gehörten u.a. die Aktiengesellschaft für Kunstdruck (Nr. 49), die Kamerawerkstätten Niedersedlitz (Nr. 56), die Dresdner Schulbankfabrik Lickroth & Cie. (Nr. 57) und die Schokoladenfabrik EMERKA (Nr. 66). Architektonisch bemerkenswert sind die unter Denkmalschutz stehenden Häuser Nr. 3 (Deus-Nobiscum-Villa), Nr. 17 (Villa Oskar), Nr. 23 (Manß-Villa) und Nr. 26, 27 und 29. Im Haus Bismarckstraße 47 befand sich einst die Gastwirtschaft "Zur Wartburg". 2013 entstand zwischen Reisstraße und Saydaer Straße ein kleines Wohngebiet. Apostolische Kirche: Das Gebäude an der Bismarckstraße 30 entstand 1996 für die Apostolische Gemeinde Dresden. Diese Freikirche ging 1955 aus einer Abspaltung der um 1860 in Deutschland entstandenen Neuapostolischen Kirche hervor und nutzte zuvor die Striesener Versöhnungskirche für ihre Gottesdienste. 1994 schloss sie sich mit dem in Dresden seit 1921 aktiven Reformiert-Apostolischen Gemeindebund zusammen. Gegenwärtig gehören der Gemeinde, welche sich an der Urkirche des Neuen Testaments orientiert, ca. 100 Mitglieder an. Aktiengesellschaft für Kunstdruck: Das Unternehmen wurde als Kunstdruckerei Willner & Pick gegründet und firmierte ab 1896 unter dem Namen Aktiengesellschaft für Kunstdruck vorm. Willner & Pick. Ab 6. Februar 1900 war nur noch der Name Aktiengesellschaft für Kunstdruck gebräuchlich. Stammsitz und Produktionsräume des deutschlandweit tätigen Unternehmens war die Bismarckstraße 49. Bis 1945 befand sich die Firma mehrheitlich im Besitz des Nürnberger Großaktionärs Dr. Carl Soldau GmbH. Zum Produktionsprogramm gehörten graphische Erzeugnisse unterschiedlichster Art, u.a. Werbeplakate, Kalender, Postkarten, Prospekte und Kataloge, wobei die Entwürfe zum Teil von renommierten Grafikern stammten. Aber auch Wahlplakate und Wertpapiere sowie Notgeldscheine wurden hier gedruckt. Die Gebäude der AG sind noch erhalten und dienen als Wohnhaus bzw. Bürogebäude. Bild: Werbeplakat zur Internationalen Hygieneausstellung 1930 in Dresden (Entwurf von Willy Petzold, Druck Aktiengesellschaft für Kunstdruck Niedersedlitz) Kamera-Werkstätten Dresden-Niedersedlitz: Das Unternehmen entstand 1919 durch Zusammenschluss der Kamerawerkstätten von Paul Guthe und Benno Thorsch und hatte seine Produktionsstätten auf der Serrestraße 12 und der Zinzendorfstraße 48 in der Pirnaischen Vorstadt. Der wachsende wirtschaftliche Erfolg ermöglichte wenig später den Umzug zur Bärensteiner Straße 30. Hergestellt wurden neben einfachen Patent-Etui-Kameras (Werbung) ab 1931 auch Spiegelreflexkameras. Nach dem Ausscheiden und dem Tod Guthes führte Benno Thorsch das Unternehmen gemeinsam mit Julius Thorsch weiter. 1938 erwarb der Amerikaner Charles Adolf Noble den Betrieb im Tausch gegen seine Fotokopieranstalt in Detroit und ermöglichte damit den jüdischen Inhabern die Ausreise in die USA. Fortan firmierte das Werk unter dem Namen Kamera-Werkstätten Charles A. Noble und verlegte seinen Stammsitz nach Niedersedlitz zur Bismarckstraße 56. Diese Firma wurde wenig später durch die legendäre “Praktiflex”, eine 1938 von Alois Hoheisel entwickelte Spiegelreflexkamera, berühmt und blieb bis 1946 in Familienbesitz. Während des Zweiten Weltkriegs wurden hier u.a. Flugzeugfilter angefertigt. Wegen des völlig absurden Vorwurfs, Noble habe von seiner Loschwitzer Villa “San Remo” den Luftangriff auf Dresden gesteuert, wurde er 1945, sein Sohn John Noble 1948 verhaftet und bis 1955 in einem Internierungslager gefangen gehalten. Erst auf Druck der amerikanischen Regierung gelang ihm schließlich die Ausreise in die USA. Nobles Unternehmen kam als VEB Kamerawerke Dresden-Niedersedlitz in staatlichem Besitz und wurde erst 1991 an die Eigentümer zurückgegeben. Ab 1949 wurde hier mit der “Praktica” eines der erfolgreichsten Kameramodelle der DDR gebaut. Zehn Jahre später kam auch dieser Betrieb zum neu gebildeten Kombinat VEB Kamera- und Kinowerke Dresden (ab 1964 PENTACON). Nach der Wende erhielten John Noble und sein Bruder George ihren Betrieb sowie die Villa zurück und begannen nach verlorenem Rechtsstreit um die Markennamen “Practica” und Praktina” mit dem Bau moderner Panoramakameras (“Noblex”). Trotz der Weltneuheit einer 180° - Panoramakamera gelang es jedoch nicht, sich dauerhaft auf dem Markt zu behaupten. 1997 musste das Unternehmen Konkurs anmelden, wird jedoch heute von neuen Besitzern als Kamera Werk Dresden GmbH fortgeführt (Foto). Die Buchsbaumstraße wurde Mitte der 1930er Jahre beim Bau der Wohnsiedlung an der Windmühlenstraße angelegt und am 20. Mai 1938 Braunauer Straße genannt. Die Namensgebung erfolgte nach der Stadt Braunau am Inn in Österreich, dem Geburtsort Adolf Hitlers. Das war auch der Grund für die Umbenennung in Heinrich-Heine-Straße unmittelbar nach Kriegsende. Da es jedoch in Leubnitz-Neuostra bereits eine gleichnamige Straße gab, machte sich mit der Eingemeindung von Niedersedlitz eine erneute Umbenennung erforderlich. In Anlehnung an die benachbarten Föhren- und Wacholderstraße wurde auch hier der Name einer Baumart gewählt. zuvor war kurzzeitig auch der Name Erlenstraße im Gespräch. Christian-Morgenstern-Str. Die Christian-Morgenstern-Straße wurde Ende der 1970er Jahre im Zusammenhang mit dem Neubaugebiet Prohlis südlich der Windmühlenstraße angelegt. Ihren Namen erhielt sie am 13. April 1978 nach dem deutschen Schriftsteller und Lyriker Christian Morgenstern (1871–1914). Curt-Guratzsch-Straße Die Curt-Guratzsch-Straße wurde um 1900 im Zusammenhang mit der Entwicklung des Ortes zur Industriegemeinde angelegt. Finanziert wurde der Bau durch den Privatier Ernst Schanze, der seine Grundstücke wenig später an die Gemeinde verkaufte. In diesem Zusammenhang erhielt sie offiziell den Namen Albertstraße, wohl nach dem sächsischen König Albert. Nach 1945 trug sie zeitweise den Namen Ernst-Thälmann-Straße. Da es in Dresden jedoch bereits eine Ernst-Thälmann- Straße gab, machte sich mit der Eingemeindung von Niedersedlitz eine erneute Umbenennung erforderlich. Seit dem 30. September 1953 war sie als Wilhelm-Florin-Straße nach einem kommunistischen Arbeiterfunktionär benannt. Wilhelm Florin (1894-1944) gehörte ab 1920 der KPD an und war später Mitglied des Zentralkomitees und des Politbüros der Partei. 1993 wurde die Straße in Curt-Guratzsch-Straße umbenannnt. Curt Guratzsch (1891-1965) erwarb sich große Verdienste um die Dresdner Kultur und war ab 1930 Vorsitzender des Verbandes zur Förderung der Neustadt. Außerdem widmete er sich pädagogischen und sprachwissenschaftlichen Forschungen und regte 1945 das alljährliche Gedenkläuten am 13. Februar an. Dorfstraße Als Dorfstraße wird bis heute der zwischen Windmühlenstraße und Bahnhofstraße gelegene Teil des alten Niedersedlitzer Ortskerns bezeichnet (Foto). Ursprünglich entstand dieser als Rundling und wurde später zum Gassendorf erweitert. Noch bis 1895 bestand der Ort mit Ausnahme einiger Industriebetriebe und Fabrikantenvillen fast ausschließlich aus den Häusern der Dorfstraße. Bis heute blieben hier einige Zwei- und Vierseithöfe sowie ehemalige Häusleranwesen erhalten. Nach der Jahrhundertwende entstanden am Rande des Dorfkerns an der Lockwitztalstraße / Ecke Dorfstraße einige mehrgeschossige Wohn- und Geschäftshäuser. Erich-Kästner-Straße Die Erich-Kästner-Straße wurde Anfang der 80er Jahre des 20. Jahrhunderts im Zusammenhang mit dem Ausbau des Neubaugebietes Prohlis auf Niedersedlitzer Flur angelegt und mit mehrgeschossigen Wohnhäusern bebaut. Die wegen ihres Grundrisses auch als “Sternhäuser” bekannten Zehngeschosser sind heute nicht mehr vorhanden und wurden 2008 im Rahmen des Rückbaus von Plattenbauwohnungen abgerissen. Ihren Namen verdankt die Straße dem bekannten Schriftsteller und Kinderbuchautor Erich Kästner (1899-1974), der 1899 in Dresden geboren wurde und seine Kindheitserlebnisse in seiner Autobiografie “Als ich ein kleiner Junge war” beschrieb. Benannt wurde sie am 13. April 1978. Ernst-Toller-Straße Die Ernst-Toller-Straße wurde in den 1930 Jahren beim Bau der Wohnsiedlung an der Windmühlenstraße angelegt. Am 20. Mai 1938 erhielt die bisherige Planstraße XXIII den Namen Andreas-Hofer-Straße, womit der Südtiroler Freiheitsheld Andreas Hofer (1767-1810) geehrt werden sollte. Hofer war Anführer des gegen die napoleonische Freiherrschaft gerichteten Tiroler Volksaufstand und wurde 1810 in Mantua hingerichtet. Da es nach der Eingemeinung von Niedersedlitz bereits eine weitere Andreas-Hofer-Straße in Meußlitz gab, erfolgte in den 1950er Jahren die Umbenennung in Ernst-Toller-Straße. Ihren Namen verdankt sie dem deutschen Lyriker und Dramatiker Ernst Toller (1893-1939). Der vom Expressionismus beeinflusste Autor verfasste verschiedene revolutionäre und antimilitaristische Dramen. Bei der Premiere seines Stückes “Hinkemann” über das Schicksal eines Kriegsverwundeten kam es am 17. Januar 1924 zu einem Theaterskandal im Dresdner Schauspielhaus, der zum Abbruch der Vorstellung und zu heftigen politischen Auseinandersetzungen im Stadtrat sowie im Landtag führte. Die heutige Falkenhainer Straße entstand um 1935 beim Bau einer neuen Wohnsiedlung an der Windmühlenstraße. In Bezug auf die im Zuge des Versailler Vertrags verlorenen Gebiete des Deutschen Reiches erhielt sie zunächst den Namen Iglauer Straße nach der Stadt Iglau (Jihlava) in Tschechien. Wenig später begann hier der Bau von standardisierten Siedlungshäusern. Mit der Eingemeindung von Niedersedlitz machte sich eine Umbenennung erforderlich, da es in Laubegast ebenfalls eine Iglauer Straße gab. Auf Beschluss des Stadtrates vom 30. September 1953 wurde die Straße nach dem kleinen Ort Falkenhain im Müglitztal in Falkenhainer Straße umbenannt. Die heutige Föhrenstraße wurde 1935 beim Bau des Wohngebietes an der Windmühlenstraße angelegt und auf Beschluss des Niedersedlitzer Gemeinderates am 20. Mai 1938 Planettastraße benannt. Otto Planetta (1899-1934) gehörte zu den Mitbegründern des nationalsozialistischen „Deutschen Soldatenbundes” und tötete am 25. Juli 1934 bei einem Attentat den damaligen österreichischen Bundeskanzler Dollfuß. Gemeinsam mit seinem Mittäter Franz Holzweber wurde er für seine Tat zum Tode verurteilt und am 31. Juli 1934 hingerichtet. Während der Nazizeit galt Planetta als ein “Märtyrer” und Vorkämpfer für den Anschluss Österreichs an das Deutsche Reich. Unmittelbar nach Kriegsende erfolgte 1945 die Umbenennung in G.-E.-Lessing-Straße. Da es in Dresden jedoch bereits eine Lessingstraße gab, machte sich nach der Eingemeindung von Niedersedlitz eine erneute Namensänderung erforderlich. Am 16. Januar 1954 erfolgte in Anlehnung an weitere nach Bäumen benannte Straßen der Umgebung die Umbenennung in Föhrenstraße. Franz-Werfel-Straße Die im Zusammenhang mit dem Bau einer Wohnsiedlung Mitte der Dreißiger Jahre angelegte Straße erhielt ihren Namen am 20. Mai 1938 nach dem Nürnberger Buchhändler Johann Philipp Palm (1766-1806). Palm hatte in seiner Buchhandlung das gegen Napoleon gerichtete Flugblatt “Deutschland in seiner tiefen Erniedrigung” veröffentlicht und war auf Befehl Napoleons standrechtlich erschossen worden. Nach 1945 wurde die Johannes-Palm-Straße nach dem österreichischen Dichter und Romancier Franz Werfel (1890-1945) umbenannt. Werfel gilt als Begründer des österreichischen Expressionismus und verbrachte seine letzten Lebensjahre in der USA. Friedrich-Adolph-Sorge-Straße Die Friedrich-Adolph-Sorge-Straße entstand kurz nach 1900 bei der Bebauung der Flächen nördlich des alten Dorfkerns. Bauherr war der Privatus Ernst Schanze, der die hier gelegenen Grundstücke wenig später verkaufte. Nach dem sächsischen König Friedrich August III. wurde sie zunächst Friedrichstraße genannt. Da es nach der Eingemeindung von Niedersedlitz jedoch bereits eine Friedrichstraße in Dresden gab, erhielt sie im September 1953 den Namen Friedrich-Adolph-Sorge- Straße. Friedrich Adolph Sorge (1828-1906) war ein Revolutionär, der 1849 am badischen Aufstand teilnahm, später in die USA emigrierte und dort Leiter der amerikanischen Sektion der I. Internationale war. Friedrich-Ebert-Straße Die Friedrich-Ebert-Straße entstand 1925 beim Bau einer Arbeiterwohnsiedlung im Osten der Niedersedlitzer Flur. Der Name erinnert an den ersten deutschen Reichspräsidenten Friedrich Ebert (1871-1925). Ebert war bis zu seiner Wahl ab 1913 Vorsitzender der SPD und gehörte zu den führenden Köpfen des gemäßigten Flügels der Partei. Aus politischen Gründen erfolgte am 20. März 1933 die Umbenennung in Leo-Schlageter-Straße. Albert Leo Schlageter (1894-1923) war als Mitglied der nationalsozialistischen Großdeutschen Arbeiterpartei an mehreren Sprengstoffanschlägen im französisch besetzten Ruhrgebiet beteiligt und wurde wegen dieser Anschläge und Spionage 1923 zum Tode verurteilt und hingerichtet. Während der NS-Zeit galt er als ein “Vorkämpfer der Bewegung”. Bereits 1945 wurde die Straße wieder rückbenannt und erhielt ihren alten Namen Friedrich-Ebert-Straße zurück. Der Geranienweg entstand beim Bau des Wohnpark am Niedersedlitzer Platz und wurde am 7. Oktober 1993 benannt. Wie auch bei einigen älteren benachbarten Straßen erfolgte die Namensgebung nach einer Zierpflanzenart. Sowohl der Gersdorfer Weg als auch der benachbarte Göppersdorfer Weg wurden Mitte der 1970er Jahre beim Bau einer kleinen Eigenheimsiedlung nördlich der Windmühlenstraße angelegt. Die Namensgebung erfolgte am 12. Juli 1973 nach dem Ort Gersdorf, einem Ortsteil von Bahretal im Kreis Pirna (heute Landkreis Sächsische-Schweiz-Osterzgebirge. Göppersdorfer Weg.jpg Der Göppersdorfer Weg entstand gemeinsam mit dem Gersdorfer Weg beim Bau einer Eigenheimsiedlung an der Windmühlenstraße. Am 12. Juli 1973 entschied der Rat der Stadt Dresden, diesen Weg nach der Ortschaft Göppersdorf, heute ein Ortsteil von Bahretal im Landkreis Sächsische Schweiz-Osterzgebirge, zu benennen. Heinrich-Mann-Straße Die Heinrich-Mann-Straße wurde bereits in den Dreißiger Jahren angelegt, bestand damals jedoch nur aus einem kurzen Straßenabschnitt am Rand der Siedlung Windmühlenstraße. Ihren Namen erhielt sie nach dem deutschen Schriftsteller Heinrich Mann (1871-1950), der von den Nazis 1933 ins Exil getrieben wurde und zu den bedeutendsten bürgerlich-humanistischen Autoren des 20. Jahrhunderts gehört. Bekannt wurde er u.a. durch seine Romane “Professor Unrat” und “Der Untertan”. Nach 1980 wurde die Heinrich-Mann-Straße über die Windmühlenstraße hinaus verlängert und bildet seitdem die Zufahrt zu den “Sternhäusern”, einer im Zusammenhang mit dem Neubaugebiet Prohlis entstandenen Wohnsiedlung mit sternförmig angeordneten Zehngeschossern. Dieses Gebiet, welches auf Niedersedlitzer, Prohliser und Lockwitzer Flur liegt, wird heute meist zu Prohlis gerechnet. 2006 wurde mit dem Abriss der “Sternhäuser” begonnen. Hermann-Schmitt-Platz Der Hermann-Schmitt-Platz wurde kurz vor dem Ersten Weltkrieg angelegt und bis 1916 Rosenplatz genannt. Seinen jetzigen Namen verdankt er dem früheren Vorsitzenden der Baugenossenschaft Dresden-Land Hermann Schmitt (1874-1932). Schmitt war ab 1903 im Staatsdienst tätig und übernahm 1923 das Amt des sächsischen Innenministers. Die Gebäude um den Platz und in den angrenzenden Straßen wurden ab 1912 als „Kolonie Niedersedlitz II“ für die Baugenossenschaft Dresden-Land e.G.m.b.H erbaut. Diese hatte kurz zuvor ein ca. 11 Hektar großes Flurstück an der Lugaer Straße für den Bau von Arbeiterwohnhäusern mit Gärten erworben. Ziel war es, nach dem Vorbild der drei Jahre zuvor gegründeten Gartenstadt Hellerau preiswerte Wohnungen für Arbeiter in ruhiger und grüner Umgebung zu schaffen. In Anlehnung an die hier vergebenen Straßennamen wird die Wohnanlage auch als „Blumensiedlung“ bezeichnet. Heute stehen die Häuser unter Denkmalschutz. Kleinborthener Straße Die Kleinborthener Straße, benannt nach einem Kreischaer Ortsteil, wurde in den 50er Jahren angelegt und mit Wohnhäusern bebaut. Auf den verbliebenen Freiflächen in leichter Hanglage entstand ab 2008 eine kleine Eigenheimsiedlung. Kurt-Tucholsky-Straße Im Zusammenhang mit der Erweiterung des Neubaugebietes Prohlis entstanden nach 1980 auch auf Niedersedlitzer Flur einige neue Straßen, darunter die Kurt-Tucholsky-Straße. Ihren Namen erhielt diese Straße nach dem deutschen Schriftsteller und Publizisten Kurt Tucholsky (1890-1935), der vor allem durch seine politisch-satirischen Schriften bekannt wurde. Die nach Ihrem Grundriss als “Sternhäuser” bekannten Zehngeschosser an der Kurt-Tucholsky-Straße wurden 2009/11 abgerissen. Lugaer Straße Die Lugaer Straße verbindet den Ortskern von Niedersedlitz mit dem 1922 eingemeindeten Dorf Großluga. Zunächst wurde sie als Niedersedlitz-Lugaer Communicationsweg, ab 1903 als Lugaer Straße bezeichnet. Diese Namensgebung galt zunächst jedoch nur für den Niedersedlitzer Abschnitt, während die Verlängerung auf Lugaer Flur vor dem Ersten Weltkrieg Niedersedlitzer Straße hieß. Erst mit der Vereinigung beider Orte 1922 erfolgte eine einheitliche und bis heute gültige Namensgebung. Bereits in den 1920er Jahren entstand an der Flurgrenze zwischen beiden Ortsteilen eine kleine Wohnsiedlung, deren Straßen Blumennamen erhielten und welche deshalb im Volksmund als “Blumensiedlung” bezeichnet wird. 1991/94 wurde diese Siedlung um einen Wohnpark erweitert. Die Grundsteinlegung erfolgte am 18. September 1991. Im Mittelpunkt der Anlage mit ca. 300 Wohnungen liegt der neu angelegte Niedersedlitzer Platz mit dem sogenannten “Sachsenstein”. Das Denkmal wurde von Karl-Heinz Seemann geschaffen und zeigt historische Persönlichkeiten und Ereignisse der sächsischen Geschichte (Foto). Hier befindet sich auch das Dienstleistungszentrum der Siedlung mit einigen Läden. Lehrschwimmbecken Niedersedlitz: Das Gebäude an der Lugaer Straße 12 entstand in den 1930er Jahren und beherbergte ab 1938 zunächst die “Filmschau Niedersedlitz” mit ca. 400 Plätzen. Zeitweise ist dieses Kino auch als "Capitol-Lichtspiele" im Adressbuch verzeichnet. Betreiber war der auf der Gartenstraße (heute Lungkwitzer Straße) 16 wohnende Unternehmer Albert Heinze. 1967 endete der Spielbetrieb. Kurz danach erfolgte der Umbau des früheren Kinos zu einer Lehrschwimmhalle. Diese Schwimmhalle blieb bis zum Jahr 2000 erhalten. Nach mehrjährigem Leerstand erfolgte ein Verkauf des Gebäudes und der Umbau zum Wohnhaus mit mehreren Loftwohnungen. Lungkwitzer Straße Die heutige Lungkwitzer Straße verband schon vor ihrem Ausbau als sogenannter "Communicationsweg" Niedersedlitz mit dem benachbarten Sporbitz. 1888 begann der Bau des Abschnitts zwischen Lugaer Straße und Bismarckstraße, der im Anschluss Gartenstraße genannt wurde. Noch bis 1929 war diese Straße eine Privatstraße, bevor sie von der Gemeinde übernommen wurde. Nachdem Niedersedlitz 1950 zu Dresden gekommen war, machte sich eine Umbenennung erforderlich. Ursprünglich war dafür der Name Am Bach (nach dem hier fließenden Lockwitzbach) vorgesehen. Letztlich entschied man sich jedoch für die Namensgebung nach dem Ort Lungkwitz, einem Ortsteil von Kreischa. Das Foto zeigt die Villa Lungkwitzer Straße 4. Maxie-Wander-Straße Die Maxie-Wander-Straße entstand in den 80er Jahren des 20. Jahrhunderts im Zusammenhang mit dem Bau einer neuen Wohnsiedlung. Ihren ursprünglichen Namen Fritz-Selbmann-Straße erhielt sie nach dem Schriftsteller und früheren DDR- Industrieminister Fritz Selbmann, der bis zu seinem Tod 1975 Vizepräsident des DDR-Schriftstellerverbandes war. 1993 wurde sie nach der Schriftstellerin Maxie Wander (1933-1977) benannt. Die aus Österreich stammende Autorin lebte ab 1958 in der DDR und war hier als kritische Journalistin, Fotografin und Drehbuchautorin tätig. Bekannt wurde sie durch ihre kritischen Tonbandprotokolle zur Emanzipation der Frau, die sie unter dem Titel “Guten Morgen, du Schöne” veröffentlichte. Mühlenstraße Die Mühlenstraße gehört zu den ältesten Straßen im Dorfkern von Niedersedlitz. Der Name erinnert an eine frühere Wassermühle und deren hier verlaufenden Mühlgraben. Ursprünglich wurde dieser vom Lockwitzbach gespeist und trieb das Mühlrad an, bevor 1873 der Niedersedlitzer Unternehmer A. Danckelmann auf dem Grundstück eine Dampfmühle einrichtete. Nach 1945 wurden die Gebäude vom VEB Weizenin genutzt. 1992 entstand an der Mühlenstraße/ Ecke Lockwitztalstraße der Wohnpark “Lockwitztal” mit Mehrfamilien- und Bürohäusern. In unmittelbarer Nähe überspannt eine unter Denkmalschutz stehende Bogenbrücke den Lockwitzbach (Foto). Nestroystraße Die Nestroystraße wurde in den Dreißiger Jahren beim Ausbau der Niedersedlitzer Siedlung an der Windmühlenstraße angelegt. Namensgeber war der österreichische Satiriker Johann Nestroy (1801-1862), der durch seine Lustspiele (“Lumpazivagabundus”) bekannt wurde. Niedersedlitzer Straße Die Niedersedlitzer Straße verbindet die Dresdner Stadtteile Reick und Niedersedlitz und geht auf einen alten Kommunikationsweg zwischen diesen beiden Dörfern zurück. Ende des 19. Jh. siedelten sich hier erste Industriebetriebe an, die bis heute das Straßenbild prägen. 1980-85 entstanden im westlichen Teil der Straße einige Wohnblocks des Neubaugebietes Prohlis, 2003 die neue Gleistrasse der Straßenbahn zum Endpunkt Prohlis. Firma Höntsch & Co.: Das Unternehmen wurde 1895 von Georg Höntsch in einer Feldscheune am Rande des Niedersedlitzer Dorfkerns gegründet. Hergestellt wurden Gewächshäuser, Wintergärten, Heizungsanlagen, aber auch Wohnholzhäuser und andere Fertigteilbauten. Bis zum Ersten Weltkrieg entwickelte sich der kleine Handwerksbetrieb zum Großunternehmen mit Geschäftsbeziehungen in aller Welt. U.a. gehörten Zweigbetriebe in der Tschechoslowakei, Österreich, Ungarn, Jugoslawien, Rußland, China und Nordamerika dazu. Zu den markantesten Schöpfungen im Dresdner Raum gehörten die von der Firma errichteten Holzhaussiedlungen in Prohlis (1945 zum Großteil zerstört) und in Stetzsch (Foto). 1946 wurde der Betrieb verstaatlicht und als VEB Hosta-Glas (Holz-, Stahl- und Glasbau Dresden) weitergeführt. Zunächst lag der Schwerpunkt auf der Herstellung von Fertigteilen für den Wiederaufbau, bevor man in den 50er und 60er Jahren zum traditionellen Gewächshausbau zurückkehrte. Ab 1974 war der seit 1969 zum VEB Metallleichtbaukombinat Leipzig gehörende Betrieb Leitunternehmen der Branche in der DDR. Trotz zahlreicher Neuerungen wie der Einführung von Isolierglas und Aluminiumteilen in den Gewächshausbau geriet die Firma nach 1990 in Schwierigkeiten. 1994 übernahm ein schwäbischer Investor den Traditionsbetrieb, der heute unter dem Namen MBM Metallbau Dresden GmbH Fertigteile für die Baubranche herstellt. Teilweise werden auch noch Gewächshäuser gebaut bzw. rekonstruiert wie u.a. das Palmenhaus im Pillnitzer Schlosspark (1992-1994). Pfarrer-Schneider-Straße Die Pfarrer-Schneider-Straße am Rande des Niedersedlitzer Dorfkerns wurde nach 1945 nach dem evangelischen Pfarrer Paul Schneider (1897-1939) benannt. Schneider war im Rheinland tätig und geriet wegen seiner antifaschistischen Haltung schon bald in Konflikt mit dem NS-Regime. Mehrfach strafversetzt wurde er 1937 im KZ Buchenwald inhaftiert, wo er 1939 an den Folgen der Haft verstarb. Gemeindezentrum Niedersedlitz: Das Evangelisch-Lutherische Gemeindezentrum entstand 1982 auf einem bereits 1958 von der Kirche erworbenen Grundstück an der Pfarrer-Schneider-Straße 7. Bereits vor dem Zweiten Weltkrieg hatte es Pläne für eine eigene Kirche gegeben, um den langen Weg zur Leubener Kirche zu verkürzen. Die Grundsteinlegung für den Neubau erfolgte am 13. März 1982, die Weihe am 18. September 1983. Die Bauplanung übernahm der Architekt Dietmar Bach, die Arbeiten erfolgten fast ausschließlich durch die Gemeindemitglieder. Das Gemeindezentrum bietet Platz für 80 Gläubige. Zur Ausstattung gehören ein von Niedersedlitzer Jugendlichen gestalteter Passionszyklus aus Keramik- und Glasmosaiksteinen sowie Altar, Tisch, Lesepult und Leuchter von Werner Juza. Die bereits vor Vollendung des Gebäudes geweihte Orgel wurde von der Firma Eule geschaffen. Neben dem Gemeindezentrum befindet sich ein hölzerner Glockenstuhl, in dem zwei Glocken läuten. Prof.-Billroth-Straße Die Professor-Billroth-Straße entstand im Zusammenhang mit dem Bau neuer Wohnhäuser außerhalb des alten Dorfkerns und erhielt ihren Namen nach dem Mediziner Christian Theodor Billroth (1829-1894). Billroth gehörte zu den bedeutendsten Chirurgen seiner Zeit und führte zahlreiche neue Operationsmethoden in seinem Fachgebiet ein. Fotos: Wohnhäuser an der Prof.-Billroth-Straße / Lugaer Straße Rosenweg Der Rosenweg wurde 1913 im Zusammenhang mit dem Bau der sogenannten “Blumensiedlung” westlich der Lugaer Straße angelegt. Die kleine Wohnanlage entstand nach einem einheitlichen Konzept für die Baugenossenschaft Dresden-Land e.G.m.b.H und umfasst mehrere Reihen- und Doppelhäuser. Markantestes Gebäude ist das Torhaus Rosenweg 23/24. Sowohl der Rosenweg als auch die benachbarten Straßen sind nach Blumen benannt und erinnern damit an die einst in den östlichen Dresdner Vororten ansässigen zahlreichen Gärtnereien. Schongauerstraße Die kurze Schongauerstraße, eine Seitenstraße der Lockwitztalstraße, bildet die Flurgrenze zwischen Lockwitz und Niedersedlitz, die bis zur Eingemeindung 1950 zugleich Dresdner Stadtgrenze war. Sie ist 1935 erstmals im Stadtplan verzeichnet und wurde zunächst nach der Adelsfamilie von Osterhausen Osterhausenstraße genannt. Johann Georg von Osterhausen hatte 1620 die beiden Rittergüter Ober- und Unterlockwitz gekauft und war Bauherr der Lockwitzer Kirche. 1950 erhielt sie nach dem Maler und Kupferstecher Martin Schongauer (um 1435-1491), der neben Dürer zu den bedeutendsten Künstler des Mittelalters gehörte, ihren heutigen Namen. Siemensstraße Die Siemensstraße wurde als Werksstraße des Industriegebietes nördlich der Bahnlinie angelegt und nach dem Techniker und Industriellen Werner von Siemens (1816-1892) benannt. Siemens war auf dem Gebiet der Elektrotechnik tätig und entwickelte u.a. die erste Elektrolokomotive der Welt. In neueren Stadtplänen ist die Straße nicht mehr namentlich erwähnt. Sosaer Straße Die Sosaer Straße wurde Ende des 19. Jahrhunderts angelegt und trug bis zur Eingemeindung von Niedersedlitz den Namen Schulstraße. Hier befand sich das 1876 errichtete Schulhaus und das 1902 eingeweihte Rathaus der Gemeinde. Ihren heutigen Namen verdankt sie der kleinen Gemeinde Sosa im Vogtland, bekannt durch die gleichnamige Talsperre. Nr. 6 (Villa Trummler): Die Villa wurde 1898 für den Rechtsanwalt Horst Trummler errichtet. Architekt des Gebäudes war der junge Max Hans Kühne (1874-1942), der mit dem Haus seinen ersten größeren Bauauftrag realisierte. Später arbeitete er mit seinem Schwiegervater im Architekturbüro Lossow & Kühne zusammen. Zu seinen bedeutendsten Bauten gehören u.a. das Dresdner Schauspielhaus und der Hauptbahnhof in Leipzig. Nach der Fertigstellung des Hauses bezog Trummler die Villa auf der damaligen Schulstraße. Der Jurist war zu dieser Zeit als königlicher-sächsischer Notar tätig. 1903 beurkundete er einen Vergleich zwischen dem Niedersedlitzer Verleger Adalbert Fischer und dem Schriftsteller Karl May. Fischer hatte wenige Jahre zuvor den Münchmeyer-Verlag und damit auch die Rechte an einigen Karl-May-Werken erworben, diese jedoch aus Mays Sicht unerlaubt verändert und nachgedruckt. In den Zwanziger Jahren wohnte der Unternehmer Heinrich Weeren, Inhaber einer Armaturenfabrik und Eisengießerei, in der Villa. Das Unternehmen war während des Zweiten Weltkriegs eng in die Rüstungsindustrie eingebunden und wurde nach 1945 verstaatlicht. Die Villa diente zu DDR-Zeiten als Kindergarten. Heute wird sie, vor einigen Jahren denkmalgerecht saniert, als Kita "Villa Naseweis" genutzt. Im Garten des Hauses befand sich einst ein Zierbrunnen mit einer Darstellung einer "Danaide" aus der griechischen Mythologie. Danaiden wurden die 50 Töchter des Königs Danaos genannt, welche als Strafe für die Ermordung ihrer Ehemänner Wasser in ein durchlöchertes Fass schöpfen mussten. Die Bronzefigur wurde von Johannes Schilling geschaffen und befand sich bis 1945 auf dem Grundstück. 1948 wurde sie ohne das heute verschwundene Brunnenbecken in eine kleine Grünanlage an der Tharandter Straße in Löbtau umgesetzt. Nachdem sie dort mehrfach Opfer von Vandalismus geworden war, kam sie 2009 ins städtische Lapidarium und soll künftig einen neuen Platz finden. Sportplatzstraße Die Sportplatzstraße entstand 1905 als Zufahrtsstraße zum Betriebsgelände des Kunstverlags Krey & Sommerlad und hatte zunächst den Status einer Privatstraße. Die ursprünglich postalisch der Schillerstraße (heute Heidenauer Straße) zugeordnete Straße erhielt nach der Machtübernahme der Nationalsozialisten 1935 die Benennung Hans-Schemm-Straße. Hans Schemm (1891-1935) war Gründer des Nationalsozialistischen Lehrerbundes und Gauleiter der NSDAP in Oberfranken. 1935 kam er bei einem Flugzeugabsturz ums Leben. 1945 erhielt die Straße ihren heutigen Namen, da sie zu einem Sportplatz führt. Dieser wird heute u.a. vom Dresdner Bogenschützenverein und dem Baseballverein Dresden Dukes genutzt. Kunstanstalt Krey & Sommerlad: Bedeutendstes Gebäude ist die frühere Kunstanstalt Krey & Sommerlad. Das Haus (heute Sportplatzstraße 1) entstand zwischen 1903 und 1905 für dieses Unternehmen und beherbergte die Verwaltungs- und Produktionsräume der Firma, die als graphischer Betrieb, Lithografieanstalt und Buch- und Steindruckerei tätig war. Hergestellt wurden vor allem Ansichtskarten, Musterbücher, Werbebroschüren und Plakate (Bild). Zwischen 1911 und 1914 erschien im Verlag die Zeitschrift “Die Kunstwelt”. In den Zwanziger Jahren besaß die Firma zudem eine Genehmigung für den Druck von Wertpapieren. Später wechselten mehrfach die Eigentümer, bevor um 1935 Wilhelm Berg in den Räumen eine Stahlmatratzenfabrik einrichtete. Nach 1945 ging das Unternehmen in staatlichen Besitz über und gehörte als Bettenfabrik zum Kombinat VEB Polstermöbel Oelsa-Rabenau. 2013/14 erfolgte der Umbau der denkmalgeschützten Bauten zu einer Wohnanlage. Straße des 17. Juni Die parallel zur Bahnlinie verlaufende Straße trug bis zur Eingemeindung von Niedersedlitz den Namen Nordstraße. Zur Vermeidung von Verwechslungen mit einer gleichnamigen Straße im Preußischen Viertel erhielt sie 1950 den Namen Hennigsdorfer Straße. Hier entstanden Ende des 19. Jahrhunderts zahlreiche Industriebetriebe, darunter als bedeutendstes Niedersedlitzer Unternehmen das spätere Sachsenwerk. Der Betrieb war 1953 eines der Zentren des Aufstandes in Dresden gegen die herrschenden politischen Zustände in der DDR. Zu den Führern der streikenden Arbeiter gehörte der SPD-Funktionär Wilhelm Grothaus, der später zu einer langjährigen Haftstrafe verurteilt wurde. In Erinnerung an diese Ereignisse wurde die Hennigsdorfer Straße 2003 in Straße des 17. Juni umbenannt. Auf der Straße des 17. Juni Nr. 102c hat seit 1993 die Evangelisch-Freikirchliche Gemeinde Dresden Süd-Ost ihr Gemeindezentrum. Die Religionsgemeinschaft entstand als Ableger der Gemeinde in Striesen und gehört dem Bund Evangelisch-Freikirchlicher Gemeinden BEFG an. Malzfabrik Niedersedlitz: Der Betrieb wurde 1889 als Aktiengesellschaft von den Gebrüdern Pick gegründet und diente zur Versorgung der zahlreichen Dresdner Brauereien mit Braumalz. Die für die Herstellung erforderliche Gerste kam per Schiff über die Elbe nach Kleinzschachwitz, wurde dort entladen und anschließend mit Fuhrwerken nach Niedersedlitz gebracht. Mit der industriellen Malzherstellung entfiel der zuvor notwendige aufwendige Produktionsprozess vor Ort, was zu einer deutlichen Erhöhung der Produktivität der Brauereien beitrug. 1915 und 1956 wurde die Malzfabrik modernisiert und war noch bis nach 1990 in Betrieb. Nr. 26: Das heute nicht mehr vorhandene Gebäude war ab 1902 Sitz des bekannten Münchmeyer-Verlages. Der von Heinrich Gotthold Münchmeyer gegründete Verlag gab hauptsächlich Kolportageromane heraus und wurde vor allem durch seinen populärsten Autor Karl May bekannt. Wirtschaftliche Schwierigkeiten zwangen Münchmeyers Witwe Pauline 1899 zum Verkauf an den Buchhändler Adalbert Fischer. Fischer verlegte den Firmensitz im Juni 1902 nach Niedersedlitz. Hier besaß er auch eine Villa auf der Gartenstraße 4. Wenig später kam es zu einem Streit zwischen Fischer und May, da der Schriftsteller dem Verleger den unerlaubten Nachdruck seiner Werke mit von May nicht autorisierten Änderungen vorwarf. Erst ein vom Niedersedlitzer Rechtsanwalt Trummler beglaubigter Vergleich beendete 1903 den Konflikt. Am 15. Mai des gleichen Jahres gründete Adalbert Fischer den "Belletristischen Verlag Dresden-Niedersedlitz", in dem er u.a. Mays Frühwerke unter dem Titel "Erzgebirgische Dorfgeschichten" veröffentlichte. Nach Fischers Tod 1907 übernahm zunächst seine Witwe, danach sein Schwiegersohn Arthur Schubert die Geschäftsleitung. Nach 1933 firmierte der Verlag unter Regie von Adele Preatorius als "Verlag Das Vaterhaus" und gab u.a. die Illustrierte Roman-Zeitschrift "Das Vaterhaus" heraus. Das frühere Verlagsgebäude wurde 2012 abgerissen. Windmühlenstraße Die Windmühlenstraße wurde als Verbindungsstraße zwischen Niedersedlitz und der alten Pirnaischen Straße (heute Dohnaer Straße angelegt). Ihren Namen verdankt sie der 1825 hier errichteten Holländerwindmühle auf dem Hinterberg. Erst nach dem Ersten Weltkrieg entstanden an der Windmühlenstraße durch eine Baugenossenschaft die ersten Wohnhäuser, die 1935 um eine größere Wohnsiedlung ergänzt wurden. Auf den verbliebenen Freiflächen südlich der Straße errichtete man ab 1980 zehngeschossige Wohnhäuser. Einige dieser wegen ihres Grundrisses “Sternhäuser” genannten Gebäude wurden ab 2005 abgerissen. Holländerwindmühle: Die Niedersedlitzer Windmühle entstand 1825 als Ersatz für die Laubegaster Schiffsmühle. 1859 brannte die Mühle ab, wurde jedoch schon bald wieder aufgebaut. Ursprünglich als Mahlmühle genutzt, diente sie später auch als Holzmühle zur Herstellung von Rohstoffen für die Niedersedlitzer Papier- und Kartonnagenindustrie. 1894 fiel die Windmühle erneut einem Brand zum Opfer und wurde daraufhin abgerissen. Erhalten blieb lediglich das Wohnhaus des früheren Mühlenbesitzer (Windmühlenstraße 49).

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Verlage ohne Adresse:

add_def_ver("v_f_sonntag","Sonntag, Dresden","Fotowerkstätte Sonntag, Dresden Wildermann"); add_def_ver("v_e_sonntag","E. Sonntag, Trachau","Photograph E. Sonntag, Trachau- Dresden"); add_def_ver("v_sowaidnig","Sowaidnig, Dresden","Sowaidnig L.A., Dresden 9"); add_def_ver("v_ce_spahn","Carl Eduard Spahn, Olbernhau","Erzgebirgische Kunstanstalt Carl Eduard Spahn, Olbernhau"); add_def_ver("v_h_stankowski","Hugo Stankowski, Dresden","Fotoverlag Hugo Stankowski, Dresden"); add_def_ver("v_stein","Stein, Dresden","Stein Verlag, Dresden A.1,"+v_adr("seid026","Seidnitzer Str. 26")); add_def_ver("v_w_stein","Wilhelm Stein, Dresden","Kunstverlag Wilhelm Stein, Dresden A.1,"+v_adr("seid026","Seidnitzer Str. 26")); add_def_ver("v_o_steinemann","Otto Steinemann, Dresden","Verlag Otto Steinemann, Dresden,"+v_adr("wils010","Wilsdruffer Straße 10")); add_def_ver("v_steinmann","Steinmann, Dresden","Verlag Photograph Steinmann, Dresden A."); add_def_ver("v_a_steinert","A. E. Steinert, Dresden","Verlag A. E. Steinert, Dresden- A."); add_def_ver("v_m_steinert","M. Steinert, Dresden","Verlag von M. Steinert, Dresden- A., Rosenstr. 28"); add_def_ver("v_stengel","Stengel & Co., Dresden","Stengel & Co., Dresden - Berlin"); add_def_ver("v_st-ma","Stengel & Markert, Dresden"); add_def_ver("v_jf_stiehm","J. F. Stiehm, Berlin"); add_def_ver("v_f_stolz","Friedr. Stolz, Dresden"); add_def_ver("v_f_stiegel","Fritz Stiegel, Weixdorf","Verlag Fritz Stiegel, Weixdorf"); add_def_ver("v_storch","Storch, Dresden","Verlag Storch, Dresden, Wittenb."); add_def_ver("v_a_strauch","Anna Strauch, Coschütz","Buchhandlung Anna Strauch, Coschütz"); add_def_ver("v_w_strauch","Wilh. Strauch, Coschütz"); add_def_ver("v_strauss","Strauss, Weißig","Foto Strauss, Weißig / Dresden"); add_def_ver("v_r_streller","Robert Streller, Dresden","Robert Streller, Lichtbildnerei, Dresden A. 16. Blumenstr. 53?"); add_def_ver("v_h_striezel","Herbert Striezel, Dresden","Verlag herbert Striezel, Dresden A."); add_def_ver("v_e_stroeche","Ed. Ströche, Warnsdorf","Lith. Ed. Ströche, Warnsdorf i. B."); add_def_ver("v_strohfeld","Strohfeld, Dresden","Photo- Werkstatt Strohfeld, Dresden- A. 16,"+v_adr("gero021","Gerokstr. 21")); add_def_ver("v_stroehla","Ströhla, Dresden","Photo- Atelier Ströhla, Dresden- A.,"+v_adr("kreu015","Kreuzstr. 15")); // __t add_def_ver("v_tannera","Tannera, Dresden","Tannera, Dresden A.1"); add_def_ver("v_cw_tasche","C. W. Tasche, Steinhagen"); add_def_ver("v_f_tautz","Franz Tautz, Dresden","Verlag Franz Tautz, Dresden"); add_def_ver("v_f_teicher","Fritz Teicher, Weisser Hirsch","Verlag von Fritz Teicher, Weisser Hirsch"); add_def_ver("v_p_teistler","Paul Teistler, Dresden","Paul Teistler, Dresden A."); add_def_ver("v_h_terp","H. Terp, Niedersedlitz"); add_def_ver("v_o_tetzner","O. Tetzner, Cossebaude","Verlag von O. Tetzner, Buchhandlung, Cossebaude"); add_def_ver("v_b_teubner","B. G. Teubner, Dresden"); add_def_ver("v_f_teuchert","Friedr. Teuchert, Cossebaude","Verlag von Friedr. Teuchert, Cossebaude"); add_def_ver("v_p_thiele","Paul Thiele, Dresden- Cotta","Verlag Paul Thiele, Buchdruckerei Dresden- Cotta"); add_def_ver("v_j_thienemann","J. Thienemann, Dresden","Verlag J. Thienemann, Dresden- A."); add_def_ver("v_j_thomas","Josef Thomas, Dresden","Verlag Josef Thomas, Papierhandlung, Dresden"); add_def_ver("v_m_thuemer","Marle Thümer, Nausslitz","Marle verw. Thümer, Nausslitz"); add_def_ver("v_w_tiedchen","Wilh. Tiedchen, Dresden","Verlag Wilh. Tiedchen, Dresden"); add_def_ver("v_e_tietze","E. Tietze, Dresden","E. Tietze, Dresden- A., Große Plauensche Straße 37"); add_def_ver("v_f_tittel","Friedrich Tittel, Dresden","Verlag Friedrich Tittel, Dresden,"+v_adr("pill051","Pillnitzer Straße 51,53")); add_def_ver("v_trau-claus","Trau & Claus, Dresden"); add_def_ver("v_trau-schwab","Trau & Schwab, Dresden","Trau & Schwab, Dresden 19,"+v_adr("bema023","Bergmannstr. 23")); add_def_ver("v_a_trautmann","A. Trautmann, Borsberg"); add_def_ver("v_o_trebus","O. Trebus, Niedersedlitz","O. Trebus, Schreibwaren, Niedersedlitz"); add_def_ver("v_trenkler","Dr. Trenkler Co., Leipzig"); add_def_ver("v_trinks","Trinks, Leipzig"); add_def_ver("v_h_truemper","Heinrich Trümper, Dresden","Verlag Heinrich Trümper, Dresden- A."); add_def_ver("v_g_tuch","Gustav Tuch, Dresden"); add_def_ver("v_r_tuck","Raphael Tuck & Sons"); add_def_ver("v_e_tuerpe","E. Türpe, Kl. Zschachwitz","Verlag E. Türpe, Kl. Zschachwitz, Königsallee"); // u add_def_ver("v_k_ullrich","Karl Ullrich, Dresden","Photographie Karl Ullrich, Dresden-A.,"+v_adr("rabn005","Rabenerstr. 5")); add_def_ver("v_w_ulrich","Woldemar Ulrich, Dresden","Buchdruckerei Woldemar Ulrich, Dresden- N."); add_def_ver("v_umlauft-treppenhauer","Umlauft & Treppenhauer, Dresden","Verlag f. mod. Rekl., Umlauft & Treppenhauer, Dresden"); add_def_ver("v_a_unland","August Unland, Magdeburg","Verlag August Unland, Magdeburg, Friesenstr. 37 / 1911 Eutin, Weberhain 1"); add_def_ver("v_urania","Urania, Berlin","Graphisches Institut Urania, Berlin"); add_def_ver("v_a_ursinus","Arno Ursinus, Dresden"); add_def_ver("v_uvachrom","Uvachrom München","Uvachrom A.G. für Farbenphotographie, München"); // __v add_def_ver("v_r_valten","R. Valten, Dresden","R. Valten, Dresden 28"); add_def_ver("v_a_velten","A. Velten, Karlsruhe","Kunstverlag A. Velten, Karlsruhe"); add_def_ver("v_p_vibrans","P. Vibrans, Klotzsche- Dresden"); add_def_ver("v_m_voelgnor","M. Vögnor, Dresden","Verlag M. Vögnor, Dresden"); add_def_ver("v_m_voellmer","Max Voellmer, Dresden","Verlag Max Voellmer, Dresden-N.8,"+v_adr("wimi009","Wilhelminenstr. 9")); add_def_ver("v_o_vogel","Otto Vogel, Dresden","Verlag Otto Vogel, Dresden A.16"); add_def_ver("v_a_voigt","Albin Voigt, Dresden"); add_def_ver("v_volkszeitung","Dresdner Volkszeitung","Verlag Dresdner Volkszeitung"); // __w add_def_ver("v_m_waechtler","Martin Wächtler","Verlag Martin Wächtler"); add_def_ver("v_r_wachs","Rich. Wachs, Dresden","Verlag Rich. Wachs, Lichtbildner, Dresden- N.23, Großenhainer Straße 285"); add_def_ver("v_e_wadewitz","E. Wadewitz, Dresden","Kunstverlag E. Wadewitz, Dresden N.6."+v_adr("albe018","Albertstr. 18")); add_def_ver("v_k_wadewitz","K. Wadewitz, Dresden","Kunstverlag K. Wadewitz, Dresden N.6."+v_adr("albe018","Albertstr. 18")); add_def_ver("v_m_wagner","Moritz Wagner, Weissig","Verlag von Moritz Wagner, Weissig"); add_def_ver("v_wallrath","Wallraths Kunstverlag, Dresden","Wallraths Kunstverlag, Dresden-A.3,"+v_adr("albr014","Albrechtstr. 14")); add_def_ver("v_walther","Walther & Co., Dresden","Sächs. Postkartenverlag Walther & Co., Dresden"); add_def_ver("v_ag_walther","A. Walther, Großzschachwitz","Verlag von A. Walther, Großzschachwitz"); add_def_ver("v_a_walther","A. P. Walther, Dresden","Architektur- Photo A. P. Walther, Dresden A. 27"); add_def_ver("v_al_walther","Albert Walther, Dresden","Albert Walther, Dresden- A.,"+v_adr("amal021","Amalienstrasse 21")); add_def_ver("v_g_walther","Georg E. Walther, Dresden","Georg E. Walther, Dresden- A."); add_def_ver("v_l_walther","Luftbild Walther, Dresden","Verlag Luftbild Walther,"+v_adr("reck002","Reckestr. 2,")+"Dresden"); add_def_ver("v_w_wanner","Wilhelm Wanner, Loschwitz"); add_def_ver("v_e_wasmuth","Ernst Wasmuth, Berlin"); add_def_ver("v_m_wax","Max Wax, Dresden","Verlag Max Wax, Dresden, Nicolaistraße"); add_def_ver("v_weber","Weber, Niedersedlitz","Verlag Weber's Buch- und Papierhandlung. Niedersedlitz"); add_def_ver("v_wechselmann-thorschmidt","Wechselmann & Thorschmidt, Dresden","Wechselmann & Thorschmidt, Dresden- A."); add_def_ver("v_h_weener","Henry Weener, Radebeul","Henry Weener, Fotomeister, Radebeul 1, Augustusweg 9"); add_def_ver("v_o_wehlitz","Otto Wehlitz, Dresden","Lichtbildner Otto Wehlitz, Rähnitz- Hellerau / Dresden"); add_def_ver("v_ga_wehnert","G. A. Wehnert, Dresden","G. A. Wehnert, Dresden,"+v_adr("amse048","Am See 48")); add_def_ver("v_a_wehrt","Aug. Wehrt, Braunschweig","Aug. Wehrt, Kunst- Anstalt, Braunschweig"); add_def_ver("v_h_weichert","H. Weichert, Kl.- Zschachwitz","Verlag H. Weichert, Kl.- Zschachwitz"); add_def_ver("v_g_weigang","Gebrüder Weigang, Bautzen","Gebrüder Weigang GmbH, Grossdruckerei, Bautzen"); add_def_ver("v_h_weinhold","Hugo Weinhold, Dresden","Photo Hugo Weinhold, Dresden-N.,"+v_adr("alau104","Alaunstr. 104")); add_def_ver("v_r_weise","Richard Weise, Dresden","Verlag Richard Weise, Buchb. u. Papierhandlg.,"+v_adr("scha030","Schandauerstr. 30")); add_def_ver("v_w_weise","Walther Weise, Dresden","Walther Weise, Dresden A. 16,"+v_adr("rein005","Reinickstr. 5")); add_def_ver("v_j_weitze","Jenny Weitze, Dresden","Verlag Jenny Weitz3, Dresden A.,"+v_adr("wais033","Waisenhausstr. 33")); add_def_ver("v_b_wendler","Bruno Wendler, Blasewitz","Verlag Bruno Wendler, Schillergarten, Blasewitz"); add_def_ver("v_p_welde","Paul Welde, Lockwitz","Verlag Paul Welde, Lockwitz, Drogerie zum Stern"); add_def_ver("v_p_welzel","Paul Welzel, Lockwitz"); add_def_ver("v_welzel","Welzel, Dresden","Welzel- Tiefdruck, Dresden A 47"); add_def_ver("v_ah_werner","A. & H. Werner, Dresden","Verlag A. & H. Werner, Dresden- A. 16"); add_def_ver("v_h_werner","Hermann Werner, Dresden","Verlag Hermann Werner, Dresden A.,"+v_adr("gamb011","Gambrinusstr. 11")); add_def_ver("v_werner","Otto Werner, Leuben","Verlag Otto Werner, Leuben"); add_def_ver("v_w_werner","W. Werner, Dresden","Verlag W. Werner, Dresden A."); add_def_ver("v_b_wertheimer","Bernhard Wertheimer, Frankfurt","Bernhard Wertheimer & Cie., Frankfurt a. M."); add_def_ver("v_m_weydich","Max Weydich, Dresden","Verlag Max Weydich, Dresden- Strehlen"); add_def_ver("v_l_wetzel","Lothar Wetzel, Dresden","Lothar Wetzel, Dresden A.19,"+v_adr("tisc030","Tischerstr. 30")); add_def_ver("v_c_wiedemann","C.F. Wiedemann, Roda","C. F. Wiedemann, Hofl., Roda S.- A."); add_def_ver("v_b_wiehr","Bruno Wiehr, Weißer Hirsch","Bruno Wiehr, Photo- Atelier u. Handlung, Weißer Hirsch, Villa Maria Josefa"); add_def_ver("v_g_wieland","G. Wieland, Weisser Hirsch"); add_def_ver("v_r_wiesner","Rud. Wiesner, Dresden","Verlag von Rud. Wiesner, Papierhandlg., Dresden- N."); add_def_ver("v_f_willig","Willig, Bühlau","Foto- Willig, Dresden Bühlau,"+v_adr("neub011","Neubühlauer Str. 11")); add_def_ver("v_r_windfuhr","Rob. Windfuhr, Dresden","Verlag Rob. Windfuhr, Dresden- A,"+v_adr("grun015","Grunaerstr. 15")); add_def_ver("v_winkler-voigt","Winkler & Voigt, Leipzig","Kunstverlag Winkler & Voigt, Leipzig Liepzig"); add_def_ver("v_e_winkler","E. Winkler, Dresden","E. Winkler, Dresden,"+v_adr("neue017","Neuegasse 17")); add_def_ver("v_ed_winkler","Eduard Winkler, Dresden"); add_def_ver("v_m_winkler","Max Winkler, Dresden","Verlag Max Winkler, -1908"+v_adr("anne004","Annenstraße 4")+"/ -1908"+v_adr("grzw006","Zwingerstraße 6")); add_def_ver("v_o_winkler","Oskar Winkler, Mügeln","Kunstanstalt Oskar Winkler, Mügeln bei Dresden, Bismarckstr. 33, früher Leipzig"); add_def_ver("v_a_winter","A. Winter, Dresden","A. Winter, Dresden- A16,"+v_adr("pfot008","Pfotenhauerstr. 8")); add_def_ver("v_o_winter","Otto Winter, Dresden","Verlag Otto Winter, Dresden- N.,"+v_adr("koen054","Königsbrückerstr. 54")); add_def_ver("v_d_winzer","Dr. Winzer, Dresden","Verlag von Dr. Winzer & Co. Nachf., Emil Fuchs, Dresden"); add_def_ver("v_e_winzer","Emil Winzer & Sohn, Freital","Verlag Emil Winzer & Sohn, Freital- Potschappel"); add_def_ver("v_fa_winzer","F. A. Winzer, Rabenau"); add_def_ver("v_j_winzer","Johanna Winzer, Rabenau"); add_def_ver("v_h_wirthgen","H. Wirthgen, Dresden","Verlag H. Wirthgen, Dresden- A."); add_def_ver("v_wkd","W.K.D."); add_def_ver("v_a_wohlrab","A. Wohlrab, Leutewitz"); add_def_ver("v_wolf-glaeser","Wolf & Gläser, Dresden","Verlag von Wolf & Gläser, Dresden- N. 12"); add_def_ver("v_fa_wolf","F. A. Wolf, Dresden","Buchdruckerei u. Verlag F. A. Wolf, Dresden,"+v_adr("zirk037","Circusstr. 37")); add_def_ver("v_k_wolf","Karl Wolf, Dresden","Verlag Karl Wolf, Dresden, Städt. Schlachthof"); add_def_ver("v_p_wolff","Paul Wolff, Dresden","Paul Wolff, Dresden A 45"); add_def_ver("v_c_worm","Carl Worm, Dresden","Verlag von Carl Worm in Dresden, Waisenhausstraße"); add_def_ver("v_worrings","Worrings- Verlag, Frankfurt","Lith. Kunstanstalt, Worrings- Verlag, Frankfurt a. M."); add_def_ver("v_c_wuensche","C. Wünsche, Dresden-Stetzsch","Verlag C. Wünsche, Dresden-Stetzsch,"+v_adr("mela116","Meißner Landstr. 116")); add_def_ver("v_p_wuensche","Wünsche, Dresden","Photohaus Wünsche, Dresden"); add_def_ver("v_e_wuensche","Emil Wünsche Nachf., Dresden","Photohaus Emil Wünsche Nachf., Dresden"); add_def_ver("v_g_wuensche","G. Wünsche Pillnitz","Verlag G. Wünsche Pillnitz"); add_def_ver("v_a_wugk","A. Wugk, Wilsdruff","Verlag A. Wugk, Wilsdruff Sa."); add_def_ver("v_m_wuestling","Max Wüstling, Dresden","Verlag Max Wüstling, Dresden- A.5"); // __z add_def_ver("v_zander-labisch","Zander & Labisch, Berlin W"); add_def_ver("v_ae_zapp","A. E. Zapp, Dresden","Photo-Verlag A. E. Zapp, Dresden-N."+v_adr("goer047","Görlitzer Str. 47")); add_def_ver("v_zedler-vogel","Zedler & Vogel, Darmstadt"); add_def_ver("v_a_zeibig","Arthur Zeibig","Verlag Arthur Zeibig,"+v_adr("trac064","Trachenbergerstr. 64")); add_def_ver("v_g_zelle","Gg. Zelle, Dresden","Verlag Gg. Zelle, Dresden A. 18"); add_def_ver("v_e_zeppereick","Edmund Zeppereick, Dresden"); add_def_ver("v_g_ziegner","Gebr. Ziegner, Kötzschenbroda"); add_def_ver("v_o_zieher","Ottomar Zieher, München"); add_def_ver("v_c_zierden","Carl Zierden, Neidersedlitz","Verlag Carl Zierden, Neidersedlitz"); add_def_ver("v_zilcken","Zilcken & Co"); add_def_ver("v_b_zillessen","Bertha Zillessen, Bautzen","Verlag von Bertha Zillessen, Bautzen"); add_def_ver("v_zimmass","Zimmaß, Erfurt","Ansichtskarten- Verlag Zimmaß, Erfurt, Neuestr. 12"); add_def_ver("v_ma_zimmer","Marie Zimmer, Kl. Zschachwitz;"); add_def_ver("v_m_zimmermann","Max Zimmermann, Coschütz","Verlag Max Zimmermann, Coschütz, Bismarckstr. Ecke Dresdnerstr."); add_def_ver("v_b_zipfel","B. Zipfel, Dresden","Verlag B. Zipfel, Dresden"); add_def_ver("v_m_zobel","Moritz Zobel, Dresden","Verlag Moritz Zobel, Dresden"); add_def_ver("v_v_zobel","Vorm. Moritz Zobel, Dresden","Dresdner Kunstanstalt Vorm. Moritz Zobel Act. Ges. Dresden"); add_def_ver("v_ms_zocher","M. & S. Zocher, Dresden"); add_def_ver("v_mr_zocher","M. & R. Zocher, Dresden","M. & R. Zocher, Dresden,"+v_adr("anne009","Annenstraße 9")); add_def_ver("v_zoo","Zoologischer Garten zu Dresden","Verlag Aktienverein Zoologischer Garten zu Dresden"); add_def_ver("v_m_zschaler","M. Zschaler, Dobritz- Dresden","Verlag M. Zschaler, Bäckerei & Colonialw. Dobritz- Dresden,"+v_adr("pirl031","Pirnaische Straße 26")); add_def_ver("v_w_zscheile","W. Zscheile, Dresden","W. Zscheile, Reisephoto- Verlag, Dresden- A. 28,"+v_adr("grum035","Grumbacher Straße 35")); add_def_ver("v_f_zwieseler","Franz Zwieseler, Dresden","Kunstverlag Franz Zwieseler, Dresden");

Die Silcherstraße ist eine kurze Straße, die als Sackgasse von der Klotzscher Hauptstraße nach Norden abgeht. Das wird der Graund gewesen sein für die Erstbenennung mit Kurze Straße (in den 1890er Jahren). Eine Kurze Straße gibt es in der Südvorstadt bereits seit 1886. Deshalb wurde nach der Eingemeindung von Klotzsche die gleichnamige Straße im September 1953 umbenannt in Silcherstraße nach dem Komponisten und Förderer des deutschen Volksgesanges Friedrich Silcher (1789–1860) .

Agnes-Smedley-Straße Die Agnes-Smedley-Straße hieß ursprünglich wegen ihres Verlaufs am Weißeritzufer Uferstraße. Nach der Eingemeindung Plauens erhielt sie 1904 den Namen Kielmannseggstraße, der an die Gräfin Auguste Charlotte von Kielmannsegge (1777-1863) erinnerte. Die als Verehrerin Napoleons bekannte Adlige wohnte bis zu ihrem Tod im Wasserpalais des Reisewitz´schen Gartens. Der Park wurde Ende des 19. Jahrhunderts mit Industrieanlagen überbaut. Auch die Wohnhäuser der Kielmannseggstraße entstanden auf einem Teil des ehemaligen Gartengeländes. Im Haus Nr. 11 hatte ab 1906 die von Ida Bienert gestiftete erste Volksbibliothek Sachsens ihr Domizil. Nach 1945 wurde die Straße in Agnes-Smedley-Straße umbenannt. Die amerikanische Schriftstellerin und Journalistin Agnes Smedley (1894-1950) schloss sich in den Zwanziger Jahren der anarchistischen Bewegung an und nahm am Freiheitskampf in Indien und China teil. Zeitweise lebte sie in Berlin. Enge Kontakte unterhielt sie während des Zweiten Weltkrieges zum Agenten Dr. Richard Sorge, der in Japan für den sowjetischen Geheimdienst tätig war. Albert-Schweitzer-Straße Die Straße im südlichen Teil Plauens an der Ortsgrenze zu Coschütz wurde nach dem Ersten Weltkrieg im Zusammenhang mit dem Bau neuer Wohnhäuser angelegt und zunächst nach dem deutschen Philosophen Friedrich Wilhelm Nietzsche (1844-1900) Nietzschestraße genannt. Ursprünglich war sie Teil der geplanten, aber nie realisierten halbkreisförmigen äußeren Ringstraße des Villenviertels. Nach 1920 wurden zwischen Nietzsche-, Bernhard- und Leibnizstraße Mietshäuser des Bauvereins Gartenheim errichtet (Foto). Da Nietzsche vor allem in der Nachkriegszeit als einer der geistigen Wegbereiter der Ideologie des Nationalsozialismus betrachtet wurde, entschied man sich Ende der 1960er Jahre zur Umbenennung in Albert-Schweitzer-Straße. Der Arzt und Theologe Albert Schweitzer (1875-1965) setzte sich Zeit seines Lebens für humanistische Ideale ein und erhielt für seine Verdienste um Frieden und Völkerverständigung 1952 den Friedensnobelpreis. Altplauen Arltstraße Die im Stadtviertel Hohenplauen gelegene Arltstraße erinnert seit 1936 an den Architekten Max Arlt (1876-1933), welcher viele Jahre als Stadtbaudirektor im städtischen Hochbauamt tätig war. Zu seinen wichtigsten Tätigkeiten gehörte die Planung der Großsiedlung Dresden-Trachau 1928-1930. Die Gebäude der Straße, meist zweigeschossige Wohnhäuser, entstanden Mitte der 1930er Jahre. Bamberger Straße Die Bamberger Straße bildet die nördliche Flurgrenze Plauens und wurde deshalb von 1878 bis 1904 Grenzstraße genannt. An den einstigen Verlauf dieser Grenze erinnert noch ein alter, heute eingemauerter Weichbildstein an der Kreuzung Kaitzer / Bamberger Straße mit der Nr. 72 und der Jahreszahl 1729. Nach der Eingemeindung Plauens erfolgte die Umbenennung nach der Stadt Bamberg in Oberfranken. Die ersten Gebäude wurden 1879 errichtet. 1890 verlegte die renommierte Blechwarenfabrik Anton Reiche ihre Produktion auf ein Grundstück an der Bamberger Straße 1 bis 9. Auch die Firma Weinhold & Albrecht, eine von mehreren Schokoladenfabriken in Plauen, hatte hier bis 1933 ihren Sitz (Bamberger Straße 20). Danach nutzte bis 1945 eine Beleuchtungskörperfabrik die Gebäude. Dieser Teil Plauens gehörte zu den am stärksten vom Luftangriff 1945 betroffenen Gebieten, weshalb heute nur noch wenige Reste der ursprünglichen Bebauung vorhanden sind. Zu den 1945 zerstörten Gebäuden gehörte auch das Wohnhaus Hohe Straße 22 / Ecke Bamberger Straße, in dem zwischen 1884 und 1890 der Sozialistenführer August Bebel lebte. Als erstes Haus der Südvorstadt konnte 1952 das Gebäude Bamberger Straße 43 in Privatinitiative wieder aufgebaut werden (Foto). Bernhardstraße Biedermannstraße Die 1876 im Plauener Industrieviertel an der Grenze zur Südvorstadt gelegene Straße trug bis zur Eingemeindung den Namen Florastraße. Grund für diese Namensgebung waren mehrere Gärtnereien in diesem Gebiet. Um Verwechslungen mit einer gleichnamigen Straße in Dresden zu vermeiden, erfolgte 1904 die Umbenennung in Biedermannstraße. Woldemar von Biedermann (1817-1903) war im Staatsdienst tätig und wurde vor allem als Goethe- Forscher bekannt. An der Biedermannstraße siedelten sich Ende des 19. Jahrhunderts einige gewerbliche Unternehmungen an. Hier befand sich bis 1913 das Plauener Elektrizitätswerk, dessen Gebäude danach einer Erweiterung der Dresdner Milchversorgungsanstalt weichen mussten. Auf dem Grundstück Biedermannstraße 8 hatte von 1877 bis 1927 die Maschinenfabrik Vogel & Schlegel ihren Sitz. Maschinenfabrik Vogel & Schlegel: Das Unternehmen wurde 1877 von Oskar Vogel und Friedrich Ernst Schlegel auf der Oberseergasse in der Nähe der Prager Straße als Reparaturwerkstatt für Maschinenbau.gegründet. Da die beengten Platzverhältnisse in der Innenstadt eine Erweiterung unmöglich machten, erwarben die beiden Unternehmer 1889 ein Grundstück in Plauen, um hier ein neues Fabrikgebäude zu errichten. Zu dieser Zeit waren bereits 50 Arbeiter im Betrieb beschäftigt. Hergestellt wurden verschiedene Maschinenteile, Wellen, Turbinen und Kupplungen. Für ihre Produkte erhielt die Firma Vogel und Schlegel 1894 den Ehrenpreis der Stadt Dresden für hervorragende Leistungen. Weitere Gold- und Silbermedaillen folgten später auf verschiedenen Ausstellungen. 1912 erwarb das Unternehmen ein weiteres Areal in der Gemeinde Döhlen (seit 1921 Stadtteil von Freital). Nach dem Tod Oskar Vogels wurde die Firma 1920 in eine GmbH umgewandelt und beschäftigte nun über 200 Angestellte. Im Zuge der Verstaatlichung der meisten Betriebe in der DDR kam das Unternehmen 1952 als Betriebsteil zum VEB Kupplungswerk- und Triebwerksbau und gehörte ab 1982 zum VEB Kupplungswerk Dresden, dessen Nachfolgebetrieb noch heute als KWD Kupplungswerk Dresden GmbH existiert. Das frühere Plauener Betriebsgrundstück an der Biedermannstraße wird jetzt von verschiedenen Kleinunternehmen genutzt. Bienertstraße Die 1871 angelegte Bienertstraße erhielt ihren Namen nach dem Plauener Mühlenbesitzer Gottlieb Traugott Bienert (1813-1894), der 1852 die frühere Hofmühle übernommen hatte. Bienert war wichtigster Förderer der Gemeinde Plauen und trat als Stifter öffentlicher Einrichtungen wie Schule, Kindergarten und Rathaus in Erscheinung. Auch seine Söhne Erwin und Theodor und die Schwiegertochter Ida Bienert engagierten sich auf kulturellem und sozialem Gebiet. Die Familiengrabstätte befindet sich auf dem Inneren Plauenschen Friedhof an der Kirche. Im letzten Drittel des 19. Jahrhunderts wurden die Flächen östlich des Dorfkerns parzelliert und für eine Bebauung freigegeben. Die Bienertstraße gehörte dabei zu den ersten in diesem Zusamenhang neu angelegten Straßen. Ab 1872 entstanden hier Wohnhäuser und Villen, meist in offener Bauweise. Bauherren waren meist einheimische Fabrikanten wie der Ziegeleibesitzer Bossecker, der sich um 1880 ein Wohnhaus an der Ecke Hohe Straße (Bienertstraße 35) errichten ließ. Hinzu kamen einige gewerbliche Unternehmen. Zu den wichtigen Industriebetrieben Plauens gehörte bis zur Zerstörung 1945 die Schokoladenfabrik Petzold & Aulhorn (Bienertstraße 1), die 1897 auf dem Gelände des Reisewitz´schen Gartens entstanden war. An diesen erinnerte auch der Name des früher im Eckhaus zur Tharandter Straße befindlichen Restaurants “Zum alten Reisewitzer Park”. Eine weitere Gaststätte “Knäsels Restaurant” befand sich auf der Bienertstraße 6 an der Einmündung der Kielmannseggstraße (Agnes-Smedley-Straße - Foto). Auch das Haus Bienertstraße 55 (Ecke Münchner Straße) diente bereits seit ca. 1900 als Restaurant “Münchner Krug”. 1945 fielen mehrere Gebäude den Bomben zum Opfer. In der Nachkriegszeit wurde die Bienertstraße in Kronacher Straße umbenannt, erhielt jedoch 1991 ihren früheren Namen wieder zurück. Die beim Hochwasser 2002 schwer beschädigte denkmalgeschützte Weißeritzbrücke aus dem Jahr 1898 wurde 2008 saniert und wird seitdem nur noch als Fußgängerbrücke genutzt. Fotos: Eckhaus mit ehemaliger Gaststätte “Zum alten Reisewitzer Park” (links) - historische Weißeritzbrücke (Mitte) - Villa Bossecker um 1930 (Nr. 35 - rechts) Chemnitzer Straße Coschützer Straße Die heutige Coschützer Straße wurde 1844 als Chaussee ausgebaut und ersetzte einen alten und wegen der starken Steigung schwer zu bewältigenden Fahrweg über die heutige Gitterseestraße. 1865 erhielt sie als eine der ersten Straßen Plauens ihren Namen nach dem benachbarten Dorf Coschütz. Noch bis Ende des 19. Jahrhunderts wurden die Flächen fast ausschließlich landwirtschaftlich genutzt. Zu den ersten Gebäuden gehörte die 1862 gegründete Schankwirtschaft am Hohen Stein mit ihrem Aussichtsturm. Wenig später begann die Bebauung der Straße mit Mietshäusern. Unter Denkmalschutz steht u.a. das vom Dresdner Spar- und Bauverein errichtete Wohnhaus Coschützer Straße 54-56 (“Plaut-Haus” - Foto). Das für die Bebauung weniger geeignete Areal an der Felskante des Plauenschen Grundes wurde ab 1906 vom Mühlenbesitzer Erwin Bienert erworben und als Parkanlage gestaltet. Mädchenheim (Nr. 58): Das Gebäude entstand 1897 an der Flurgrenze zu Coschütz zur Unterbringung von elternlosen Mädchen und alleinstehenden Fabrikarbeiterinnen. Anfangs lebten hier bis zu 100 Bewohnerinnen. Bereits 1901 erfolgte jedoch die Umwandlung in ein Altersheim, welches bis heute existiert. 1995 wurde das Seniorenheim um einen modernen Anbau an der Hofseite erweitert. Nr. 65: Das markante Gebäude mit seinen beiden Giebeln zur Straßenseite wurde 1889 als “Versorghaus” der Gemeinde Plauen erbaut und diente als Unterkunft für die Armen des Ortes. Im Inneren befanden sich Krankenstuben für alte bzw. pflegebedürftige Bewohner. Später wurde es als Wohnhaus genutzt. Fotos: Das heute als Seniorenheim genutzte Mädchenheim (links und Mitte) und das Plauener “Versorghaus” (rechts) F.-C.-Weiskopf-Platz An Stelle des heutigen F.-C.-Weiskopf-Platzes befand sich ursprünglich der Dorfplatz des Plauener Oberdorfes. Um den hier gelegenen Dorfteich standen die meisten Gehöfte des Ortes, darunter das 1608 entstandene Freigut zwischen Chemnitzer und Klingenberger Straße und die alte Schmiede an der Ecke zur Reckestraße. Im Zuge der Entwicklung Plauens zum städtischen Wohnvorort wurde der Teich 1875 verfüllt und die Gebäude bis zur Jahrhundertwende 1900 abgetragen. An ihrer Stelle errichteten verschiedene Bauherren mehrgeschossige Wohn- und Geschäftshäuser im Stil der Gründerzeit, zum Teil mit reich verzierten Jugendstilfassaden. Fotos: Das ehemalige Kobisch-Gut an der Südseite des Platzes kurz vor seinem Abriss 1902 (links); Gebäude an der West- und Südseite um 1910, in der Bildmitte das 1945 zerstörte Haus mit der Gaststätte “Zum Müllerbrunnen” (rechts) Nach dem Bau des Plauener Rathauses erhielt der Dorfplatz 1897 zunächst den Namen Rathausplatz und wurde 1911 in Chemnitzer Platz umbenannt. Der 1902 hier aufgestellte Müllerbrunnen ist bis heute ein Wahrzeichen des Stadtteils geblieben. Ab 1909 verkehrte die Straßenbahn bis zum Rathausplatz. 1927 folgte eine weitere Verbindung über Altplauen bis zur Tharandter Straße. Die Häuser an der Westseite des Platzes mit dem Restaurant “Zum Müllerbrunnen” sowie ein Wohnhaus an der Nordseite wurden 1945 beim Bombenangriff zerstört und um 1960 sowie 1998 durch Neubauten ersetzt. 1953 erhielten der Chemnitzer Platz sowie die benachbarte Chemnitzer Straße den Namen des Schriftstellers Franz Carl Weiskopf (1900-1955). Weiskopf wurde vor allem durch seine politischen Romane (“Abschied vom Frieden”) und Reportagen bekannt und musste 1933 vor den Nazis emigrieren. Nach 1945 war er zunächst im diplomatischen Dienst der Tschechoslowakei tätig und lebte ab 1953 in der DDR. Hier war er bis zu seinem Tod als Vorstand des Schriftstellerverbandes aktiv. Während die Namensgebung der Straße nach 1990 wieder rückgängig gemacht wurde, trägt der F.-C.-Weiskopf- Platz bis heute diesen Namen. Mitte der 1990er Jahre wurde mit der Schließung der vorhandenen Baulücken begonnen (Foto), so dass sich der Platz wieder zu einem Geschäftszentrum Plauens entwickelt hat. An der Südseite wurde 2006 der Neubau eines Altenpflegeheimes eingeweiht. Außerdem ist der F.-C.-Weiskopf- Platz als Verkehrsknoten von Bedeutung. Friedrich-Hegel-Straße Die im Jahr 1888 angelegte Friedrich-Hegel-Straße wurde ursprünglich als Daheim-Straße bezeichnet, da eine 1872 gegründete gleichnamige Baugenossenschaft hier die ersten Wohnhäuser errichtet hatte. 1946 erhielt sie ihren jetzigen Namen nach dem deutschen Philosophen Friedrich Hegel. Hegel (1770-1831) begründete das philosophische System des dialektischen “Dreischritts” und stellte die Bedeutung des Staates als Verwirklichung einer sittlichen Idee heraus. Bis heute prägen zahlreiche villenartige Mehrfamilienhäuser aus der Gründungszeit des Stadtteils Hohenplauen um 1884 das Straßenbild. Ursprünglich war zwischen Plauenschem Ring und Kaitzer Straße der Bau einer weiteren Kirche für den stark gewachsenen Ort geplant. Bedingt durch den Ersten Weltkrieg wurden diese jedoch nicht umgesetzt. Stattdessen errichtete man Ende der Zwanziger Jahre auf dem Grundstück weitere Mehrfamilienhäuser. Zu den Bewohnern der Friedrich-Hegel- Straße gehörten einige Professoren der Technischen Hochschule, u.a. Heinrich Barkhausen (Nr. 10), Ewald Sachsenberg (Nr. 21), Hugo Eckardt (Nr. 27) und Helmut Heinrich (Nr. 31). Gitterseestraße Die heutige Gitterseestraße geht auf einen alten Reit- und Fahrweg zurück, der die Dörfer Plauen und Coschütz miteinander verband. Vor der Eingemeindung trug sie ab 1873 den Namen Gartenstraße, da sich hier der gemeindeeigene Obstgarten befand. Dieser wurde 1711 vom Dorfrichter Ehrlich angelegt und mit Obstbäumen bepflanzt. Nach dem Tod Ehrlichs erfolgte eine Aufteilung des Areals an die Bauern des Dorfes, die in diesem Teil des Ortes bis Ende des 19. Jahrhunderts Obst- und Gartenbau betrieben. 1904 wurde die Straße nach dem benachbarten Ort Gittersee benannt und mit Wohnhäusern bebaut.. Ältestes noch erhaltenes Gebäude ist das Haus Gitterseestraße 18, erbaut um 1865. Später befand sich hier viele Jahre das Volksbad Plauen. 1914 wurde das Wohn- und Geschäftshaus Nr. 7 errichtet. Die Erdgeschossräume nutzte nach der Fertigstellung die 23. Polizei-Bezirkswache der Dresdner Polizei. Heute befinden sich hier Gewerberäume. Großmannstraße Die Großmannstraße wurde im Zusammenhang mit der Schaffung des Fichteparkes angelegt. Ihren Namen verdankt sie dem früheren Plauener Gemeindevorstand Karl Gustav Großmann (1843-1900), der sein Amt ab 1876 ausübte. Unter seiner Führung entwickelte sich Plauen zum wichtigen Industrie- und Wohnvorort Dresdens. Großmanns Grab befindet sich auf dem Äußeren Plauenschen Friedhof. An der Großmannstraße blieben bis zur Gegenwart einige Villen aus der Zeit um 1900 erhalten. An der Ecke zur Bernhardstraße befand sich ab 1895 die Gaststätte “Parkschänke”. 1918 zum Wohnhaus umgebaut, fiel das Gebäude 1945 dem Luftangriff zum Opfer. Architektonisch interessant ist die Villa Nr. 5 an der Ecke zur Westendstraße (erbaut 1905). Halbkreisstraße Die nach ihrer Straßenführung benannte Halbkreisstraße in Hohenplauen erinnert an die frühen Bebauungspläne der Dresdner Westend AG. Ursprünglich war die Anlage eines parallel-halbkreisförmigen Straßennetzes in diesem Bereich geplant, in dessen Zentrum der Westendpark (heute Fichtepark) lag. Die Halbkreisstraße bildete in diesem Projekt den inneren, der Plauensche Ring sowie die Albert-Schweitzer-Straße den äußeren Kreis des Baugebietes. Bedingt durch den Ersten Weltkrieg konnte dieses Vorhaben jedoch nicht vollendet werden. Erst in den Zwanziger Jahren entstanden weitere Wohnhäuser, die sich jedoch nur teilweise an den ursprünglichen Absichten orientierten. Architektonisch interessant sind die um 1900 entstandenen Wohnhäuser Halbkreisstraße Nr. 7, 12 und 14, welche an den Fassaden verschiedene Jugendstilelemente aufweisen. Im Haus Nr. 3 befand sich einst das private Töchter-Bildungsinstitut von Willibald Rother. 1945 fiel das Haus den Bomben zum Opfer und wurde nach 1960 durch einen Neubau ersetzt. Fotos: Blick in die Halbkreisstraße um 1900 und 2003 Hantzschstraße Die Hantzschstraße wurde 1934 nach dem Ornithologen und Polarforscher Bernhard Adolf Hantzsch (1875-1911) benannt. Hantzsch war zwischen 1898 und 1909 als Lehrer an der XV. Bürgerschule in Plauen angestellt und kam im Juni 1911 bei einer Expedition in der Nähe der Baffin-Insel in Nordkanada ums Leben. Sein Vater Adolf Hantzsch (1841-1920) gehörte zu den Mitbegründern des Vereins für Geschichte Dresdens. Bis zum Beginn des Zweiten Weltkriegs wurden hier mehrere zweigeschossige Wohnhäuser erbaut. 1945 kam es auch in diesem Viertel zu einigen Schäden, so dass ein Teil der Gebäude in der Nachkriegszeit durch Neubauten ersetzt werden musste. Hegerstraße Die Hegerstraße wurde nach der Plauener Gutsbesitzerwitwe Amalie Wilhelmine Heger (1800-1877) benannt. Bei ihrem Tod hinterließ sie der Gemeinde 56.000 Mark als Stiftung für eine Kinderbewahranstalt, Vorläufer der späteren Kindergärten. 1883 konnte die Kinderbewahr- und Beschäftigungsanstalt der Heger-Bienert-Stiftung an der Nöthnitzer Straße 4 eingeweiht werden. Foto: Blick in die Hegerstraße Hofmühlenstraße Hohe Straße Kaitzer Straße Kantstraße Die heutige Kantstraße hieß bis 1904 Seminarstraße, da sich hier das 1896 eröffnete Königliche Lehrerseminar befand. Der Name erinnert an den bedeutenden deutschen Philosophen Immanuel Kant (1724-1804). Kant gilt als bedeutendster Vertreter der klassischen deutschen Philosophie und wurde vor allem durch seine “Kritik der reinen Vernunft” bekannt. Im ehemaligen Seminargebäude hat heute das Gymnasium Dresden-Plauen seinen Sitz. Klingenberger Straße Die Klingenberger Straße, benannt nach dem kleinen Ort Klingenberg im Weißeritzkreis, trug vor 1904 den Namen Poststraße, da sich hier das Postamt des Ortes befand. Zwischen Klingenberger und Chemnitzer Straße stand bis zum Abbruch 1895 das Freigut, welches sich zuletzt im Besitz der Familie Moses befand und größtes bäuerliches Anwesen Plauens war. Später wurden an seiner Stelle repräsentative Mietshäuser errichtet. Die Westseite der Straße erhielt ihr heutiges Bild nach dem Ersten Weltkrieg, als hier weitere Mehrfamilienhäuser entstanden. Kotteweg Der Kotteweg im Wohngebiet Hohenplauen entstand in den Zwanziger Jahren und erhielt seinen Namen nach dem Dresdner Stadtverordneten Gustav Kotte (1844-1925). Kotte war zugleich Vorsitzender des Bürgervereins Dresden-Plauen. Krausestraße Die Krausestraße oberhalb des Inneren Plauenschen Friedhofes wurde 1876 als Schulstraße angelegt, da sich hier das alte Plauener Schulhaus befand. Das historische Gebäude wurde 1903 wegen Baufälligkeit abgerissen. Ihren heutigen, nach der Eingemeindung des Ortes nach Dresden eingeführten, Namen verdankt sie dem Philosophen Karl Christian Friedrich Krause (1781-1832). Krause verbrachte viele Jahre seines Lebens in Dresden und war als Privatdozent tätig. Sein wichtigstes Werk “Das Urbild der Menschheit” wurde im 19. Jahrhundert vor allem in Spanien und Lateinamerika populär. An der Südseite der Krausestraße steht das 1878 errichtete Pfarrhaus der Auferstehungskirche (Nr. 3). Das eingeschossige Gebäude besitzt zwei Wohnungen. Auf dem Nachbargrundstück wurde 1997 ein kirchlicher Kindergarten gebaut. Gegenüber befindet sich die einstige Feuerwache Plauens (Foto) . Das Haus, zu welchem ursprünglich ein heute nicht mehr vorhandener Wach- und Schlauchturm gehörte, wurde in den 1930er Jahren umgebaut und aufgestockt. In den früheren Fahrzeughallen befindet sich heute eine Kfz-Werkstatt. Leibnizstraße Die Leibnizstraße wurde im Zusammenhang mit der Erschließung des Villenviertels Hohenplauen angelegt, jedoch erst in den 1920er und 30er Jahren mit Mehrfamilienhäusern bebaut. Initiator der Siedlung zwischen Leibniz- und Nietzschestraße (heute Albert-Schweitzer-Straße) war der genossenschaftlich organisierte Bauverein Gartenheim. Ihren Namen erhielt die Straße nach dem deutschen Gelehrten Gottfried Wilhelm Leibniz (1646-1716), der zu den wichtigsten Vertretern der Frühaufklärung gehörte. Leibniz befasste sich mit philosophischen Fragen, aber auch mit mathematischen und physikalischen Fragen und begründete die Differential- und Integralrechnung. Lotzestraße Die Lotzestraße entstand in den Zwanziger Jahren in der Nähe des Plauenschen Rings und wurde nach dem Philosophen Rudolf Hermann Lotze (1817-1881) benannt. Der aus Bautzen stammende Gelehrte gilt als Vertreter der vor dem Ersten Weltkrieg populären Lehre der “induktiven Metapysik”, welche moderne wissenschaftliche Erkenntnisse mit religiösen Glaubensvorstellungen in Einklang zu bringen versuchte. 2011 entstand auf dem Areal eines früheren Garagenkomplexes zwischen Lotzestraße und Passauer Straße ein kleines Wohngebiet mit Einfamilienhäusern und einer Kita. Architektonisch interessant ist das von Steffen Pape entworfene Haus Nr. 7, welches 2013 mit dem “Baupreis Plauen” prämiert wurde. Nöthnitzer Straße Pestitzer Straße Die Pestitzer Straße im Ortsteil Hohenplauen erhielt ihren Namen nach dem Bauernweiler (Klein-) Pestitz zwischen Räcknitz und Mockritz. Seit Mitte des 19. Jahrhunderts waren die Flächen Standort der Ziegelei Bossecker. Die Firma gehörte zu den einst drei Ziegeleibetrieben auf Plauener Flur. Nach Erschöpfung der Lehmvorkommen verlegte man deren Betrieb zur Nöthnitzer Straße. Teile der früheren Ziegeleigebäude wurden später von einem Fuhrunternehmen genutzt und 2005 zugunsten eines Wohnhauses abgebrochen. Erhalten blieb die Villa des einstigen Besitzers an der Bienertstraße 35. Nach Aufgabe des Ziegeleibetriebes entstanden an der Pestitzer Straße mehrgeschossige Mietshäuser. Plauenscher Ring Der bis 1904 Ringstraße genannte Plauensche Ring wurde 1873 als Auftakt für das geplante Villenviertel Hohenplauen durch die Baugesellschaft Dresdner Westend angelegt. Unter Ausnutzung des Geländes war ein teilweise bogenförmiges Straßennetz vorgesehen, welches jedoch nur in Ansätzen realisiert wurde. Ab 1897 endete hier die Straßenbahn, die 1927 bis Coschütz verlängert wurde. In diesem Zusammenhang entstand auch die Haarnadelkurve am Übergang des Plauenschen Rings in den Westendring. Hier ereignete sich am 9. Dezember 1959 das schwerste Unglück in der Geschichte der Dresdner Straßenbahn, bei dem neun Menschen ums Leben kamen. Ein Wagen der Linie 11 war auf der abschüssigen Trasse aus der Kurve getragen worden und gegen einen Betonmast geprallt. Der Streckenabschnitt auf dem Plauenschen Ring wurde 1999 nach Fertigstellung der neuen Gleistrasse zur Münchner Straße stillgelegt. Bis zur Jahrhundertwende entstanden an der nördlichen Seite der Ringstraße zahlreiche Mehrfamilienhäuser, teilweise mit kleinen Läden im Erdgeschoss. Hier finden sich auch einige Gaststätten wie das Lokal “Keller” (Nr. 9) und die 1995 eröffnete bekannte Szenekneipe “Paul Rackwitz” (Nr. 33). Das in einem früheren Kolonialwarenladen befindliche und nach dessen einstigem Besitzer benannte Lokal schloss im Juli 2015 seine Pforten. Auch im Eckhaus Nr. 10 gab es mit der “Räuberschänke” zeitweise eine Gastwirtschaft. Nach dem Ersten Weltkrieg setzte sich die Bebauung der Ringstraße in Richtung Coschütz fort. Noch heute lassen die unterschiedlichen Stilformen der Wohnhäuser den Wandel der Architekturauffassung gut erkennen. Fotos: Das 1945 zerstörte Eckhaus zur Kaitzer Straße aus der Zeit vor 1900. Nach 1945 befand sich auf dem Grundstück der Schulgarten der 55. Polytechnischen Oberschule (links) - Das Eckhaus zur Bernhardstraße mit der Kneipe “Paul Rackwitz” (rechts). Reckestraße Die Reckestraße, vor 1904 Elisenstraße genannt, wurde 1873 durch die Baugesellschaft Dresdner Westend angelegt und mit Wohnhäusern bebaut. Ihren Namen erhielt sie nach der Lyrikerin Elisa von der Recke (1756-1833), die im 19. Jahrhundert Mittelpunkt eines Künstlerkreises war, dem auch ihr Lebensgefährte Christoph August Tiedge und Carl Maria von Weber angehörten. Markantestes Gebäude an der Reckestraße ist neben der Kirche das 1912 von Hans Erlwein und Max Wrba entworfene Gemeindehaus der Auferstehungskirche(Foto). Im Wohnhaus Reckestraße 5 entstand nach 1990 die Restauration Kielmannsegge, deren Name an die Gräfin Kielmannsegge, eine Geliebte Napoleons, erinnerte. Später existierte zeitweise die Gaststätte “Hola` Paraguay” mit südamerikanischer Küche, bevor in die Räume das italienische Restaurant “Il Grottino” einzog. Schleiermacherstraße Die Schleiermacherstraße beginnt an der Plauener Kirche und endet in der Nähe des Naturdenkmals Hoher Stein im oberen Teil von Plauen. Bis 1904 wurde sie Lutherstraße genannt. Der heutige Name erinnert an den deutschen Theologen und Religionsphilosophen Friedrich Schleiermacher (1768-1834), der auch mit reformpädagogischen Gedanken für Aufsehen sorgte. Bemerkenswertestes Gebäude ist das 1875/76 erbaute Schulhaus, welches heute von der 39. Grundschule genutzt wird. Ein Erweiterungsbau entstand 1898. Oberhalb dieser Schule liegt der vom Sohn des Mühlenbesitzers gestiftete Bienertpark. Im Sommer 1913 wurde an der Schleiermacherstraße bei Kanalarbeiten eine Wohngrube der sogenannten “Billendorfer Kultur” (um 800 v. Chr.) entdeckt. Schopenhauerstraße Die um 1900 angelegte Gostritzer Straße im oberen Teil von Plauen erhielt nach der Eingemeindung des Ortes den Namen des deutschen Philosophen Arthur Schopenhauer (1788-1860). Schopenhauer vertrat eine die Welt als Vorstellung und ihre Kräfte als Äußerung eines allgemeinen Urwillens auffassende Theorie und gehörte seit Mitte des 19. Jahrhunderts zu den wichtigsten Vertretern der deutschen Philosophie. Um 1905 entstanden an der Schopenhauerstraße die ersten villenartigen Wohnhäuser. Außerdem gab es unterhalb der Straße vor dem Ersten Weltkrieg eine Ziegelei. Die durch den Lehmabbau entstandene Senke zwischen Hoher Straße und Kaitzer Straße wurde erst um 1970 und nach 1990 mit Wohnhäusern bebaut. Nr. 1 / 3: Die beiden Wohnhäuser dienten in der unmittelbaren Nachkriegszeit zwischen Juli 1945 und Februar 1947 als sowjetische Ortskommandantur im 6. Rayon. Dazu waren die deutschen Bewohner zum Auszug gezwungen worden und durften erst nach Räumung der Gebäude in ihre Wohnungen zurück. Nr. 5: Zwischen 1909 und 1914 wohnte im 1. Obergeschoss dieses Hauses der aus Dänemark stammende Schriftsteller Karl Gjellerup mit seiner Frau Nina. Gjellerup war nach seiner Hochzeit mit der aus Dresden stammenden und bereits zuvor verheirateten Eugenia Bendix 1892 in die sächsische Residenz übergesiedelt. Für sein in Dresden entstandenes Werk “Der Pilger Kamanita” (1906) erhielt er 1917 den Literaturnobelpreis. Vom Preisgeld erwarb er die Villa Goethestraße 11 in Klotzsche, wo er bis zu seinem Tod 1919 lebte. Steinadlerstraße Die Steinadlerstraße in der Nähe des Fichteparks wurde in Abweichung vom ursprünglichen Bebauungsplan für Hohenplauen um 1930 angelegt. Wenig später wurden hier Ein- und Mehrfamilienhäuser erbaut, welche bis zur Gegenwart weitgehend im Ursprungszustand erhalten blieben. Tharandter Straße Westendring Der Westendring entstand 1874 in Verlängerung der Ringstraße (ab 1904 Plauenscher Ring) und bildete zugleich die östliche Begrenzung des Villenviertels der Baugesellschaft “Dresdner Westend”. Nach dem Ersten Weltkrieg wurden auch in diesem Bereich Hohenplauens, Wohnhäuser erbaut. Rund um den Fichtepark prägen bis heute vor allem Einfamilienhäuser das Stadtbild. Auf der gegenüberliegenden Seite entstand ab 1980 das Wohngebiet Cämmerswalder Straße. Ab 1927 verkehrte hier die bis nach Coschütz verlängerte Straßenbahn, welche 1999 über die neu angelegte Passauer Straße eine direkte Verbindung zur Münchner Straße erhielt. Zuvor mussten die Bahnen vom Westendring über eine scharfe Haarnadelkurve in den Plauenschen Ring einbiegen. Diese Stelle gehörte zu den gefährlichsten Stellen im Streckennetz und war 1959 Ort eines tragischen Unfalls. Ein Hechtwagen war bergabwärts von Coschütz kommend an dieser Stelle entgleist, wobei 11 Menschen ums Leben kamen. Liepschs Ruhe: In der Nähe der Straßenbahnhaltestelle Cämmerswalder Straße befindet sich ein kleiner Aussichtspunkt mit einer Stützmauer am Hang, Treppenanlage und integrierter Straßenbahnwartehalle. Die Anlage geht auf einen 1880 vom Plauener Baumeister Hermann Blauert angelegten Ruheplatz zurück, der nach dessen Freund Max Liepsch, Besitzer der Zeitung “Dresdner Nachrichten”, den Namen Liepschs Ruhe erhielt. Blauert ließ dort vier Linden anpflanzen und eine steinerne Ruhebank aufstellen. Ganz in der Nähe weist ein Grenzstein auf die hier verlaufende Flurgrenze zu Kleinpestitz hin. An Liepschs Ruhe begann zudem ein als “Langer Rain” bezeichneter Fußweg nach Kaitz. Im Zusammenhang mit dem Ausbau der Straßenbahntrasse nach Coschütz und der Bebauung der Fluren von Hohenplauen wurde die Anlage Anfang der Dreißiger Jahre umgestaltet und erhielt dabei ihr heutiges Aussehen. Mit finanzieller Hilfe der Bienert-Stiftung entstand zugleich ein Promenadenweg parallel zum Westendring, der Auftakt für eine größere Parkanlage sein sollte. Der Bezirksverein Dresden-Plauen ließ dazu mehrere Spazierwege anlegen, steinerne Wegweiser aufstellen und eine Bepflanzung des Areals vorbereiten. Kriegsbedingt konnten diese Planungen jedoch nicht weiter realisiert werden. Nach 1980 entstand stattdessen das Neubaugebiet Cämmerswalder Straße mit mehrgeschossigen Plattenbauten. Westendstraße Ebenso wie der benachbarte Westendring erhielt auch die Westendstraße ihren Namen nach dem 1872 gegründeten Bauverein Westend, der bis zum Ende des 19. Jahrhunderts die Freiflächen in diesem Bereich parzellierte und als Baugrundstücke zur Verfügung stellte. Hauptsächlich entstanden hier Villen und Landhäuser, zunächst an der Ost-, nach 1900 auch an der Westseite der Straße. Architektonisch interessant sind u.a. die Häuser Nr. 18 und 21. Villa Nr. 21: Zu den markantesten Wohnbauten in Plauen gehört die 1905 erbaute Villa an der Ecke Plauenscher Ring / Westendstraße, die vom Plauener Büro William & Fischer entworfen wurde und zu den bedeutendsten Zeugnissen des Jugendstils in Dresden zählt (Fotos). Bauherr und erster Eigentümer des Hauses war der Rechtsanwalt Dr. jur. R. Baum, der ab 1900 am Landgericht Dresden tätig war und 1915 eine Professur erhielt. Aus dieser Familie entstammt auch der FDP- Politiker Gerhart Baum, später deutscher Bundesinnenminister. 1920 erwarb der Spediteur und Automobilhändler Alexander Graumüller die Villa. Seine Tochter Lilo war eine der ersten weiblichen Rennfahrerinnen in Deutschland und startete bei mehreren Autorennen. Aus dieser Zeit stammt auch der Anbau mit Garage. 1945 wurde die Villa von der Roten Armee zeitweise konfisziert und diente bis 1947 als Wohnung für sowjetische Offiziere. Die Erdgeschossräume wurden später gewerblich genutzt, u.a. von einer Zahlstelle der SVK und ab 1951 vom Leihhaus Baldauf & Co. In den Obergeschossen entstanden Mietwohnungen und Büros. 1951 verkauften die Erben Graumüllers das Gebäude an die Familie Kahlert, die die Villa bis 1995 denkmalgerecht sanieren ließ. Heute befindet sich hier die Kunstgalerie “Galerie K Westend”. Würzburger Straße Diese Straße im unteren Teil von Plauen wurde 1873/74 als Reisewitzer Straße (nach dem nahen Reisewitzschen Garten) angelegt und 1904 in Würzburger Straße umbenannt. In diesem Gebiet dominierten vor allem gewerbliche Unternehmen, östlich der Chemnitzer Straße lagen Villen und Mehrfamilienhäuser. In der Nähe der Weißeritz enstand ein Elektrizitätswerk, daneben die Großmolkerei DREMA. Das Eckgrundstück zur Chemnitzer Straße wurde von der Brauerei “Plauenscher Lagerkeller” (später Falkenbrauerei) eingenommen. Dresdner Milchversorgungsanstalt: Das Gebäude entstand 1907 nach Plänen des Architekturbüros Schümichen & Michel auf einem Grundstück an der Würzburger Straße 9 als Altstädter Dampfmolkerei zur Verarbeitung von Milch. Zum Zeitpunkt ihrer Entstehung gehörte sie zu den modernsten Unternehmen der Branche weltweit. Die Milch wurde von Bauern aus Orten der Dresdner Umgebung bezogen, vor Ort verarbeitet und anschließend in Filialen im gesamten Stadtgebiet verkauft. 1911 war das Unternehmen mit einem eigenen Milchausschank auf der Internationalen Hygiene-Ausstellung in Dresden vertreten. Die Entwürfe für diesen Pavillon stammten vom bekannten Architekten Georg Heinsius von Mayenburg. Bis nach dem Ersten Weltkrieg erfolgte die Betriebsführung durch eine Genossenschaft, welche in dieser Zeit größte Molkereigenossenschaft Deutschlands war. 1923 wurde der Betrieb an die neu gegründete Drema AG übertragen (ab 1936 Drema Grossmolkerei AG). Trotz einiger Kriegsschäden konnte die Produktion bereits kurz nach Kriegsende wieder aufgenommen werden. Später wurde die Drema Betriebsteil der volkseigenen Dresdner Milchwerke. 1990 ging aus diesem Unternehmen die Sachsenmilch AG hervor. Nachdem in Leppersdorf bei Radeberg eine moderne Großmolkerei in Betrieb genommen wurde, stellte der Plauener Betrieb seine Produktion ein. Die Gebäude übernahm 1992 der Feinkosthersteller Dr. Doerr. Das Unternehmen wurde 1933 von Alice und Herbert Doerr gegründet und 1938 nach Klotzsche verlegt. Bis 1972 befand sich die Firma in Familienbesitz, wurde dann zwangsweise verstaatlicht und erst 1990 reprivatisiert. Hergestellt werden vor allem Salatcremes und verschiedene Feinkostsalate, welche den Betrieb zum Marktführer seiner Branche in Sachsen machten. In den letzten Jahren erfolgten einige Modernisierungen sowie 2004 der Neubau eines Produktionsgebäudes am Weißeritzufer. Bis 2002 stand an seiner Stelle ein mehrstöckiges Mietshaus, welches beim Augusthochwasser teilweise einstürzte, wobei ein Bewohner ums Leben kam. Nr. 43: Die Villa entstand 1902 nach Plänen des Plauener Architekten- und Baubüros Fichtner im Jugendstil (Foto). 1945 fiel das Haus den Bomben zum Opfer und wurde mit Ausnahme der früheren Einfriedung abgerissen. Nach 1990 wurde auf dem Grundstück ein Mehrfamilienhaus errichtet. Nr. 58: Die im süddeutschen Stil gestaltete Villa wurde 1908 nach Plänen des Architekten Otto Heinrich Riemerschmidt errichtet. Bauherr und erster Bewohner war der TH-Professor Richard Mollier (1863-1935). Mollier kam 1897 als Nachfolger Gustav Zeuners nach Dresden und wurde hier ordentlicher Professor für Maschinenlehre. Er gilt als einer der Pioniere der Thermodynamik. Nr. 69: Auch dieses Haus gehört zu den architektonisch interessanten Villen und Mietshäusern der Würzburger Straße. Die malerische Villa mit zahlreichen Schmuckdetails entstand 1906. Zwickauer Platz Der ursprünglich Wettiner Platz genannte Platz erhielt seinen Namen Zwickauer Platz erst nach der Eingemeindung Plauens 1904. Gleichzeitig wurde die benachbarte Falkenstraße in Zwickauer Straße umbenannt. Angelegt wurde er 1895 im Zuge der Bebauung der Flächen zwischen Zwickauer und Klingenberger Straße. Der von mehrgeschossigen Wohnhäusern umgebene Platz erhielt dabei eine parkartige Gestaltung. Im Mittelpunkt stand ein heute nicht mehr vorhandenes Wettindenkmal, welches seinen Standort zuvor am alten Dorfplatz hatte. Heute befindet sich an seiner Stelle ein um 1995 angelegter Kinderspielplatz. Einige Gebäude der Ostseite fielen 1945 den Bomben zum Opfer.

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Die Sohlander Straße ist eine kleine Straße, die von der Grundstraße abgeht. Möglicherweise war ursprünglich nur ein Platz geplant, laut eines Bebauungsplans. Im Adressbuch von 1943 gab es nur ein einziges Haus auf der rechten Seite der Graudenzer Straße. Diesen Namen erhielt die Straße ab 14. Februar 1938 nach der alten Festung Graudenz an der Weichsel. Diese Festung (jetzt Courbiere genannt) liegt 2 km nördlich von der Stadt Graudenz. Die Festung wurde von Friedrich II. in den Jahren 1772 bis 1776 angelegt und 1874 als Festung aufgegeben. Graudenz (polnisch Grudziadz) ist eine Stadt im (ehemaligen) preußischen Regierungsbezirk Marienwerder am rechten Ufer der Weichsel, die 1291 die Stadtrechte erhielt. Die Graudenzer Straße sollte auch noch weiter über die heutige Neukircher Straße hinweg bis zur Bautzner Landstraße führen. Das wurde aber nicht realisiert. Im Zusammenhang mit Baumaßnahmen auf der Grundstraße gab es lediglich mal in den 1990er Jahren eine Baustraße in dieser Richtung. Zu dieser Zeit trug die Straße bereits einen anderen Namen. Ab dem 20. Januar 1967 wurde die Straße mit Sohlander Straße bezeichnet nach der Gemeinde Sohland/Spree südlich von Bautzen, an der Spree gelegen. Sohland (sorbisch Zalom) wurde 1222 erstmals urkundlich erwähnt.

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Die erste Plauener Kirche entstand wahrscheinlich bereits Mitte des 13. Jahrhunderts, da schon 1296 erstmals ein Pfarrer zu “Plawen” genannt wurde. Sie unterstand ursprünglich dem Kloster Altzella, später dem Nonnenkloster Seußlitz und wurde 1429 während der Hussitenkriege zerstört. 1466 erfolgte ein Neubau mit einem neuen Turm. Am 14. März 1467 wurde dieser Bau durch den Meißner Bischof dem Heiligen Michael geweiht. Erweiterungen des Gotteshauses sind für 1617 und 1700 verbürgt. Die erste Orgel der Kirche wird im Jahr 1491 genannt und soll der Überlieferung nach aus der alten Kreuzkirche gestammt haben. 1735 erhielt die Kirche einen vom Besitzer der Hofmühle gestifteten Barockaltar, der von J. G. Feige geschaffen wurde. Von Feige stammt auch das Grabmal des Mühlenbesitzers Gäbler. Die Ausstattung der Kirche wechselte in der Folgezeit mehrfach. So kam Ende des 18. Jahrhunderts die Orgel der alten Frauenkirche nach Plauen, wo sie noch einige Jahre im Einsatz war. 1878 begann eine umfassende Renovierung der Plauener Kirche. Neben einem Anbau für die Sakristei erhielt das Gebäude eine von Bienert gestiftete neue Orgel. Auch die nach einer Erneuerung des Turmes 1893 aufgehängten Glocken wurden von der Mühlenbesitzerfamilie finanziert. Trotz aller Bemühungen erforderte die zunehmend schlechtere Bausubstanz zur Jahrhundertwende einen grundlegende Sanierung des Gebäudes. Zwischen 1900 und 1902 wurde die Kirche deutlich vergrößert und umgebaut und erhielt dabei ihr heutiges Aussehen mit dem erhöhten Turm. Die Pläne lieferte das renommierte Architektenbüro Lossow & Viehweger, welches sich für den damals verbreiteten Baustil der deutschen Renaissance entschied. Die Ausführung oblag dem Plauener Baumeister Fichtner. Am 9. März 1902 wurde die neue Kirche feierlich geweiht und ein Jahr später offiziell in Auferstehungskirche umbenannt. Im Umfeld des Gotteshauses schuf Stadtbaurat Hans Erlwein 1907 eine neue Treppenanlage mit einem kastellartigen Eckturm (Foto links). Für diese Arbeiten mussten die alte Plauener Schule und die Dorfschmiede abgetragen werden, womit der Abbruch des Oberdorfes abgeschlossen war. Die Plauener Auferstehungskirche wurde 1945 nur leicht beschädigt, verlor jedoch die künstlerisch wertvollen Glasfenster. Am 1. Juli 1945 fand im Gotteshaus das erste Nachkriegskonzert des Kreuzchores statt, der die Kirche auch später für gelegentliche Auftritte nutzte. Als Ersatz für die verlorenen Glocken wurde das Geläut der zerstörten Zionskirche eingebaut. Den Innenraum gestaltete man 1953 im Stil der damaligen Zeit um, wobei die Kirche viel von ihrer ursprünglichen Atmosphäre verlor. 1985 baute die Firma Eule eine moderne Orgel in den vorhandenen Orgelprospekt ein (Foto). Nach 1990 begannen umfangreiche Sanierungsarbeiten, die auch eine teilweise Wiederherstellung des historischen Innenraumes vorsehen. 2003 konnten fünf neue Glasfenster eingebaut werden. Die vom Glaskünstler Wolfgang Korn gestalteten Fenster orientieren sich in ihrer Thematik an den historischen Vorbildern, wurden jedoch modern gestaltet. Bemerkenswert ist auch der noch aus der alten Dorfkirche stammenden Taufstein sowie das Altarbild “Segnender Christus” von Alfred Diethe (1859). Fotos: Glocke und Uhrwerk der Plauener Kirche Gemeindehaus: Das Gemeindehaus der Plauener Auferstehungskirche an der Reckestraße 6 entstand 1912 und löste einen Vorgängerbau von 1878 ab. Dieser genügte nicht mehr den Anforderungen der auf über 10.000 Mitglieder gewachsenen Kirchgemeinde. Für den Neubau beauftragte man den Architekten Max Wrba, der sich für ein zweigeschossiges Gebäude in Jugendstilformen entschied. Wrba hatte sich zuvor gegen 29 Mitbewerber in einem entsprechenden Wettbewerb durchgesetzt. Der plastische Schmuck an der Fassade stammt von Oskar Döll. Die offizielle Einweihung des Neubaus erfolgte am 9. Oktober 1912. Neben der Verwaltung erhielten auch verschiedene kirchliche Vereine Räume im Haus. Für diese gab es im Erdgeschoss einen großen und einen kleinen Saal. Außerdem wurde das Gebäude bis 1995 als Kindergarten genutzt. Da das Gemeindehaus den Zweiten Weltkrieg ohne Schäden überstand, fanden hier 1945 die ersten Proben des Kreuzchores statt. Von 1948 bis 1972 tagte zudem die sächsische Landessynode im Haus. Kindergarten: Die Geschichte des evangelischen Kindergartens Plauen begann 1932, als die Tochter des Pfarrers mit regelmäßigen “Kinderstunden” eine ehrenamtliche Betreuung aufbaute. Die zunehmende Nachfrage führte 1934 zur Einrichtung eines regulären Kindergartens im Gemeindehaus an der Reckestraße. Dieser bestand bis 1941, wo die Kirche zur Übergabe der Einrichtung an die NS-Volkswohlfahrt gezwungen wurde. Mit dieser Anordnung sollte der christliche Einfluss zugunsten einer nationalsozialistischen Erziehung zurückgedrängt werden. Bereits 1945 gab es jedoch eine Neugründung, die auch die DDR-Zeit überstand. Bautechnische Gründe führten nach der Wende zur Schließung und zum Umzug in einen Neubau auf der Krausestraße 5, der am 4. August 1995 eingeweiht wurde. Innerer Plauenscher Friedhof: Der Innere Plauensche Friedhof entstand als Kirchhof der alten Plauener Kirche und wurde bereits 1647 erstmals erweitert. Hier fanden bis zum Bau des Äußeren Plauenschen Friedhofes alle verstorbenen Einwohner des Dorfes ihre letzte Ruhestätte. Die nur 0,33 Hektar große Anlage wurde 1901-1907 im Zusammenhang mit dem Kirchenneubau umgestaltet, wobei die Pläne für den Vorplatz des Gotteshauses mit der großen Freitreppe von Hans Erlwein stammen. Bedeutendstes Grabdenkmal ist die Familiengruft der Bienerts mit Plastiken von Robert Henze. Außerdem fanden bekannte Plauener Industrielle wie der Direktor der Felsenkellerbrauerei Albert Franz Evereth (1848-1901), die Baumeister Imanuel Ferdinand (1836-1906) und Konrad Albert Fichtner (1870-1941) und der Großindustrielle John Daniel Souchay hier ihre letzte Ruhestätte. Letzterer war viele Jahre Besitzer von Schloss Eckberg. Zwei Kriegsgräberstätten mit Holzkreuz und einem Sandsteinrelief sind Arbeiten des Bildhauers Friedrich Press. Die in einer Friedhofsecke gelegene Grabanlage Bienerts gehört zu den wichtigsten Schöpfungen der Friedhofsarchitektur im Stadtgebiet (Foto). 1894 wurde hier der bekannte Mühlenbesitzer und Stifter Gottlieb Traugott Bienert (1813-1894) beigesetzt. Das Porträt des Plauener Ehrenbürgers sowie die Bronzefiguren und - reliefs am Grabmal stammen von Robert Henze. Neben ihm ruhen seine Frau Amalie Wilhelmine, geborene Heger (1800-1877) und sein Sohn Theodor (1857-1935). Bienerts zweiter Sohn Erwin (1859- 1930) fand im Nachbargrab seine letzte Ruhestätte. Beide setzten das Werk ihres Vaters fort und waren Stifter des Müllerbrunnens und des Bienertparkes am Hohen Stein. Erwins Ehefrau, die Kunstsammlerin Ida Bienert, initiierte 1904 die Gründung der ersten Volksbibliothek und versammelte in den Zwanziger Jahren einen Freundeskreis junger Künstler um sich. Zu dieser Runde gehörten u. a. Fritz Löffler, Oskar Kokoschka, Paul Klee, Otto Dix und Walter Gropius. Letzterer konnte von ihr auch für die Gestaltung der Grabstätte gewonnen werden. Auch der Sohn Erwin und Ida Bienerts, der Mühlenfabrikant Friedrich Bienert, wurde 1969 in dieser Gruft beigesetzt. Friedrich Bienert war ab 1924 mit der bekannten Tanzpädagogin Gret Palucca verheiratet. Unweit des Bienert-Grabes liegt die Familiengrabstätte der Familie Wolf. Hier ruht u.a. der Geologe und Biologe Theodor Wolf (1841-1924), der Ende des 19. Jahrhunderts in Südamerika lebte und die erste Landkarte von Ecuador schuf. Als Naturforscher befasste er sich mit Geologie, Flora und Fauna des Landes und ist Namensgeber eines Vulkans und einer Krakenart. Wolf lebte nach seiner Rückkehr nach Europa 1891 in Plauen. Die Grabstätte wurde 2013 saniert. Grabstätte Todesjahr Familiengrabstätte Bienert (Mühlenbesitzerfamilie) Familiengrabstätte Schleider (Bildhauer) Amalie Wilhelmine Heger, Stifterin (Heger-Bienert-Stiftung) 1877 Albert Franz Emil Everth, Direktor der Felsenkellerbrauerei 1901 Hermann Otto Zieger, Kunstmaler 1905 Imanuel Ferdinand Fichtner, Baumeister 1906 Hermann Blauert, Baumeister 1923 Theodor Wolf, Naturforscher und Geograph 1924 Rudolf Focke, Bürgermeister von Geithain 1933 Konrad Albert Otto Fichtner, Baumeister 1941 Johannes Blauert, Architekt und Baumeister 1944 Theodor Görschen, königlich-sächsischer Musikdirektor 1946 Alfred Richter, Prof. Dr.-Ing. 1971 Otto Hliste, Baumeister 1973 Paul Otto Seibt, Baumeister (Familiengrabstätte Seibt - Lienemann) 1977 Fritz Moritz Kleinert, Kammermusiker 1978 Äußerer Plauenscher Friedhof: Zur Entlastung des bisherigen Friedhofs entstand 1882 an der südlichen Flurgrenze zu Coschütz ein neuer Begräbnisplatz, der heute als Äußerer Plauenscher Friedhof bezeichnet wird. Dafür erwarb die Gemeinde ein 2,8 Hektar großes Grundstück und ließ eine Totenhalle und eine Friedhofskapelle errichten. 1897 erfolgte unmittelbar angrenzend die Anlage des Coschützer Friedhofs. Zu den bekannten Persönlichkeiten, die auf dem Äußeren Plauenschen Friedhof ihre letzte Ruhe fanden, gehört der frühere Plauener Gemeindevorstand Karl Gustav Großmann (1843-1900), dessen Grabstein ein Porträtmedaillon von Robert Henze ziert. In seiner Nachbarschaft befindet sich die von August Schreitmüller im Jugendstil geschaffene Grabstätte der Familie Pleißner (1905). Auch der 1988 verstorbene Dresdner Kunsthistoriker Fritz Löffler (“Das alte Dresden”) wurde auf diesem Friedhof beigesetzt, ebenso zahlreiche früheren TH-Professoren. Grabstätte Todesjahr Karl Großmann, Gemeindevorstand von Plauen 1900 Friedrich Bernhard Pfennigwerth, Unternehmer (Lederfabrik) und Handelsgerichtsrat 1927 Richard Julius Müller, Architekt und Rektor der Technischen Hochschule 1930 Hans Lohmann, Oberlehrer Am Annen- und König-Johann-Gymnasium 1930 William Fichtner, Baumeister (Gebrüder Fichtner) 1937 Wilhelm Geißler, Bauingenieur, Professor an der Technischen Hochschule 1937 Johannes Görges, Professor für Elektrotechnik 1946 Gerhard Tempel, Baumeister 1947 Enno Heidebroek,Professor für Maschinenkunde 1955 Georg Oehme, Maler und Professor 1955 Hans Fischer, Architekt 1962 Adolf Loeltgen, Kammersänger 1968 Willy Kehrer, Komponist 1976 Kurt Fichtner, Architekt 1979 Stefan Fronius, Professor für Konstruktionstechnik 1984 Fritz Löffler, Kunsthistoriker und Denkmalpfleger 1988 Bernhard Klemm, Architekt 1995 Hans-Joachim Papke, Architekt 1995 Fritz Schultheiß, Professor für Elektrotechnik 1998 Helmut Rucker, Kammervirtuos 1999 Fritz Wiegmann, Professor für Elektrotechnik 2003

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Landeskirchlichen Kreditgenossenschaft (LKG). Die im Besitz der evangelischen Kirche befindliche Bank entstand 1925 als erstes derartiges Kreditinstitut in Deutschland und hatte ihr Domizil zunächst im Alten Rathaus am Altmarkt. In den Dreißiger Jahren bezog die Bank neue Geschäftsräume auf der Ringstraße 62, 1937 das Eckhaus Moritzstraße 19

Die Straße Sonnenlehne in Briesnitz wurde gemeinsam mit weiteren Straßen in einem Gebiet gebaut, in dem ab 1912 zahlreiche Eigenheime errichtet wurden (bspw. Eigenhufe und Hammeraue). Die Benennung erfolgte wegen der Lage im aufsteigenden Gelände .

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In der Nähe der Kreuzung des Moritzburger Weges mit der Königsbrücker Straße erinnert ein mittelalterliches Steinkreuz an den Tod des Reitknechtes Jonas Daniel, der hier 1402 während einer Fehde ums Leben kam. 2002 wurde ein erläuternde Gedenktafel aufgestellt

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Die Sonnenleite führt in Cossebaude von der Krummen Gasse hinauf zur Weinbergstraße. Der Name bedeutet soviel wie sonniger Höhenweg, abgeleitet von "Leithe" bzw. "Leite", worunter man einen Berghang versteht. Wie bei der Sonnenleite in Loschwitz wird also die Lage am Südhang zur Benennung beigetragen haben. Seit 1936 ist die Straße im Adressbuch zu finden.

Die Straße bildet den Kern des ehemaligen Dorfes und wurde deshalb früher Hauptstraße genannt. Erst im November 1991 erhielt sie, um Verwechslungen mit der rückbenannten Hauptstraße in der Inneren Neustadt zu vermeiden, ihren neuen Namen Altklotzsche. Der südliche Abschnitt ab der Einmündung Am Hellerrand heißt seitdem Klotzscher Hauptstraße. Die meisten Gebäude entstanden nach dem letzten großen Dorfbrand von 1802 und stehen unter Denkmalschutz. Zu den wenigen Häusern des Ortes, welche den Brand überstanden, gehört das ehemalige Vogelstellerhaus (Nr. 44), in dem früher der Vogelfänger des Dresdner Hofes seinen Sitz hatte. Bemerkenswert sind auch die Gebäude Altklotzsche 51 (Baujahr 1670), 59, 60 (Baujahr 1864) und 61 (ehem. Pfarrhaus) sowie die Gebäudegruppe Nr. 91-97. Im Dorfkern Altklotzsche befindet sich auch die alte Dorfkirche des Ortes. Noch bis in die Nachkriegszeit wurden einige Gehöfte landwirtschaftlich genutzt. Erbgericht: Das Erbgericht Klotzsche wurde 1501 erstmals erwähnt. Erster namentlich bekannter Erbrichter war der Gutsbesitzer Zceissigk. Zu den frühen Zeugnissen der dörflichen Gerichtsbarkeit gehört das Klotzscher Rügenbuch mit vielfältigen Regeln zum Zusammenleben im Ort, von dem sich eine Abschrift erhalten hat. Mit der Gerichtsbarkeit war auch das Schankrecht verbunden, wodurch das Erbgericht zum Gasthof des Ortes wurde. Zusätzlich diente es ab 1583 als kurfürstliche Ausspanne und gelegentlich als Versorgungspunkt bei größeren Jagdvergnügen. Neben dem eigentlichen Ausschank im Dorfkern bewirtschaftete der Erbrichter auch eine Bierschänke an der Königsbrücker Landstraße, aus der 1835 das Gasthaus Schänkhübel hervorging. Mehrfach durch Brände zerstört, umgebaut und erweitert, blieb das Erbgericht bis in die jüngste Vergangenheit ein wichtiges kulturelles Zentrum des Ortes. Um 1900 besaß es einen großen Saal, mehrere Restaurationsräume, Kegelbahn und einen Gästegarten mit Tanzdiele. Zugleich diente das Gebäude bis zur Fertigstellung des Rathauses als Tagungsort des Gemeinderates. Nach einer Rekonstruktion 1948 war das Haus als “Stadtsäle Klotzsche” bekannt, später als Klubhaus der Flugzeugbauer bzw. als Kulturhaus “Friedrich Wolf” (Foto). Einige Räume im Obergeschoss beherbergten zeitweise ein Studentenwohnheim. Das nach der Wende geschlossene und zuletzt leer stehende Gebäude wurde im Herbst 2003 abgerissen. An seiner Stelle befinden sich heute mehrere Wohnhäuser.

Der Dorfplatz Altstrehlen, der sich zu beiden Seiten des Kaitzbaches erstreckt, gehört zu den größten Dorfplätzen im Stadtgebiet. Ursprünglich gehörten auch Teile der Kreischaer Straße und der Dohnaer Straße dazu. Ihr heutiges Aussehen erhielten die Gebäude nach dem letzten großen Dorfbrand im Jahr 1855. Weitere Häuser entstanden um 1900, als sich Strehlen vom Bauerndorf zum Wohnvorort entwickelte. Oberhalb des Platzes steht seit 1905 die Strehlener Christuskirche. Ab 1860 trug die Platzanlage den Namen Albertplatz, womit der sächsische Kronprinz Albert geehrt werden sollte. Albert verbrachte zu dieser Zeit regelmäßig die Sommermonate in seiner Strehlener Villa. Mit der Eingemeindung Strehlens 1892 wechselte die Bezeichnung in Friedrich-August-Platz. Auch nach Abdankung des Königs behielt der Platz zunächst seinen Namen. Erst 1946 erfolgte die Umbenennung in Altstrehlen. Trotz verschiedener Umbauten nach 1900 und Gebäudeabrissen in den 1980er Jahren und nach 1990 sind noch einige historische Gehöfte erhalten geblieben. Bemerkenswert sind u. a. die Bauernhöfe Altstrehlen Nr. 10 und 13. In der Toreinfahrt vom Gut Nr. 10 erinnert eine eingemauerte Kanonenkugel an die Zerstörung des Dorfes im Jahr 1813. Sämtliche Gebäude werden heute nicht mehr landwirtschaftlich genutzt, sondern dienen Wohn- und Gewerbezwecken. Nr. 1: Der historische Vierseithof an der Ecke Kreischaer Straße / Altstrehlen bildete bis zu seinem Abriss den Auftakt zum historischen Strehlener Dorfkern. Zu DDR-Zeiten wurden die ehemaligen Wohn- und Wirtschaftsgebäude u.a. als Altstoffhandel und von der Schuhmacher-PGH “Hans Sachs” genutzt. Trotz Denkmalschutzes wurden die Gebäude 1996 wegen ihres schlechten Bauzustandes abgerissen. Eine hier geplante Wohnanlage in Anlehnung an die einstige Gestaltung kam bislang nicht zustande. Nr. 3: Im 1856 nach einem Brand wiederaufgebauten Gehöft Altstrehlen Nr. 3 (Foto unten) befindet sich seit der Rekonstruktion 1997 ein kleines Einkaufszentrum. An der Scheune informieren Schrifttafeln über die Geschichte des Anwesens: Linke Schrifttafel (mit Darstellung eines Ährenbündels): Wenn dir die Flammen Hab und Gut vernichten, so sieh ergebungsvoll zum güt´gen Vater auf. Mit Fleiß und seiner Hilfe wirst du dir errichten, was er genommen hat dir in dem Schicksalslauf. Rechte Schrifttafel (mit Darstellung verschiedener landwirtschaftlicher Geräte:) Die Gebäude dieses Gutes wurden am 18. Oktober 1855 ein Raub der Flammen und mit Gottes Hilfe von dem Besitzer Karl Traugott Heyne im Jahre 1856 wieder aufgebaut. Nr. 4: An Stelle des wegen Baufälligkeit abgerissenen Gebäudes Altstrehlen Nr. 4 entstand 2008 im Anschluss an die bestehende Gründerzeitbebauung ein modernes mehrgeschossiges Wohn- und Geschäftshaus. Das von Architekt und Bauherr Konrad Lentschig gestaltete Gebäude erregte wegen seiner Fassadengestaltung Aufsehen und wird von einigen Anwohnern als “unpassend” kritisiert, setzt jedoch einen modernen farblichen Akzent im Dorfkern.

Die Straße Sonnenleite wurde durch den Kaufmann Adolf Bruno Hietzig ab 1904 abgehend von der heutigen Steglichstraße gebaut. Zunächst war vorgesehen, dass die erste Hälfte als Fahrstraße (mit Umlenkeplatz) und die zweite Hälfte als Fußweg in Richtung der heutigen Straße An der Berglehne ausgeführt werden sollen. Die schwierige Lage am Hang bewirkte, dass die Bauvorschriften immer wieder geändert werden mussten. Erst Mitte 1906 war der untere Teil der Straße fertig gestellt. Der erwähnte Fußweg wurde im nächsten Jahr auch zur Straße ausgebaut. Nach der Fertigstellung schlägt der Ortsgeschichtsausschuß für die Benennung Felsenstraße und Sommerleite vor. Der Erbauer Hietzig bittet, der Straße den Namen „Sonnenleite“ und nicht Sommerleite beizulegen. Die Benennung der Straße mit Sonnenleite beschließt der Gemeinderat am 2. Oktober 1907. Der Name bedeutet soviel wie sonniger Höhenweg, abgeleitet von "Leithe" bzw. "Leite", worunter man einen Berghang versteht. Ab dem 1. Juni 1926 wurde die Sonnenleite verlängert. Unter der Oskar-Pletsch-Straße wurde der Bau der damaligen Heinrichstraße beschrieben. Deren östlicher Teil wurde zu dem Datum der Sonnenleite zugeschlagen, weil es in Dresden bereits eine Heinrichstraße gab.

Die Königsbrücker Landstraße ist Teil der wichtigen Verbindung zwischen Altstadt und den nördlichen Vororten Dresdens. Vermutlich entstand sie bereits in slawischer Zeit und blieb über Jahrhunderte ein bedeutender Heer- und Handelsweg. Im 18. Jahrhundert wurde diese Straße als Poststraße ausgebaut und war Teil des “Krönungswegs” August des Starken. 1706 wurde eine reitende Post von Dresden über Königsbrück - Hoyerswerda - Sorau nach Warschau eingerichtet. Am Ende des langen und beschwerlichen Anstiegs befand sich am Schänkhübel eine Pferdewechsel- und Raststation. Aus der ehemaligen Poststation ging 1873 die erste Klotzscher Postagentur hervor (Klotzscher Hauptstraße Nr. 1). An der Grenzstraße erinnert noch eine alte Brücke mit einem Schlußstein von 1790 an die Postkutschenzeit. In Weixdorf wurde in den letzten Jahren die frühere “Königlich-Sächsische Chausseegeld-Einnahme” rekonstruiert (Foto). 1911 erhielt Klotzsche Anschluss an das Dresdner Straßenbahnnetz, nachdem die bereits seit längerem geplante Strecke vom Arsenal bis zum Schänkhübel mit einem Abzweig nach Hellerau übergeben wurde. Die Eröffnungsfahrt erfolgte am 21. Januar 1911 unter großer Anteilnahme der Bevölkerung. im gleichen Jahr entstand der heute nicht mehr in Betrieb befindliche Straßenbahnhof. Auf Wunsch der Bevölkerung des Ortsteiles Königswald und der Nachbargemeinde Lausa-Weixdorf wurde die Straßenbahn 1925 bis zum Kurhaus Klotzsche, ein Jahr später bis zur “Deutschen Eiche” verlängert. 1928/29 folgte der Neubauabschnitt nach Weixdorf, wobei die Straßenbahn hier die Trasse der früheren Schmalspurbahn nutzt. Die Bebauung der Straße in Klotzsche begann im Zusammenhang mit der Gründung des Kurbades und dessen Erweiterung zum Villenvorort Königswald. Neben repräsentativen Villen und Landhäusern entstanden hier auch mehrere Gaststätten, Läden und kleine Gewerbebetriebe, die die Königsbrücker Landstraße zur wichtigsten Geschäftsstraße Klotzsches machten. Gebäude: Luftnachrichten-Schule: Der Gebäudekomplex entstand 1934 im südlichen Teil der Ortsflur gegenüber der Abzweigung des Moritzburger Wegs. Die Militärschule diente der Ausbildung von Richtfunkern und Flugmeldern und arbeitete eng mit der Luftkriegsschule in der Nähe des Flughafens zusammen. Außerdem war hier das Luftnachrichten-Regiment Nr. 1 stationiert. Auf dem Nachbargrundstück gab es eine Tierklinik mit Pferdelazarett. 1937 erfolgte die Benennung des aus mehreren Gebäuden bestehenden Komplexes in Hermann-Göring-Kaserne. 1992 wurde ein Großteil der früheren Kasernenbauten zugunsten des Chipherstellers Infinion abgerissen. Erhalten blieb der Eingangsbereich, der heute unter Denkmalschutz steht. Das Areal dient als “Technopark Nord” gewerblichen Zwecken. Straßenbahnhof Klotzsche: Der Betriebshof ging auf die einstige “Haidebahn” zurück, welche 1902 eröffnet, jedoch bereits zwei Jahre später ihren Betrieb wieder einstellen musste. Als Depot für seine Fahrzeuge ließ Erbauer Carl Stoll auf dem Grundstück eine Wagenhalle errichten und ein für den Betrieb der O-Bus-Linie notwendiges Kraftwerk bauen. 1916 wurde diese Halle durch einen Neubau ersetzt, welcher nun als Straßenbahnhof der nach Klotzsche verlängerten Linie 7 diente. Der zu den kleinsten Dresdner Betriebshöfen gehörende Klotzscher Straßenbahnhof besaß sechs Gleise sowie eine Werkstatt für einfachere Reparaturen. Außerdem gab es ein Verwaltungs- und Sozialgebäude. 1994 wurde der Straßenbahnhof stillgelegt und im Anschluss bis zum Abriss von einem Baumaschinenhandel genutzt. 2003 entstand auf dem Areal ein Umspannwerk der DREWAG. Nr. 3: Ehemaliges Wohnhaus der bekannten Kinderbuchillustratorin Gertrud Caspari, die hier ab 1914 lebte. Sie verstarb 1948 und liegt auf dem Neuen Friedhof Klotzsche begraben. Seit 1998 erinnert am Haus eine Gedenktafel an sie. Institut für Rheumathologie (Nr. 6a): Die Einrichtung wurde 1934 von Elisabeth Schuricht als Rentnerheim gegründet und umfasste nach Erweiterungen 120 Kleinstwohnungen für alte Menschen, die hier versorgt und betreut wurden. 1945 in ein Seniorenheim umgewandelt, verschmolz sie 1948 mit der Rheumapoliklinik des Arztes Prof. Dr. Hans Tichy. Diese war kurz zuvor vom Hellerauer Arzt Dr. Martin Vogel angeregt worden und nutzte ab 1947 das Gesundheitshaus Klotzsche. Unter Leitung des verdienstvollen Arztes entwickelte sich das Klotzscher Institut zu einer international anerkannten Forschungsstätte für Rheuma-Erkrankungen mit mehreren Fachabteilungen. Dafür entstand an der Greifswalder Straße 3 ein modernes Bettenhaus. 1973 wurde das Institut aufgelöst und dessen Aufgaben der Poliklinik Mickten übertragen. Das Gesundheitshaus bestand noch bis 1991 als Stadtambulanz. Schänkhübel (Nr. 7): Die Gaststätte am Schänkhübel entstand als Rasthaus für die hier vorbeifahrenden Fuhrleute und ist bereits in einer Karte von 1568 eingezeichnet. Zunächst wurde sie von kurfürstlichen Forstleuten als Sommerschänke betrieben, erhielt aber später eine offizielle Konzession. 1835/36 wurde nach Übernahme des Lokals durch den Besitzer des Klotzscher Erbgerichts Clemens Hofmann ein neues Gasthausgebäude errichtet (Foto) . Auf der gegenüber liegenden Straßenseite befand sich bis 1920 zusätzlich ein Gartenlokal. Mit dem Bau der “Haidebahn” 1903 und dem Straßenbahnanschluss 1911 entwickelte sich der Schänkhübel zu einer beliebten Ausflugsgaststätte mit großem Saal und Übernachtungsmöglichkeiten. In der früheren Turnhalle des Klotzscher Turnvereins wurde 1912 eines der ersten Kinos im Dresdner Umland eingerichtet (“Heidepark-Kinotheater”). Das Filmtheater besaß zunächst 60, später 450 Plätze. Gaststätte und Filmtheater mussten 1945 schließen, nachdem sowjetische Militärbehörden das Haus in Beschlag genommen hatten. Diese betrieben hier zeitweise ein Offizierskasino, welches später als öffentliche Gaststätte auch der deutschen Bevölkerung offen stand. Nach dem Abzug der Sowjetarmee stand das Gebäude viele Jahre leer. 2011 erfolgte der Umbau zum Wohnhaus. Den ehemaligen Kinosaal nutzt heute ein Tanz- und Fitnesscenter. Nr. 50: Die um 1900 für die Hofschauspielerin Gerda Hermany entstandene Villa (Foto) war ab 1937 im Besitz des Freitaler Fabrikanten Albin Wilhelm, zugleich Vorsitzender des Dresdner Sportclubs DSC. Zu Wilhelms regelmäßigen Besuchern gehörten bekannte Dresdner Sportler wie der Fußballer und spätere Bundestrainer Helmut Schön und der DSC-Spieler Richard Hofmann. Letzterer war einige Zeit auch als Chauffeur Wilhelms angestellt. 1945 wurde die Villa von der Roten Armee besetzt, war zeitweise Sitz des Quartieramtes der Stadt, einer Polizeistation, des Deutschen Roten Kreuzes sowie der SED-Ortsleitung Klotzsche. Nach 1990 stand das Gebäude viele Jahre leer und wurde 2007 denkmalgerecht saniert. Nr. 61: Das Gebäude an der Ecke zur Auenstraße (heute Gertrud-Caspari-Straße) war ab 1918 Wohnsitz des bekannten Kunstmalers Conrad Felixmüller, der auch einige Bilder mit Klotzscher Motiven schuf. Felixmüller lebte zuvor einige Monate auf der Gartenstraße 10 (Kieler Straße). 1931 verließ er Klotzsche und verzog nach Dresden. Dresdner Bank (Nr. 66): Das markante Eckhaus zur Wolgaster Straße entstand Ende des 19. Jahrhunderts und beherbergte einst die Klotzscher Niederlassung der Dresdner Bank. Zu DDR-Zeiten nutzte ein Obst-Gemüse-Geschäft und eine Haushaltwarenhandlung des Konsums die Räume, welche heute Sitz einer Sparkassenfiliale sind. Heide-Apotheke (Nr. 67): Die Apotheke entstand als erste derartige Einrichtung Klotzsches 1895 und wurde zunächst Prinzeß-Luisa-Apotheke genannt. Mehrfach wechselten die Besitzer, bevor die Apotheke 1949 verstaatlicht wurde. In diesem Zusammenhang erhielt sie ihren heutigen Namen Heide-Apotheke. Seit 1990 wird sie wieder als Privatapotheke geführt. Café Königswald (Nr. 69): Das bis heute in Familienbesitz gebliebene Café (Foto) wurde 1897 von Max Donath eröffnet. Zu den Besuchern gehörte u.a. der letzte sächsische König Friedrich August III. Nach dem Zweiten Weltkrieg diente das Café einige Jahre als Bäckerei der Roten Armee, konnte aber 1949 wieder für die Bevölkerung geöffnet werden. 1993 wurde das Lokal umfassend saniert. Weißes Roß (Nr. 71): Das Haus wurde 1889 erbaut und seit 1897 als Gasthaus “Weißes Roß” genutzt. Der Besitzer Karl Wöllner, von den Klotzschern nur “Tilly” genannt, galt als Original und machte sein Lokal weithin bekannt. Neben dem Lokal betrieb die Familie auch eine Möbelexpedition im Hinterhaus. Die Gaststätte mit angeschlossenem Saal war bis in die 60er Jahre geöffnet. Später zog eine Zweigstelle der Stadtbibliothek ein. Nach Rekonstruktion des Gebäudes befindet sich hier seit 1994 ein Hotel mit öffentlicher Gaststätte. Nr. 82: In der Ende des 19. Jahrhunderts errichteten Villa “Silvana” befand sich von 1916 bis 1920 die Privatschule des Studienrates Manfred Pollatz und seiner Frau Lili. Die Schule verfolgte ein Reformschulkonzept ähnlich der heutigen Waldorfschulen und wurde mit dem Wechsel von Manfred Pollatz an die Landesschule Klotzsche geschlossen. Nr. 83: Das Gebäude an der Einmündung der Wolgaster Straße beherbergte früher das Kaufhaus Königswald, einziges Kaufhaus im Ort. Hier befanden sich mehrere Geschäfte sowie eine Tischlerwerkstatt im Hintergebäude. Nr. 91: Die Ende des 19. Jahrhunderts errichtete Villa Baum war einige Jahre Wohnung der Eltern von Grete Weiser, die hier einen Teil ihrer Kindheit verbrachte und später eine der bekanntesten deutschen Filmschauspielerinnen wurde. Das Gebäude verfiel in der Nachkriegszeit und wurde nach 1990 abgerissen. Kurhaus Klotzsche (Nr. 73/75): Das Kurhaus Klotzsche entstand um 1850 als Gasthaus “Carolaschlößchen” und wurde 1886/88 unter Einbeziehung der Nachbarvilla “Elise” zum Kur- und Ballhaus erweitert. Die architektonische Gestaltung oblag dem Baumeister Haenschel, erster Betreiber war der Gastronom Kamprad. Wenig später erwarb es der Gastwirt und Hotelier Carl Christoph Arndt und nannte es fortan “Arndt´s Kurhaus”. Das Gebäude war Ende des 19. Jahrhunderts Mittelpunkt des Kurbades Königswald und Schauplatz für Tanz- und Vergnügungsveranstaltungen, Konzerte, Theateraufführungen u.a. Auch nach Ende des Kurbetriebes blieb die Gaststätte bestehen und war bis 1945 gesellschaftliches Zentrum Klotzsches. Zu den bekanntesten Gästen des Lokals gehörte der Schriftsteller Erich Kästner und die Tanzpädagogin Gret Palucca. 1949 wurde der Ballsaal geschlossen und nun als Lager bzw. Produktionshalle genutzt. Später brannte der Saal aus und konnte nur notdürftig wiederhergestellt werden. Pläne, das Gebäude als Stadtkulturhaus und Kino auszubauen, scheiterten an den Besitzverhältnissen und dem hohen Sanierungsaufwand. Die ab 1955 von der volkseigenen HO bewirtschaftete Gaststätte im Kurhaus bestand jedoch noch bis in die 1980er Jahre. 1993 begann die Sanierung des stark verfallenen Hauses, welches heute als Hotel dient. 1999 fand im wiederhergestellten Saal erstmals seit 1945 wieder eine öffentliche Veranstaltung statt. Eine originelle Bar, die mit Flugzeugsitzen und Kabinenteilen eines Airbus ausgestattet ist und den Namen “Last Minute” trägt, befindet sich im Souterrain. Gasthaus “Deutsche Eiche”: Die Gaststätte entstand 1897 an der Ecke Königsbrücker Straße/Langebrücker Straße. Bereits um 1560 soll sich an dieser Stelle eine Schankwirtschaft befunden haben, die vor allem von Fuhrleuten gern aufgesucht wurde. Die Bewirtschaftung übernahmen dabei Forstangestellte des Klotzscher Reviers. Mit der Entwicklung Königswalds zum Kur- und Villenort entschied man sich zu einem Neubau im altdeutschen Stil (Foto). Um die Jahrhundertwende wurde die Schänke auch als “Krug zur Deutschen Eiche” bezeichnet. 1903/04 befand sich hier die Endstation der gleislosen “Haidebahn”, die dem Gasthof zahlreiche Ausflügler brachte. 1942 übernahm der Gastwirt Kamillo Kolitsch das Lokal mit angeschlossener Fleischerei und betrieb es bis zu seinem Tod 1950. Während des Zweiten Weltkrieges befanden sich in den Räumen Notunterkünfte für deutsche Flüchtlinge. Später nutzte die Rote Armee das Lokal zeitweise als Verpflegungsstützpunkt. Nachfolger von Kamillo Kolitsch war zunächst seine Frau Elsa, später ihr Sohn Heinz Kolitsch, der die “Deutsche Eiche” bis zum Renteneintritt 1991 führte. Als eine der wenigen ununterbrochen bewirtschafteten Gaststätten gehört die “Deutsche Eiche” bis heute zu den traditionsreichsten Dresdner Lokalen. Das Haus wurde 1998/99 saniert und wird jetzt als italienisches Restaurant “Fellini” geführt. Lauschenbachmühle: Auf diesem Grundstück (Königsbrücker Landstraße 470) an der Flurgrenze von Lausa zu Hermsdorf befand sich einst die Lauschenbachmühle, eine im Besitz der Hermsdorfer Rittergutsbesitzer befindliche Wassermühle mit zwei Mahlgängen und einem oberschlächtigen Mühlrad. 1657 erwarb Johann Georg Freiherr von Rechenberg diese Mühle zusammen mit der Grundherrschaft über Hermsdorf. 1791 ist die Lauschenbachmühle in einem Verzeichnis aller sächsischen Mühlen ebenfalls verzeichnet. Der Mahlbetrieb wurde um 1975 eingestellt und der Mühlgraben später zugeschüttet.

Die August-Bebel-Straße wurde im Zusammenhang mit dem Ausbau des Villenviertels Strehlen als Residenzstraße angelegt. Auf einem angrenzenden Gartengrundstück entstand 1860 die Königliche Villa, Landsitz der Wettiner in Strehlen. Nach dem Ersten Weltkrieg wurde die Residenzstraße in Gerhard-Hauptmann-Straße umbenannt. Mit der Namensgebung sollte ausdrücklich der eng mit Dresden verbundene Schriftsteller geehrt werden, weshalb auch das Prinzip durchbrochen wurde, Straßen nur nach bereits verstorbenen Persönlichkeiten zu benennen. In den Dreißiger Jahren entstand im früheren Park der Königlichen Villa der Militärkomplex des Luftgaukommandos der Wehrmacht. In diesem Zusammenhang erhielt der Straßenabschnitt zwischen Strehlener Platz und Wasaplatz den Namen General-Wever-Straße. Walther Wever war erster Stabschef der deutschen Luftwaffe und kam am 3. Juni 1936 bei einem Flugzeugabsturz in der Nähe von Klotzsche ums Leben. 1945 fielen mehrere Villen, vor allem im westlichen Bereich den Bomben zum Opfer. In einem dieser Gebäude (Residenzstraße Nr. 3b) hatte vor dem Ersten Weltkrieg der frühere sächsische Kriegsminister Max von Hausen (1846-1922) seinen Wohnsitz. Heute befindet sich auf dem Grundstück an der Gerhard-Hauptmann-Straße ein Seniorenheim. Im westlichen Abschnitt der August-Bebel-Straße sind bis heute einige Villen aus dem 19. und vom Beginn des 20. Jahrhunderts erhalten geblieben. Die Bauten entstanden ab 1850 für wohlhabende Dresdner Unternehmer und Künstler. Bemerkenswert sind die Häuser Nr. 27 und Nr. 30, die im Neorenaissancestil bzw. im klassizistischen Stil gestaltet wurden. Das frühere Wohnhaus des Kunstmalers Wilhelm Claudius (Nr. 10, ehem. Residenzstraße 20), 1888 erbaut und 1910 um einen Atelierflügel erweitert, fiel 1985 dem Abriss zum Opfer (Foto). Jüngeren Datums sind die erst nach 1900 errichteten Villen Nr. 23, Nr. 48 und Nr. 50, welche bereits modernere Bauformen und Jugendstildekor aufweisen. Heute werden einige dieser Gebäude gewerblich genutzt. In der DDR-Zeit wurde die 1946 in August-Bebel-Straße umbenannte General-Wever-Straße unterbrochen und zum Teil in das Gelände der Militärakademie einbezogen. Lediglich der Abschnitt zwischen Franz-Liszt-Straße und Wasaplatz blieb öffentlich zugänglich. Erst 1990 konnten die meisten Gebäude einer zivilen Nutzung zugeführt und die Straße wieder freigegeben werden. Im ehemaligen Offizierscasino entstand 1996 die vom Studentenwerk betriebene Gaststätte “Tusculum” (Nr. 5), welche seit 2012 als Studentenclub “Wu 5” (ehemals Wundtstraße 5) genutzt wird. Weitere Gebäude nutzt die Fakultät Erziehungswissenschaften der Technischen Universität. Hier befindet sich auch das kleine „Kino im Kasten“ (Nr. 20). Der Straßenname erinnert an den bekannten deutschen Arbeiterführer August Bebel (1840-1913), der zwischen 1884 und 1890 in Dresden-Plauen wohnte. Einzelne Gebäude: Nr. 7 (ehem. Residenzstraße 13): Die etwas von der Straße in Richtung Bahnlinie zurückgesetzt stehende Villa wurde um 1894 von Oswald Haehnel für Bruno Klette errichtet. Das in historisierenden Formen gestaltete Gebäude mit repräsentativer Fassadengestaltung steht unter Denkmalschutz (Foto) Nr. 12 (ehem. Residenzstraße 22): Das Gebäude entstand 1894 für Ernst O. Simonson und überstand als eine der wenigen Villen des westlichen Straßenteils alle Wirren der Zeit. Nach 1945 wurde das "Villa Tusculum" genannt Haus umgebaut und erweitert und bis zur Auflösung der Einrichtung als Offizierskasino der Militärakademie genutzt. Heute befindet sich hier ein Studentenclub. Luftgaukommando (Nr. 19): Zu den architektonisch auffälligsten Gebäuden der August-Bebel-Straße gehört der Komplex des früheren Luftgaukommandos (Nr. 19). Die Gebäude wurden zwischen 1936 und 1938 nach Plänen von Wilhelm Kreis errichtet und nehmen einen Großteil der früheren Gartenanlage der Königlichen Villa ein. Im Mittelpunkt befindet sich ein Ehrenhof, an dessen Stirnseite das dreigeschossige Hauptgebäude mit Mittelrisalit steht. Diesen Mitteltrakt ziert das Relief “Fliegender Genius” von Karl Albiker. Darstellungen des Ikarus, des Gottes Vulkan und mehrere Kriegerfiguren weisen auf die militärische Funktion des Gebäudes hin. An das Haupthaus schließen sich zwei zweigeschossige Seitenflügel an. Teile des plastischen Schmucks, vor allem solche mit NS-Bezug, wurden nach 1945 entfernt. Erhalten blieben die Reliefköpfe Otto Lilienthals und des Fliegergenerals Ernst Udet. Abgeschlossen wird der Hof durch zwei kleine Wachgebäude und ein schmiedeeisernes Tor. Nach der Fertigstellung hatte hier das Luftgaukommando IV seinen Sitz, welches für die Koordination aller Groß- und Jagdverbände der Luftwaffe im Großraum Sachsen zuständig war. Außerdem oblag der Behörde die Organisation der Luftabwehr sowie des zivilen Luftschutzes. 1945 wurden die Bauten nur leicht beschädigt und dienten zunächst bis 1952 als Sitz der sächsischen Landesregierung.Danach übernahm die Kasernierte Volkspolizei das Areal. Seit 1959 gehörte das ehemalige Luftgaukommando zur Militärakademie der Nationalen Volksarmee der DDR. Militärakademie “Friedrich Engels”: Die Militärakademie wurde am 5. Januar 1959 in Dresden gegründet und war höchste militärische Bildungsstätte der DDR. Genutzt wurden die Gebäude des früheren Luftgaukommandos (Foto) sowie einige in den 1960er und 70er Jahren auf dem Areal errichtete Neubauten. Die nach dem Arbeiterführer Friedrich Engels benannte Hochschule unterstand unmittelbar dem Minister für Nationale Verteidigung und war trotz ihrer wissenschaftlichen Aufgaben ein Teil der NVA. Neben Führungskräften für die Nationale Volksarmee wurden hier auch Offiziere aus befreundeten Staaten zu Diplom-Militärwissenschaftlern bzw. Diplom-Ingenieuren ausgebildet. Mit dem Beitritt der DDR zur Bundesrepublik wurde die Akademie aufgelöst und die Gebäude an die Technische Universität Dresden übergeben. Die Bauten des Luftgaukommandos übernahm die Bundeswehr. Heute werden die meisten Gebäude des Areals von den geisteswissenschaftlichen Fakultäten der TU genutzt. Der Ende der 1970er Jahre erbaute Hörsaalkomplex beherbergt seit seiner Sanierung 2013/14 zwei moderne Hörsäle sowie Seminarräume. Im großen Saal finden seit 1993 regelmäßig Filmvorführungen des “Kino im Kasten” (KiK) statt. Das sogenannte “Blaue Haus”, ein sechsstöckiger Plattenbau, diente nach Auflösung der Militärakademie zeitweise als Bekleidungsstelle der sächsischen Polizei. Künftig sollen auch hier Räume der TU untergebracht werden, ebenso wie in den früheren Fahrzeughallen. Dort sind Labors sowie ein Prüfstand des Institutes für Automobiltechnik vorgesehen. Nr. 38 (ehem. Residenzstraße 46): In dieser heute unter Denkmalschutz stehenden Villa lebte ab 1896 der impressionistische Maler Carl Bantzer (1857-1941), der mehrere Jahre der Künstlerkolonie Goppeln angehörte. Bantzer stammte aus Hessen, wo er 1884/85 gemeinsam mit dem Dresdner Maler Wilhelm Claudius zusammenarbeitete Dessen heute nicht mehr vorhandenes Atelierhaus befand sich auf der Residenzstraße 20. Ab 1896 war Carl Bantzer Professor der Dresdner Kunstakademie. Nr. 46 (ehem. Residenzstraße 50): Die um 1890 erbaute Villa befand sich einst im Besitz des Bankiers und Konsuls Eugen Gutmann (1840-1925), einem der Gründer der Dresdner Bank. Ursprünglich war das Grundstück von einer großzügigen Parkanlage umgeben. 1936 entstand im hinteren Teil nach Plänen des Architekten Wilhelm Jost das Kameradschaftshaus des Nationalsozialistischen Studentenbundes. Das im Stil eines größeren Einfamilienhauses gestaltete Gebäude (Foto) beherbergte im Inneren Wohnräume für Mitglieder der "Kameradschaft Stammhaus" sowie Schulungs- und Versammlungsräume des NSB sowie des NS-Dozentenbundes. Im Erdgeschoss gab es einen großen Gemeinschaftsraum mit vorgelagerter Terrasse zum Garten. Das Gebäude überstand den Luftangriff ohne größere Schäden und wurde erst nach 1990 zugunsten moderner Einfamilienhäuser abgerissen.

Fotograf: Gustav Wetzel Ort: Dresden Strasse: Prager Strasse 6 Filiale: Zeitraum: 1879-1893 Atelier: Lithograf: Auszeichnungen: Bemerkungen: Atelier für Fotografie; Sponsor: Carsten Kattau

Die über Mockritzer, Zschertnitzer und Strehlener Flur verlaufende Caspar-David-Friedrich-Straße geht auf einen alten Höhenweg am südlichen Kamm des Elbtalkessels zurück. Da dieser Weg für den Transport der Steinkohle aus den Schachtanlagen in Bannewitz und Gittersee genutzt wurde, war bis ins 19. Jahrhundert der Name Kohlenstraße üblich. Später setzte sich die Bezeichnung Südhöhe durch, während der östlichste Teil von der Mockritzer Flurgrenze über Zschertnitz nach Strehlen ab 1862 als Josefstraße bezeichnet wurde. Namensgeber war Kaiser Franz Josef von Österreich, der 1860 den damaligen sächsischen Kronprinzen Albert in seiner Strehlener Villa besucht hatte. Erst 1940 erhielt die Straße ihren jetzigen Namen nach dem wohl bekanntesten deutschen Maler der Romantik Caspar David Friedrich. Infolge verkehrstechnischer Veränderungen besteht sie heute aus zwei getrennten Abschnitten zwischen Wasaplatz und Teplitzer Straße sowie dem über eine Treppenanlage erreichbaren südlichen Teil bis zur Südhöhe. Während in der Nähe des Wasaplatzes auf Strehlener Flur vor allem Villen dominieren, erinnert oberhalb der Räcknitzhöhe das letzte erhaltene Bauerngut an die Vergangenheit von Zschertnitz. Das Gehöft Caspar-David-Friedrich-Straße 52 blieb als einziges Zschertnitzer Gut 1973 vom Abriss verschont und steht heute unter Denkmalschutz. Im Wohnhaus Nr. 15b richteten die Nazis 1940 eines der berüchtigten “Judenhäuser” ein, in dem u.a. der bekannte Sprachwissenschaftler Victor Klemperer leben musste. Einzelne Gebäude: Nr. 5: Auch das Nachbarhaus weist eine interessante architektonische Gestaltung auf. Die Villa entstand 1905 mit zahlreichen Erkern, Giebeln und Fensterformen sowie verschiedenen Jugendstilelementen (Bild). Architekt war Georg Heinsius von Mayenburg, Bruder des “Chlorodont”-Fabrikanten. Er schuf zahlreiche Villen in Dresden und Umgebung, einen Großteil der Pavillons der I. Internationalen Hygieneausstellung und war auch am Umbau des Schlosses Eckberg beteiligt. Nr. 12: Das repräsentative Gebäude im Stil der sogenannten Reformbaukunst wurde kurz vor dem Ersten Weltkrieg in der Nähe der Einmündung des Zelleschen Wegs in die Josefstraße als privates Sanatorium erbaut. Inhaber war der Arzt Dr. Curt Schmidt. Ab 1932 übernahm der Psychiater Dr. Heinrich Stoltenhoff die Leitung der Privatklinik. Stoltenhoff (1898-1979) hatte in Königsberg und Wien studiert und wirkte ab 1922 als Assistenzarzt am Kurhaus Alberthöhe in Bad Schandau. Ab 1950 war bis zur Pensionierung 1964 Chefarzt und Ärztlicher Direktor des Krankenhauses Arnsdorf und zeitweise auch sächsischer Landespsychiater. Die Gebäude der früheren Privatklinik nutzte zu DDR-Zeiten die Poliklinik Dresden-Strehlen. Heute dienen sie als Ärztehaus. Nr. 15: Auch dieses Gebäude auf der gegenüberliegenden Straßenseite wurde schon vor dem Zweiten Weltkrieg für medizinische Zwecke genutzt. Hier befand sich die private Klinik Dr. Behringer. So wie mehrere Häuser in diesem Abschnitt der Caspar-David-Friedrich-Straße kam auch diese nach 1945 zur Poliklinik Strehlen, die hier ihre orthopädische und chirurgische Abteilung einrichtete. Heute dient das Haus als Waldorf-Kindergarten. Außerdem gibt es auch weiterhin Arztpraxen im Haus. Ziegelei Christmann (Nr. 34): Die Mitte des 19. Jahrhunderts gegründete Privatziegelei Christmann gehörte zu den drei Zschertnitzer Ziegeleien und stellte ihren Betrieb bereits nach dem Ersten Weltkrieg ein. Einige Nebengebäude blieben noch bis 1970 erhalten. Das Areal wurde daraufhin mit mehrgeschossigen Wohnhäusern bebaut (Räcknitzer Weg). Ziegelei der Vereinigten Dresdner Baugesellschaft (Nr. 36-46): Diese Ziegelei war im 19. Jahrhundert vom Mockritzer Gutsbesitzer Ulbricht gegründet worden. 1904 befand sie sich im Besitz der Vereinigten Dresdner Baugesellschaft (später Dresdner Bau- und Industrie AG). Das Unternehmen hatte um 1900 große Teile der Zschertnitzer Dorfflur erworben und für die Ziegelherstellung umgestaltet. Die eigentlichen Ziegeleianlagen befanden sich an der Räcknitzhöhe, die Lehmgrube erstreckte sich an der Südhöhe bis zur Münzmeisterstraße. Nach Einstellung des Ziegeleibetriebs übernahmen verschiedene gewerbliche Unternehmen die Gebäude. U.a. hatte hier die Firma Feig für die Herstellung chemisch-pharmazeutischer Erzeugnisse (“Olonga”; Nr. 36) sowie das Graphit-Schmelztiegel-Werk Blechschmidt (ab 1930 F.C. Theiss Graphit-Schmelztiegelwerk) ihren Sitz. Nach 1945 nutzte die Möbelfirma Röthing das Areal. Das Hauptgebäude blieb bis heute erhalten, während die meisten Nebengebäude sowie die einstigen Ringöfen dem Bau des Neubaugebietes Zschertnitz weichen mussten. Das areal der früheren Lehmgrube nimmt heute eine Kleingartenanlage ein. Maschinenfabrik Richard Gäbel (Nr. 39): Das Unternehmen wurde 1888 vom Mechaniker Friedrich Adolf Richard Gäbel (1866-1939) gegründet. Ursprünglich hatte die Firma ihren Sitz auf der Pirnaischen Straße 19 und wurde als einfache Werkstatt betrieben. Um 1900 stellte man hauptsächlich Spezialmaschinen für die Papierwarenindustrie her und übernahm zudem Reparaturarbeiten. Später kamen Maschinen zur Herstellung von Süßwaren und Verpackungen hinzu. Um 1914 beschäftige Gäbel bereits 60 Angestellte. Um sein Unternehmen ausbauen zu können, erwarb der Firmeninhaber nach dem Ersten Weltkrieg das Areal der früheren Mockritzer Ziegelei auf der Josefstraße 39. Hier ließ er die vorhandenen Bauten für seine Zwecke umbauen und durch eine Montagehalle sowie ein Verwaltungsgebäude ergänzen. Im Juni 1924 nahm die zugleich in eine Kommanditgesellschaft umgewandelte Firma in Mockritz die Produktion auf. Richard Gäbel war der Komplementär, seine Ehefrau sowie seine drei Kinder wirkten als Kommanditisten. Außerdem wurden Gäbels Schwiegersöhne Hermann Weber und Hermann Lohmann als Prokuristen eingesetzt. Die Firma spezialisierte sich nun auf den Bau von Papierschneide- und Verpackungsmaschinen für die Nahrungs- und Genussmittelindustrie. Zum Produktionsprogramm gehörten u.a. Waffel- und Gebäckschneidemaschinen sowie Spezialmaschinen für die Verpackung von Schokoladentafeln und Bonbons sowie Tabletteneinfüll- und -abzählanlagen. In dieser Zeit nahm das Unternehmen regelmäßig an Messen und Ausstellungen teil und erhielt für seine Erzeugnisse Auszeichnungen, u.a. eine “Goldene Medaille” zur Dresdner Hygiene-Ausstellung 1930/31 und den “Grand Prix” der Weltausstellung in Brüssel 1935. Die mit zahlreichen Patenten versehenen Maschinen wurden in 46 Länder Europas und nach Übersee verkauft. Bis 1938 war die Zahl der Beschäftigten auf ca. 100 angesteigen. 1939 übernahm Gäbels Schwiegersohn Hermann Weber die Geschäftsleitung, da der Unternehmensgründer zusammen mit seinem Sohn bei Jüterbog Opfer eines Verkehrsunfalls geworden war. Während des Zweiten Weltkrieges arbeitete der Mockritzer Betrieb hauptsächlich für die Rüstungsindustrie. Zu den Partnern gehörten die Junkers- Werke in Dessau sowie die Torpedoversuchsanstalt in Eckernförde. Den stark zurückgegangenen zivilen Anteil übernahm der Betriebsteil “Olonga” auf der Caspar-David-Friedrich-Straße 46. Zwischen 1941 und 1945 kamen verstärkt Kriegsgefangene als Zwangsarbeiter zum Einsatz, die im Gasthof “Elysium” an der Bergstraße, im Betriebsgelände Caspar-David-Friedrich-Straße 46 und in einer Baracke an der Münzmeisterstraße untergebracht waren. Kurz nach Kriegsende wurden große Teile des Maschinenparks demontiert und in die UdSSR verbracht, so dass zunächst nur kleine Reparaturarbeiten möglich waren. 1946 erhielt der Betrieb den Auftrag, im Rahmen von Reparationsleistungen 30 Bonbon-Prägeanlagen für die Sowjetunion zu produzieren. Wegen ihrer engen Verbindung zur Rüstungsindustrie fiel die Maschinenfabrik Richard Gäbel unter die Enteignungsbestimmungen des Volksentscheids und wurde zum 1. Juli 1946 verstaatlicht. Als VEB NAGEMA Spezialmaschinen Dresden bzw. VEB Manag-Werk gehörte der Betrieb bis zur Schließung 1990 zum Kombinat NAGEMA. Mitte der 1990er Jahre erfolgte der Abbruch sämtlicher Gebäude. An ihrer Stelle befindet sich heute ein Wohnpark (“Südpark”), für den mit der Dora-Stock- und der Louise-Seidler-Straße zwei neue Erschließungsstraßen auf dem früheren Betriebsgelände angelegt wurden. Mockritzer Höhe (Nr. 41): Die Gaststätte entstand Ende des 19. Jahrhunderts am Rande der Lehmgrube der Mockritzer Ziegelei (Kohlenstraße 3, später Josefstraße 41). Wegen der schönen Aussicht über das Elbtal entwickelte sie sich zu einem beliebten Ausflugslokal. Neben den Restaurationsräumen im Hauptgebäude gehörten auch eine Veranda und ein großer Gästegarten dazu. Nach 1945 wurde der Betrieb eingestellt. Das noch erhaltene Gebäude dient heute als Wohnhaus. Nr. 52: Der aus dem 19. Jahrhundert stammende Dreiseithof ist letztes erhaltenes Zeugnis des alten Bauerndorfes Zschertnitz. Die Gebäude entstanden in der zweiten Hälfte des 19. Jahrhunderts und bestehen aus dem Wohnhaus, einem Stallgebäude und einer Scheune. Da große Flächen der Zschertnitzer Ortsflur um 1900 für die Lehmgewinnung der Ziegeleien in Ansprich genommen wurden, erwarb die Dresdner Bau- und Industrie AG (Dresdner Baugesellschaft) das Gut und ließ es durch einen Gutsverwalter bewirtschaften. 1946 kam das Gehöft in Privatbesitz und wurde zuletzt von der LPG Kaitz landwirtschaftlich genutzt. Die Gebäude befinden sich heute in einem schlechten Zustand, stehen jedoch unter Denkmalschutz.

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Die Straße Sonniger Weg verbindet Schilfweg und Dobritzer Straße in Seidnitz. Auf Beschluss vom 24. Juni 1920 wurde die Planstraße 3 mit Sonniger Weg benannt.

Fotograf: Kurt Meyer Ort: Dresden Strasse: An der Augustusbrücke 4, Eingang beim Wiener Garten Filiale: Zeitraum: ca.1900 Atelier: Atelier Germania

Die Dohnaer Straße ist Teil einer alten Verbindungsstraße zwischen Dresden und der einst wichtigen Burg Dohna. Ihren Ausgangspunkt hat sie im Dorfkern von Strehlen, wo noch einige historische Bauerngüter erhalten geblieben sind. Hier verlief einst auch die Weichbildgrenze Dresdens, die mit entsprechenden Weichbildsteinen gekennzeichnet wurde. Ein solcher hat sich noch in Altstrehlen erhalten. Nach Zerstörung der um 1000 entstandenen Burg Dohna im Zuge der Dohnaischen Fehde 1402 verlor der Verkehrsweg schlagartig seine Bedeutung, da Markgraf Wilhelm die wichtige Moltabrücke bei Großluga zerstören ließ und somit die Verbindung nach Dohna unterbrach. Erst nach Ende der Kampfhandlungen konnte diese Straße wieder durchgängig befahren werden. Im 18. Jahrhundert wurde sie als Alte Teplitzer Poststraße ausgebaut und diente nun dem Fernverkehr nach Böhmen. Mit Entstehung neuer Verkehrswege im Elbtal verlagerte sich der Verkehr immer mehr auf diese günstigeren Verbindungen, wodurch die alte Straße zum unbedeutenden Ortsverbindungsweg herabsank. Erst im 19. Jahrhundert griff man auf den ursprünglichen Verlauf zurück. Die alte Dohnaische Straße wurde zur Chaussee ausgebaut und gehört heute als Bundesstraße 172 zu den am stärksten befahrenenen Ausfallstraßen Dresdens. Bis zur Stadtgrenze folgte diese Straße weitgehend dem ursprünglichen Verlauf. Der Straßenteil zwischen Luga und Dohna existiert heute nur noch als Feldweg. 1899 entstand an der Ehrlichtmühle in Heidenau die neue Müglitzbrücke, in den 20er Jahren der Neubauabschnitt bis Pirna. Strehlen: Die Dohnaer Straße beginnt im alten Dorfkern von Strehlen, wo noch einige frühere Bauerngüter erhalten sind. Einige dieser Gebäude, u. a. die Nr. 1 und Nr. 27 sind als Baudenkmale in den Denkmallisten verzeichnet. Bedeutendstes historisches Gebäude ist das 1829 von Thormeyer errichtete alte Strehlener Schulhaus (Nr. 16), welches seit 1977 ebenfalls unter Denkmalschutz steht und heute gewerblich genutzt wird. Ende des 19. Jahrhunderts entstanden weitere Wohn- und Geschäftshäuser, darunter der einstige Gasthof “Zur goldenen Krone” (Nr. 7-9) und das Restaurant "Rathsgarten" (Nr. 13 - Bild). Hinzu kamen nach 1870 einige Villen, später auch mehrgeschossige Mietshäuser. Seit 1881 trägt die Dohnaer Straße offiziell ihren Namen. 1962 wurde auf dem Grundstück Nr. 53 ein Gemeindehaus für die katholische St.-Petrus-Gemeinde eingeweiht. Strehlener Mühle: Die Mühle am Kaitzbach entstand Mitte des 16. Jahrhunderts als Wassermühle (Zeichnung) und wurde 1870 zur modernen Dampfmühle umgebaut. Am 9. August 1883 besiegelte ein Brand das Schicksal des Unternehmens. Nach Abbruch der Ruinen entstand an gleicher Stelle zehn Jahre später das Mietshaus Dohnaer Straße 18. Bauherr war der Bäckermeister Louis Haase, dessen Nachkommen bis heute im Haus ihre Bäckerei betreiben (seit 1971 Bäckerei Morenz). 1993 entstand nebenan das kleine “Café Lui”. Olympia-Kino: Das kleine Kino an der Ecke Dohnaer/Teplitzer Straße wurde im März 1938 eröffnet. Architekt des Gebäudes war Paul Müller, der das Haus in modernen und sachlichen Formen gestaltete. Im Inneren befand sich hinter dem Foyer mit der Kinokasse der Zuschauerraum mit ca. 500 Plätzen. Außerdem gab es im Obergeschoss ein Wohnung. Die Namensgebung erfolgte vermutlich in Anlehnung an ein bereits vor dem Ersten Weltkrieg gegründetes Filmtheater am Altmarkt. Auch nach 1945 wurde im “Olympia-Kino” der Spielbetrieb fortgesetzt. 1995 schloss das Kino aus wirtschaftlichen Gründen und wurde in der Folgezeit zur Kfz-Werkstatt umgebaut (Foto: Stadtwiki Dresden). Wohnsiedlung Dohnaer/Rayskistraße: Die nach einem einheitlichem Konzept entworfene Wohnsiedlung entstand zwischen 1930 und 1934 im Auftrag des Baumeisters Hanns Vasak und wurde in Anlehnung an die Formensprache des Bauhauses modern gestaltet. Bereits zuvor hatte die Heimstättengesellschaft Sachsen (HGS) zwischen Dohnaer und Lockwitzer Straße einige Wohnblocks errichten lassen. Die Gebäude beherbergten vorrangig Kleinwohnungen mit Bädern und WC´s. Wegen des Verdachts der Beamtenbestechung und manipulierter Bürgschaften wurden Vasak und der Geschäftsführer der HGS 1934 verhaftet. Die folgenden Zivilgerichtsprozesse zwischen Banken und der am Bau beteiligten Reichspost führten zu einem jahrelangen Rechtsstreit, der erst 1959 mit der Auflösung der Heimstättengesellschaft und der Übernahme der Häuser durch die Deutsche Post endete. Nach 1990 wurde die Siedlung saniert. Leubnitz-Neuostra: Mit Erreichen der Ortsgrenze zwischen Strehlen und Leubnitz trifft die Dohnaer Straße auf die Bundesstraße B 172, die ihrem weiteren Verlauf bis zur Dresdner Stadtgrenze folgt. Ursprünglich lagen hier mehrere Ziegeleien, welche heute alle nicht mehr existieren und deren Grundstücke jetzt gewerblich genutzt werden. 1928 entstanden auf Leubnitzer Flur die auch “Sommersiedlung” genannten Mietshäuser an der Spitzwegstraße. Die übrigen Freiflächen wurden nach 1980 mit einer Plattenbausiedlung bebaut. Beim Bau konnten Reste einer steinzeitlichen Siedlung freigelegt werden. Zum Knipser (Nr. 81): In diesem Gebäude befand sich bis 1990 die filmtechnische Anstalt der Familie Schumann. Ursprünglich war das Unternehmen 1926 vom deutsch-russischen Mechaniker Wladimir Schmidt in der Johannstadt gegründet worden. Hier fertigte man verschiedene Kameras und Filmprojektoren für das In- und Ausland. Nach Zerstörung der Geschäftsräume auf der Pfotenhauerstraße verlegte Schmidt zusammen mit seinem Mitarbeiter Erich Schumann den Betrieb nach Leubnitz, wo man mit ausgelagerten Maschinen einen Neuanfang wagte. In den 1960er Jahren übernahm Schumann die Firma allein und widmete sich fortan vor allem der Produktion von Kurzfilmen für wissenschaftliche Institute und Unternehmen sowie der Erstellung und Vervielfältigung von Diaserien. Mit dem Wegfall der Auftraggeber nach der Wende entschloss sich die Familie, in den Geschäftsräumen ein Fotostudio sowie ein kleines Café einzurichten. Unter dem Namen “Zum Knipser” existiert das Lokal bis heute. In den Räumen ist zudem eine Ausstellung historischer Kameras und Kinomaschinen zu sehen, ebenso Teile der Ausstattung des 1995 geschlossenen Olympia-Kinos. Firma Dr. Klopfer: Die Nahrungsmittelfabrik an der Dohnaer Straße 103 wurde 1900 von Dr. Volkmar Klopfer gegründet und produzierte in einem speziellen Verfahren Lezithin. Das für die gesunde Ernährung wichtige Pflanzeneiweiß wurde dabei mit Hilfe einer von Klopfer entwickelten Zentrifuge aus Weizenmehl gewonnen und zur Weiterverarbeitung zu Vollkornbrot und Kräftigungsmitteln verkauft. Der international renommierte Lebensmittelfachmann erhielt 1911 auf der I. Internationalen Hygiene-Ausstellung für sein Verfahren den “Großen Preis”. Bis zum Ersten Weltkrieg wuchs die Belegschaft des Werkes auf zeitweise über 300 Angestellte an. Bedingt durch die Kriegsfolgen und die Inflation geriet der Nahrungsmittelhersteller jedoch in wirtschaftliche Schwierigkeiten und wurde 1924 in eine Aktiengesellschaft umgewandelt. Dr. Klopfer fungierte zunächst noch als deren Direktor, schied jedoch wenig später aus seinem Betrieb aus und gründete das Chemische Werk Dr. Klopfer GmbH in Altleubnitz. 1932 wurde die Dr. Klopfer AG geschlossen und das Grundstück verkauft. Nach 1945 befand sich hier der VEB Weizenin, welcher u.a. Speisewürze, Glutal, Brühpulver und Rohstoffe für die Backwarenindustrie herstellte. Nach der Wende übernahm die Düsseldorfer Handelsgesellschaft Zamek den Betrieb. Die Fabrikgebäude weisen zum Teil Jugendstil-Dekorationen auf und stehen unter Denkmalschutz. 1997/98 wurde die Anlage saniert und wird heute von einem Sportcenter und einem Autohaus genutzt. Prohlis: Zwischen dem Dorfkern von Prohlis und der Dohnaer Straße entstanden Ende des 19. Jahrhunderts auf Leubnitzer, Prohliser und Tornaer Flur mehrere Ziegeleien. Auf eine solche geht auch der Naturpark an der Gamigstraße zurück, der mit seinem Teich nach Einstellung des Betriebes angelegt wurde. Bis 1923 betrieben hier die Gebrüder Kunath eine Lehmgrube zur Rohstoffgewinnung ihrer Ziegelei (Dohnaer Straße 121). Ein weiteres Restloch der 1906 stillgelegten Ziegelei Pahlisch & Vogel wurde nach dem Abriss der Gebäude 1933 zum Freibad Prohlis umgewandelt (Nr. 135). Gegenüber stand bis zur Zerstörung 1945 der Prohliser Gasthof (Nr. 182 - Bild). Hier fand am 31. Mai 1921 die letzte Gemeinderatssitzung vor der Eingemeindung statt. Ziegeleien an der Dohnaer Straße Standort Ziegelwerk Mey & Sohn (F. Herrmann und Johannes Mey) Dohnaer Str. 60 Ziegelwerk Hering (Herings Erben) Dohnaer Str. 64 Ziegelwerke Reinhold Prenzel (VEB Ziegelwerk Torna) Alttorna 5 Ziegelwerke Schmidt & Co. Alttorna 7 Dampfziegelwerk Pahlisch & Bergmann Tornaer Str. 28 Ziegelwerke Friedrich Kunath Dohnaer Str. 121 Ziegelwerke F. Paul Gottschalch (später Pahlisch & Vogel) Dohnaer Str. 135 Dampfziegelei Thieme & Söhne Dohnaer Str. 158 Dampfziegelei Müller & Bergmann Dohnaer Str. 176 Dampfziegelei Robert Kunath (Kunath & Müller) Dohnaer Str. 176-180 Ziegelwerke Kurt Herrnsdorf Dohnaer Str. 194 Dampfziegelwerke Hans Leonhardt Dohnaer Str. 236 Ziegelei Heyde & Waschneck Dohnaer Str. 340 Lockwitz/Nickern: Der durch die Fluren von Lockwitz und Nickern führende Straßenabschnitt wird von verschiedenen gewerblichen Einrichtungen geprägt, die meist nach 1990 auf früherem Ziegeleigelände entstanden. Neben zahlreichen Autohäusern 1995 gegenüber der Gleisschleife Prohlis das Einkaufszentrum “Kaufpark Nickern” errichtet. In der 1994 an der Ecke Fritz-Meinhard-Straße eröffneten Mercedes-Niederlassung erinnert das Café Caracciola an den berühmten Rennfahrer Rudolf Caracciola, der seine Karriere in den Zwanziger Jahren als Autoverkäufer in Dresden begann. Unterer Gasthof Lockwitz: Der Gasthof entstand als zweiter des Ortes Mitte des 16. Jahrhunderts an der Dohnaer Straße/ Ecke Lockwitztalstraße und wurde 1577 erstmals urkundlich genannt. Zur besseren Unterscheidung vom älteren Oberen Gasthof erhielt das ursprünglich als Niederschänke bezeichnete Lokal den Namen Unterer Gasthof Lockwitz. 1862 enstand an gleicher Stelle ein Neubau mit zwei Sälen. 1891/95 wurde dieses Haus von O. Kreyßig um einen Saalanbau und eine Veranda erweitert. Während der Obere Gasthof heute nicht mehr existiert, blieb der Untere Gasthof auch nach 1945 beliebte Einkehrstätte und wurde wegen seiner häufigen Tanzveranstaltungen bekannt. Nach 1990 befand sich in den Räumen ein Jugendclub. Heute haben hier verschiedene Unternehmen ihr Domizil. Im 2008 sanierten Ballsaal finden regelmäßig Veranstaltungen statt, außerdem können die Räume für private Feiern gemietet werden. Großluga Nach Verlassen der Lockwitzer Flur erreicht die Dohnaer Straße Großluga, letzter Stadtteil auf Dresdner Stadtgebiet. Bis zur Eingemeindung Großlugas nach Niedersedlitz 1922 wurde sie hier als Dorfstraße, teilweise auch als Großluga - Lockwitzer Communicationsweg bzw. Großluga - Gommerner Weg bezeichnet. Gommern gehört heute zur Stadt Heidenau. Um 1907 sind auch die Namen Lockwitzer Straße bzw. Gommernsche Straße nachweisbar. Da es in Niedersedlitz bereits eine Lockwitzer Straße gab, erfolgte 1922 die Umbenennung des in Richtung Dresden führenden Teilabschnitts in Dresdner Straße. Mit der Eingemeindung von Niedersedlitz nach Dresden wurden sowohl Lockwitzer als auch Gommerner Straße 1953 bzw. 1956 der Dohnaer Straße zugeordnet.

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Die Sosaer Straße tauchte erstmals im Adressbuch von 1891 als Schulstraße auf und führt an der 1876 eingeweihten Schule vorbei. An der Schule kreuzt sie die heutige Pfaffendorfer Straße, die damals Schulweg genannt wurde. Ab dem 20. März 1933 wurde die Straße umbenannt in Adolf-Hitler-Straße. Nach 1945 wurde sie wieder rückbenannt in Schulstraße. Wegen der in Gittersee vorhandenen Schulstraße erfolgte in Niedersedlitz mit Beschluss vom 30. September 1953 die Umbenennung in Sosaer Straße nach dem Ort. Sosa ist heute ein Ortsteil von Eibenstock.

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Der Strehlener Platz wurde Ende des 19. Jahrhunderts angelegt und gärtnerisch gestaltet. Zuvor befand sich hier eine Steuereinnahmestelle mit Akzisehaus, welches 1930 dem Neubau des Hotels “Astoria” weichen musste. 1933 erfolgte die Umbenennung in Horst-Wessel-Platz nach dem nationalsozialistischen “Märtyrer” Horst Wessel, der 1923 beim Putschversuch Hitlers ums Leben gekommen war. 1945 wurde diese Namensgebung wieder aufgehoben und der Platz fortan bis 1990 Ernst-Thälmann-Platz genannt. In den Grünanlagen an der Teplitzer Straße fand 1986 aus Anlass des 100. Geburtstages des Arbeiterführers ein Thälmann-Denkmal Aufstellung. Schöpfer war der Bildhauer Johannes Peschel. Das bis heute erhaltene Denkmal zeigt eine Büste Thälmanns vor acht Betonsäulen. 1990 erhielt der Strehlener Platz seinen ursprünglichen Namen zurück. Hotel “Astoria”: Das im modernen Stil gestaltete Gebäude am Strehlener Platz entstand nach einem Entwurf von Stadtbaurat Paul Wolf als ”Haus der Jugend” und wurde am 24. März 1931 eröffnet. Getrennt in einen Knaben- und einen Mädchentrakt bot das Haus über 460 Betten, mehrere Speise-, Vortrags- und Aufenthaltsräume und galt als eine der modernsten Jugendherbergen Deutschlands. Nach dem Machtantritt der Nazis musste diese Einrichtung geschlossen werden. Zunächst wurde das Haus nun als Führerschule der Hitlerjugend, während des Zweiten Weltkrieges als Hilfskrankenhaus genutzt. 1945 brannte es teilweise aus, blieb jedoch in seiner Grundstruktur erhalten. Nach Beseitigung der Kriegsschäden konnte hier am 11. August 1950 das erste Dresdner Großhotel nach dem Zweiten Weltkrieg eingeweiht werden. Beim Wiederaufbau orientierte man sich am bereits zur Bauzeit verwendeten Stil. Die Innenausstattung übernahm der Architekt Hans Hartl, der wegen seiner formalistisch-modernen Gestaltung scharf kritisiert wurde. 1956 erfolgte eine teilweise Modernisierung im Zusammenhang mit dem Dresdner Stadtjubiläum. Während der Feierlichkeiten besuchten u. a. Otto Grotewohl, Kulturminister Alexander Abusch, der frühere sowjetische Stadtkommandant Oberst Bortnikow, der jemenitische Kronprinz Emir Seif el-Islam al-Badr und Nordkoreas Staatschef Kim Ir-Sen das Hotel. Auch Staatspräsident Wilhelm Pieck und SED-Chef Walter Ulbricht trugen sich ins Gästebuch des Hauses ein. Anfang der 1960er Jahre diente das Hotel zeitweise als Gästehaus des Rates des Bezirkes Dresden. 1965 wurde es zum Interhotel erweitert und erhielt in diesem Zusammenhang den Namen “Astoria”. Das Haus besaß 114 Betten, eine Bar und ein Tanzcafé. Außerdem gab es neben einer auch von den Dresdnern gern besuchten Gaststätte einen “Intershop”, in dem gegen Devisen westliche Waren erworben werden konnten. Zu den berühmten Gästen des ”Astoria” gehörten u. a. Erich Kästner, Karl Böhm, Rudolf Mauersberger und Täve Schur. Ab 1985 gehörte es als Betriebsteil zum neu eröffneten Luxushotel “Bellevue” am Neustädter Elbufer. 1988 enstand in den Räumen des früheren Tanzcafés das Restaurant “Rendezvous”. Trotz einiger Renovierungsarbeiten kurz nach der Wende und guter Auslastung wurden das Hotel “Astoria” und die angeschlossene Gaststätte 1992 geschlossen und im Oktober 1997 für einen geplanten, aber nie realisierten Hotelneubau abgerissen. An gleicher Stelle entstand 2006 ein Lebensmittelmarkt. Ingenieurschule für Eisenbahnwesen: Nachdem bereits 1951 in Dresden eine Ingenieurschule für Eisenbahnwesen gegründet worden war, welche ihren Sitz zunächst an der Dornblüthstraße 6 hatte, entstand wenig später ein Neubau am Strehlener Platz und der Strehlener Straße. 1955 konnte das Haus bezogen werden. Ausgebildet wurden hier Führungskräfte für den mittleren Dienst der Deutschen Reichsbahn. Für diese gab es die Abteilungen Maschinentechnik, Eisenbahnstrecken-, Brücken und Hochbau, Sicherungs- und Fernmeldetechnik, Starkstromtechnik sowie Ökonomie des Eisenbahnwesens. Zum Leiter wurde der Reichsbahnhauptrat Koepp ernannt. Neben Mitarbeitern der Deutschen Reichsbahn wurden später auch Absolventen des militärischen Transportwesens sowie verschiedener Großbetriebe mit eigenen Anschlussbahnen ausgebildet. In den 1970er Jahre wurde die Schule in Ingenieursschule für Verkehrstechnik umbenannt und 1988 an die Hochschule für Verkehrswesen angeschlossen, 1991 jedoch aufgelöst. Heute nutzen u.a. die Berufsschule für Elektro- und Informationstechnik und die Fachschule für Technik dire Gebäude.

Konrad Wachsmann Konrad Ludwig Wachsmann (* 16. Mai 1901 in Frankfurt (Oder); † 25. /26. November 1980 in Los Angeles) war ein deutscher Architekt jüdischer Abstammung, der 1941 in die USA emigrierte. Wachsmann absolvierte eine Tischler-Lehre in der Werkstatt Münnich in Frankfurt (Oder) und studierte von 1920 bis 1924 in Berlin und Dresden bei Heinrich Tessenow, anschließend als Meisterschüler von Hans Poelzig an der TH Berlin. Wachsmanns Versuch bei1924/1925 arbeitete Wachsmann als unbezahlter Praktikant bei Le Corbusier in Paris.

Die Spenerstraße in Striesen führt von der Kyffhäuserstraße bis zur Borsbergstraße, wobei sie zwischen der Merseburger Straße und der Haydnstraße nur als Fußweg passierbar ist. Die Straße ist einerseits durch einige Plattenbauten, aber auch Villen und einer denkmalgeschützten geschlossenen Bauweise von Paul Wolf an der Ecke Wormser Straße geprägt. Sie erhielt mit dem Bebauungsplan im Jahr 1873 zunächst die Bezeichnung Straße 5 und ist seit 1893 offiziell nach Philipp Jacob Spener (* 13. Januar 1635 in Rappoltsweiler, Oberelsass; † 5. Februar 1705 in Berlin), dem bekanntesten Vertreter des Pietismus, benannt . Spener war ebenfalls von 1686 bis 1691 Oberhofprediger in Dresden. Adressen Nr. 1 (Hinterhaus): Wohnung von Familie Wehner Nr. 1b: Kunstmaler Johannes Beutner Nr. 21: denkmalgeschütztes Wohn- u. Geschäftshaus mit Interieur, rückwärtiger Garage und Einfriedung, vormals Verlag der Kunst Dresden Nr. 25 (Vorderhaus): bis 1934 Wohnung von Maler und Professor Carl Rade (1878-1954) Nr. 35: ehemals VEB Maschinenbauhandel Dresden

(30.07.2001) An Herbert Wehners Geburtstagsabend wurde es im Bildungswerk literarisch. Die Kölner Schriftstellerin Anne Dorn, Trägerin des Deutschen Journalistenpreises, las ihre Kindheitserinnerungen an Dresden-Striesen vor. Der Clou: Ihr Großvater, Kohlenhändler Heinrich Schlegel, lebte bis zu seinem Tod beim Bombardement von 1945 in der Spenerstraße und war wohl der Vermieter der Familie Wehner, die mehrere Jahre in der Spenerstraße 1b wohnte. Anne Dorn beschreibt den Geburtsort von Herbert Wehner wie folgt: "Was an diesem Striesen so besonders war, war dank seines Entstehungszeitraums kurz vor und kurz nach der vorvergangenen Jahrhundertwende die Liaison zwischen Fabrikanten und Arbeitern wie Angestellten. Alle waren sie Neulinge in Striesen, Unternehmer und Arbeiter. Sie sollten und wollten bleiben. Und so wuchsen mit den Fabriken und Unterkünften auch Schulen, Bäder, Sportstätten, Kneipen, Vereine, Verbände, und auch Parteien! Die 'Bürgerlichen' suchten in Striesen nach 'Aufstrebenden', die Kommunisten suchten ebendort 'das Proletariat'. Weder die einen noch das andere waren in Striesen 'rein' zu finden." Sicher mit Bezug auch auf die Biographie von Herbert Wehner heißt es an anderer Stelle: "Hält man dem Anblick einer vergangenen Wirklichkeit stand, hat man eine genauere Vorstellung von dem, was wünschbar und möglich ist." Die etwa 50 Zuhörerinnen und Zuhörer der abendlichen Lesung, darunter auch Greta Wehner, Wolfgang Vogel und Jürgen Schmude, waren beeindruckt von diesem literarischen Anstimmen einer Saite im Leben von – auch – Herbert Wehner.

Fotograf: Kurt Meyer Ort: Dresden Strasse: An der Augustusbrücke 4, Eingang beim Wiener Garten Filiale: Zeitraum: ca.1900 Atelier: Atelier Germania

Die Tiergartenstraße entstand Mitte des 19. Jahrhunderts und erhielt ihren Namen nach dem hier 1861 eröffneten Zoologischen Garten. Die Grundstücke an der Südseite des Großen Gartens wurden mit repräsentativen Villen bebaut, die die Straße zum Wohnsitz einiger der reichsten Dresdner Familien machten. Gleichzeitig stellte diese Straße eine Verbindung zwischen dem “Englischen Viertel” der Seevorstadt und den Villenvierteln Strehlens her. Ab 1882 verkehrte die Pferdebahnlinie Neumarkt - Zoologischer Garten bis zur Tiergartenstraße. Am Endpunkt dieser Strecke (Querallee) befand sich damals der Eingang zum Zoologischen Garten, welcher jedoch 1891 an die heutige Stelle verlegt wurde. Eines der früheren Kassenhäuschen ist noch erhalten und diente ab 1919 als Straßenbahnwartehalle. Leider fielen Teile der Fassade, darunter ein Löwenkopfrelief über der Tür, späteren Umbauten zum Opfer. Nach 1945 diente diese Wartehalle zeitweise als Notquartier einer ausgebombten Familie. 1945 fielen zahlreiche Villen an der Tiergartenstraße den Bomben zum Opfer, vor allem im westlichen Bereich. An Stelle der zerstörten Gebäude entstanden in den 1960er Jahren Neubauten sowie eine Schule. 1988 wurde auf einem früheren Villengrundstück das moderne Gemeindezentrum der Dresdner Mormonen eingeweiht. Einzelne Gebäude: Villa Salzburg (Nr. 8): Die Villa im Renaissancestil wurde 1874 von Hermann Nicolai für den Textilgroßhändler Salzburg errichtet. 1909/10 ließ dessen Sohn das repräsentative Gebäude umbauen. Die von den Nazis 1940 enteignete Villa diente nach dem Zweiten Weltkrieg viele Jahre dem Deutschen Roten Kreuz, ab 1970 der Zivilverteidigung. Das einzige erhaltene Gebäude des 1945 zerstörten “Englischen Viertels” wurde nach 1990 saniert und war danach Sitz eines Bildungszentrums für Denkmalpflege. Seit 2010 befindet sich hier eine exklusive Möbelhandlung. Nr. 10: Die 1945 zerstörte Villa war vor dem Zweiten Weltkrieg Wohnsitz der Familie Kreutzkamm, Besitzer der bekannten Konditorei am Altmarkt. An ihrer Stelle befindet sich heute der Parkplatz des Zoologischen Gartens. 21. Mittelschule: Das Schulhaus vom DDR-Typ “Dresden” entstand Anfang der 1970er Jahre an der Tiergartenstraße 18 und wurde wegen seiner Nähe zum Zoo umgangssprachlich als “Zooschule” bezeichnet. Offiziell hieß diese Schule 21. POS “Anton Saefkow”. Mit der Namensgebung sollte der kommunistische Widerstandskämpfer Anton Saefkow (1903-1944) geehrt werden, der wegen seiner Untergrundarbeit und dem Aufruf zur Sabotage in Rüstungsbetrieben 1944 zum Tode verurteilt wurde. Ab 1986 befand sich im Erdgeschoss des Schulgebäudes das Dresdner Schulmuseum. 2003 schloss die 1991 in die 21. Mittelschule umgewandelte Bildungseinrichtung ihre Pforten. Seit 2005 nutzt die Freie BIP Kreativsschule das Gebäude als Grundschule. Brunnen “Mutter und Kind”: An der Ecke Tiergartenstraße/ Beethovenstraße befindet sich ein kleiner Brunnen “Mutter mit Kind”, welcher 1963 von Vinzenz Wanitschke geschaffen wurde. Die bronzene Brunnenplastik entstand im Rahmen eines Wettbewerbes und wurde 2003/04 saniert. In diesem Zusammenhang erfolgte zugleich eine Neugestaltung des Brunnenbeckens und die Hinzufügung einer Granitkugel, welche sich auf dem Wasserpolster bewegt. Nr. 28: Erbauer dieser Villa war der Architekt Ernst Fleischer, der das Haus nach seiner Fertigstellung 1898 als eigenes Wohnhaus nutzte. Die Villa überstand als eines der wenigen Gebäude die Zerstörungen 1945. Die Fassade im Neobarockstil wurde teilweise nach dem architektonischen Vorbild der Hofkirche gestaltet. Zwischen 2003 und 2008 wohnte hier der Wettiner Prinz Alexander von Sachsen, der zeitweise im Auftrag der sächsischen Landesregierung tätig war. Nr. 32: Das Gebäude befand sich in den Zwanziger Jahren im Besitz des jüdischen Bankiers Heinrich Arnhold. Gemeinsam mit seiner kunstsinnigen Frau Lisa trat Arnhold nicht nur als Stifter verschiedener sozialer Einrichtungen in Erscheinung, sondern trug auch eine große Kunstsammlung zusammen. Zu dieser Sammlung gehörten Gemälde und Grafiken von Künstlern wie Max Liebermann, Lovis Corinth, Otto Nolde und Käthe Kollwitz, aber auch wertvolle Porzellane und Plastiken. Nach dem Tod Heinrich Arnholds 1935 und unter dem Eindruck der zunehmenden Repressalien gegen jüdische Bürger verlegte seine Witwe ihren Wohnsitz 1937 in die Schweiz und lebte nach 1945 in der USA, wo sie 1972 verstarb. An Stelle der 1945 zerstörten Villa wurde in den 60er Jahren ein Wohnblock errichtet. 2009 ließ die Bürgerstiftung vor dem Haus ein Denkmal für die Bankiersfamilie aufstellen. Das von der Künstlerin Erika Lust gestaltete Mahnmal besteht aus einer Sandstein-Bodenplatte, einer Stele und einer gläsernen Gedenkplatte mit einem Foto des vernichteten Gebäudes. Nr. 36: In diesem Haus wohnten bis zur Zerstörung 1945 die Inhaber des bekanntesten Dresdner Kaufhauses Renner am Altmarkt. Auch dieses Gebäude fiel den Luftangriffen zum Opfer. Nr. 40/42: Auf diesem Grundstück an der Ecke zur Oskarstraße stand bis zur Zerstörung 1945 die frühere Villa des Kommerzienrates Paul Leonhardt. Leonhardt war zugleich Generalkonsul von Bolivien, wobei sich der Sitz des Konsulates auf der nahegelegenen Beuststraße befand. Während des Zweiten Weltkriegs waren im Haus Teile des Dresdner Stadtarchivs ausgelagert, die bei der Vernichtung der Villa verloren gingen. Nach Abriss der Ruine Anfang der 1950er Jahre errichtete die Technische Universität hier einige Baracken. Im März 1987 begann auf dem Areal der Bau des Gemeindezentrums der Kirche Jesu Christi der Heiligen der letzten Tage. Erhalten blieb die unter Denkmalschutz stehende Grundstücksumfassung zwischen Tiergarten-, Oskar- und Wiener Straße. Nr. 48: Das nach seinem Bauherren Villa Mundts genannte Haus entstand 1906 im Jugendstil mit klassizistischen Elementen. Die Planung oblag dem renommierten Architekturbüro Lossow & Kühne, welches mehrere Villenbauten in Strehlen entwarf. Nr. 52: Die Villa (Foto) wurde 1901 vom Architekten William Lossow als eigenes Wohnhaus errichtet. Lossow war Teilhaber des bekannten Architekturbüros Lossow & Viehweger und um 1900 einer der meistbeschäftigten Dresdner Architekten. Auch das benachbarte Wohnhaus Tiergartenstraße 50 wurde von ihm entworfen. Später kam die Lossow-Villa in den Besitz der Siemens AG für Glasindustrie und wurde nach 1945 von der Tanzschule Römer genutzt. Nr. 64: Dieses Gebäude entstand um 1900 als Wohnhaus für den jüdischen Bankier Victor von Klemperer. Klemperer übernahm 1914 die Nachfolge seines Vaters als Direktor der Dresdner Bank und war zugleich bedeutender Kunstkenner und -sammler. Zu seinem Freundeskreis gehörten Fritz Busch, Richard Tauber, Maria Cebotari und Oskar Kokoschka. Villa und Kunstsammlung wurden 1938 von den Nazis beschlagnahmt und die jüdische Familie in die Emigration getrieben. Bis 1945 nutzte die Reichsfinanzverwaltung das Haus, welches beim Luftangriff zerstört wurde. Dabei ging auch ein Großteil der Sammlung verloren. Einige Reste wurden 1991 an die Erben zurückgegeben. Auf dem Grundstück wurde in der Nachkriegszeit ein neues Wohnhaus errichtet. Nr. 72: Diese beim Luftangriff 1945 zerstörte Villa war Wohnsitz des letzten amtierenden Dresdner Oberbürgermeisters vor dem Ende des Zweiten Weltkriegs. Dr. Rudolf Kluge gehörte ab 1930 als Stadtverordneter der NSDAP dem Stadtrat an und übernahm 1934 das Amt des Zweiten Bürgermeisters. Zwischen 1937 und 1940 und ab Februar 1945 leitete er die städtische Verwaltung bis zum 7. Mai 1945. Bischof-Wienken-Haus (Nr. 74): Die in den Zwanziger Jahren im Bauhausstil errichtete Villa befindet sich im Besitz der katholischen Kirche und wird als Bischof-Wienken-Haus bezeichnet. Heinrich Wienken war zwischen 1951 und 1957 Bischof des Bistums Meißen und ließ im Haus ein kirchliches Schulungszentrum einrichten. Nach 1990 wurde das Gebäude renoviert und beherbergt seit November 2006 eine Niederlassung der Missionsschwestern vom heiligen Petrus Claver. Der Orden ist vor allem in der Kinder- und Jugendarbeit tätig. Sein Patron Petrus Claver (1581-1651), dem auch die im Haus befindliche Kapelle geweiht ist, widmete sich der Seelsorge der nach Südamerika verschleppten afrikanischen Sklaven und wurde dafür 1888 heilig gesprochen. Nr. 81: Die Villa entstand 1914 für den Textilhändler Benedix Jordan und zeigt noch Anklänge an den späten Jugendstil. Jordan war Inhaber des Herrenbekleidungsgeschäftes G. Tuchler Nachf. an der König-Johann-Straße. Auch dieses Haus wurde 1938 als jüdisches Eigentum konfisziert und war bis 1945 Sitz des rumänischen Konsulats. Heute dient die Villa als Bürohaus. Nr. 82: Die bis 2007 vom Heinrich-Schütz-Konservatorium genutzte Villa ist heute Sitz und Begegnungsstätte des jüdisch-orthodoxen Religionsvereins Chabad Lubawitsch. Zuvor hatte dieser sein Domizil auf der Merseburger Straße 1. Nr. 94: Der moderne Gebäudekomplex wurde 1993/95 für die Dresdner Kfz-Innung errichtet. Ursprünglich wurde das Areal vom VEB Kraftverkehr genutzt. Die neuen Häuser beherbergen Werkstätten und Unterrichtsräume für die Berufsausbindung, Wohnungen für auswärtige Schulungsteilnehmer, eine Mensa sowie eine öffentliche Gaststätte. Zum Eröffnungszeitpunkt 1996 war das Zentrum größtes Berufs- und Technologiezentrum des Kfz-Gewerbes in Deutschland.

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Der Sperlingsweg liegt in einem Wohngebiet, das zwischen 1926 und 1930 mit Holzhäusern bebaut wurde. Die Häuser wurden gebaut durch die Firma Höntsch & Co. Niedersedlitz und die Deutschen Werkstätten Hellerau. Die Gebäude wurden nahezu vollständig bei der Bombardierung Dresdens zerstört. Es blieb lediglich ein Doppelhaus bestehen im Zeisigweg 39-41. Dieses Haus steht heute auf der Liste der Kulturdenkmale in Prohlis. Es befindet sich am Ende des Sperlingsweges. Etwa in der Zeit nach 1950 wurden in dem Gebiet massive Wohnhäuser errichtet. Der Name Sperlingsweg bezieht sich, wie auch bei anderen Straßen in dem Gebiet, auf eine Vogelart, die Familie der Sperlinge. Seit 1927 steht der Straßenname im Adressbuch.

Der Wasaplatz wurde um 1880 angelegt und entwickelte sich in der Folgezeit zum neuen Strehlener Ortszentrum mit Gasthof, Geschäften und Wohnhäusern. Neben dem Hotel “Königshof” und einigen Villen entstand um 1880 das Geschäftshaus mit der Wasa-Apotheke. Seinen Namen erhielt dieser Platz wie auch die benachbarte Wasastraße nach dem polnisch-schwedischen Königsgeschlecht Wasa. Die Gemahlin König Alberts, Carola von Wasa-Holstein-Gottor (1833-1907) entstammte dieser Familie und sollte mit der Namensgebung geehrt werden. 1853 hatte sie den sächsischen Thronfolger geheiratet. Heute ist der Wasaplatz wichtiger Verkehrsknotenpunkt und zugleich Einkaufszentrum für die Umgebung. Nach 1990 entstand unmittelbar neben dem "Königshof" ein modernes Wohn- und Geschäftshaus an der Lockwitzer Straße. Fotos: Der Wasaplatz auf einer historischen Ansicht um 1900 (links) und 2014 (rechts) Einzelne Gebäude: Strehlener Hof: Der Strehlener Hof entstand unter dem Namen “Königshof” 1888/89 als Großgaststätte am Wasaplatz (Fotos). Zuvor befand sich hier der Gasthof Palitzsch, der dem prunkvollen Neorenaissancebau weichen musste. Der angeschlossene Saal war bereits vor dem Zweiten Weltkrieg Schauplatz von Konzerten, Tanzveranstaltungen und Theateraufführungen und genoss weit über die Ortsgrenzen hinaus einen guten Ruf. 1945 wurde der Flügel an der Lockwitzer Straße zerstört. Lediglich die ehemalige Eingangshalle diente noch viele Jahre als Feinkostladen “Menü”. Im erhaltenen Ballsaal fanden in der Nachkriegszeit Theater- und Varietéaufführungen statt, die zum Wiederaufleben des Kulturlebens in der zerstörten Stadt beitrugen. Nach Schaffung neuer Spielstätten diente der Saal nur noch als Lagerraum. Lediglich die Gaststätte, nach 1945 in “Strehlener Hof“ umbenannt, blieb noch bis 1992 geöffnet. Nach erfolgter Privatisierung des Gaststättenkomplexes wurden die Gebäude mit Ausnahme des Kopfbaus und der Straßenfront zur Kreischaer Straße abgerissen. Dabei wurden Malereien und Ausstattungsreste des Saales geborgen und für eine Wiederverwendung aufgearbeitet. 1995/97 erfolgte der Wiederaufbau des Strehlener Hofs unter seinem alten Namen “Königshof” als Hotel- und Gaststättenkomplex. In diesem Zusammenhang erfolgte die Erweiterung um einen Büro- und Geschäftshausflügel zur Lockwitzer Straße. Prunkstück ist der im Stil der Jahrhundertwende wiederhergestellte historische Ballsaal, der für verschiedene Veranstaltungen genutzt wird. Bis 2011 gehörte das Hotel zur Sheraton-Gruppe (Four Points) und wird heute als “Dormero-Hotel” von der Hotelgruppe Gold-Inn geführt. Fotos: Historische Bilder aus dem Königshof - links der Ballsaal, rechts ein Blick in den heute nicht mehr vorhandenen Theatersaal. Villa Wasa: Der schlossartige Bau im Jugendstil entstand 1903 für den Glasfabrikanten Gustav Kühnel und gehört zu den repräsentativsten Villenbauten in Strehlen. Zeitweise hatte der Maler Gotthard Kuehl hier sein Atelier. Nach 1945 diente die Villa viele Jahre als Klubhaus “August Bebel” und war Veranstaltungsort für Konzerte, Lesungen usw. 1991/93 hatte hier das Dresdner Kulturamt seinen Sitz. Nach kompletter Sanierung des Gebäudes wird die Villa seit 1994 teilweise als Restaurant genutzt. Die Innenraumgestaltung übernahm unter Einbeziehung der vorhandenen Jugendstilornamente der im Haus wohnende Künstler R. Kleemann. Im Souterrain befindet sich der “Wasakeller”, im Obergeschoss die Gaststätte “Homage” im Stil der Jahrhundertwende. Weitere Räume werden zu Wohnzwecken bzw. als Büro genutzt. König-Albert-Eiche: Der seit 1999 unter Naturschutz stehende Baum in der kleinen Grünanlage inmitten des Platzes wurde am 24. April 1898 zu Ehren des 25-jährigen Thronjubiläums des sächsischen Königs Albert gepflanzt. Initiatoren waren die Kirchgemeinde der Strehlener Christuskirche sowie verschiedene Vereine des Ortsteils. Eine geplante Gedenktafel wurde nicht realisiert.

Dresdner Saugarten Angelegt als 0,4 Hektar großer Treybegarten um 1560, ist der Dresdner der älteste der Saugärten und war bis ins 18. Jahrhundert auch der einzige. Auf die Mitte der Dresdner Heide fiel die Auswahl des Ortes, da er der Hauptausgangspunkt der Jagden der sächsischen Kurfürsten sein sollte. In diesem Zusammenhang erschuf der Kartograf Johannes Humelius außerdem ein neues sternförmiges Wegenetz, in dessen Mittelpunkt er sich befindet. Die Zahlen 1 bis 8 auf der an diesem Ort aufgestellten Wegesäule symbolisieren jene acht von hier ausgehenden Sternflügel. Im Jahre 1710 errichtete M. D. Pöppelmann hier ein kleines Jagdschlösschen für August den Starken, dessen Abriss um 1850 erfolgte. Seine Steine fanden beim Bau der Terrassenmauern unterhalb des Schlosses Albrechtsberg eine Wiederverwendung. Der Landesverein Sächsischer Heimatschutz stiftete 1926 eine Erinnerungssäule mit Inschriften. Liegauer Saugarten Nachdem der Dresdner Saugarten nicht mehr ausreichte, entstand im 18. Jahrhundert der ca. 1 Hektar große Alte Saugarten zwischen den Waldwegen „Kuhschwanz“ und „Unterringel“. Dieses später Liegauer Saugarten genannte Wildgehege liegt südlich von Liegau-Augustusbad an der Stadtgrenze, jedoch noch auf Dresdner Gebiet. An die 1876 wieder beseitigte Anlage erinnert heute ein Gedenkstein mit einem kleinen Rastplatz sowie niedrige Mauerreste. Langebrücker Saugarten Steinmauer mit Gerätehaus am Langebrücker Saugarten Einer der beiden Damentrittsteine im Langebrücker Saugarten Der Langebrücker Saugarten ist der am besten erhaltene und größte der vier Saugärten. Er liegt etwa 500 Meter vom Rand der Ortschaft Langebrück entfernt. Das Gelände umfasst eine in ihrer Ausdehnung dem Dresdner Altmarkt vergleichbare Fläche von 1,27 ha und wurde 1781/82 als „Neuer Saugarten“ und insgesamt dritte Anlage dieser Art in der Dresdner Heide angelegt. Eine Steinmauer umzäunt einen Teil des Saugartens. Am Sternbrückenhübelweg wurde ein noch heute existierendes Steinhaus in der Mauer eingebaut, in dem Jagdgerätschaften gelagert werden konnten. Langebrück war ein beliebtes Ausflugsziel von Angehörigen des Dresdner Hofes, die meist im Hotel zur Post, das noch heute als Gasthof existiert, Quartier nahmen. König Friedrich August I. kam im Jahr 1818 zwei Monate lang jede Woche zweimal zur Saujagd ins Langebrücker Revier. Im 19. Jahrhundert waren die Hetzjagden aus der Mode gekommen, so dass alle Saugärten ohnehin faktisch aufgegeben wurden. In der Dorfchronik von Langebrück ist allerdings im Jahr 1883 vermerkt, dass König Albert I. während seiner Regentschaft ein- bis zweimal pro Jahr zur Jagd nach Langebrück kam. Im Jahr 1875 wurden über 50 % der Mauersteine abgetragen, die zum Bau der Dresdner Albrechtsschlösser verwendet wurden. Bereits 1868 nutzte man Teile der Mauer nach dem Brand des Dorfes Klotzsche zu dessen Wiederaufbau. Nach 1945 wurde auf dem Gelände des Saugartens ein Gehege für Muffelwild angelegt, die übrig gebliebene Bausubstanz der Mauer wurde allerdings nicht weiter gepflegt. Der Langebrücker Saugarten wurde von 1992 bis 1994 von ABM-Kräften im Auftrag des Sächsischen Forstamtes teilsaniert. Dabei wurde die stark verfallene Mauer und das Gerätehaus erneuert und Lehrtafeln aufgestellt. Ebenfalls erhalten sind zwei so genannte Damentrittsteine gegenüber dem Gerätehaus. Dabei handelte es sich um treppenförmig behauene Steine, die die Damen der Jagdgesellschaften als Steighilfe beim Aufsitzen auf die Pferde benutzten. Lausaer Saugarten Der manchmal auch als „Sausprudel“ bezeichnete Lausaer Saugarten entstand im 18. Jahrhundert zwischen Langebrück und Weixdorf. Benannt ist er nach Lausa, einem Teil der Ortschaft Weixdorf, und liegt im südlichen Sauerbusch, an der Alten Zehn. Im Jahre 1869 abgetragen, blieben von ihm keine Reste erhalten. Die letzte Spur war eine einzelne Holzsäule, die noch Anfang des 20. Jahrhunderts bestand. Um den ehemaligen Saugarten herum verläuft heute ein kleiner Lehrpfad. Dieser führt auch zu einer volkstümlich „Pilz“ genannten Sandsteinsäule mit Holzdach, welche an die letzte Parforcejagd in der Dresdner Heide 1827 erinnert.

Altkaitz Als Altkaitz wird seit 1926 der alte Dorfkern von Kaitz bezeichnet. In diese Namensgebung einbezogen wurde auch die westlich der Kaitzbachbrücke gelegene frühere Coschützer Straße. Im Zusammenhang mit dem Ausbau der Innsbrucker Straße erfolgte eine Neugestaltung der Kreuzung und die Verlängerung der Straße Altkaitz bis zur Stuttgarter Straße in Coschütz. Am früheren Dorfplatz haben sich noch einige Gebäude aus der Vergangenheit des Ortes erhalten. Bedeutendstes Anwesen ist das 1672 entstandene Amtslehngut (Altkaitz Nr. 1), welches bis 1945 mit 111 Hektar größter Grundbesitzer im Ort war. Die Flächen wurden 1946 an Neubauern verteilt, die sich 1952 zur LPG “Fortschritt” zusammenschlossen. Die historischen Gebäude, zu denen auch ein kleiner Gartenpavillon gehört, stehen unter Denkmalschutz. Weitere historische Bauernhäuser stehen rund um den kleinen Dorfplatz. Aus dem Jahr 1814 stammt der Dreiseithof Nr 3, der zuvor im Zusammenhang mit der Schlacht bei Dresden niedergebrannt war. Bis 1886 befand sich das Gut im Besitz der Familie Schäfer, danach gehörte es der Familie Johne/Nedeß. 1961 endete die privatbäuerliche Gutswirtschaft mit dem zwangsweisen Eintritt in die LPG. Die später verfallenen Gebäude wurden ab 2011 saniert und werden heute zu Wohnzwecken genutzt. Im Wohnhaus Altkaitz Nr. 5 befand sich bis 1844 die erste Schule des Ortes. Unweit davon erinnert ein Denkmal an die im Ersten Weltkrieg gefallenen Söhne des Dorfes. Zum Amtslehngut gehörte einst die am Kaitzbach gelegene Hofemühle (Nr. 6), die ab 1670 das Privileg des Brot- und Mehlhandels in Dresden besaß. Fotos: Altkaitz - Amtslehngut und Gartenpavillon - Kriegerdenkmal Tränenwiese: Das unmittelbar am Kaitzbach gelegene Grundstück in der Nähe des Dorfkerns erhielt seinen Namen in Erinnerung an die Ereignisse des Jahres 1813. Damals befand sich hier während der Schlacht bei Dresden ein Verbandsplatz für die zahlreichen verwundeten Soldaten. Wenig später wurde ihnen zu Ehren ein noch heute vorhandener Gedenkstein aufgestellt. Ein weiterer Stein folgte aus Anlass des 100. Jubiläums der Schlacht im Jahr 1913. Zum 200. Jahrestag wurde am 31. August 2013 ein drittes Denkmal errichtet. Das vom Kaitzer Steinmetz Jens Krämer geschaffene Monument besteht aus drei Steinsäulen, welche die damaligen Verbündeten Preußen, Österreich und Russland symbolisieren. Geschichtsstein: Ein weiterer Gedenkstein befindet sich an der Ecke Altkaitz / Possendorfer Straße. Das Denkmal erinnert an an das 800. Jubiläum der Ersterwähnung des Dorfes und wurde im September 2006 eingeweiht. Die ca. zwei Meter hohe Sandsteinsäule zeigt an ihrer Vorderseite das alte Dorfsiegel von Kaitz, an den Seiten sind wichtige Ereignisse der Ortsgeschichte und die früheren Schreibweisen von Kaitz dokumentiert. Geschaffen wurde der Gedenkstein vom Kaitzer Steinmetz Jens Krämer. Die Bannewitzer Straße, eine Seitenstraße der Boderitzer Straße entstand nach dem Ersten Weltkrieg und ist 1926 erstmals im Adressbuch verzeichnet. Ihren Namen erhielt sie nach dem nahegelegenen Ort Bannewitz. Franzweg Der parallel zum Kaitzbach verlaufende Franzweg erhielt seinen Namen 1926 nach dem früheren Gemeindevorstand von Kaitz. Max Franz (1860-1916) erwarb hier 1839 ein Grundstück, auf dem 1844 das neue Kaitzer Schulhaus errichtet wurde. Die mehrfach erweiterte Schule wird heute von der 71. Grundschule Am Kaitzbach genutzt. Das 1849 umgebaute Wohngebäude Franzweg Nr. 12 gehört zu den ältesten Häusern in Kaitz und steht unter Denkmalschutz. Innsbrucker Straße Die große Straßenschleife Innsbrucker Straße wurde 1925 angelegt, um den Durchgangsverkehr aus dem Kaitzer Dorfkern herauszunehmen. Die Straße ist Teil der dichtbefahrenen Bundesstraße B 170 und wird gegenwärtig als Autobahnzubringer ausgebaut. Südlich des Ortes entsteht künftig die Autobahn- Anschlussstelle Dresden-Süd. Foto: Blick von Altkaitz über die Innsbrucker Straße zur Südhöhe Kaitzer Weinberg Die Straße Kaitzer Weinberg wurde nach 1900 am Nordrand des Kaitzbachtales angelegt und mit Einfamilienhäusern bebaut. Bis 1926 trug sie den Namen Weinbergstraße. Noch bis 1887 nutzten Kaitzer Einwohner die hier gelegenen Grundstücke als Weinberge. An diese Vergangenheit erinnert ein 1686 errichtetes Weinberghaus im Grundstück Nr. 14. Das stark verfallene Gebäude, welches bis zu einem Unwetter 1962 auf dem Dach auch eine Wetterfahne mit Weinbaumotiv besaß, konnte nach 1990 denkmalgerecht saniert werden. Gleichzeitig entstand ein heftig umstrittener moderner Neubau auf diesem Grundstück. Café Weinberg: Das Café Weinberg wurde 1912/13 auf einem früheren Weinberggrundstück am Südhang des Kaitzbachtales erbaut. Zuvor hatte der Dresdner Konditormeister Ernst Theodor Opitz das Areal von der Kaitzer Bauernfamilie Franz erworben. Die originalgetreu erhaltene Innenausstattung von 1912 stammt aus den Hellerauer Werkstätten und wurde von Richard Riemerschmid entworfen. Von der Veranda und dem angrenzenden Gästegarten bietet sich eine herrliche Aussicht über das Kaitzbachtal bis zur Sächsischen Schweiz. Das auch zu DDR-Zeiten in Privatbesitz befindliche Café wurde 1999 saniert und steht unter Denkmalschutz. Paul-Richter-Haus: Da Kaitz nie eine eigene Kirche besaß und kirchlich zur Leubnitzer Kirche gehört, mussten die Bewohner weite Wege zum Gottesdienst zurücklegen. Aus diesem Grund wurde nach dem Zweiten Weltkrieg in einem Haus am Kaitzer Weinberg ein Gemeindezentrum eingerichtet. Das als Paul-Richter-Haus bezeichnete Gebäude erhielt seinen Namen nach dem früheren Wilsdruffer Pfarrer Paul Richter (* 1894 in Kaitz, + 1942 im KZ Dachau), der als Mitglied der bekennenden Kirche von den Nazis verfolgt wurde. Sein Grab befindet sich auf dem Leubnitzer Friedhof. Feinste Christollen Meraner Straße Die Meraner Straße wurde nach dem Ersten Weltkrieg oberhalb der früheren Kaitzer Weinberge angelegt und nach der Stadt Meran in Südtirol benannt. Noch bis nach 1990 prägten neben Einfamilienhäusern Felder und eine Schweinemastanlage das Straßenbild, bevor auch hier neue Wohnhäuser errichtet wurden. An der Ecke Meraner / Possendorfer Straße befindet sich eine um 1830 aufgestellte historische Wegsäule. Die ca. 1,60 Meter hohe Säule weist auf frühere Verbindungswege nach Plauen, Kleinpestitz, Kaitz und Coschütz hin und wurde 2009 saniert. Possendorfer Straße Die Possendorfer Straße ist Teil der alten Landstraße von Dresden nach Possendorf, die bis zum Bau der Schleife Innsbrucker Straße 1925 direkt durch den Dorfkern führte. 1680 ließ der Besitzer des Amtslehngutes an dieser Straße einige Tagelöhnerhäuser errichten, die zur Unterbringung der Arbeitskräfte des Gutes dienten und noch bis 1920 zusammen mit dem Herrengut einen eigenen Gutsbezirk bildeten.. Im 19. Jahrhundert wurden in einigen dieser Gebäude kleinere Läden und Handwerksbetriebe eingerichtet. Außerdem befand sich hier viele Jahre die heute als Wohnhaus genutzte Gaststätte “Sängereiche”, einst Vereinslokal des 1884 gegründeten Kaitzer Gesangsvereins “Sängerlust”. Die erhaltenen Häuser Nr. 27 bis 51 stehen zum Großteil unter Denkmalschutz (Foto) . Eine steinerne Bogenbrücke über den Kaitzbach entstand 1807. Gasthof Kaitz: Ursprünglich befand sich hier auch der frühere Gasthof des Ortes (Nr. 21), der 1813 der Schlacht von Dresden zum Opfer fiel, bis 1828 jedoch wiederaufgebaut werden konnte. Nach 1945 wurde das Lokal geschlossen und das Gebäude 1979 wegen Baufälligkeit abgetragen. Firma Nagetusch (Nr. 26): Das Unternehmen wurde 1931 als Karosseriebaufirma von August Richard Nagetusch gegründet und hatte seinen Sitz ursprünglich auf dem Gelände des Alten Schlachthofs an der Leipziger Straße. Die Zerstörung der Produktionsräume am 13. Februar 1945 führte zum Umzug nach Kaitz auf die Possendorfer Straße 26. In den 1950er begann Nagetusch mit der Entwicklung eines modernen Leichtbau-Wohnwagens, der erstmals auf der Leipziger Herbstmesse 1958 vorgestellt wurde. Die Fertigung der Anhänger, die wegen ihres geringen Gewichts auch von Pkws gezogen werden konnten, erfolgte u.a. im VEB Schiffswerft Rechlin und im Karosseriewerk Rosenthal. Neben Camping-Wohnwagen entstanden auch Verkaufswagen für Imbiss-Stände und den mobilen Handel (Foto: Wikipedia / gernhaex). Nach der Flucht des Sohns Manfred Nagetusch nach Westberlin 1963 geriet die Familie ins Visier der DDR-Staatsführung. Richard Nagetusch wurde einige Jahre später aus politischen Gründen verhaftet und 1971 von der Bundesrepublik freigekauft. 1972 erfolgte die Zwangsverstaatlichung des Betriebes, der nun zum VEB Karosseriewerk Dresden gehörte. Hier setzte man die Produktion der Nagetusch-Anhänger noch kurze Zeit fort, bevor die Modelle 1973 durch den Campinganhänger “Bastei” abgelöst wurden und der Markenname Nagetusch verschwand. Auf dem Grundstück in Kaitz befindet sich heute eine Kfz-Werkstatt.

Die Spittastraße tauchte bereits 1883 als Straße 5a im Adressbuch auf. Seit 1893 trägt sie den Namen Spittastraße nach dem Dichter Philipp Spitta (1801–1859) .

add_def_ver("v_e_hammer","E. Hammer, Dresden","Photowerkstätten E. Hammer, Dresden A.16, Blumenstr. 106");

Die Spitzbergstraße liegt in einer Siedlung, die ab Ende der 1920er Jahre im Süden von Leubnitz-Neuostra entstand (westlich der Goppelner Straße). Ab 1937 wird die Straße im Adressbuch geführt. Der Name bezieht sich wohl auf die weiter südlich liegende Erhebung (südlich von Possendorf).

Die Spitzhausstraße führt vom alten Dorfkern von Kaditz in nördliche Richtung nach dem früheren Dorf Radebeul. Deshalb wurde sie seit 1896 als Radebeuler Straße bezeichnet. In der Leipziger Vorstadt gab es damals ebenfalls eine Radebeuler Straße (heute Fritz-Hoffmann-Straße). Deshalb heißt sie seit 1904 in Kaditz Spitzhausstraße nach dem in ihrer Richtung gelegenen, weithin sichtbaren Spitzhaus in der Lößnitz .

Das "Lämmchen" war ein Vorwerk an der jetzigen Blumenstraße in Johannstadt. 1640 wurde es als "Vorwerk Tatzberg" erbaut und seit 1742 das "Lämmchen" genannt. In der Nähe stand von 1804 - 1813 eine Glashütte. Übrigens führte auch das Schulgut, nach dem die Schulgutstraße benannt wurde, bis zur Erwerbung durch den Stifter Ehrlich den Namen "Vorwerk Tatzberg". Noch verwirrender wird die Geschichte dadurch, dass auch in der Wilsdruffer Vorstadt ein Vorwerk "Lämmchen" existierte, dessen Name später im Volksbad "Zum Lämmchen" (Annenstraße 37). Das Johannstädter Lämmchen besaß seit 1644 Brau-, Gast- und Schankgerechtigkeit. Das Vorwerk war von Einquartierungen, Kriegs- und anderen Kontributionen befreit. Der Landwirt Carl August Meißner, der das Grundstück 1825 gekauft hatte, erbaute neben den Gutsgebäuden ein Landhaus für seinen Schwiegersohn Hoffmann, den Wirt des Hotels "Zum goldenen Engel" (Wilsdruffer Straße). Den Garten dieses Landhauses benutzte Carl Maria von Weber als Sommerhaus, als er auf der Holzhofgasse in der Neustadt wohnte. Die Gutsgebäude und das Landhaus wurden 1866 abgerissen. 1868 wurde es von Meißner an der Blasewitzer Straße neu erbaut, es lag zwischen dieser und der Kreutzerstraße, Fürstenstraße uund Dürerstraße. Die mit dem Vorwerk verbundene Milchwirtschaft bestand noch bis 1909, das Gasthaus "Zum Lämmchen" (Blasewitzer Str. 58) hat mit dem Vorwerk nichts zu tun. An das zweite Lämmchen erinnerte noch die Inschrift "Vorwerk Lämmchen" am Tor des Grundstücks Blasewitzer Str. 48 und ein vergoldetes Lämmchen am Giebel des Eckhauses Blasewitzer und Kreutzerstraße. Anfang des 18. Jahrhunderts entstand auf einem vom Vorwerk "Lämmchen" abgetrennten Landstück die "Neue Sorge", nicht zu verwechseln mit dem Grundstück "Neue Sorge" am Weißeritzmühlgraben. (siehe Stückgießers, auch: Zur Goldenen Aue, Blumensäle).

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Die Neudecker Straße erhielt ihren Namen am 3. November 1933. Da einige Straßen in Bühlau nach Orten in den ehemaligen deutschen Ostgebieten benannt wurden, ist die Ortschaft Neudeck (heute Ogrodzieniec) als Namensgeber wahrscheinlich. Der Ort liegt im Gebiet Ermland-Masuren in Polen. Bei einer Umbenennungsaktion 1967 von Straßen mit Namen aus den ehemaligen deutschen Gebieten wurde diese Straße nicht berücksichtigt.

Die Spitzwegstraße kreuzt den Stadtteil Leubnitz-Neuostra in Ost-West-Richtung und gehört zu den ältesten Straßen. Im früheren Ortsteil Leubnitz war es die Fortsetzung der Dohnaer Straße. Das war damals der nördliche Teil der heutigen Wilhelm-Franke-Straße. Am Kreisverkehr, der vor 1926 Carolaplatz genannt wurde, bog die Straße nach Osten hin ab. Wegen ihrer Richtung wurde dieser Teil Dohnaer Straße genannt. Nach dem Zusammenschluss von Leubnitz und Neuostra wurde sie Arnoldstraße genannt (ab 1899 im Adressbuch). Ob der Namensgeber ebenfalls Johann Christoph Arnold war, wie bei der heutigen Arnoldstraße, ist nicht bekannt. Der westliche Teil der Spitzwegstraße (ab der Wilhelm-Franke-Straße) liegt im Ortsteil Neuostra. Wegen seiner Richtung zum benachbarten Dorf Mockritz wurde diese Straße Mockritzer Straße genannt. Ab der Einmündung von Neuostra war es wahrscheinlich anfangs nur ein Fußweg. Mit der Bebauung erhielt dieses Teilstück einen eigenen Namen. Ab 1913 wird die Straße im Adressbuch als Kaitzer Weg geführt. Nach der Eingemeindung von Leubnitz-Neuostra wollte man Doppelbenennungen von Arnoldstraße und Mockritzer Straße vermeiden. Der gesamte Straßenzug wurde ab 1926 mit Spitzwegstraße benannt nach dem Maler und Illustrator Carl Spitzweg (1808–1885) . Einbezogen wurde dabei auch der Kaitzer Weg. Dieser Weg führt bis zur Gostritzer Straße. Am südlichen Rand grenzt er an eine Kleingartenanlage. Nördlich des Weges befinden sich Neubauten aus den 1980er Jahren, die aber zur Clausen-Dahl-Straße zählen. Ein kurzes Stück an der Einmündung in die Gostritzer Straße ist dann wieder als Straße ausgebaut. Die dort einmündende Wilhelm-Busch-Straße gehört dann bereits zum Stadtteil Mockritz. 2015 wurde an der Einmündung von Zschertnitzer Straße und Robert-Sterl-Straße ein Gedenkstein für Carl Spitzweg errichtet (gestiftet von der Konsum Dresden e.G.). Ausgewählte Adressen Nr. 70: Bildhauer Hans Tröger

August Wilckens Georg Christoph August Wilckens (* 25. Juni 1870 in Kabdrup/Dänemark; † 3. August 1939 in Sønderho/Fanø) war Zeichner und Maler. Leben Nach Besuch der Kunstgewerbeschulen in München und Nürnberg kam Wilckens von 1891 bis 1894 nach Dresden, um als Zeichner in der Lithographischen Anstalt Dresden zu arbeiten . Von 1894 bis 1897 studierte er an der Kunstakademie bei Leon Pohle und Gotthardt Kuehl. Er ließ sich in Dresden nieder, verbrachte aber ab 1903 die Sommermonate auf der Nordseeinsel Fanö, wo er 1909 ein Haus mit Atelier erwarb. In Dresden heiratete er ebenfalls im Jahr 1909 Julie Schoop und bezog mit ihr in der Gerokstraße 9 eine Wohnung. Seine letzte Dresdner Adresse war die Stephanienstraße 24, II. Stock, in der seine Frau auch noch im Jahr 1943 lebte .

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Die Sporbitzer Straße führt abgehend von der Struppener Straße in Richtung Sporbitz. Ab der Flurgrenze ist die Verlängerung ein Fußweg, der dann in Sporbitz in die Straße Altsporbitz mündet. Dieser alte Fußweg zwischen den beiden Gemeinden erhielt in Meußlitz mit Beschluss vom 7. Februar 1901 die Bezeichnung Sporbitzer Straße, weil sie in den Nachbarort führt.

Die Sportplatzstraße wurde 1905 als Privatstraße angelegt. Sie diente als Zufahrtstraße zur damaligen Firma 'Kunstanstalt Krey & Sommerlad', einer Kunstanstalt für geographische Erzeugnisse. Wann die Straße öffentlich wurde und ob sie vor 1935 einen Namen trug, konnte bisher noch nicht ermittelt werden. In Gemeindeunterlagen vom 4. Dezember 1935 wurde die Bemerkung gefunden, dass "die zZT. noch nicht ausgebaute Verbindungsstraße zwischen der Hindenburg- und Leo-Schlageter-Straße die Bezeichnung Hans-Schemm-Straße erhalten hat." nach Hans Schemm. Nach 1945 wurde die Straße umbenannt in Sportplatzstraße. Am südlichen Ende der Straße befindet sich ein Sportplatz.

hochwasser 19->20

add_def_ver("v_t_kirsten","Th. Kirsten"); Adressen

add_def_ver("v_mars","Atelier Mars, Dresden","Atelier Mars, H. Hähnig, Dresden N., Marien- Allee 1");

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Fotograf: Wilhelm Robert Eich Ort: Dresden Strasse: Prager Strasse 39 Filiale: Zeitraum: 1861 - 1869 Atelier: Lithograf: Auszeichnungen: Zweite Ausstellung 1868, zuerkannt Fotografischer Verein zu Hamburg. Bemerkungen: Fotograf und Historienmaler

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weiter

add_def_ver("v_mitteldeutscherpostkartenverlag","Mitteldeutscher Postkartenverlag","Mitteldeutscher Postkartenverlag, Dresden- A., Schnorrstr. 5d,"+v_adr("froe018","Fröbelstr. 18"));

Der Veilchenweg (früher: Berggasse, Obere Berggasse) führt vom Körnerplatz unter der Schwebebahn hindurch vorbei am 1. und 2. Steinweg in Richtung des Königlichen Weinberges. Bereits zweimal, 1932 und 1998, kam es zu einem Unfall zwischen einem LKW und der Schwebebahn am Veilchenweg. Geschichte Der Veilchenweg ist seit etwa 1865 unter verschiedenen Namen bekannt. Man nannte ihn Obere Bergstraße, Viktoriaweg und Blauveilchenweg. In Loschwitz gab es neben der Oberen Bergstraße auch noch eine Untere Bergstraße (heute Schevenstraße). Zur Herkunft des Namens Blauveilchenweg ist nichts bekannt. Der Name Viktoriaweg bezieht sich auf die 1820 erbaute "Viktoriahöhe". Das Haus wurde mehrfach umgebaut und als Hotel, Sanatorium, Pensionärsheim und dann als Wohnhaus genutzt. In Unterlagen vom 15. Mai 1883 wurde erstmals die Bezeichnung Viktoriastraße gefunden. Diesen Namen trug die Straße bis zur Eingemeindung von Loschwitz. Wegen einer gleichnamigen Viktoriastraße in Dresden-Seevorstadt erfolgte in Loschwitz eine Umbenennung. Ab 1. Juni 1926 trägt die Straße dort den Namen Veilchenweg, möglicherweise in Bezug zum früheren Namen Blauveilchenweg. Adressen Nr. 1: Ludwig-Richter-Haus Nr. 9: Winzerhaus von 1661 mit Winzersäule (von 1674), an der 3 Sonnenuhren angebracht wurden

11.1896: Das Feldschlößchen in Dresden Die Restauration bewirthschaftete nach Meisls Besitzzeit, bis 1861, Gastwirth Frank. Seitdem die Gastwirthe: Freyer bis 1876, Gebrüder Agsten bis 1878, Heinecke bis 1879, Thamm bis 1883, Weicholt bis 1886, Noack bis 1889 und seitdem Herr Gastwirth Scheibe. Das Hauptrestaurationsgebäude, das seit Herbst 1816 erbaut worden ist, gewährte mit seinem kleinen Thurmaufbau in seiner erhabenen freien Lage früher den Anblick eines Schlößchens. Jetzt ist durch Anbauten und die großen Brauereigebäude die stattliche ehemalige Anschau sehr beeinträchtigt. Wesentlich trägt zur besseren Frequenz die erst seit etwa Jahresfrist erfolgte Wiederherstellung des Fußweges, auf Feldschlößchenareal, auf dem Ausläufer des Hahneberges bei. Ein Bild vom alten Feldschlößchenrestaurant aus der Zeit von 1859 hat die Brauereigesellschaft herstellen und lithographieren lassen

Die Veteranenstraße, eine kurze Straße östlich von der Leipziger Straße abgehend, erhielt 1896 ihren Namen. Zur Benennung heißt es: "... 1896 so benannt zu Ehren der Veteranen aus dem deutsch-französischen Kriege 1870/71." .

add_def_ver("v_a_desbarats","A. Desbarats, Dresden","Alexander Desbarats, Dresden. DEA, 1915 Kl. Plauensche Gasse 16, 3.OG");

Die Augsburger Straße wurde gemäß dem Striesener Bebauungsplan 1860 als Straße C angelegt und erhielt 1893 den Namen der Stadt Augsburg in Bayern. 1905 kam noch der kurzer Abschnitt bis zur Fiedlerstraße auf Johannstädter Flur hinzu. Neben Wohnhäusern und Villen befanden sich hier zahlreiche kleine Geschäfte und Restaurants. Bekannt waren auch die Regina-Lichtspiele auf der Augsburger Straße 12, die 1945 durch Bomben zerstört wurden. Zu den beliebtesten Lokalen gehört das 1903 eröffnete “Rübezahl” im Haus Nr. 49 (Foto). Aus ideologischen Gründen musste die im altdeutschen Stil ausgestattete Gastwirtschaft in der Nachkriegszeit den Namen “Augsburger Hof” annehmen. Zu den Stammgästen gehörte später u. a. Manfred Krug. Seit Anfang 2010 wird das Restaurant als Feinschmeckerlokal “Spizz” weitergeführt. Auch das Eckhaus zur Blasewitzer Straße (Augsburger Str. 2) beherbergte einst eine Gastwirtschaft, die nach ihrem Inhaber “Knapes Restaurant” genannt wurde. Nach 1945 zog hier ein Blumenladen ein, nach 1990 ein chinesisches Restaurant. Später wurde die gastronomische Tradition dieser Straße u. a. vom Irish Pub “Old Slyne Head” (Nr. 85) fortgesetzt, welches im Oktober 1993 als erstes irisches Lokal in Dresden eröffnet und nach einer kleinen Insel in der Irischen See benannt wurde. Bereits vor dem Ersten Weltkrieg gab in diesen Räumen im Eckhaus zur Dornblüthstraße (Nr. 85) ein Lokal mit Namen "Kiautschou". Der ungewöhnliche Name bezog sich auf ein 1898 vom Deutschen Reich gepachtetes Kolonialgebiet in China. In den letzten Jahren wurden auf der Augsburger Straße einige Baulücken geschlossen, u.a. durch ein modernes Wohnhaus mit Penthouse- und Eigentumswohnungen. Foto: Richtfest für Nr. 81 am 6. Dezember 2013 Gebäude: “Eg-Gü”-Schuhcremefabrik (Nr. 1): Das Unternehmen wurde von dem aus Meerane stammenden Egbert Günther als kleiner Hinterhofbetrieb gegründet und hatte seinen Sitz ursprünglich auf der Pfotenhauerstraße. Zunächst bestand die Produktionspalette aus Bohnerwachs, bevor sich Günther 1915 auch der Herstellung von Schuh- und Lederpflegemitteln widmete. 1919 stellte der Betrieb erstmals Schuhcreme in Tuben her und machte die Firma damit zum Branchenführer in Deutschland. Die zeitweise bis auf 500 Personen gewachsene Mitarbeiterzahl und der zunehmende Export in mehrere europäische Staaten erforderte eine Ausweitung der Produktionsanlagen, weshalb der Betrieb in den 1920 Jahren zur Augsburger Straße 1 (Ecke Fiedlerstraße) verlegt wurden (Foto). Privat bewohnte Günther eine noch heute erhaltene Villa auf der Wägnerstraße 8. Die neuen Fabrikgebäude beherbergten bis zum Einzug Günthers eine Schuhfabrik. Besitzer waren die jüdischen Brüder Eduard, Richard und Albert Hammer, die hier unter dem Markennamen “Hammer-Schuhe” hochwertige Fußbekleidung herstellten. Eine Verkaufsniederlassung unterhielt die Firma bis zur Zwangsarisierung 1938 auf der Prager Straße. Richard Hammer war zudem königlich-siamesischer Konsul und gehörte um 1912 zu den reichsten Bewohnern der Stadt. Bis zum Abbruch der Fabrikgebäude erinnerte noch das Firmenwappen am Giebel des Gebäudes an das Familienunternehmen. 1945 trafen Bomben auch die Produktionsgebäude der Firma “Eg-Gü” und vernichteten diese zu 90 Prozent. Trotzdem gelang es den Söhnen des Gründers, die Herstellung von Schuh- und Lederpflegemitteln wieder aufzunehmen und an den alten Ruf anzuknüpfen. 1972 wurde der Betrieb enteignet und zum VEB Dresdner Schuhpflegemittel. Nach dreijähriger Treuhandverwaltung erfolgte 1993 die Reprivatisierung. Heute werden über 70 verschiedene Produkte hergestellt, wobei die Exportquote inzwischen wieder bei ca. 50 Prozent liegt. 2007 wurde die Produktion in Dresden eingestellt und nach Lichtenau bei Chemnitz verlegt. 2012 erfolgte ein weitgehender Abriss der baufälligen Gebäude an der Augsburger Straße (Foto). An ihrer Stelle ist künftig ein modernes Laborgebäude für das Uniklinikum geplant. Korelle-Werk (Nr. 3): Das Unternehmen wurde 1921 von Franz Kochmann als "Fabrik photographischer Apparate" auf der Blasewitzer Straße 64/66 gegründet und stellte zunächst einfache Platten-Klappkameras her. Drei Jahre später kamen die Spiegelreflexkamera "Enolde" und die Rollfilmkamera "Korelle" hinzu. Der wirtschaftliche Erfolg ermöglichte Kochmann, sein Werk 1927 in größere Räume auf der Trinitatisstraße 42/44, wenig später zur Augsburger Straße 3 zu verlegen. 1929 begann die Produktion von fotografischem Zubehör. Zwei Jahre später brachte Kochmann seine neue Rollfilmkamera "Korelle 4 x 6,5 cm" auf den Markt und spezialisierte sich auf den Bau von Kleinbildkameras, bevor auf der Leipziger Messe 1935 die moderne Spiegelreflexkamera "Korelle 6 x 6" mit Bildzählwerk, wechselbarem Objektiv und klappbarem Lichtschacht vorgestellt wurde. Unter den Markennamen "Reflex-Korelle I", "Reflex-Korelle II" und "Reflex-Korelle Ia" gehörten die Kameras zu den Spitzenerzeugnissen der Dresdner Fotoindustrie in jener Zeit. Da Franz Kochmann Jude war, musste er 1938 emigrieren und sein Unternehmen zwangsweise an neue Inhaber verkaufen. Unter dem neuen Firmennamen "Korelle-Werk G. H. Brandtmann" fertigten die ca. 80 Angestellten auch weiterhin Kleinbildkameras, nach 1940 zunehmend Rüstungsgüter an. Im Hintergebäude befand sich die Druckerei "Curt von Hahn". 1945 wurde das Werk vollständig zerstört und nach Kriegsende als Rüstungsbetrieb von der sowjetischen Besatzungsmacht beschlagnahmt. 1946 folgte die Enteignung des Betriebes, zwei Jahre später die Eingliederung in den VEB WEFO. Hammers Hotel: Das zum Zeitpunkt seiner Eröffnung 1895 größte Striesener Konzert- und Ballhaus war Hammers Hotel an der Augsburger Straße 7. Inhaber war Moritz Beckert. Im Saal des Hauses fanden regelmäßig Tanzveranstaltungen und Theateraufführungen statt. 1904 wurden hier erstmals in Dresden Filme gezeigt. 1913 erhielt Beckert die Konzession für die Einrichtung eines Varietétheaters ("Flora-Theater"). Aber auch Parteien, Gewerkschaften und Vereine nutzten dieses Lokal als Versammlungsort. 1928 sprach hier der KPD-Führer Ernst Thälmann vor Tausenden Dresdner Arbeitern. Nach 1933 übernahm die NSDAP das Gebäude für Propaganda- und Kulturveranstaltungen. 1945 wurde Hammers Hotel beim Luftangriff zerstört. Regina-Lichtspiele (Nr. 12): In diesem Gebäude in der Nähe der Löscherstraße befand sich ab 1911 ein Kino. Zunächst wurde es unter dem Namen Apollo-Lichtspiel-Theater eröffnet, bevor der Name wenig später in "Regina-Lichtspiele" wechselte. Inhaber war zunächst Max Menzel, später die Firma Friese & Loll. Ursprünglich standen nur 188 Plätze zur Verfügung, bevor man diese Zahl nach einem Umbau auf ca. 360 erweiterte. Mehrfach wechselten die Betreiber und Pächter, die jeweils in ihrem Sinne passende Umbauten vornahmen. Eine größere Renovierung des Saales erfolgte 1926. 1945 wurde das Gebäude zerstört. Nr. 28/30: Das im Hinterhof des Grundstücks befindliche Gebäude war um 1930 Firmensitz der Max Blechschmidt KG. Das 1912 in Neustadt/Holstein gegründete Unternehmen produzierte Korken und anderen Kellereibedarf und war auch als Vertriebsfirma für Flaschenverschlüsse und Kellereimaschinen anderer Hersteller tätig. Im Vorderhaus gab es um 1910 Wiesingers Badeanstalt, die "mit Russischen und Kastendampfbädern" um ihre Kunden warb. Das Hintergebäude wurde zu dieser Zeit durch die Maschinen- und Zahnräderfabrik "Astra" und die Maschinenfabrik "Summus Compagnie" G.m.b.H. genutzt. 1920 befand sich dort die Photographische Manufaktur von Richard Knoll. Augsburger Hof (Nr. 33): Im 1945 zerstörten Eckhaus zur Spenerstraße befand sich um 1900 das Lokal "Zum Augsburger Hof", eine von zahlreichen kleineren Eckkneipen der Straße. Weitere gab es u.a. im Haus Nr. 49 ("Zum Rübezahl"), an der Ecke zur Tzschimmerstraße (Nr. 62 - "Striesener Casino") und im Eckhaus an der Dornblüthstraße (Nr. 85 - "Kiautschou"). Nach dem Ersten Weltkrieg bezog der "Edwesp Edellikör-, Wein- und Spirituosen-Grosso-Vertrieb" von Rudolf Schwarz die früheren Restaurationsräume. Der Name "Augsburger Hof" lebte dann nach dem Zweiten Weltkrieg wieder auf und wurde vom früheren "Rübezahl" auf der Augsburger Straße 49 übernommen. Fotos: Alt-Striesener Gaststätten an der Augsburger Straße: links "Knapes Restaurant" (Nr. 2), in der Mitte "Zum Rübezahl" (Nr. 49), rechts das "Striesener Casino" (Nr. 62) Evangelisch-methodistische Zionskirche: Das Gebäude an der Ecke zur Jacobistraße (Augsburger Straße 59) ist das Gotteshaus der evangelisch-methodistischen Zionskirche. Die Gemeinde ist älteste der vier methodistischen Dresdner Gemeinden und entstand 1872. Zunächst versammelte man sich in einer Striesener Wohnung, bevor wenig später ein Gebäude im Stadtzentrum an der Neuen Gasse erworben werden konnte. Diese Kirche fiel 1945 den Bomben zum Opfer. 1950 errichtete man auf den Fundamenten eines zerstörten Wohnhauses an der Augsburger Straße das neue Gemeindehaus. Die Plänen dafür stammten von Karl August Alicke. Der verputzte Bau wird durch einen Dachreiter mit Glocke verziert und weist so auf seine kirchliche Funktion in. Ein moderner Ergänzungsbau entstand 2013. Im Inneren befinden sich Büro- und Veranstaltungssräume sowie der Kirchsaal mit 150 Plätzen. Die Orgel der Firma Jehmlich entstand 1950 und besitzt neun Register. Der freikirchlichen Gemeinde, die in heutiger Form 1968 durch die Fusion der Evangelischen Gemeinschaft und der Bischöflichen Methodistenkirche entstand, gehören ca. 230 Mitglieder an. Nr. 71 (Villa “Sansibar”): Das Gebäude entstand 1895 als Wohnhaus für den Kunst- und Handelsgärtner Hermann Seidel, Inhaber der bekannten Gärtnerei Seidel. Wegen der damals abseitigen Lage des Grundstücks nannte er sein Haus nach der gleichnamigen Insel an der ostafrikanischen Küste “Villa Sansibar” (Foto). Kurz nach der Fertigstellung verstarb Hermann Seidel am 28. April 1896, so dass nun seine Witwe Minna allein in der Villa lebte. Bereits 1893 hatten Seidels Söhne den Sitz des Gartenbaubetriebs von Striesen nach Laubegast verlegt. Nach dem Tod von Minna Seidel (+ 1917) ging das frühere Gärtnereigrundstück 1921 in den Besitz der Stadt über, die unter Einbeziehung der zahlreichen Rhododendren den Hermann-Seidel-Park anlegte. Die Villa selbst wurde Domizil einer Städtischen Säuglingskrippe mit Kinderheim. 1945 brannte die Villa aus. Das verbliebene Erdgeschoss erhielt um 1950 ein Notdach, so dass hier wieder ein bis 2008 bestehender Kindergarten Einzug halten konnte. Nach dem Abbruch des Gebäudes entstand auf dem Grundstück bis 2011 die moderne Kita “Gäste der Buche” mit ca. 135 Plätzen. Die Pläne stammen vom Architektenbüro Hänel/ Furkert/ Koenitz (Foto).

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Christian Joseph Krüger (* 9. November 1759 in Dresden; † 14. Februar 1814) war ein Münzgraveur und Medailleur an der Münzstätte Dresden. Krüger erhielt zunächst eine achtjährige Ausbildung an der Dresdner Kunstakademie bei Charles Hutin und Johann Gottfried Knöffler. Danach ging er als Zeichenlehrer nach Livland und reiste weiter bis nach Russland, wo er an der Kaiserlichen Münze gravierte. Nach seiner Rückkehr nach Dresden kopierte Krüger vorrangig Antiken, für verschiedene ausländische Höfe fertigte er Münzstempel an. 1790 wurde Krüger in Dresden als zweiter, später in der Nachfolge seines 1805 verstorbenen Bruders Friedrich Heinrich Krüger als erster Münzgraveur angestellt. 1812 war er als Kanzlei-Stempelschneider beschäftigt. Werke Krüger bossierte Büsten und Figuren in Wachs, schnitt auch in Elfenbein, u. a. ein Kruzifix, welches von seinen Zeitgenossen sehr gerühmt wurde. Er war aber auch für Privatpersonen tätig und schuf z. B. Taufmedaillen. Zudem schuf er mehrere bekannte Denkmünzen: Pillnitzer Convention von 1791 die Bestimmung des Japanischen Palais zum Museum Saxonicum die Einnahme von Mainz auf den Theologen Franz Volkmar Reinhard Familie Christian Joseph Krüger entstammte einer über mehrere Generationen in Dresden tätigen Künstlerfamilie, die nach 1700 aus Danzig zugezogen war. Sein Vater, Ephraim Benjamin Krüger, war Elfenbein- und Bernsteinarbeiter, der Münzgraveur und Medailleur Friedrich Heinrich Krüger (1749-1805) sein Bruder. Der Münzgraveur und Medailleur Reinhard Krüger (1794-1879) und der Kupferstecher Ferdinand Anton Krüger (1795-1857) waren Söhne von Christian Joseph Krüger.

add_def_ver("v_dfw","DFW, Dresden","Dresdner Farbenfotographische Werkstätten Walther, Dresden A., -1927 Reckestr. 2, ab 1927 Stübelallee 14");

add_def_ver("v_diakonissenanstalt","Diakonissenanstalt Dresden","Verlag der luth. Diakonissenanstalt Dresden- N., Bautzner Str. 68");

Die Viehbotsche ist eine Straße in Graupa direkt neben der Rysselkuppe. Sie liegt am Sächsischen Weinwanderweg. Geschichte Die Straße Viehbotsche in Oberpoyritz wurde erstmals 1933 in einem Plan gefunden. Die Bezeichnung ist aber sicherlich wesentlich älter. Allerdings steht sie nicht unter diesem Namen im Straßenverzeichnis von 1939, sondern als Borsbergstraße. Eine Unterlage zur Benennung fehlt. Viehbodsche kommt aus dem Sorbischen. Bodzer bedeutet Stößer, Treiber, also steht bodsche für Viehtreibe. Auf diesem Weg wurde früher das Vieh auf die Weide getrieben

Der Vierbeeteweg wurde im Zusammenhang mit der Bebauung südlich des Achtbeeteweges in den 1920er Jahren angelegt. Wie dieser bezieht sich der Name auf eine Flurbezeichnung und steht seit 1927 im Adressbuch.

add_def_ver("v_h_dieckhof","H. Dieckhof, Dresden-Plauen","Hermann Diekhof, 1907 Altplauen 28");

Die Straße Vierlinden wurde gemeinsam mit weiteren Straßen in einem Gebiet gebaut, in dem ab 1912 zahlreiche Eigenheime errichtet wurden (bspw. die parallel verlaufende Sonnenlehne. Es wird vermutet, dass 1913 die Benennung nach dort angepflanzten Lindenbäumen erfolgte. In einigen Adressbüchern (bspw. 1921) gibt es die Schreibweise Straße Vierlinden .

Privatschulen

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Privatschulen

Privatschulen

Die Viktoriastraße führt seit 1865 ihren Namen wahrscheinlich nach dem 1849 errichteten Viktoriahotel, dessen Garten ehemals bis nahe an ihre Ausmündung an der Waisenhausstraße reichte. Das Hotel wurde 1891 abgebrochen, um dem Viktoriahause Platz zu machen . 1945 wurde das gesamte Gebiet rund um die Viktoriastraße durch die Bombardierung zerstört. Mit der Bebauung nach 1990 entstand die Straße auf dem nördlichen Teil wieder neu.

Die Villacher Straße im Stadtteil Laubegast wurde bereits 1898 zwischen Gustav-Hartmann-Straße und Hermannstädter Straße gebaut. Allerdings blieb sie vorerst namenlos. Später wurde die Planstraße IX westlich der Leubener Straße gebaut. Mit Beschluss vom 29. September 1926 wurde die Straße IX mit Villacher Straße benannt nach der Stadt Villach in Kärnten. Später wurde die Planstraße auch östlich der Leubener Straße weiter gebaut. Im Adressbuch von 1943 wird sie beschrieben von der Tauernstraße bis zum Dachsteinweg, aber nicht durchführend. Zwischen der Leubener Straße und der Melli-Beese-Straße ist die Villacher Straße durch die Anlage des Neusiedler Weges 2012 auch heute nicht durchführend; zwischen Melli-Beese-Straße und Gustav-Hartmann-Straße ist die Villacher Straße ebenso nicht durchführend. Adressen Häuserzeilen Nr. 61 bis 76: Villacher Siedlung (denkmalgeschütze Sachgesamtheit) Doppelhäuser Nr. 73/75 und 78/80: Kulturdenkmale (ebenfalls Villacher Siedlung)

Der Friedrich-List-Platz ist ein in der Dresdner Südvorstadt und südlich des Hauptbahnhofs gelegener Platz. Er trägt den Namen Friedrich Lists (1789–1846), eines bedeutenden Wirtschaftstheoretikers und Eisenbahnpioniers. Inhaltsverzeichnis 1 Lage 2 Geschichte 3 Gestaltung 4 Bebauung 5 Verkehr 6 Weblinks 7 Einzelnachweise Lage Der Platz befindet sich innerhalb der Dresdner Gemarkung Altstadt II im Stadtteil Südvorstadt-Ost. Seine Nordseite bildet dabei sowohl die Grenze der Gemarkung zu Altstadt II als auch die Stadtteilgrenze zu Seevorstadt-Ost/Großer Garten. Die Westseite des Friedrich-List-Platzes markiert zudem den Übergang zum Stadtteil Südvorstadt-West. Der im Wesentlichen rechteckige Platz besteht aus einem etwa 1,45 Hektar großen Park, der – abgesehen von der Südseite – von Straßen umgeben ist. Die nördliche Begrenzung bildet dabei die Strehlener Straße. Sie verläuft leicht schräg zur übrigen Platzgeometrie entlang der Bahnhofsgebäude und hat an der Nordwestecke des Friedrich-List-Platzes eine Kreuzung mit der Bayrischen Straße sowie der durch die Überführung der Bahnstrecke Decín–Dresden-Neustadt verlaufenden Straße „Am Hauptbahnhof“, die sich nach Norden als St. Petersburger Straße fortsetzt. Die südliche Einfassung des Platzes übernimmt die Lindenaustraße, die aber nur noch als Fußweg besteht und vor Ort nicht mehr ausgeschildert ist. Die östlich und westlich des Platzes verlaufenden Straßen tragen beide den Namen „Friedrich-List-Platz“. Bei der östlich gelegenen Straße handelt es sich um die Fortsetzung der Hochschulstraße, die westliche Begrenzungsstraße verbindet die Fritz-Löffler-Straße mit der Kreuzung Strehlener/Bayrische Straße/Am Hauptbahnhof und ist Teil der Bundesstraße 170. Geschichte Der Bismarckplatz (Kartenmitte) im Jahr 1904 Der Platz entstand Ende der 1860er Jahre zusammen mit der späteren Reichsstraße (heutige Fritz-Löffler-Straße), der Lindenaustraße (angelegt 1867) und dem Ausbau des Kälberwegs (heutige Strehlener Straße). Da die Reichsstraße damals die direkte Fortsetzung der Prager Straße war, erhielt die neu entstandene Fläche 1868 zunächst den Namen Prager Platz. Diese Bezeichnung trug sie aber nur wenige Jahre, denn nach dem siegreichen Deutsch-Französischen Krieg und der Reichsgründung 1871 folgte im gleichen Jahr die Umbenennung in Bismarckplatz, zu Ehren des Fürsten Otto von Bismarck. Blick durch die Reichsstraße gen Norden: zu erkennen das Polytechnikum, der davor gelegene Bismarckplatz und der noch ebenerdige Bahnübergang am Böhmischen Bahnhof. Bebaut wurde der Platz ab 1870 an der Ostseite, der damaligen Sedanstraße, vornehmlich mit Hotels und Pensionen. An der Südseite entstand von 1872 bis 1875 das Hauptgebäude des damaligen Königlich Sächsischen Polytechnikums Dresden, dem Vorläufer der Technischen Universität Dresden. Bis 1900 waren Süd-, Ost- und Westseite des Bismarckplatzes komplett geschlossen bebaut und der Platz gärtnerisch gestaltet. Bis in die 1890er Jahre bildete die Bahntrasse östlich des Böhmischen Bahnhofs die nördliche Begrenzung des Platzes. Die Bahnstrecke kreuzte die Reichsstraße/Prager Straße nordwestlich des Bismarckplatzes ebenerdig und beschrankt. Erst mit der Umgestaltung der Dresdner Eisenbahnanlagen ab 1892 und der Errichtung des neuen Dresdner Hauptbahnhofs (1898 eröffnet) erhielt die Nordseite des Platzes ihre heutige Gestalt. Die Luftangriffe auf Dresden während des Zweiten Weltkriegs im Februar 1945 beschädigten die Gebäude am Bismarckplatz stark. Mit Ausnahme des Hauptbahnhofs und eines Nebengebäudes an der Westseite wurde die ruinöse Bebauung in der Nachkriegszeit komplett abgetragen. In Folge der sowjetischen Besatzung war der Name Bismarcks als geographische Bezeichnung nicht mehr erwünscht, sodass der Platz gemeinsam mit der Bismarckstraße in Bayrischer Platz bzw. Bayrische Straße umbenannt wurde. Die Wiederbebauung des Areals begann 1954 mit der Errichtung des Hauptgebäudes der Hochschule für Verkehrswesen (HfV) an der Ostseite/Hochschulstraße. Die 1952 gegründete Hochschule erhielt zu ihrem zehnjährigen Bestehen 1962 den Beinamen „Friedrich List“. Aus diesem Grund beschloss die Dresdner Stadtverordnetenversammlung am 3. September 1962 die Umbenennung des Platzes in „Friedrich-List-Platz“. Außerdem wurde ein Denkmal an den Eisenbahnpionier eingeweiht. Die bis vor dem Krieg noch von der Reichs- zur Sedanstraße durchgehende Lindenaustraße wurde während des Wiederaufbaus nicht mehr an den nun Hochschulstraße genannten Weg angebunden. Gestaltung Marie-Gey-Brunnen Teil des Friedrich-List-Denkmals Der Platz bestand seit dem Ende des 19. Jahrhunderts aus einem zentral gelegenen Rondell, von dem nach allen Richtungen gerade Wege zu den Seiten führten. Im Jahr 1911 wurde der zwischen 1908 und 1910 von Georg Wrba geschaffene Marie-Gey-Brunnen auf dem Bismarckplatz aufgestellt. Er erinnert an die 1908 jung gestorbene Künstlerin Marie Gey-Heinze (* 1881) und wurde von ihrem Ehemann Paul Heinze für 15.000 Mark gestiftet. Nachdem der Brunnen 1945 bei Bauarbeiten beschädigt wurde, wurde er im September 1952 wieder aufgestellt sowie in den 1980er Jahren und im Jahr 2001 restauriert. Nach den Kriegseinwirkungen änderte sich auch die Platzgestaltung. Mit der Einweihung des Friedrich-List-Denkmals 1964 erhielt der Platz anstelle des zentralen Rondells eine eher horizontale Gliederung mit einem unbepflanzten Band zwischen der Juri-Gagarin- (Fritz-Löffler-) und der Hochschulstraße, auf dem sich auch das Denkmal befand. Ergänzt wurde es mit einer schräg dazu verlaufenden Wegverbindung zwischen der Kreuzung am Hauptbahnhof und der Hochschulstraße sowie mit einem parallel zur Hochschulstraße angelegten Weg von der Strehlener Straße aus. Die frühere Lindenaustraße wurde durch einen weiteren Weg nachempfunden. Mitte der 2000er Jahre wurde der Friedrich-List-Platz vor allem auf der westlichen Hälfte nochmals umgestaltet. Die zahlreichen großen Bäume entlang des schrägen Hauptwegs sind heute von Rasenflächen und vereinzelten Sitzgelegenheiten umgeben. Der Hauptweg ist zwischen Marie-Gey-Brunnen und dem Friedrich-List-Denkmal teilweise gepflastert. Das Friedrich-List-Denkmal ist ebenfalls von Bänken und Sitzgelegenheiten umreiht und zeigt die Entwicklung des Transportwesens in Vergangenheit und Zukunft. Die Reliefs wurden von Wilhelm Landgraf entworfen und von Werner Hempel gefertigt. Bebauung Das Grand Union Hotel am Bismarckplatz, um 1920 Die Lage am Böhmischen Bahnhof, dem späteren Hauptbahnhof, begünstigte mit vielen Reisenden die Entstehung einiger Hotels und Pensionen auch aus dem gehobenen Bereich, weshalb die Gegend um den Bismarckplatz die Bezeichnung „Diplomatenviertel“ erhielt. Am Bismarckplatz Nr. 1 (Ecke Strehlener Straße/Sedanstraße) befand sich das fünfstöckige Hotel Carlton von Gustav Härtig. Nach dem Ersten Weltkrieg verschlechterte sich die Situation für die Hotelbetreiber, sodass das Gebäude später zum Behördenstandort umgenutzt wurde. Ein ähnliches Schicksal teilte das Hotel Bristol am Bismarckplatz 5–9. Das um 1900 eröffnete Etablissement war modern ausgestattet und verfügte über eine große Empfangshalle sowie einen Festsaal. Ab Dezember 1933 war es Sitz der Obersten Bauleitung der Reichsautobahnen Dresden. An das Bristol schloss sich ein Block mit Wohnungen und Gewerbebetrieben an. An der Ecke Reichsstraße/Bismarckstraße wurde 1873 das Grand Union Hotel (Nr. 2–6) eröffnet. Dieses gehörte zu den vornehmsten Hotels der Südvorstadt und verfügte über 80 Zimmer und als eines der ersten Hotels in Dresden über Stellplätze für Kraftfahrzeuge. Auch dieses Hotel überlebte die wirtschaftlichen Schwierigkeiten nach dem Ersten Weltkrieg nicht und musste den Betrieb aufgeben, der Energiekonzern Aktiengesellschaft Sächsische Werke (ASW) nutzte das Gebäude ab 1923 als seinen Geschäftssitz. Das Polytechnikum an der Südseite, davor der Bismarckplatz Die Südseite des Bismarckplatzes wurde vollständig von dem 1872 bis 1875 erbauten Polytechnikum begrenzt. Architekt Rudolf Heyn war selbst Lehrer und später Rektor an der Einrichtung, die 1828 als Technische Bildungsanstalt zu Dresden gegründet und 1890 zur Technischen Hochschule ernannt wurde. Der Neorenaissance-Bau war dreigeschossig und bestand aus vier Flügeln, die zwei Innenhöfe umschlossen. Aufgrund steigender Studentenzahlen wurden in Räcknitz neue Gebäude für die Technische Hochschule errichtet, sodass das Gebäude am Bismarckplatz die Bezeichnung „Alte Hochschule“ erhielt. Die Neubauten im Süden überstanden im Gegensatz zu den Gebäuden am Bismarckplatz die Bombardements während des Zweiten Weltkriegs und bilden heute den Campus der Technischen Universität Dresden, die aus der Technischen Hochschule hervorgegangen war. Zentralgebäude der HfV bzw. der HTW vom Friedrich-List-Platz aus gesehen Nach den Kriegszerstörungen wurde die Tradition des Hochschulstandorts wieder aufgenommen, als an der Ostseite des umbenannten Bayrischen Platzes und entlang der Hochschulstraße der Bau der Hochschule für Verkehrswesen begann. Der Grundstein für das von Richard Paulick entworfene Zentrale Universitätsgebäude wurde am 8. April 1954 gelegt. Der markante Bau ist heute Sitz der Hochschule für Technik und Wirtschaft Dresden (HTW), nachdem die HfV als Fakultät Verkehrswissenschaften „Friedrich List“ der TU Dresden angegliedert wurde und in den Gerhart-Potthoff-Bau umzog. 1996 fertiggestelltes ENSO-Gebäude am Friedrich-List-Platz 2, Blick vom Hauptbahnhof aus Auf der Westseite des Friedrich-List-Platzes wurde nach dem Zweiten Weltkrieg zunächst ein weitgehend erhaltenes Nebengebäude des ehemaligen Grand-Union-Hotels saniert und wieder vom verstaatlichten Nachfolgebetrieb der ASW genutzt, der später in das Energiekombinat Ost bzw. den Energiebezirk Dresden überging. Das Gebäude wurde bis zur Wende mehrfach durch Anbauten ergänzt. Bis 1996 wurde es durch einen Neubau ersetzt, der Hauptsitz der aus dem Energiebezirk vervorgegangenen ENSO Energie Sachsen Ost AG ist und unter der Bezeichnung „City-Center“ außerdem eine Ladenpassage und Büroflächen beheimatet. Die Südseite des Bayrischen Platzes war nach dem Abriss des ruinösen Polytechnikums zunächst eine Grünanlage, bevor diese in den 1980er Jahren Teil eines langgezogenen zehngeschossigen Plattenbau-Wohnblocks zwischen Friedrich-List-Platz, Juri-Gagarin-Straße, Reichenbachstraße und Hochschulstraße wurde. Im September 2017 begann an den dem Platz zugewandten Blöcken die Sanierung. Die zwischen Lindenaustraße und ENSO-Gebäude befindliche Fläche liegt bis heute brach und soll bebaut werden. Das ENSO-Gebäude (Friedrich-List-Platz 2) und das Zentralgebäude der HTW (Friedrich-List-Platz 1) sind die einzig verbliebenen Adressen, die den Namen des Platzes tragen. Verkehr Der Friedrich-List-Platz ist ein Verkehrsknotenpunkt der Dresdner Südvorstadt. Entlang der Westseite verläuft die Straßenbahnstrecke Richtung „Nürnberger Ei“, Plauen und Coschütz, die am Hauptbahnhof eine Haltestelle hat und von gegenwärtig zwei Straßenbahnlinien befahren wird. Die Nordseite ist als Teil der Strehlener Straße ein Zubringer zum Hauptbahnhof und zur HTW, den Dresdner Finanzämtern sowie zur S 173 Richtung Pirna. Dort befindet sich auch eine Bushaltestelle „Hauptbahnhof (Friedrich-List-Platz)“ für Bedarfshalte. Durch die an der Bayrischen Straße gelegene Internationale Bushaltestelle ist der Friedrich-List-Platz auch erhöhtem Fernbusverkehr ausgesetzt. Die Westseite wurde im August 2011 von etwa 27.400 Fahrzeugen am Tag befahren, die Nordseite von 10.800 Fahrzeugen täglich. Im studentischen Fuß- und Radverkehr kommt dem Friedrich-List-Platz als zwischen Hauptbahnhof und HTW gelegenem Platz ebenfalls Bedeutung zu.

Die Virchowstraße wurde 1902 zunächst nur auf der Flur von Trachau angelegt, von der Dippelsdorfer Straße in östliche Richtung abgehend und bis zur heutigen Dorothea-Erxleben-Straße führend. Später wurde sie teilweise bis zur Duckwitzstraße in Pieschen gebaut. Im Adressbuch von 1943 wird sie als nicht durchführend bezeichnet. Die hohen Hausnummern deuten darauf hin, dass die Straße eventuell bereits von der Hubertusstraße aus führen sollte. Ihre Benennung erhielt die Straße 1902 nach dem Pathologen und Anthropologen Rudolf Virchow .

Die Vitzthumstraße besteht seit 1903. Sie wurde benannt nach dem 1639 verstorbenen Rudolph Vitzthum von Apolda (1572–1639), dem Stifter des Vitzthum'schen Geschlechtsgymnasiums, das, erst 1828 eröffnet, 1861 in eine selbständige öffentliche Lehranstalt umgewandelt wurde und 1898 in städtischen Besitz überging. Die Straße durchschneidet das Gartenland des alten Gymnasialgrundstücks . Das Gymnasium wurde bei der Bombardierung 1945 zerstört. Seit 1994 trägt ein Schulneubau auf der Paradiesstraße wieder den Namen Vitzthum-Gymnasium Dresden. Die Vitzthumstraße wurde 1962 umbenannt in Rudi-Hempel-Straße nach dem Dresdner Widerstandskämpfer Rudi Hempel (1911-1947). Im Oktober 1991 erfolgte die Rückbenennung in Vitzthumstraße .

add_def_ver("v_et_domschke","E.T. Domschke, Cotta","Ernst Th. Domschke (1900 Cig. Fabrkt. u. Buch- u. Papierhandlung, Cotta, Schulplatz 2)"); ____________________________________
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Die Liebigstraße wurde Mitte des 19. Jahrhunderts beim Bau des “Schweizer Viertels” hinter dem Hauptbahnhof angelegt und nach 1900 im Zusammenhang mit dem weiteren Ausbau der Südvorstadt bis zur Münchner Straße verlängert. Ihren Namen erhielt sie nach dem deutschen Chemiker Justus von Liebig (1803-1873). Liebig befasste sich u.a. mit den Prozessen beim Stoffwechsel von Tieren und Pflanzen und begründete die künstliche Düngung in der Landwirtschaft. Auch diese Straße war 1945 von Zerstörungen betroffen, so dass heute nur noch teilweise historische Bebauung erhalten geblieben ist. Die meisten Baulücken konnten jedoch bereits in den 50er und 60er Jahren geschlossen werden. Einzelne Gebäude: Nr. 1: Die 1945 zerstörte Villa wurde 1879 für den Kaiserlich-Russischen Staatsrat Wassili Petrowitsch Baron von Engelhardt (1828-1915) errichtet. Zuvor hatte Engelhardt bereits ab 1877 das Nachbargrundstück Nr. 2 gepachtet, um hier eine massive Sternwarte zu errichten. Unter dem Pseudonym Basilius von Engelhardt befasste er sich mit Astronomie und schrieb u.a. die dreibändige “Observations Astronomique”, ein Standardwerk der modernen Himmelskunde. Gemeinsam mit dem befreundeten Fabrikanten Gustav Heyde, Besitzer der Firma “G. Heyde - mechanische und optische Präzisions- Werke” ließ sich Engelhardt sein Haus mit einem neuen Observatorium, einer beweglichen Beobachtungsplattform und verschiedenen Geräten zur Himmelsbeobachtung ausstatten. 1945 fielen Villa und Sternwarte den Bomben zum Opfer. Heute erinnert noch das gusseiserne Portal am Zaun mit den Initialen BvE an ihn. Nr. 3 (ehem. Nr. 2): Die 1873 vom Architekten Rößler für den Leutnant a. D. Albert Meurer errichtete Villa steht beispielhaft für die bis 1945 typische Bebauung des Schweizer Viertels. Der relativ schlichte Bau mit Attika und Walmdach orientiert sich an den Vorbildern der Nicolai-Schule und weist Neorenaissance- und neoklassizistische Elemente auf. Erst gegen Ende des 19. Jahrhunderts entschieden sich viele private Bauherren für aufwendigere Gebäude. Bereits 1880 verkauften die Eigentümer ihr Haus an neue Besitzer. 1898 erwarb die Familie Klette das Gebäude, welches nach der neuen Hausherrin nun den Namen Villa Clara erhielt. Das Paar ließ einige Umbauten vornehmen und fügte dem Haus um 1900 einen Wintergarten hinzu. Nach 1945 diente die Villa bis 1995 als Mietshaus und wurde 2001 an ein Bauunternehmen verkauft. Im Anschluss erfolgte eine denkmalgerechte Sanierung des Gebäudes, welches jetzt als Wohn- und Bürohaus genutzt wird. In Erinnerung an den Computer-Pionier Konrad Zuse trägt das Haus heute den Namen “Konrad-Zuse-Haus”. Diese Namensgebung erfolgte auf Anregung des Besitzers, welcher Träger der Konrad-Zuse-Medaille für Verdienste um die Informatik im Baugewerbe ist. Nr. 7: Das repräsentative Neorenaissancegebäude mit entstand 1875 als eines der letzten Bauwerke des Schweizer Viertels im Geist der Nicolai-Schule. Ursprünglich gehörte es dem königlichen Hofjuwelier Fritz Chrambach, der zugleich das Amt eines Kaiserlich-Türkischen Konsuls innehatte. Chrambach war Mitinhaber des Juweliergeschäfts Elimeyer am Neumarkt und galt als kunstsinniger Gastgeber. So weilten u.a. der Komponist und Klaviervirtuose Anton Rubinstein, Richard Wagners Sohn Siegfried mit seiner Frau Winifred und der Literaturnobelpreisträger Karl Gjellerup in seinem Haus. Ab 1930 diente die Villa als Privatklinik für Gynäkologie und Geburtshilfe von Prof. Dr. med. Wilhelm Rübsamen, der zeitweise auch geschäftsführender Oberarzt des Johannstädter Krankenhauses war. 1945 brannte das Haus aus, konnte jedoch bis 1949 wieder aufgebaut werden. Unter Leitung Professor Rübsamens, später unter der seiner Tochter Ursula, blieb die Frauenklinik auch zu DDR-Zeiten in Familienbesitz und gehörte zu den wenigen Privatkliniken der Stadt. Erst 1987 gab Dr. med. Ursula Rübsamen ihre Klinik aus Altersgründen auf, führte jedoch noch gelegentliche Sprechstunden durch. Ab 1992 nutzte zunächst die Diakonissenanstalt, später die Johanniter-Unfallhilfe das Gebäude. Heute hat hier eine Werbeagentur ihren Sitz. Außerdem gibt es im Haus einige Mietwohnungen. Fotos: Villa Liebigstraße 7 mit Wandbrunnen Nr. 8: Nach der Reichsgründung 1870/71 verdrängten im Schweizer Viertel zunehmend mehrgeschossige, aufwendig gestaltete Mietshäuser die bislang relativ schlicht ausgeführten Villen. Auch der Architekt Bär entschied sich 1873 für den Bau eines solchen Gebäudes, welches er teilweise selbst bewohnte, zum Teil aber auch an zahlungskräftige Interessenten vermietete. Trotz einiger baulicher Veränderungen stellt dieses Haus ein interessantes Zeugnis der Wandlung der Architekturauffassungen im letzten Drittel des 19. Jahrhunderts dar. Nr. 13: 1893/94 entstand auf dem Grundstück Liebigstraße 13 eine romantische landhausartige Villa mit Treppenturm und Fachwerkobergeschoss, welche heute nicht mehr vorhanden ist. Architekt war Hermann Kickelhayn, der für mehrere Villenbauten der Südvorstadt verantwortlich zeichnete. Bekanntestes Dresdner Bauwerk seiner Hand ist das heute von der Kreuzschule genutzte ehemalige Freimaurerinstitut in Striesen. Nr. 23: Das seit 1965 als Ärztehaus genutzte Gebäude beherbergte vor 1933 die Importgroßhandlung des jüdischen Kaufmanns Weiger. Bis zur Enteignung durch die Nationalsozialisten lebten im Schweizer Viertel zahlreiche wohlhabende jüdische Familien. Während einigen noch Mitte der Dreißiger Jahre die Flucht gelang, wurden die verbliebenen Bewohner später in “Judenhäusern” konzentriert und von dort in die Vernichtungslager geschickt. Nr. 24: Das um 1900 errichtete Mietshaus war zeitweise Wohnsitz des Baritons Josef Herrmann (1903-1955). Bis 1945 gehörte er dem Ensemble der Dresdner Staatsoper an und war in der Nachkriegszeit am Wiederaufbau des Musiklebens in der Stadt beteiligt. U.a. trat er am 10. August 1945 in der ersten Opernaufführung nach dem Zweiten Weltkrieg als “Figaro” auf. Im Keller des Gebäudes (Foto) befindet sich seit 1991 die beliebte Gaststätte “B. Liebig”. Nr. 29: In diesem Haus wohnte einst der Kunsthistorikers Fritz Löffler (1899-1988). Löffler verfasste zahlreiche Werke zur Kunst- und Architekturgeschichte, darunter das populäre Buch “Das alte Dresden” (1956). Bekannt wurde er auch durch seinen unermüdlichen Einsatz für die Bewahrung der verbliebenen historischen Bausubstanz nach 1945. An ihn erinnert das Fritz-Löffler-Gymnasium an der Bernhardstraße sowie die nach ihm benannte Fritz-Löffler-Straße. 1999 wurde vor seinem früheren Wohnhaus eine Bronzestele aufgestellt. Nr. 30: Die Villa ist seit 1998 Domizil der Evangelischen Studentengemeinde Dresden. Diese wurde 1949 von christlichen Studenten der TH gegründet und nutzte bis 1963 eine in Eigeninitiative ausgebaute Baracke auf dem Gelände der 1945 zerstörten Zionskirche. Dann bezog sie die Kellerräume der Ruine des Pfarrhauses am Lukasplatz, bevor 1998 der Treff zur Liebigstraße 30 verlegt wurde. Regelmäßig finden hier Gemeindeabende, Gesprächsrunden und verschiedene andere Veranstaltungen statt.

Der Münchner Platz entstand 1899 im Zuge des weiteren Ausbaus der Südvorstadt und wurde wenig später mit mehrgeschossigen Wohn- und Geschäftshäusern bebaut. Zuvor hatte hier einige Jahre der private Zirkus Herzog sein Quartier. Ursprünglich sollte auf diesem Areal eine Kirche errichtet werden. Nachdem man sich jedoch für einen anderen Standort an der Ecke Nürnberger / Hohe Straße entschieden hatte, entstand an dieser Stelle 1902/07 der Bau des Dresdner Landgerichts. In den umliegenden Gebäuden befanden sich verschiedene Geschäfte und kleinere Gaststätten. Am bekanntesten war die sowohl von Juristen als auch Angeklagten und Zeugen besuchte Gaststätte "Am Münchner Platz” (Nr. 1), welche im Volksmund “Meineidschänke” genannt wurde. Heute nutzt ein kleines Café die Räume (Foto). Im Eckhaus Münchner Platz 16 wohnte zeitweise der Fußballer Helmut Schön, der mit dem Dresdner SC 1944 letzter deutscher Fußballmeister wurde und später das Amt des Bundestrainers übernahm. Beim Bombenangriff auf Dresden wurden auch einige Gebäude am Münchner Platz getroffen. Zur Enttrümmerung der Innenstadt und des westlichen Teils der Südvorstadt legte man eine Feldbahn an, welche ab Januar 1951 über die Kaitzer und Münchner Straße zum Münchner Platz und von dort direkt in die Lehmgrube an der Nöthnitzer Straße führte. Oberhalb des Münchner Platzes entstand dafür ein großer Betriebs- und Rangierbahnhof mit Lokschuppen, Kohlendepot und Wasserkran. Gegenüber davon stand ab 1947 ein schlichter Flachbau mit Konsum-Verkaufstelle (Foto) . Während Lokschuppen und Werkstätten bereits kurz nach Einstellung der Trümmerbahn im Oktober 1951 verschwanden, blieb der Verkaufspavillon noch bis zum Abriss 2013 als Zeugnis der unmittelbaren Nachkriegsgeschichte erhalten. An gleicher Stelle befindet sich heute in einem Neubau wieder ein Konsum-Markt. 1974 wurde der Münchner Platz nach dem am 11. September 1973 durch einen Militärputsch gestürzten und ermordeten chilenischen Präsidenten in Salvador-Allende-Platz umbenannt. Im gleichen Jahr entstand das bis heute in der Nähe der Straßenbahnhaltestelle in Richtung Innenstadt erhaltene Denkmal mit Porträtrelief Allendes. 1991 beschloss der Stadtrat die Rückbenennung in Münchner Platz. Foto: Gedenkstein für Salvador Allende. Die unter dem Porträtrelief befindliche Tafel trägt die Inschrift: SALVADOR ALLENDE vom Volk gewählter Präsident Chiles ermordet von einer reaktionären Militärjunta am 11. September 1973

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Die Wiesentorstraße führte vom früheren Beaumontplatz (seit 1946 Wiesentorplatz, jetzt nicht mehr vorhanden) am Jägerhof (Dresden) vorbei zum unteren Wiesentor. In der zweiten Hälfte des 18. Jahrhunderts wurde sie deshalb Am Jägerhof genannt. Seit 1840 trug sie den Namen Wiesenthorstraße (Schreibweise ab 1906: Wiesentorstraße). Das Wiesentor stand bis 1854 an ihrem südlichen Ausgang. Durch dieses gelangte man auf das Gelände an der Elbe, das auch als Mönchswiese bekannt ist, weil es ehemals zum Augustinerkloster gehörte. Das Gelände wurde mit Am Wiesenthor bzw. auch Vor dem Wiesenthor bezeichnet. Es gab auch die Benennungen Elbwiese oder Stallwiese . Heute finden dort die Filmnächte am Elbufer statt. Das Straßenstück am Jägerhof (Dresden) wurde in den 1970er Jahren überbaut.

Die Schweizer Straße im westlichen Teil der Südvorstadt wurde 1856 angelegt und nach der hier gelegenen Gastwirtschaft “Zum Schweizerhäuschen” benannt. Wenig später entstanden in deren Nachbarschaft die ersten Villen. Gasthaus und Straße waren später Namensgeber für das gesamte Wohngebiet, welches noch heute oft als “Schweizer Viertel” bezeichnet wird. Nach 1945 erfolgte der Abbruch der ausgebrannten Ruinen zugunsten moderner Wohnblocks für die Arbeiter-Wohnungsbaugenossenschaft Süd (heute WGS “Glückauf Süd”). Nach 1990 entstanden zudem einige neue Wohn- und Bürogebäude. Fotos: Villa Schweizer Straße 9 (vor 1945) - Blick in die Schweizer Straße im Sommer 2006 Einzelne Gebäude: Schweizerhäuschen: Die kleine Gastwirtschaft (Schweizer Straße 1) entstand 1856 auf dem Gelände des “Meinertschen Milchgartens” und wurde zunächst “Schweizerei”, später “Schweizerhäuschen” genannt. Das Lokal befand sich im Besitz des Dresdner Gastwirts Heydel und gehörte zu den beliebten Einkehrstätten vor den Toren der Stadt. In der angeschlossenen “Schweizerhaus-Diele” fanden bis zum Ersten Weltkrieg regelmäßig Tanzveranstaltungen statt. 1992/93 wurde auf dem Areal des 1945 zerstörten “Schweizerhäuschens” ein Büro- und Geschäftshaus für die Deutsche Bahn errichtet. Nr. 9: Die Villa Schweizer Straße 9 wurde 1874 erbaut und gehörte bis zu ihrer Zerstörung zu den ungewöhnlichsten Villenbauten der Südvorstadt. Das Gebäude war im toskanischen Landhausstil gestaltet und besaß mehrere Balkons und Veranden. Darüber lag ein flaches weitvorkragendes Dach mit abgerundeten Ecken. Der Entwurf für dieses Haus stammte von Emil Lehnert (Foto oben links). Nr. 12: In diesem Haus wohnte Ende des 19. Jahrhunderts die Familie des evangelischen Pfarrers Julius Oster. Sohn Hans (1887-1945) begann nach seinem Abitur eine militärische Laufbahn und gehörte während des Zweiten Weltkrieges der Auslandsabwehr der Wehrmacht an. Im Zusammenhang mit dem Attentat auf Hitler am 20. Juli 1944 wurde Oster verhaftet und kurz vor Kriegsende hingerichtet. An ihn erinnert die Hans-Oster-Straße in der Albertstadt und eine Gedenkstätte auf dem Nordfriedhof. Satyrgruppe: Die Figurengruppe, welche eine Szene aus der griechischen Mythologie darstellt und auch als „musizierender Kentaur mit Nymphe“ bezeichnet wird, befindet sich an der Straßenecke Schweizer / Budapester Straße. Sie wurde 1971 vom Bildhauer Karl Schönherr geschaffen.

Der Zellesche Weg gehört zu den ältesten Verkehrsverbindungen im Süden der Stadt und bestand bereits im 13. Jahrhundert. Ursprünglich verlief er von der Löbtauer Brücke über den Hahneberg und den Frankenberg bis zum Klosterhof Leubnitz. Da dieser Weg vor allem als Transportweg zwischen Leubnitz und dem Klosters Altzella genutzt wurde, dem der Klosterhof unterstand, erhielt er den Namen Zellescher Weg. An dieser Straße lagen auch die zum Ausgang des Mittelalters untergegangenen Dresdner Vorwerke Auswik (Nähe Fritz-Foerster-Platz) und Boskau (am Beutlerpark). Im 16. Jahrhundert erlangte der Zellesche Weg neue Bedeutung, da hier die südliche Weichbildgrenze Dresdens verlief. An diese Grenze erinnert noch ein historischer Weichbildstein in der Nähe der TU-Mensa (Foto). Der Stein mit der Nr. 63 stand einst an der Kreuzung des Zelleschen Weges mit der alten Dippoldiswalder Chaussee (Bergstraße) und wurde nach seiner Sanierung Mitte der 1990er Jahre an seinen heutigen Platz versetzt. Der Form des Wappens nach gehört er zu den ältesten Weichbildsteinen der Stadt, die sonst übliche Jahreszahl der Aufstellung fehlt. Einige Abschnitte des alten Zelleschen Weges wurden nach 1870 mit den Villenvierteln der Südvorstadt überbaut. Der westlich der Zwickauer Straße gelegene Teil erhielt 1881 den Namen Nossener Straße, der Teil bis zur Hohen Straße den Namen Zellesche Straße (heute Altenzeller Straße). Die weiter östlich gelegenen Abschnitte blieben hingegen vorerst von der städtischen Bebauung ausgeschlossen und wurden erst nach 1900 aufgehoben. In diesem Zusammenhang ging der ursprüngliche Verlauf des alten Zelleschen Weges völlig verloren. Das heute als Zellescher Weg bezeichnete Reststück zwischen Fritz-Foerster-Platz und Teplitzer Straße blieb sogar bis 1950 weitgehend unbebaut. Auf dem heutigen TU-Gelände und an der Ortsgrenze von Zschertnitz bestanden einige Handelsgärtnereien. Ein in den 1930er Jahren begonnener Ausbau der Straße als Teil des geplanten Tangentenringes konnte erst im Zusammenhang mit dem Bau des Neubaugebietes 1975 vollendet werden. Ab 1949 verkehrte hier bis zu ihrer Stillegung 1974 Dresdens einzige O-Bus-Linie. Heute dominieren am Zelleschen Weg Bauten der Technischen Universität. Bereits in den 1950er Jahren waren die Lehr- und Verwaltungsgebäude der Mathematischen Fakultät (Foto oben rechts von 1962 / Fotothek), des Botanischen Institutes (beide nach Plänen von Walter Henn) und des Institutes für Holztechnologie entstanden. Außerdem wurden einige Studentenwohnheime errichtet. Die von Heinrich Rettig entworfenen Gebäude sind an den Giebelseiten mit Sgraffitti verziert, welche Szenen aus Forschung und Lehre darstellen. 1978 öffnete an der Ecke Zellescher Weg / Bergstraße die Neue Mensa. Vor dem Gebäude steht der “Stahlmast mit Faltungen” (Foto links) , der vom bekannten Dresdner Metallgestalter Hermann Glöckner geschaffen wurde. Eine weitere Stele als “Wegweiser” zur TU befindet sich seit Oktober 1989 an der Ecke Teplitzer Straße. Die verbliebenen Freiflächen, zuletzt als Sportanlagen genutzt, verschwanden nach 1990 zugunsten des Kongress- und Messezentrums “Dre-punkt” (1993/95) und der neuen Staats- und Universitätsbibliothek. Die Eröffnung dieser modernsten Bibliothek Deutschlands erfolgte im Oktober 2002. Gärtnereien am Zelleschen Weg: Zwischen dem heutigen Fritz-Foerster-Platz und der Paradiesstraße gab es noch bis Anfang der 1970er Jahre mehrere Handelsgärtnereien. So hatten auf den Grundstücken Nr. 10, 12 und 14 die Gärtnereien von Emil Piesche, Oswald Schumann und Paul Angermann ihren Sitz. Nach Kündigung der bestehenden Pachtverträge mussten diese ihre Produktion um 1950 einstellen. Auf dem Gelände entstanden Neubauten der Physikalischen Institute der TU. Etwas länger existierten die drei Zschertnitzer Gärtnereien zwischen Heinrich-Greif- und Paradiesstraße (Foto). Die Gartenbaubetriebe von Moritz Hirschfeld (Nr. 26), May Tümpler (Nr. 28) und Reinhold Schwarzbach (Nr. 30), welche alle um 1900 gegründet worden waren, mussten 1970 dem Neubau eines Wohnblocks weichen. Erhalten blieb lediglich ein Wohnhaus an der Heinrich-Greif-Straße. Einzelne Gebäude: Willers-Bau (Nr. 12-14): Nach dem notdürftigen Wiederaufbau der 1945 zerstörten Hochschulgebäude erarbeitete Richard Konwiarz 1950 einen Raumentwicklungsplan für die künftige Erweiterung der Hochschule. Schwerpunkt dabei waren Flächen südlich des Zelleschen Weges. Die Planungen sahen hier den Neubau mehrerer Lehrgebäude, beginnend an der Bergstraße vor. Die Umsetzung übernahmen Walter Henn, Karl Wilhelm Ochs, Heinrich Rettig und Georg Funk. Für diese Arbeiten mussten die zuvor hier ansässigen Gärtnereien aufgegeben werden. Für den im zweiten Bauabschnitt errichteten Willers-Bau begannen die Arbeiten 1954. Die Projektierung stammt von Walter Henn in Zusammenarbeit mit Helmut Fischer und Hans Siegert, die Bauausführung leitete Georg Funk. Bis 1957 wurde das langgestreckte und im Grundriss kammartige Gebäude vollendet. Es besteht aus drei zweistöckigen Gebäudeteilen, die im Norden von Zwischenbauten verbunden sind. Im Inneren sind räumlich getrennt Groß- und Lehrräume sowie die Arbeitsräume der Wissenschaftler untergebracht (Foto: Jörg Blobelt/Wikipedia). Nutzer des Baus waren die mathematischen und physikalischen Institute der Hochschule. 1961 wurde das Gebäude deshalb zu Ehren des Mathematikers Friedrich Adolf Willers Willers-Bau benannt. Heute hat hier die Fachrichtung Mathematik der Technischen Universität ihren Sitz. Ein ursprünglich geplanter Erweiterungsbau bis zur Bergstraße blieb unrealisiert. Heute steht auf diesem Grundstück die Neue Mensa am Fritz-Foerster-Platz. Der unter Denkmalschutz stehende Willers-Bau blieb bis zur Gegenwart äußerlich weitgehend im Ursprungszustand erhalten. Im Inneren befindet sich ein von Eva-Schulze-Knabe geschaffenes Sgraffito, das den Wissenschaftler Wilhelm Leibniz bei der Vorführung seiner ersten Rechenmaschine in der Royal Society London zeigt. Mehrere Kunstwerke sind auch in der kleinen parkähnlich gestalteten Anlage hinter dem Haus zu finden. Die Planung für diese Anlage stammt von Werner Bauch. Zu sehen sind hier die Plastik "Besinnung" von Charlotte Sommer-Landgraf (1981), die "Heimkehr des Elefanten Celebes" von Jürgen Schieferdecker (1984) sowie Moritz Töpfers "Tritonus" (1993/1997). Trefftz-Bau (Nr. 16): Der Treffz-Bau entstand zwischen 1950 und 1953 als erster Teil eines geplanten, jedoch nicht vollständig realisierten Bauvorhabens der Technischen Hochschule. Die Grundsteinlegung für diesen Komplex erfolgte am 25. April 1950. Der Entwurf stammt von den Architekten Walter Henn und Heinrich Rettig, die sich dabei an den Formen des bereits kurz zuvor entstandenen Barkhausen-Baus der TH orientierten (Foto: Erich Höhne / Bundesarchiv). Nach seiner Fertigstellung 1953 bezogen die Fachrichtungen Mathematik und Physik das Gebäude. Hier fanden die beiden großen Hörsäle der Fakultäten ihren Platz. Baulich verbunden ist das Gebäude mit dem benachbarten Willers-Bau durch einen säulengestützten Verbindungsgang, dem eine Freitreppe vorgelagert ist. Auf dem Vorplatz steht die Skulptur "Mensch und Woge" von Karl Lüdecke. Am Giebel des Treffz-Baus befand sich ursprünglich eine astronomische Uhr, die ím Zuge eines Um- und Erweiterungsbaus 2006 entfernt und an die Ostseite des Willers-Baus versetzt wurde (Foto: Wikipedia / SchiDD). Die Uhr ermöglicht neben der Zeitangabe auch das das Ablesen von Sonnenauf- und -untergangszeiten und der Mondphasen. Die Berechnungen dafür stammen von Friedrich Adolf Willers, die Zifferblätter entwarf seine Tochter Annemarie. Mehrfach wurde der Treffz-Bau erweitert, zuletzt 2008/09 um einen Anbau für das Universätsrechenzentrum. Hier ist auch das Zentrum für Informationsdienste und Hochleistungsrechnen untergebracht. Seit 1994 trägt das Gebäude den Namen des früheren TH-Professors für Technische Mechanik und Angewandte Mathematik Erich Trefftz. Kongresszentrum "DrePunct" (Nr. 17): Der moderne Neubau (Foto) wurde zwischen 1993 und 1995 auf einem zuvor als Sportfläche genutzten Grundstück errichtet. Ursprünglich waren diese für den Akademischen Sportverein der Hochschule angelegt worden. Der Entwurf stammt vom Architektenbüro Brenner & Partner. Im Inneren des langgestreckten Baus sind neben verschiedenen Lehr-, Büro und Veranstaltungsräumen die Zweigbibliotheken mehrerer TU-Fakultäten untergebracht. Außerdem hat hier das Institut für Sächsische Geschichte und Volkskunde seinen Sitz. Andreas-Schubert-Bau (Nr. 19): Das siebengeschossige Gebäude mit einem dreigeschossigen Nebengebäude entstand 1956-60 nach Entwürfen von Helmut Fischer und Heinz Stoll. Ursprünglich war es Sitz der Fakultät für Kerntechnik der Technischen Universität. Heute sind hier Teile der Fachrichtungen Physik, Biologie und Psychologie untergebracht. Seinen Namen erhielt der Bau nach dem Maschinenbauingenieur Andreas Schubert (1808-1870), der u.a. die erste deutsche Lokomotive und den ersten Elbdampfer "Königin Maria" konstruierte. Im Hauptgebäude befinden sich Büros und Institute, der Flachbau dient als Hörsaal mit 390 Plätzen. Wegen seiner interessanten architektonischen Gestaltung steht das in Stahlbetonskelettbauweise errichtete Gebäude unter Denkmalschutz. In den Grünflächen vor dem Haus erinnert seit 1996 die Werner-Hempel-Eiche an den Gründungsdekan der Fachrichtung Biologie. Der benachbarte Kranichbrunnen stammt von Werner Scheffel. Institut für Holztechnologie (Nr. 24): Die Gebäude an der Ecke zur Heinrich-Greif-Straße entstanden 1954/56 für das 1952 gegründete Institut für Holztechnologie und Faserbaustoffe (IHF). Am 9.Juni 1956 wurde das Haus als eine der ersten Forschungs- und Entwicklungseinrichtungen seiner Art in Europa übergeben (Foto links: Trautvetter 1956 / Bundesarchiv). Ab 1973 gehörte es der Vereinigung Volkseigener Betriebe Möbelindustrie an, ab 1980 zum Wissenschaftlich-Technischen Zentrum der holzverarbeitenden Industrie. Heute wird es von einem Trägerverein als gemeinnützige GmbH betrieben. Zum Institut gehören verschiedene Labors, Forschungsräume und Werkstätten für die Entwicklung neuartiger Materialien auf der Basis des Rohstoffes Holz. Im hinteren Teil des Grundstücks entstanden dafür Werks- und Versuchshallen. An der Fassade des Hauptgebäudes finden sich einige künstlerisch gestaltete Relieftafeln. Die Holzstelen vor dem Haus (Foto: Wikipedia / SchiDD) wurden 2012 von Kerstin Vicent geschaffen. Nr. 26-30b:Das zur Gemarkung Zschertnitz gehörende Grundstück zwischen Heinrich-Greif-Straße und Paradiesstraße war ab ca. 1900 Standort dreier Handelsgärtnereien. Die Betriebe gehörten um 1930 Moritz Hirschfeld (Nr. 26), May Tümpler (Nr. 28) und Reinhold Schwarzbach (Nr. 30). 1945 richteten Bomben erhebliche Schäden an und zerstörten auch das Eckhaus an der Paradiesstraße. Trotzdem existierten die Gärtereien weiter und mussten erst 1970 dem Bau des U-förmigen Neubaublocks an dieser Stelle weichen. Drude-Bau (Nr. 40): Das Gebäude wurde zwischen 1950 und 1952 für die Fakultät Biologie der Technischen Universität errichtet (Foto: Fotothek). Die Planungen stammen von Walter Henn, Fritz Schaarschmidt und Karl Wilhelm Ochs. An der Fassade befindet sich über dem Haupteingang ein Flachrelief vom Reinhold Langner. Der in traditioneller Ziegelbauweise errichtete Bau erhielt 1953 seinen Namen nach dem TH-Professor für Botanik und zeitweisem Rektor Prof. Oscar Drude. Im Inneren des heute vom Institut für Hydrobiologie genutzten Gebäudes sind Labors und Büroräume untergebracht, zudem gibt es einen kleinen Hörsaal. Studentenwohnheime (Nr. 41 - 41d): Die zweigeschossigen Gebäude zwischen Wundt- und Teplitzer Straße entstanden ab 1952 als erste Wohnheimbauten der Technischen Hochschule nach 1945 und stehen wegen ihrer historischen und architekturgeschichtlichen Bedeutung unter Denkmalschutz. Die Entwürfe für diese Gebäudegruppe stammen von Heinrich Rettig, der die Häuser als einfache Putzbauten errichten ließ. An den zum Zelleschen Weg zeigenden Giebelfeldern befinden sich Sgraffitti mit Darstellungen aus dem Studenten- und Wissenschaftsalltag. Schöpfer dieser Bilder war der Dresdner Künstler Johannes Beutner (1890-1960). 1997 begann die Sanierung der Wohnheime, die heute vom Studentenwerk Dresden vermietet werden. Insgesamt stehen hier ca. 300 Plätze zur Verfügung.

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Die Zwickauer Straße wurde auf Plauener Flur bereits Mitte des 19. Jahrhunderts angelegt und ab 1856 Falkenstraße genannt, da sich hier einst eine Falknerei des sächsischen Hofes befand. Um die parallel verlaufende stark frequentierte Chemnitzer Straße zu entlasten, entschloss man sich 1873 zum Ausbau dieser Straße in Richtung Stadtzentrum. Gleichzeitig nahm sie die teilweise vom Mühlenbesitzer Bienert finanzierte Hauptschleuse für die in Plauen anfallenden Abwässer auf. Nach Abtragung des ehemaligen Pfarrgutes in Altplauen begann 1881 die Bebauung der Straße mit Wohnhäusern. Da das Areal zwischen Chemnitzer Straße und Bahnlinie 1878 als Gewerbegebiet ausgewiesen worden war, siedelten sich an der Falkenstraße zahlreiche Industriebetriebe an. Bekannte Unternehmen waren u.a. die Firmen Kynast (Süßwaren), Riedel & Engelmann (“Schwerter”-Schokolade), Koch & Sterzel (Röntgentechnik) Richard Greiling (Zigaretten), Seelig & Hille (“Teekanne”) sowie die Chemische Fabrik Karl August Lingners. Weitere Flächen nutzte die Sächsische Staatsbahn für ihr Bahnbetriebswerk Dresden-Altstadt. Um den Warentransport zu erleichtern, wurde die Straße ab 1902 ausgebaut und verbreitert. In diesem Zusammenhang trug man auch die Erhebung des Hahnebergrückens ab. Mit der Eingemeindung Plauens wurde die Falkenstraße am 1. Januar 1904 in Zwickauer Straße umbenannt. Obwohl vor allem im unteren Teil erhebliche Zerstörungen durch die Bombenangriffe von 1945 zu verzeichnen waren, blieb das Areal an der Zwickauer Straße auch in der Nachkriegszeit wichtiges Industrie- und Gewerbegebiet. Erwähnenswert sind u. a. die Bau Union Süd (später VEB Autobahnbaukombinat) im Gebäude der ehemaligen Firma “Teekanne”, die “Tabak-Uni” (bis 1945 “Universelle”) als Hersteller von Zigarettenmaschinen sowie weitere Betriebe des Maschinenbaus und der Nahrungs- und Genußmittelindustrie. Nach 1990 stellten die meisten dieser Unternehmen die Produktion ein. Die Gebäude dienen heute als Domizil klein- und mittelständischer Unternehmen, als Bürohäuser und Einkaufsmärkte. Das in der Nähe der Nossener Brücke gelegene Bahnbetriebswerk ist seit einigen Jahren beim “Dampflokfest” alljährlich Anziehungspunkt für Eisenbahnfreunde. Unweit des Geländes befindet sich im Wohnhaus Zwickauer Straße 135 die originelle Kneipe “Die Schachtel”, welche ebenfalls mit Eisenbahnutensilien ausgestaltet ist. Unternehmen auf der Zwickauer Straße vor 1945 J. G. Kynast (Süßwaren, Russisch Brot) Richard Greiling (Zigaretten und Tabakwaren) Riedel & Engelmann (“Schwerter”-Schokolade) Seelig & Hille (“Teekanne”- Teebeutel, Spezialmaschinen) Koch & Sterzel (Röntgengeräte) Odol-Werke Lingner (Mundwasser, Pharmazieprodukte) Universelle (Zigaretten - und Verpackungsmaschinen) Brotfabrik Schlüter (Backwaren) Fa. Louis Hermann Fa. Willi Hiller Fa. Max Lösch Fa. Würker (Strickautomaten) Bahnbetriebswerk Dresden-Altstadt Cigarettenfabrik “Helios” Teekanne: Das Gebäude auf der Zwickauer Straße 27 beherbergte bis 1945 den Stammsitz der Firma Seelig & Hille, die hier unter dem Markennamen “Teekanne” Teebeutel und Verpackungsmaschinen herstellte. Der nach dem Zweiten Weltkrieg enteignete Betrieb wurde 1948 nach Radebeul verlegt. Das als einer der wenigen Industriebauten der Zwickauer Straße weitgehend unbeschädigte Gebäude war zu DDR-Zeiten Sitz der Bau Union Süd GmbH (später zeitweise VEB Autobahnbaukombinat - Betrieb Brückenbau). Nach dem Konkurs des zuletzt zum österreichischen Maculan-Konzerns gehörenden Betriebes nutzen heute verschiedene kleinere Firmen das Haus. Seifenfabrik Emil Lötzsch: Das Unternehmen entstand Ende des 19. Jahrhunderts und ist 1898 als Dampfseifenseifenfabrik Emil Lötzsch im Handelsregister verzeichnet. Der Firmensitz befand sich auf der Zwickauer Straße 36/38. Hergestellt wurden verschiedene Reinigungsmittel, die man unter dem Markennamen "Dresdo" verkaufte. Auf der I. Internationalen Hygieneausstellung 1911 erhielt die Firma für eines ihrer Produkte eine Goldmedaille. Auch nach 1945 blieb die Firma als Privatbetrieb bestehen. Alleiniger Gesellschafter auf Lebenszeit war ab 1946 Friedrich Heinrich August Schmidt. Ab 1947 lautete die offizielle Firmierung "Emil Lötzsch - Gesellschaft mit beschränkter Haftung - DRESDO-Seifenwerk". Hergestellt wurden neben Seife und Waschmittel, u.a. das Vollwaschmittel "dress". Wie viele andere Unternehmen wurde die Firma 1972 verstaatlicht und stellte später ihre Produktion ein. Koch & Sterzel: Die Firma auf der Zwickauer Straße 42 wurde am 1. Oktober 1904 vom Techniker Franz Joseph Koch und dem Chemiker Karl August Sterzel gegründet und entwickelte sich bis zum Ersten Weltkrieg zu einem der führenden Hersteller elektrotechnischer Anlagen in Deutschland. In enger Zusammenarbeit mit der damaligen Technischen Hochschule spezialisierte sich das Unternehmen auf Prüf- und Hochspannungstechnik sowie auf die Herstellung von Röntgengeräten. 1920 erfolgte die Umwandlung zur Aktiengesellschaft. Da die Räumlichkeiten an der Zwickauer Straße nicht mehr ausreichten, erwarb das Unternehmen zwei Jahre später das Gelände des früheren Kaditzer Flugplatzes und errichtete hier moderne Produktionsstätten für die Transformatorenherstellung. Im Betriebsteil Zwickauer Straße wurden nun bis zur völligen Zerstörung 1945 ausschließlich Röntgenapparate hergestellt. Aus dem Kaditzer Betriebteil ging 1948 das Transformatoren- und Röntgenwerk hervor. Universelle: Die Firma wurde im 19. Jahrhunderts vom Ingenieur Otto Bergsträsser und dem Kaufmann Max Klinge als Spezialhersteller für Zigaretten- und Verpackungsmaschinen gegründet. 1880 erfolgte hier der Bau der ersten deutschen Zigaretten-Strangmaschine nach einem Patent Bergsträssers. Nachdem der ursprüngliche Firmensitz auf der Rosenstraße zu klein geworden war, verlegte man das Werk 1898 auf die Zwickauer Straße 48-54. Nach Vereinigung mit der 1897 gegründeten “United Cigarette Machine Compagnie” (1930) und der Dresdner Firma “Progreß” (1935) firmierte das Unternehmen bis 1945 unter dem Namen “Universelle”. Hergestellt wurden Spezialmaschinen für die Tabakbe- und -verarbeitung, Mundstück-Zigarettenmaschinen, Rohtabak-Mischanlagen sowie Röst- und Schneidemaschinen. Nach Beseitigung von Kriegsschäden erfolgte die Umwandlung in einen volkseigenen Betrieb, der bis 1990 als VEB Tabak- und Industriemaschinenbau (“Tabak-Uni”) Maschinen für die Zigarettenindustrie produzierte. Später nutzten verschiedene Gewerbebetriebe den ausgedehnten Gebäudekomplex. Eine Sanierung für eine künftige Nutzung als Gründer- und Gewerbezentrum ist für 2017/18 geplant. Zigarettenfabrik Greiling: Die mit ca. 4000 Angestellten zu den größten Dresdner Zigarettenherstellern gehörende Firma Richard Greiling erwarb nach dem Ersten Weltkrieg ein Areal zwischen Zwickauer, Nossener und Eisenstuckstraße und ließ sich hier 1926/27 ein modernes Büro- und Verwaltungsgebäude errichten. Der im Bauhausstil gestaltete Bau mit einem zwölfstöckigen Turm entstand nach Plänen von M. Krautschick und nahm neben Produktions- und Lagerräumen auch eine werkseigene Druckerei und die Kartonagenherstellung auf. 1934 wurde hier die erste Filterzigarette der Welt hergestellt. Beim Luftangriff wurde das Gebäude zu 85 % zerstört, konnte jedoch bis 1947 notdürftig wiederhergestellt werden. Nach Verstaatlichung kam der Betrieb als Zweigwerk zum VEB Vereinigte Zigarettenfabriken und diente noch bis 1990 als Importlager. Trotz ihrer architektonischen Bedeutung und Einsprüchen der Denkmalpflege ließen die neuen Besitzer die Bauten 1998 abbrechen. Bahnbetriebswerk Dresden-Altstadt: Das Bahnbetriebswerk Dresden-Altstadt wurde 1872 als “Heizhausanlage” für die kurz zuvor verstaatlichte Albertbahn angelegt. Auf dem Gelände des Altstädter Güterbahnhofes entstanden ausgedehnte Abstellanlagen für Lokomotiven und Wagen, vier Lokschuppen mit Drehscheiben sowie Werkstätten für kleinere Reparaturen. Seit 1896 gab es hier auch ein Gaswerk der Firma Pintsch zur Erzeugung des für die Innenbeleuchtung der Personenwaggons erforderlichen Ölgases. Hinzu kamen Kohlelagerplätze und Beschickungs- und Verladeeinrichtungen. Die Anlagen des später als Bahnbetriebswerk Dresden-Altstadt bezeichneten Betriebes wurden mehrfach an den Bedarf angepasst. So erfolgten Erweiterungen der Lokomotivschuppen sowie 1926 der Bau einer Werkstatt mit Hebebühne. Bis zu 120 Dampflokomotiven aller gängigen Baureihen waren zeitweise im Bw Dresden-Altstadt beheimatet. Am 17. April 1945 fielen große Teile des Bahnbetriebswerkes, darunter auch die Lokschuppen 2 und 3 den Bomben zum Opfer. Die verbliebenen Gebäude und Gleisanlagen wurden repariert und noch bis 1967 als eigenständiger Betrieb genutzt. Mit der Zusammenlegung aller Dresdner Bahnbetriebswerke und dem letzten planmäßigen Dampflokeinsatz am 24. 9. 1977 verlor das Werk an Bedeutung. Stattdessen nutzte man die historischen Gebäude als Depot und Werkstatt für die historischen Eisenbahnfahrzeuge des Dresdner Verkehrsmuseums. Heute hat hier das Eisenbahnmuseum sein Domizil. Regelmäßig findet auf dem Areal das Dampflokfest der IG Bahnbetriebswerk Dresden-Altstadt statt (Fotos) . 2006 entstand auf dem Gelände eine modernen Wartungs- und Reinigungshalle für Regionalzüge der Deutschen Bahn AG. Firma J. G. Kynast: Die 1886 gegründete Firma wurde vor allem als Hersteller von Schokolade der Marken “Amles” und “Mein Ideal” bekannt. Zum Produktionsprogramm gehörten außerdem Fondant, Pfefferminzbonbons, Ostereier, Pralinen, Zuckerstreusel und andere Süßigkeiten. Eine besondere Spezialität war “Russisch Brot”. 1945 fielen die Betriebsgebäude auf der Zwickauer Straße 72/74 den Bomben zum Opfer. Trotzdem gelang es, die Produktion eingeschränkt wieder aufzunehmen. 1953 erfolgte die Verstaatlichung des Unternehmens und seine Eingliederung in den VEB Dresdner Süßwarenfabriken “Elbflorenz”. Milchkuranstalt Sanitas (Nr. 74/76): Auf diesem Grundstück hatte bis ca. 1935 die Milchkuranstalt "Sanitas" ihren Sitz. Das Unternehmen war 1883 von Max Winkler gegründet worden und besaß mehrere Filialen in der Stadt. Zum Areal in der Nähe der Nossener Brücke gehörte 1907 eine Stallanlage für Milchkühe und ein Rundstall, um den sich die zum Unternehmen gehörigen Arbeitsräume sowie ein Kranken- und Quarantänestall gruppierten. Hergestellt wurde keimfreie Kur- und Kindermilch, die vor allem als Ersatznahrung für Säuglinge verkauft wurde. Der gute Ruf der Anstalt zeigte sich in der Ernennung Winklers zum königlichen Hoflieferanten. Nach dem Tod Winklers wurde die Firma geschlossen und die Räume bis zur Zerstörung 1945 vermietet. Schokoladenfabrik Riedel & Engelmann: Das Unternehmen wurde im September 1888 auf der Rosenstraße gegründet und gehörte zu den einst zahlreichen Dresdner Schokoladenherstellern. Eigentümer der “Chocoladen- und Zuckerwarenfabrik” waren Oswald Heinrich Riedel und Karl Rudolf Engelmann. 1890 erfolgte die Verlegung des Betriebes in die damals noch selbstständige Gemeinde Plauen. Die unter dem Markennamen “Schwerter-Schokolade” produzierende Firma auf der Zwickauer Straße 118 stand 1902 mit 113 Arbeitern an sechster Stelle der örtlichen Industrie und wurde 1912-16 nochmals erweitert. Das Recht auf Führung der sächsischen Kurschwerter als Markenzeichen war den Inhabern bereits kurz nach Firmengründung vom sächsischen Königshaus verliehen worden. Nach dem Tod der beiden Inhaber 1910 bzw. 1915 übernahmen Prokuristen die Führung des Unternehmens, welches formal den minderjährigen Töchtern der Firmengründer gehörte. Allerdings kam es nach dem Ersten Weltkrieg zu Unregelmäßigkeiten in der Geschäftsführung und wirtschaftlichen Problemen und schließlich zum Konkurs der Firma 1935. Im Anschluss wurde das Unternehmen an die Kaufleute Walter Knaack und Max Hensel verkauft und blieb bis 1972 in Privatbesitz. Hergestellt wurden u.a. Bonbons, Marzipan und Schokoladenstreusel. 1972 kam das Werk als Betriebsteil zum VEB Dresdner Süßwarenfabriken “Elbflorenz” und stellte 1974 die Schokoladenproduktion ein. Zuletzt wurden bis 1989 nur noch Schokostreusel gefertigt. Das erhaltene Hauptgebäude dient nach seiner Sanierung heute als “Schwerter Bürohaus” (Foto).

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Die Wildbergstraße geht als kurze Sackgasse von Am Urnenfeld ab und verläuft parallel zur Eisenbahnstrecke. Das war 1905 der Anlass, sie mit Bahnstraße zu benennen. Die in Cotta ebenfalls vorhandene Bahnstraße führte in Stetzsch nach der Eingemeindung zum Umbenennen in Wildbergstraße. Das erfolgte am 19. Februar 1926 und bezog sich auf den Ort Wildberg, der heute zu Klipphausen gehört .

Karl Enderlein (1872 Leipzig - 1956 Dresden). Deutscher Maler und Grafiker, eigentlich Ewald Max Karl Enderlein. Lithografenlehre und Besuch der Dresdner Akademie. Lehrer an der Königlichen Kunstgewerbeschule Dresden. Zahlreiche Ausstellungen in Dresden, Düsseldorf und Leipzig. Für den Verlag J.J. Schreiber-Eßlingen entstand das Bilderbuch "Riesen und Zwerge".

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Die Wilder-Mann-Straße war ursprünglich ein Fahrweg, der vom alten Dorf Trachau in Richtung des Weingutes "Wilder Mann" führte. Da man in früheren Zeiten entlang des Weges das Vieh in den Wald trieb, wurde er auch als die Triebe bezeichnet. In der 1880er Jahren wurde der Weg wegen seiner Richtung nach dem Jagdschloß Moritzburg mit Moritzburger Straße benannt. Seit 1902 trägt die Straße ihren heutigen Namen nach dem früheren Ortsteil "Wilder Mann" von Trachenberge. . Zu der Zeit gab es in der Leipziger Vorstadt bereits eine Moritzburger Straße. Große Teile der Straße gehören zum Erhaltungsgebiet der Gaslaternen. Ansicht „Wilder-Mann-Straße” auf openstreetmap.org Adressen Nr. 11/13, Hintergebäude: bis etwa Ende des Ersten Weltkrieges „Dresdner Werkzeugmaschinen-Fabrik Carl Auerbach & Sohn“ ; etwa 1917 bis 1929 Produktionsstätte von Melitta Bentz („Fabrikation von Filtrierpapier“) ; bis 2015 Kindertagesstätte „Kinderhaus Wilma“ (Kindergarten und Schulhort) mit pädagogischem Konzept der Freinet-Pädagogik , geschlossen wegen nicht ausreichendem Brandschutz und zu geringer Außenspielfläche Nr. 12/Ecke Industriestraße: Kleingartensparte „Zur neuen Hoffnung“ Nr. 15: Wohnung von Melitta Bentz und Ehemann Hugo (Kaufmann); im Hintergebäude während des Ersten Weltkrieges Produktionsstätte von Melitta Bentz' Kaffeefiltern Nr. 29: ehemalige Hörmann-Villa

Einzeldenkmale der Sachgesamtheit Rittergut Niederpoyritz: Remise und Lagergebäude (Nr. 5), Brauerei (Nr. 7) und Mälzerei (Nr. 9); Gebäude werden heute anderweitig genutzt, architektonisch beeindruckende Zweckbauten aus dem zweiten Viertel des 19. Jahrhunderts, baugeschichtlich bedeutend, zudem als Teile des einstigen Rittergutes ortshistorisch von Belang

Die Wilhelm-Busch-Straße gehört zu den Straßen, die bereits bei der Erstbenennung von Straßen in Mockritz einen Namen erhielten. Seit 1906 stand sie als Carolastraße im Adressbuch. Damals gab es nur ein Haus nahe der heutigen Zschertnitzer Straße. Nach und nach wurde sie weiter nach Süden hin bebaut. Nach den Eingemeindungen von 1921 gab es die Carolastraße mehrfach. Nur die Carolastraße nahe dem Hauptbahnhof blieb übrig (heute der südliche Teil der Reitbahnstraße). In Mockritz wurde die Straße umbenannt in Wilhelm-Busch-Straße nach dem Dichter und Zeichner Wilhelm Busch (1832–1908) .

Emil Rudolf Weiß (auch Weiss, * 12. Oktober 1875 in Lahr, Baden; † 7. November 1942 in Meersburg) war ein deutscher Typograf, Medailleur, Grafiker, Maler, Lehrer und Dichter.

Die Wilhelm-Bölsche-Straße in Meußlitz war im Bebauungsplan die Planstraße T und erhielt ihre Erstbenennung Josefinenstraße auf der Gemeinderatssitzung vom 7. Februar 1901. Teilweise war die Schreibweise auch Josephinenstraße. Zur Namensgeberin ist in den Unterlagen nichts vermerkt. Mit dem 1. Mai 1928 erfolgte die Umbenennung in Wilhelm-Bölsche-Straße nach Wilhelm Bölsche, Schriftsteller, Naturphilosoph, geboren 2. Januar 1861 in Köln, gestorben 31. August 1939 in Oberschreiberhau .

In Klotzsche wurde die Körnerstraße ab 30. September 1953 mit Zur Kurwiese bezeichnet

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Die Wilhelm-Franz-Straße besteht seit 1901. Sie wurde benannt nach Wilhelm Franz (1819–1903), der in Cotta einige Zeit als Gemeindevorstand, dann als Gemeindeältester wirkte. Er war der einzige Ehrenbürger von Cotta .

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Die Wilhelm-Külz-Straße ist Teil der alten Straße von Rähnitz über Hellerau nach Klotzsche. Sie wurde seit 1910 Klotzscher Straße genannt. Diese Straße führte in westlicher Richtung weiter durch Rähnitz bis zur Radeburger Straße. Mit dem Bau der Autobahn A4 änderte sich die Straßenführung. Die alte Straße aus Richtung Klotzsche endete vor der Autobahn. Die weitere Verbindung nach Rahnitz führte über den Lausaer Weg (damals noch der Brunnenweg) zum Moritzburger Weg und dann über die Autobahn. Der Abschnitt östlich der Autobahn wurde um 1950 umbenannt in Wilhelm-Külz-Straße nach dem Politiker Wilhelm Külz (1875-1948). Im Februar 1993 wurde die Boltenhagener Straße bis zum Moritzburger Weg verlängert. Der Name Wilhelm-Külz-Straße bezieht sich seitdem nur noch auf das westliche Stück vom Lausaer Weg bis an die Autobahn . Der Teil der alten Klotzscher Straße westlich der Autobahn ist heute die Ludwig-Kossuth-Straße.

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Gustav Richard Martin war ein Baumeister, der im Dresdner Nordwesten lebte und wirkte. Das Innungsmitglied der Dresdner Baumeister Gustav Richard Martin, am 23. Januar 1863 in Meerane geboren, hatte Anfang der 1890er Jahre in der Vorortgemeinde Pieschen (wohnhaft Moltkestraße 2a; die 1892 nach dem preußischen Generalfeldmarschall und Heerführer Helmuth Karl Bernhard Graf von Moltke benannte Moltkestraße trägt seit dem 1. Juli 1946 den Namen des Antifaschisten Robert Matzke) eine kleine Baugewerke-Firma gegründet, die er 1898/99 im Zusammenhang mit seinem Umzug ins eigene Wohnhaus auf die Gartenstraße 5 in Mickten verlegte. Seit der Eingemeindung Micktens nach Dresden (1903) trägt die Gartenstraße den Namen Tichatscheckstraße und das mehrstöckige Haus die Nummer 14. Im Geschäftsjahr 1896/97 war Gustav Richard Martin stellvertretender Schriftführer des „Königlich-Sächsischen Militär-Vereins“ Pieschen und von 1900 bis 1902 Mitglied des Micktner Gemeinderates. In den Jahren ihres Bestehens errichtete die Firma Martin im Dresdner Nordwesten neben Schulhäusern (u.a. Aufstockung der ersten Trachauer Schule 1893, Schulturnhalle in Dresden-Übigau 1899, Schulhaus und Turnhalle der 41. Volksschule in Dresden-Mickten 1898/99) und mehrgeschossigen Wohnhäusern (z. B. Alttrachau 48) auch Gesellschaftsbauten. So konnte am 2. Oktober 1898 die Bauherrin des heutigen „Ballhaus Watzke“, Frau Wilhelmine Watzke, aus den Händen des Baumeisters Gustav Richard Martin den Schlüssel für das neue „Balletablissement“ entgegennehmen, das seine Firma nach dem Entwurf des Architekten Benno Hübel (1876–1926) in nur fünf Monaten an der Stelle des alten, ländlichen Restaurants errichtet hatte. Auch der Saalneubau sowie diverse An- und Umbauten, die der damalige Grundstückseigentümer und Gastwirt Heinrich August Werner zwischen 1895 und 1898 am Trachauer Gasthof „Zum Goldenen Lamm“, heute Sitz der Freien evangelischen Gemeinde Dresden, vornehmen ließ und die das Gebäude im Wesentlichen zu dem machte, wie es sich uns heute noch zeigt, wurden von der Baufirma Martin ausgeführt. Baumeister Gustav Richard Martin, beeideter Grundstücksschätzer sowie Sachverständiger für das Amtsgericht Dresden und Bruder der gerechten und vollkommenen St. Johannis Freimaurerloge „Zu den ehernen Säulen“ in Dresden, starb am 6. Oktober 1935. Er wurde an der Seite seiner Ehefrau Maria Selma, geb. Burkhardt (1865–1911) auf dem Markusfriedhof in Dresden-Pieschen beigesetzt. Die Grabstätte im Jugendstil gehört zu den denkmalgeschützten Bauwerken auf Dresdner Friedhöfen.

Die Wilhelm-Liebknecht-Straße war auf dem Stadtplan von 1913 eine unbebaute Straße, die damals als Oststraße bezeichnet wurde. Nach dem Bau der Eisenbahnunterführung (siehe Moränenende) war sie die direkte Verbindung von Reick nach Leuben. Geschichte In einer Akte von 1903 wird auf den Bau der Straßen "E und XI (Oststraße und Dobritzer Straße)" verwiesen (also die heutigen Wilhelm-Liebknecht-Straße und Moränenende). Erst 1929 erhielt die Straße ihre offizielle Benennung Wilhelm-Liebknecht-Straße, nach Wilhelm Liebknecht, soz.-dem. Politiker, geb. 29. März 1826 in Gießen, gest. 7. August 1900 in Charlottenburg, Führer der dt. und internat. Arbeiterbewegung). In der NS-Zeit erhielt auch sie einen anderen Namen: ab 1933 Bauriedlstraße, nach Andreas Bauriedl, gefallen am 9. November 1923 vor der Feldherrenhalle in München. 1945 wurde die Straße zunächst umbenannt in Liebknechtstraße und mit Beschluss vom 15. August 1962 rückbenannt in den früheren Namen Wilhelm-Liebknecht-Straße. Die Straße gehört größtenteils zu Reick. Kurz vor der Einmündung in die Breitscheidstraße beginnt die Dobritzer Flur.

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Die Wilhelm-Müller-Straße ist die östliche der drei Leutewitzer Querverbindungen zwischen der Warthaer Straße und Am Lehmberg. Zwischen ihr und der parallel verlaufenden Herweghstraße verläuft die Flurgrenze zu Briesnitz. In westliche Richtung gesehen steigt das Gelände an. Das wird wohl der Grund gewesen sein für die ursprüngliche Benennung mit Hohe Straße (Schreibweise damals Hohestraße) um 1900. Die in der Südvorstadt vorhandene Hohe Straße führte nach der Eingemeindung von Leutewitz zur Umbenennung in Wilhelm-Müller-Straße nach dem Dichter Wilhelm Müller (mit Beschluss vom 19. Februar 1926) .

Die Wilhelm-Raabe-Straße verbindet bereits seit Ende der 1890er Jahre die Warthaer Straße mit Am Lehmberg. Am 31. Mai 1897 wurde sie nach dem Fürsten Otto von Bismarck mit Fürst-Bismarck-Straße benannt. Zur 1921 erfolgten Eingemeindung von Briesnitz gab es in der Südvorstadt bereits eine Bismarckstraße (die heutige Bayrische Straße). Deshalb erfolgte in Briesnitz die Umbenennung nach dem Dichter und Romanschriftsteller Wilhelm Raabe (1831–1910) . Adressen Nr. 22 und 24: Neubau von zwei fünfgeschossigen Mehrfamilienhäusern durch Eisenbahner-Wohnungsgenossenschaft (Planung: Architekturbüro L10, Bau: Baufirma Gottlob Rommel); erster Spatenstich am 15. März 2016; zuvor knapp 80 Jahre lang Brache; bis 1937 Ziegelei Maximilian Noetzold; 1979 ging Grundstück in Besitz des EWG-Vorgängers Briesnitzer Genossenschaft über

Hennigsdorfer Str. 21: Fabrikanlage; monumentaler Komplex an der Straße des 17. Juni aus mittlerem Ursprungsbau der Mälzerei (um 1885), an der Ecke zur Reisstraße gelegener erster und zweiter Erweiterung (1895 und 1897–1898) sowie der dritten Erweiterung im Osten (1914–1916), Ursprungsbau mit Mälzereigebäude und zwei Darren an der Eisenbahnstrecke sowie im rechten Winkel angebauter Tenne mit Giebel zur Straße des 17. Juni, zweite und dritte Erweiterung mit Vordergebäude für Maschinenstube, Kesselhaus, Lager und verschiedene Aufbereitungsräume sowie rückwärtigem Flügel (an der Reisstraße) für Malztennen, Quell- und Ausweichräume usw., die dritte und jüngste Erweiterung mit Malzsilo, mehrgeschossiger Putzerei, Kohlensilo, Darren sowie markanten Abluftschornsteinen und rückwärtigem Anbau für Gerstenböden, Tennen und Weichhaus, einer der bauv industriegeschichtlich sowie städtebaulich bedeutendsten hiesigen Fabrikbauten um 1900, letzte authentisch erhaltene Malzfabrik von Dresden, neben Industriegelände an der Königsbrücker Straße beeindruckendste Fabrikkomplex der Landeshauptstadt

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Die Wilhelm-Weitling-Straße war früher ein alter Kommunikationsweg von Zschieren nach Laubegast. 1882 wurde der Weg mit Communicationsweg nach Laubegast bezeichnet, 1894 als Zschieren-Laubegaster Weg. Danach wurde der Weg offensichtlich zur Straße ausgebaut und erhielt die Bezeichnung Carolastraße (taucht erstmals 1896 in Akten auf). Die Fortsetzung in Kleinzschachwitz ist das Kleinzschachwitzer Ufer. Mit der zunehmenden Motorisierung und insbesondere mit der Inbetriebnahme des Wostrabades 1930 nahm auch der Verkehr auf der Straße zu. In den Gemeindeunterlagen steht mit Datum 16. August 1932 folgende Bemerkung: "Durch das Bad Wostra in Zschieren hat der Autoverkehr auf unserer Carolastraße stark zugenommen. An Badesonntagen leiden die Anwohner dieser Straße durch den regen Autoverkehr unter der kolossalen Staubplage. Den eingegangenen Beschwerden müssen wir nachgehen ...". Das betrifft haupsächlich den Teil der Straße bis zur Fanny-Lewald-Straße, über die man direkt nach Dresden gelangte. 1945 oder 1946 wurde die Carolastraße umbenannt in Friedrich-Engels-Straße. Wegen vorhandener Straße gleichen Namens erfolgte zur Eingemeindung mit Beschluss vom 30. September 1953 die Umbenennung in Wilhelm-Weitling-Straße, nach Wilhelm Christian Weitling, Theoretiker des utop. Arbeitskommunismus, geboren 5. Oktober 1808 in Magdeburg, gestorben 25. Januar 1871 in New York . Adressen Nr. 20: Sektkellerei Max Dönitz KG Nr. 66: Ehemalige Schule Zschieren, 1886 errichtet, heute Kindertagesstätte

Die Wilhelm-Wolf-Straße in Pillnitz führt abgehend vom Pillnitzer Platz parallel zur Lohmener Straße in östlicher Richtung. Das erste Stück ist noch als Straße ausgebaut. In der Folge ist es nur noch ein unbefestigter Weg auf einem Damm. Dieses Wegestück gehört wohl auch zu dem früheren Schöpsdamm (siehe Bemerkungen unter Lohmener Straße) und wurde auch Dammweg genannt. Das Straßenstück erhielt als erste offizielle Bezeichnung König-Georg-Weg (zur Ehre des sachsischen Königs Georg). 1926 tauchte der Name erstmals im Adressbuch auf. Sicherlich erfolgte die Benennung schon eher, da ab 1922 üblicherweise die Vorsätze König, Kaiser und andere wegfielen. 1945 oder 1946 erfolgte die Umbenennung in Friedrich-Engels-Straße, nach Friedrich Engels. Im Jahr der Eingemeindung, 1950, gab es in Dresden bereits eine Friedrich-Engels-Straße, die 1991 wieder in Königstraße rückbenannt wurde. In Pillnitz erfolgte deshalb die Umbenennung in Wilhelm-Wolf-Straße, nach Wilhelm Wolff . Der Straßenname ist eigentlich nicht korrekt geschrieben.

8029 Postamt 29 Cossebauder Straße 3 8030 Postamt 30 Bunsenstraße 4 8021 Postamt 33 Bodenbacher Straße 120 8028 Postamt 34 Wiesbadener Straße 55 8038 Postamt 38 Kesselsdorfer Straße 127 8029 Postamt 39 Meißner Landstraße 125 8036 Postamt 41 Wilhelm-Koenen-Platz 1 8020 Postamt 42 Wilhelm-Franke-Straße 29 8021 Postamt 44 Tauernstraße 16 8045 Postamt 45 Zamenhofstraße 1 Leuben 8017 Postamt 47 Tögelstraße 6 8029 Postamt 49 Altomsewitz 16 8051 Postamt 52 Bautzner Landstraße 136

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Johannes Daniel Schreitmüller (* 23. Februar 1842 in Bruckberg bei Ansbach im Kreis Freising; † 30. Mai 1885 in Genthin) war ein deutscher akademischer Bildhauer. Johannes Daniel Schreitmüller war der Vater des Dresdner Bildhauers August Theodor Marquart Schreitmüller. Johannes Daniel Schreitmüller wurde in Bruckberg bei Ansbach im Kreis Freising geboren. Nach seinem Schulabschluss studierte er von 1861 bis 1865 an der Dresdner Kunstgewerbeschule. Später wurde er Professor und stellvertretender Direktor an der Kunstgewerbeschule in Dresden. Mit dem in Dresden wohnenden Historienmaler, Restaurator und Photographen Ermenegildo Antonio Donadini stand Schreitmüller in festem künstlerischen und freundschaftlichen Kontakt. Werke Porzellanfigur Frau im mittelalterlichen Kostüm sowie ein figuraler Tafelaufsatz Sandsteinfigur Minnesänger, Semperoper, Dresden Fassadenplastik am Wettiner Gymnasium, Dresden Figur für Schloss Linderhof in Bayern

Obere Mühle (Niederwartha) Wohnhaus mit angebauten Gewerbegebäude, Nebengebäude mit Uhrturm, Mühlenmodelle im Garten, Schauer, Mühlgraben sowie Mühlteich mit Überlauf und Wehr; Hauptgebäude der Mühle dient heute Wohnzwecken, Sägemühle bis heute sporadisch und elektrisch betrieben, 1842 als Mahl- und Schneidemühle errichtet, Gewerbegebäude mit verbrettertem Fachwerkobergeschoss,

Thiele Johann Alexander Hofmaler, Landschaftsmaler, -zeichner und -radierer * 26.3.1685 Erfurt † 22.5.1752 Dresden Nach einer fünfjährigen Lehre als Buchdrucker und einer Wanderschaft kam T. erstmals 1714 nach Dresden, um sich künstlerisch fortzubilden. Als Maler bisher nur Autodidakt, ließ er sich hier von Adam Manyoki und Christian Ludwig Agricola in der Landschaftsmalerei, von Franz de Paula Ferg in der Figurenmalerei und von dem Leipziger Bildnisstecher Johann Martin Bernigeroth im Radieren anleiten. Seit 1718 erhielt er Aufträge von Kurfürst Friedrich August I. (August II., der Starke), dessen Aufmerksamkeit er mit Ansichten aus dem Plauenschen Grund erregt hatte, Aufträge. Nach dem Tod seines Förderers Jacob Heinrich Graf von Flemming kehrte T. 1728 in seine Heimatstadt Arnstadt zurück, wo er bis 1738 als Hofmaler des Fürsten Günther I. (XLIII.) von Schwarzburg-Sondershausen tätig war. Am 3.11.1738 wurde er zum sächsischen Hofmaler ernannt und siedelte im Jahr darauf endgültig nach Dresden über. Seitdem empfing er für jährlich vier abzuliefernde Gemälde neben freier Wohnung das stattliche Gehalt von 1.000 Taler. T. wurde vom Premierminister Heinrich Graf von Brühl und vom Oberkämmerer Karl Heinrich von Heineken gefördert, die unter Kurfürst Friedrich August II. (August III.) die Kunstankäufe auswählten. Zu seinem Bekanntenkreis zählten Ismael Mengs, Anton Graff, Louis de Silvestre, Anna Maria Werner und Bernardo Bellotto. – Bereits 1730/31 hatte T. im Auftrag Friedrich Augusts I. „Das Zeithainer Lager“ gemalt. In diesem Gemälde schildert er großformatig das prunkhafte Manöver des gerade erst modernisierten, ca. 30.000 Mann starken sächsischen Heers. Hier wie in einigen weiteren Werken fügte sein ehemaliger Schüler Christian Wilhelm Ernst Dietrich die Figuren ein. Neben solchen Ereignisbildern, wozu auch „Das Saturnusfest im Plauenschen Grund“ sowie Darstellungen eines „Caroussel Comique“ (1722) im Dresdner Zwinger gehören, schuf T. Ansichten von Schlössern und Städten, jeweils eingebettet in einer erfundenen, meist barock-bewegten Vordergrundlandschaft, den sog. Prospekten. Dazu gehören Ansichten von Arnstadt, Sondershausen, Dresden, Leipzig, Bautzen, Görlitz, Freiberg, Meißen, Kassel, Braunschweig und Schwerin. Ein präzises und zugleich überhöhtes Bild der Elbtal-Landschaft vermitteln sechs großformatige radierte Prospekte von 1726 mit Darstellungen von Dresden, Meißen und Pirna mit der Festung Sonnenstein sowie der Pillnitzer Sommerresidenz, des Schlosses Moritzburg und der Festung Königstein. Damit befand sich T. in der Tradition der topografischen Zeichner und Kupferstecher wie Wilhelm Dilich oder Matthäus Merian. Außer den Prospekten malte T. eine Reihe frei erfundener Landschaften, die meisten in seiner Arnstädter Zeit 1728 bis 1738. Seine Vorbilder waren neben Claude Lorrain und Jacob van Ruisdael v.a. die sog. niederländischen Italianisanten wie Jan Both, Karel Dujardin, Philips Koninck, Herman Saftleven d.J., Nicolaes Berchem und Philips Wouwerman oder auch Salvator Rosa. – Insgesamt leistete T. einen wesentlichen Beitrag zur künstlerischen Erschließung deutscher Regionen in der ersten Hälfte des 18. Jahrhunderts. Der Forschung galt er sogar lange Zeit als der älteste deutsche Vertreter der sog. Prospekten- oder Ansichtenmalerei. Auch wenn er sich als Landschaftsmaler an den Darstellungsmustern des 17. Jahrhunderts orientierte, so fand er doch eine eigenständige Bildsprache, um thüringische, sächsische oder mecklenburgische Gegenden darzustellen und zugleich den natürlichen Raum in barock-theatralischer Weise umzuformen. Damit begründete er eine eigene Schule, aus der Dietrich, Christian Benjamin Müller, Johann Christian Vollerdt, Johann Gottlieb Schön und Johann David Friedrich hervorgingen. Seine künstlerische Stärke und Eigenart bewiesen sich darin, wie er überlieferte Sehmuster mit der realen Ansicht eines Naturausschnitts zu einem stimmigen Bild verschmolz. Natürliche Phänomene wie Dunst, Nebel, Licht oder Schatten wurden wie seine einfühlsamen Baum- und Waldschilderungen von seinen Nachfolgern zu Beginn des 19. Jahrhunderts aufgegriffen und für eine romantische Bildsprache fruchtbar gemacht. Seine Kompositionen wurden druckgrafisch und auf Porzellan reproduziert. Somit stand T. am Anfang der Entwicklung der Landschaftsmalerei von einer untergeordneten zu einer zentralen Bildgattung.

Die Wilischstraße in Tolkewitz wurde um 1890 gebaut. Anfangs wurde sie Dobritzer Straße genannt nach dem Nachbarort Dobritz. Mit Beschluss vom 16. September 1912 wurde sie umbenannt in Wilischstraße nach dem Wilischberg bei Kreischa.

Alaunplatz: Bereits 1765 war am Bischofsweg eine Alaunsiederei entstanden, die zu einer teilweisen Bebauung des Areals führte. Nach deren Abbruch wurde an gleicher Stelle 1841 ein Wachgebäude errichtet und ein Schießstand angelegt.

Karl August Großmann, auch Carl August Grosmann (* 1741 in Königsbrück; † um 1798) war ein Kupferstecher, Verleger und Radierer in Augsburg. Leben Karl August Großmann wurde 1741 in Königsbrück als Sohn eines Bediensteten des Königsbrücker Standesherrn August Heinrich von Friesen geboren . Karl Augusts Bruder war der 1737 in Königsbrück geborene Porzellanmaler in Meißen, Christian Gotthelf Großmann. Nach seiner Ausbildung zog Karl August Großmann nach Augsburg und heiratete dort am 27. August 1765 Anna Lydia Orting. Im September 1769 verstarb ihr neun Wochen alter Sohn Christian Friderich in Augsburg. Großmann starb gegen Ende des 18. Jahrhunderts, um 1798. Werk Seine Ausbildung erhielt Karl August Großmann in Dresden bei dem Stahlstecher und Königlichen Hofgraveur Johann Stephan Seeber. Zunächst arbeitete er als Goldgraveur in Dresden. Irgendwann ließ er sich in Augsburg nieder. Dort machte er mit seinen Kupferstichen von sich reden. Bekannt sind zum Beispiel seine sechzehn Stadtansichten Deutscher Städte oder die 1778 bis 1779 veröffentlichten Blätter im Württembergischen Kalender. Als Kupferstecher beherrschte er die zu seiner Zeit aufkommende Gestaltung „a la grecque“. Zu verstehen sind darunter Ornamente in Mäanderform, bekannt aus der griechischen Antike. Großmanns Buch „Neueste Schlosserarbeit“ erreichte kaum Beachtung. Als Verleger erhält er 1775 die Kramergerechtigkeit, das Privileg, für Kunst und Verlagshandel. Er gründete den Verlag Großmann in Augsburg und veröffentlichte Kunstdrucke. Die zwölf Stiche in Johann Martin Millers Bestseller „Siegwart, eine Klostergeschichte“ stammen ebenfalls von Karl August Großmann. Zu Großmanns Schülern zählen unter anderen der Kupferstecher Johann Müller aus Nördlingen , der Kupferstecher Carl Ernst Christoph Hess und der Miniaturmaler Johann Ludwig Stahl.

Die William-Shakespeare-Straße im Süden von Klotzsche wurde anfangs als Albertstraße bezeichnet zu Ehren des König Albert (seit ca. den 1890er Jahren). Wie auch die benachbarten Straßen erhielt sie nach 1945 einen neuen Namen. Sie wurde nach dem Chefredakteur der "Arbeiterstimme" und KPD-Mitglied Rudolf Renner (1894-1940) mit Rudolf-Renner-Straße benannt. Eine solche Umbenennung gab es zur gleichen Zeit in den Stadtteilen Löbtau und Cotta. Die dortige Rudolf-Renner-Straße behielt nach der Eingemeindung von Klotzsche ihren Namen, während in diesem neuen Stadtteil die Umbenennung in William-Shakespeare-Straße nach dem englischen Dramatiker, Schauspieler und Dichter William Shakespeare (1564–1616) erfolgte .

Alaunplatz: Stattdessen gab es auf der Fläche gelegentliche Gauklerfeste und Zirkusaufführungen. So gastierte im Frühjahr 1930 der bekannte Zirkus Knie für einige Tage auf dem Alaunplatz und zog hunderte Besucher an.

Die Williamstraße in Naußlitz verläuft von der Stollestraße über die Kesselsdorfer Straße bis zur Grillenburger Straße - der Teil rechts der Kesselsdorfer gehört zu Löbtau-Nord. Sie wurde 1872 durch den in Plauen wohnhaften Baumeister Ferdinand Fichtner angelegt und nach seinem älteren Sohn William benannt (der jüngere hieß Albert – siehe Roßweiner Straße). In der Nr. 8 befand sich zu DDR-Zeiten eine Stickerei des VEB Dienstleistungskombinat Dresden . In dem zweistöckigen Gründerzeithaus an der Ecke zur Kesseldorfer Straße, in dem heute ein Asia-Imbiss seine Gäste versorgt, befand sich zu DDR-Zeiten die Eckkneipe „Goldener Apfel“ (Gastwirt: Kurt Schneider). „Freilich, den [...] beinahe ausschließlich männlichen Dauergästen der Wirtschaft wäre nicht im Traum eingefallen, ihren Frauen zu verkünden: 'Ich gehe dann mal in den Goldenen Apfel'. Kein Löbtauer sagte das. Man ging 'zu Schneiders' oder war 'bei Kurt', dem Wirt, zu Gast.“ Montags war Ruhetag, die neuen Bierfässer wurden angeliefert und die leeren abgeholt. Gegenüber befand sich ein Milchladen. Ausgewählte Adressen Nr. 8 (bis etwa 1940 Nr. 4)/Ecke Kesselsdorfer Straße: vor Zweitem Weltkrieg Produktenhandlung Kießling, nach 1945 Lebensmittelgeschäft R. Wobat, später HO-Lebensmittel, in den 1970er/80er Jahren Textilstickerei des Dienstleistungskombinates, zur Wendezeit/Anfang 90er Jahre Geschäft leerstehend, 1993-94 Textilgeschäft Dahlmann, anschließend Laden und Wohnungen leerstehend, 1997 Dachstuhlbrand , etwa 2011 Sanierung Nr. 10: Kindergarten „Naußlitzer Gartenkinder“; von März 2013 bis Juni 2014 Ersatzneubau errichtet; Rohdecan-Architekten Nr. 12: Sportanlage und Vereinsräume des FV Hafen und der Löbtauer Kickers

Die Wilmsdorfer Straße liegt in einer Siedlung, die ab Ende der 1920er Jahre im Süden von Leubnitz-Neuostra entstand (westlich der Goppelner Straße). Ab 1938 wird die Straße im Adressbuch geführt. Der Name bezieht sich offensichtlich auf den weiter südlich liegenden Ort Wilmsdorf, der jetzt zu Bannewitz gehört.

Heinrich Friedrich August Karl Freiherr von Dörnberg (* 8. Februar 1831 in Siegen; † 8. Januar 1905 in Dresden) war ein deutscher Historienmaler der Düsseldorfer Schule. Heinrich war ein Sohn des Oberforstmeisters Karl von Dörnberg (1796–1873) und dessen Ehefrau Emma, geborene von Rohr (1802–1877). Seine Brüder Hermann und Ferdinand schlugen eine Militärkarriere in der Preußischen Armee ein und brachten es zum Generalleutnant. Ein weiterer Bruder, Albert von Dörnberg, wurde preußischer Beamter und Mitglied des Abgeordnetenhauses. Dörnberg schrieb sich im Jahr 1849 als Student an der Kunstakademie Düsseldorf ein. Bis 1855 unterrichteten ihn Wilhelm von Schadow (1. Malklasse), Karl Ferdinand Sohn (Vorbereitungsklasse, 2. Malklasse) und Karl Josef Ignatz Mosler (Kunstgeschichte). Während des Studiums freundete sich Dörnberg mit dem angehenden Historienmaler Otto Knille an. Als dieser nach einem Studium in Paris bei Thomas Couture seit 1854 in München weilte, um sich unter Karl von Piloty zu vervollkommnen, lebte Dörnberg zeitweise mit Knille in dessen Gartenwohnung an der Schwanthaler Straße 49 in der Ludwigsvorstadt. Im Mai 1857 begegnete er dort dem Dichter Hermann Allmers, zu dessen engen Künstlerfreunden er sich fortan zählte. Dörnberg lebte eine Zeit lang als Schüler von Julius Schrader in Berlin, wo er seit 1860 an akademischen Kunstausstellungen teilnahm. Am 24. April 1873 heiratete er dort Antonie Walter (1849–1874), die bereits am 24. März 1874 in Dresden verstarb, wenige Tage nach der Geburt des Sohnes Julius Anton Alexander (1874–1945). 1877 hielt sich Dörnberg in Rom auf. Am 2. Februar 1887 heiratete er in Bochum seine zweite Ehefrau, Wanda Kubale (1833–1908). Diese Ehe blieb kinderlos. Das Paar lebte zuletzt in der Leubnitzer Straße 3 der Dresdner Südvorstadt, in einer Villa des Schweizer Viertels. Dörnberg war Mitglied des Düsseldorfer Künstlervereins „Malkasten“. Werke Im Hause des Dichters Hermann Allmers in Rechtenfleth schuf Dörnberg zusammen mit seinem Freund Knille 1864 im heute „Marschensaal“ genannten Raum Wandgemälde zur Geschichte der Marschen (Die Landung der Römer in den Marschen, Die Einführung des Christentums durch den Bischof Wilhardus von Bremen, Die Schlacht bei Altenesch und Die Sturmflut). Dazu illustrierte Dörnberg zwischen 1864 und 1874 in einem Bilderfries aus Grisaillen Allmers’ Gedichtzyklus Historische Marschenbilder. Für die evangelisch-lutherische Kirche Maria am Wasser in Dresden-Hosterwitz malte Dörnberg die heute nicht mehr erhaltende Darstellung eines auferstandenen Jesus.

xx mitglieder

Die Wilschdorfer Straße erhielt ihre Benennung gemeinsam mit weiteren Straßen in dem Wohngebiet am 12. Mai 1927. Benannt wurde die Straße nach dem Ort Wilschdorf, der jetzt ein Ortsteil von Dresden ist .

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weiter

Bild Name des Rathauses Adresse des Rathauses Nutzungs-
beginn
Beschreibung
Rathaus Kaitz Boderitzer Straße 92/94
offen Zwei Gebäude, Eingemeindung 1921
Rathaus Kemnitz vormals: Bahnstraße 8
offen Eingemeindung 1921
Kleinzschachwitz Haus 108.JPG Rathaus Kleinzschachwitz Hosterwitzer Str. 2
(Lage)51.00558513.851115
1902 2. Rathaus von Kleinzschachwitz bis zur Eingemeindung 1921, danach Nutzung als Postgebäude mit Wohnungen bis 1993, seit Sanierung 2000 reines Wohngebäude.
Dresden-Klotzsche-Rathaus.jpg Rathaus Klotzsche Kieler Straße 52
(Lage)51.11177813.774118
1907 Rathaus von Klotzsche bis zur Eingemeindung 1950, danach Nutzung für verschiedene Verwaltungen bis 1992, seitdem Sitz des Ortsamts Klotzsche.
Rathaus Langebrück Schillerstr. 7
offen 3. Rathaus, ab 1917 genutzt, vorher andere Adressen, ab 1900 Hauptstraße 1, Eingemeindung 1999
Österreicher Straße 37 Laubegast.JPG Rathaus Laubegast Österreicher Str. 37
(Lage)51.02563113.837252
1881 1901 aus einem Wohnhaus mit Fassadenaufwertung umgebaut, als Rathaus genutzt bis Eingemeindung 1921, Sparkasse verblieb im Erdgeschoss des Gebäudes, Sanierung 2009/2010 als Wohnhaus.
Rathaus Leuben schräg.jpg Rathaus Leuben Hertzstraße 23
(Lage)51.0103213.82534
1901 Bis zur Eingemeindung 1921 Gemeindeverwaltung von Leuben, Wohnungen in den Obergeschossen. Ab 1933 auch Außenstelle der Gestapo. Nach 1945 Auffangstelle für Bombengeschädigte, später auch Tuberkulosestation und Mütterberatungsstelle, später polizeiliche Meldestelle und Wohnungsverwaltung. Seit 1998 Sitz des gleichnamigen Ortsamtes.
Leubnitz-Neuostra-1.jpg Rathaus Leubnitz-Neuostra Klosterteichplatz 4
(Lage)51.01232213.765771
1904 Bis zur Eingemeindung 1921 Gemeindeverwaltung von Leubnitz-Neuostra, Wohnungen in den Obergeschossen. danach bis 1993 Nutzung durch die Stadtsparkasse Dresden, z. T. mit Wohnungen, seit 1998 Wohnhaus.
RathausLockwitz-6.jpg Rathaus Lockwitz Am Plan 1
(Lage)50.98723713.80637
offen 2. Rathaus (Gemeindeamt), 1. Gemeindeamt in Altlockwitz 33. Genauer Nutzungsbeginn unklar, spätester Zeitpunkt 1919. Nach Eingemeindung 1930 und Sanierung 1993 heute Wohnhaus und Filiale der Sparkasse.
Dresden-Löbtau Rathaus Architekten Schilling u. Graebner.jpg Rathaus Löbtau Tharandter Str. 33
(Lage)51.0421813.704
1898 Rathaus von Löbtau bis zur Eingemeindung 1903, danach Stadthaus. Um 1940 Filiale der städtischen Sparkasse, Stadtamt, Steueramt, Jugend- und Fürsorgeamt, Mütterberatungsstelle. 1945 zerstört, nicht wieder aufgebaut. Im Nebengebäude nach Polizeiwache um 1940 Gaswache und Gasinspektion West. Erhalten. Heute Nutzung als Jugend- und Freizeiteinrichtung.
Körnerplatz 2011-11 009.jpg Rathaus Loschwitz Grundstraße 1–3
(Lage)51.05429813.815476
1885 Eingemeindung 1921, Abbruch des ursprünglichen Gebäudeensembles mit Ausnahme des Bräustübels 1994/95, Neubau als Ortsamt Loschwitz bis 1998.
Rathaus Meußlitz vormals: Louisenallee 23
offen Eingemeindung 1950
Scharfenbergerstr2 dresden.jpg Rathaus Mickten Scharfenberger Str. 2
(Lage)51.07463413.701876
1898 Als Schulhaus 1874 errichtet, 1898 zum Rathaus umgebaut, Eingemeindung 1903, Umbau zum Wohnhaus, nach Sanierung in den 1990er Jahren verblieb es bei der Wohnnutzung.
Rathaus Mobschatz Cossebauder Straße 5
1939 Eingemeindung 1999, Wohnhaus.
Rathaus Mockritz Münzmeisterstraße 42
(Lage)51.01659213.740467
offen Eingemeindung 1921.
Rathaus Nieder-Gorbitz vormals: Wilsdruffer Str. 9
offen Wilsdruffer Straße heute Teil der Kesselsdorfer Straße. Eingemeindung 1921, Wohnhaus.
Rathaus Niederpoyritz Pillnitzer Landstraße 197
(Lage)51.03119813.843159
1900 Umbau eines Wohnhauses, Eingemeindung 1950, danach Sparkasse, seit 2001 Wohnhaus.
Rathaus Niedersedlitz frontal.jpg Rathaus Niedersedlitz Sosaer Str. 11
(Lage)50.9997313.823493
1902 Bis zur Eingemeindung 1950 Gemeindeverwaltung von Niedersedlitz, Wohnungen in den Obergeschossen, nach dem Ersten Weltkrieg auch AOK Niedersedlitz und Feuerwache. Nach Eingemeindung zeitweise Möbellager und Gastarbeiterunterkunft. 1993 Erwerb durch die Stadtsparkasse Dresden und Sanierung für eigene Zwecke.
Rathaus Omsewitz Gompitzer Straße 1[2]
offen Eingemeindung 1930.
Rathaus Pieschen.jpg Rathaus Pieschen Bürgerstraße 63
(Lage)51.0772613.7215
1891 Rathaus von Pieschen bis zur Eingemeindung 1903, 1898 mit Feuerwehr, nach Eingemeindung weitere Nutzung als Verwaltung, 1926 Ausbau des Südflügels für die Feuerwehr. Bis zum Ende der DDR Verwaltungssitz des Stadtbezirks Dresden-Nord mit Einwohneramt und Polizeimeldestelle, in den 1950er Jahren Auszug der Feuerwehr. Von 1990 bis 1994 grundhafte Sanierung, wird als Ortsamt Pieschen und Bürgerbüro genutzt, das Hintergebäude wurde zu Beginn des neuen Jahrtausends zur Zweigstelle der Stadtbibliothek.
Rathaus Pillnitz Am Rathaus 1
(Lage)51.01286313.873367
1891 Gebäude von 1879, 1924 zum Rathaus umgebaut. Bis Eingemeindung 1950 als Verwaltung genutzt. Anschließend an die Stadtsparkasse Dresden, deren Nachfolgerin, die Ostsächsische Sparkasse Dresden, das Gebäude im Erdgeschoss noch heute für eine Filiale nutzt. Obergeschosse: Wohnungen.
Dresden-Plauen-Rathaus.jpg Rathaus Plauen Nöthnitzer Straße 2
(Lage)51.029213.7075
1894 Bis zur Eingemeindung 1903 Verwaltung von Plauen, danach Meldestelle, Standesamt, Polizei, Volksbibliothek (1907–1931), Sparkasse (bis 2013), nach 1945 Auszug der Verwaltung, Nutzung als Hort und Schulgebäude bis 1990, danach Sanierung, seit Mai 1996 Sitz des Ortsamtes Plauen.
Rathaus Rähnitz-Hellerau Ludwig-Kossuth-Straße 61
(Lage)51.11618113.745688
1924 Eingemeindung 1950, Anfang der 1990er Jahre abgebrochen. Heutiger Neubau mit dieser Adresse ohne Bezug dazu.
Rathaus Rochwitz Tännichtstraße 4
(Lage)51.05704813.834229
offen eingemietet bis zur Eingemeindung 1921. Gebäude heute Pension.
DD-AmUrnenfeld23.jpg Rathaus Stetzsch Am Urnenfeld 23
(Lage)51.08186513.652798
1903 Eingemeindung 1921, Verwaltungsbereich ebenfalls zu Wohnungen umgebaut. Nahezu im Originalzustand erhalten.
Rathaus Striesen Tittmannstraße 21
(Lage)51.04954213.784794
1875 Eingemeindung 1892, 1945 ausgebrannt, Ruine nach 1948 beräumt.
Marienberger Straße 86 02-2013.jpg Rathaus Tolkewitz Marienberger Str. 86
(Lage)51.03213513.824423
1874 Bild zeigt 3. Rathaus von Tolkewitz (Nutzung 1905–1912 als Gemeindeverwaltung), danach Postgebäude (bis 1927) und Polizeirevier. Nach 1945 Wohnnutzung, erste Sanierung 1968, 1999 umfassende Sanierung, Wohnhaus. Das 1. Rathaus (1874–1902, Alttolkewitz 14) und das 2. Rathaus (1902–1905, Marienberger Str. 69/71) sind beide erhalten und werden nach Sanierung in den 1990er Jahren als Wohnhaus genutzt.
Wilder-Mann-Straße 3-5 Dresden.jpg Rathaus Trachau Wilder-Mann-Straße 3–5
(Lage)51.08754313.715213
1900 südlicher Teil des Doppelhauses immer Wohnhaus. Nördlicher Teil Rathaus bis Eingemeindung 1903, danach Stadthaus. 1950–1993 Außenstelle der Poliklinik Mickten. Nach anschließendem Leerstand bis 2008 Umbau zu einem Wohnhaus.
Rathaus Wachwitz Altwachwitz 9
(Lage)51.03767413.832334
1901 bis zur Eingemeindung 1930 Gemeindeverwaltung, ab 1906 auch Volksbibliothek, nach Eingemeindung Sparkasse und Melde- und Standesamt, danach Postgebäude (1931–1991). Heute Wohnhaus.
Villa Stange Weisser Hirsch.jpg Rathaus Weißer Hirsch Bautzner Landstraße 17
(Lage)51.063443513.823526
1894 2. Rathaus, nach der Eingemeindung 1921 Städtische Kurverwaltung und Sparkasse (letztere bis 2008), ab 1939 Wirtschaftsamt bis in die 1950er Jahre, danach Wohnungen. Seit der Sanierung 2011/2012 Ärztehaus. Das 1. Rathaus (1894–1905, Luboldtstraße 24) ebenfalls heute ein reines Wohnhaus.
Weixdorf Rathaus.JPG Rathaus Weixdorf Weixdorfer Rathausplatz 2
(Lage)51.1451313.800803
offen 1928 in Lausa erbaut und bis 1998 Verwaltung der Gemeinde Weixdorf, nach Eingemeindung seit 1999 örtliche Verwaltungsstelle der Ortschaft Weixdorf
Rathaus Wilschdorf Keulenbergstraße 41
(Lage)51.11676913.724997
offen vor der Eingemeindung: Dresdner Straße 41, 3. Rathaus (Gemeindeamt), seit 1925 bis zur Eingemeindung 1950. Vorher bis 1922 Hauptstraße 5 heute: Altwilschdorf 5), 1922–1950 Hauptstraße 1 (heute: Altwilschdorf 1).
Rathaus Zschieren vormals: Carolastraße 54
offen 2. Rathaus (Gemeindeamt), so 1939 erwähnt, bis zur Eingemeindung 1950. Vorher 1897 erwähnt: Carolastraße 25.
Fritz-Foerster-Platz 2-DD.jpg Stadtbezirksrathaus Dresden-Süd Fritz-Foerster-Platz 2
(Lage)51.04988513.730597
1957 Als Büro- und Wohngebäude 1910 errichtet, ab 1957 Verwaltungssitz des Stadtbezirkes Dresden-Süd (die weiteren Dresdner Stadtbezirke ab 1957 hatten alle ihren Sitz in ehemaligen Rathäusern), ab 1990 zunächst Ortsamt Südvorstadt, nach Rückgabe an die Alteigentümer Umzug des Ortsamtes in das Rathaus Plauen (mit Umbenennung). Heute Bürogebäude.
Stadthaus Annenstraße Annenstraße 9
(Lage)51.04988513.730597
1895 Eckgebäude Annenstraße/Am See im Stil der Neorenaissance, Erdgeschoss Geschäfte, Dachgeschoss Wohnungen. Drei Etagen Verwaltung, Verkauf 1931 an die DREWAG, 1945 zerstört, bei Großflächenentrümmerung beräumt. Heute Parkplatz und Grünfläche.
Stadthaus An der Kreuzkirche 9 Annenstraße 9
(Lage)51.04988513.730597
1912 von Hans Erlwein, im Erdgeschoss dreiachsig, sonst fünfachsig mit Erlwein-typischen Fassadenelementen. Erdgeschoss Geschäfte, Obergeschosse Vollstreckungsamt, Dach nicht ausgebaut. 1945 zerstört, bei Großflächenentrümmerung beräumt, Grundstück in den 2000er Jahren mit Hotel überbaut. War stilistisches Vorbild für die Altmarktbebauung in den 1950er Jahren.
Stadthaus Friedrichstadt 2011.JPG Stadthaus Friedrichstadt Löbtauer Straße 2
(Lage)51.0544513.7194
1908 Bis 1945 Wohlfahrts- und der Sicherheitspolizei sowie Filiale der Stadtsparkasse untergebracht, in den Obergeschossen Wohnungen. Hintergebäude Kanalreinigungsinspektion und Laternenwärterwache. 1945 linker Giebel zerstört und nicht wiederhergestellt. Fleischverkaufsstelle des Konsums, in den Obergeschossen Wohnungen und eine Arztpraxis. Hinterhaus 1985 abgerissen, Hauptgebäude wenig später aus baupolizeilichen Gründen gesperrt. Mitte der 1990er Jahre an private Investoren verkauft. Ruine.
Stadthaus Johannstadt.jpg Stadthaus Johannstadt Güntzplatz 5
(Lage)51.0540113.75897
1914 Stadtsteueramt, Versicherungsamt und Wohlfahrtsamt sowie die Straßenmeisterei. Nach Zerstörungen 1945 nur barockisierende Fassade, dahinter Innenbau von 1997. Heute Hauptsitz der Ostsächsischen Sparkasse Dresden.
Stadthaus Königstraße Königstraße 14
(Lage)51.06119213.7420786
1903 Um 1860 mit Elementen des Barocks und der Renaissance errichtet, 1903 umgebaut für Verwaltung (Steuer- und Standesamt, Ratsvollstreckungsamt), 1927 Innensanierung, 1945 zerstört und Grundstück beräumt. Parkplatznutzung. Auf dem Grundstück Hotelneubau aus den 1990er Jahren.
Stadtpalais-Striesen-Feb2018-1.jpg Stadthaus Striesen Wartburgstraße 23
(Lage)51.04853613.784298
1875 In der Literatur sogenanntes 2. Rathaus von Striesen (Nutzung 1907–1945). Nach 1945 Wohnnutzung, zunehmend Firmennutzung. 2010 Sanierung als reines Wohnhaus.
Dresden-Stadthaus.jpg Stadthaus Theaterstraße Theaterstr. 11/13
(Lage)51.05255613.730306
1923 Verwaltungsräume der Stadt, nach 1945 rekonstruiert, Sitz des Stadtbezirkes Mitte bis 1991, seitdem Sitz des Ortsamts Altstadt. 1923–1997 Hauptsitz der Städtischen Bibliotheken.
Dresden Königstraße 15.jpg Kulturrathaus Königstraße 15
(Lage)51.06175913.742753
1994 Nutzung vor 1990 noch unbekannt, 1992–1994 Sanierung als Kulturrathaus (Sitz des Amtes für Kultur und Denkmalschutz sowie der/des Beigeordneten für Kultur), weitere Umbauten 2002–2004, öffentlich nutzbare Säle, Stadtratssitzungen während der Sanierung des Neuen Rathauses


Langebrück: Die Dresdner Straße geht auf einen alten Verbindungsweg zwischen Klotzsche und Liegau-Augustusbad zurück. Erst 1815 wurde dieser zur Straße ausgebaut. Bereits 1740 hatte Revierförster Johann Georg Bruhm der Ältere den Weg mit Lindenbäumen bepflanzen lassen. Zu den ältesten Gebäuden gehörten die sogenannten Pikörhäuser (Nr. 5-7), die einst als Unterkunft für die Jagdknechte und ihre Hunde dienten. Auch ein Vorgängerbau des späteren Bahnhofshotels stand mit der Jagd in Verbindung, da hier der Vogelsteller wohnte. Historisch bedeutsam ist außerdem das Wohnhaus Dresdner Straße 30. Der um 1895 mit städtischen Wohn- und Geschäftshäusern bebaute Vorplatz (Foto links) wurde früher als Dresdner Platz bezeichnet. Zwischen 1886 und 1899 befand sich in den Räumen der späteren Germania-Drogerie (Dresdner Straße 4) die Langebrücker Postfiliale, die im Anschluss in das neu errichtete Postamt (Nr. 17) verlegt wurde. Gebäude: Bahnhofshotel (Nr. 1): 1845 wurde das alte Vogelstellerhaus zum Gasthof umgebaut, der von 1883 bis 1897 als “Hennigs Restauration” seine Gäste empfing. Nach dem Teilabriss entstand an gleicher Stelle das repräsentative Bahnhofshotel (Foto rechts) mit Restaurant, Fremdenzimmern und Gesellschaftssaal. Nach dessen Schließung 1947 diente das Gebäude viele Jahre als Domizil des Konsums, der Gemeindeverwaltung und zu Wohnzwecken. Nachdem ein 2009 geplanter Umbau zu einer Appartement-Wohnanlage scheiterte, steht das Haus heute leer. “Hotel zur Post” (Nr. 9): Das Gebäude wurde 1883 für den Gastwirt Moritz Claus erbaut und am 25. Dezember eröffnet. Neben den Gasträumen befand sich in dem Gebäude bis 1886 auch die erste Postfiliale des Ortes. Danach diente das Haus nur noch als Gaststätte, die gern von Angehörigen des sächsischen Hofes besucht wurde. U.a. war diese Stammlokal des letzten Königs Friedrich August III., der oft in Langebrück weilte. 1945 wurde hier der Nicodéchor gegründet, der sich der Pflege der musikalischen Traditionen verschrieben hat.

Das Rathaus Bühlau bestand von 1899 bis 1945 als Gemeindeamt der selbständigen Gemeinde Bühlau im Nordosten von Dresden. Das von dem Architekten Paul Winkler geplante Eckgebäude an der Bautzner Land- /Neukircher Straße (Adresse 2018: Bautzner Landstraße 130) wurde 1898/1899 errichtet. Nach der Eingemeindung von Bühlau nach Dresden 1921 wurde es als Verwaltungshaus genutzt, 1947 zog in die Räume des ehemaligen Ratskellers eine Zweigstelle der Stadtbibliothek ein, die sie auch jetzt (Stand: 2018) noch nutzt. Seit der Sanierung ist es ein Wohnhaus mit Einrichtungen des Gesundheitswesens. Bühlau wurde 1349 im Lehnsbuch Friedrichs des Strengen als „Bele“ erstmals urkundlich erwähnt. Der Ort gehörte Bühlau dem Blasewitzer Grundherrn Nikolaus Karras, später unterstand es den Lehnsherrn des Ritterguts Helfenberg. Zu dem alten Straßendorf entlang der Quohrener Straße, das seither als Oberdorf bezeichnet wurde, kam spätestens im 16. Jahrhundert eine Häuslergemeinde an der Bautzner Landstraße. Im Laufe der Jahrhunderte wuchsen die einzelnen Bühlauer Ortsteile sowie das benachbarte Quohren immer weiter zusammen. Im Jahr 1839 wurden sie zur Landgemeinde „Bühlau mit Quohren“ vereinigt. In Neubühlau entstanden im späten 19. Jahrhundert vorwiegend entlang der Bautzner Landstraße zahlreiche Wohn- und Geschäftshäuser. Auf der Grundlage der Sächsischen Landgemeindeordnung von 1838 erforderte erstmals Gemeindevorsteher und Gemeindeausschüsse, also eine eigene Gemeindeverwaltung, die 1839 mit der gleichzeitig erfolgten Vereinigung von Bühlau und Quohren eine eigenständige Gemeindeverwaltung für „Bühlau mit Quohren“ (wie die neu gebildete Gemeinde hieß) und die zunächst, wie damals üblich, vor allem in den Räumen des jeweiligen Gemeindevorstandes untergebracht war. Die wachsende Einwohnerzahl und auch die wachsende Zahl von Verwaltungsaufgaben erforderte gegen Ende des 19. Jahrhunderts schließlich den Bau eines eigenständigen Gemeindeamtes. Beauftragt mit der Planung wurde der Loschwitzer Architekt Paul Winkler, der neben den Räumen für Bürgermeister und Gemeindeverwaltung auch einen „Ratskeller“ mit einplante, sowie einen angrenzenden Rathausgarten, in dem bis zu 1000 Personen bewirtet werden konnten. Im Haus wurden die entsprechenden Dienstwohnungen mit vorgesehen. Genutzt wurde das Haus bis zur Eingemeindung am 1. April 1921 als „Gemeindeamt“, ab der Eingemeindung blieb es bei der Nutzung als Verwaltungshaus mit Wohnungen. Nach dem Zweiten Weltkrieg wurde der damals bereits geschlossene „Ratskeller“ umgebaut und am 7. September 1947 in seinen Räumen eine Zweigstelle der „Städtischen Bibliotheken“ eingerichtet. Diese Zweigstelle wurde 1956 erste Freihandbibliothek Dresdens, nachdem zuvor nur Magazinbestände vorhanden waren, die an einem Schalter ausgeliehen werden mussten. Während die Verwaltungsnutzung nach 1945 aufgegeben wurde, wurden diese Räume zunehmend Wohnungen umgewidmet. Gebäude Rathaus Bühlau, Detail mit Huhle-Plastik Das dreigeschossige Eckgebäude auf spitzwinkligem Grundriss, mit der heutigen Adresse Bautzner Landstraße 130 (2018), wurde 1898/1899 von dem Loschwitzer Architekten Paul Winkler in einer sehr repräsentativen Form im Stil der Neorenaissance errichtet. Das verputzte Gebäude erhielt ein Gesims über dem Erdgeschoss und ein Kranzgesims als oberen Abschluss. Den Putzbau zierten seitlich zwei Renaissancegiebel, die abgeschrägte Ecke erhielt einen repräsentativen Volutengiebel mit bewegter Silhouette. Die drei Eingänge wurden aufwändig und abwechslungsreich gestaltet, der in der abgeschrägten Ecke liegende Haupteingang wurde besonders herausgestellt: Ihn rahmen zwei auf Postamenten stehende Vollsäulen, die darüber einen Erker für das erste Obergeschoss tragen. Über dem Eingang selbst befindet sich ein halbrundes Gebälk in typischer Jugendstil-Manier. Verschiedene Reliefs – vor allem oberhalb des Haupteingangs – stellen Figuren der griechischen Mythologie dar. Der Eingang von der Neukircher Straße aus ist über eine Freitreppe mit kugelbesetzter Brüstung zu erreichen, der jedoch seit der Sanierung des Gebäudes nicht mehr öffentlich zugänglich ist. Über diesem Eingang wurde ein vollplastischer Kopf als Relief im Schlussstein eingesetzt. Dieser zeigt den 1918 verstorbenen Bauarbeiter Karl Huhle aus Eschdorf, der sich für den Bau des Gebäudes besonders eingesetzt hat.

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Langebrück:
Hauptstraße:
Entlang der parallel zum Dorfbach “Roter Graben” führenden Hauptstraße des Unterdorfes haben sich zahlreiche Dreiseithöfe aus der bäuerlichen Vergangenheit Langebrücks erhalten. Ihre Anordnung lässt noch deutlich die Form des früheren Waldhufendorfes erkennen, auch wenn die Gebäude selbst meist erst im 19. Jahrhundert entstanden. Einige Häuser weisen interessante Fachwerkkonstruktionen auf (u.a. Nr. 19 und Nr. 21) und wurden in den letzten Jahren saniert. Im Wohnhaus Hauptstraße 1 befand sich früher die Buchdruckerei von Kurt Imgrund (1878-1944), Herausgeber der Ortszeitung “Heide-Bote”. Die Zeitung erschien zum ersten Mal im Dezember 1913, wurde 1937 aus finanziellen Gründen eingestellt und 1990 wieder ins Leben gerufen. Nr. 12 diente einst als Gemeindeamt und beherbergte von 1907 bis 1935 die Schule des Privaten Schulvereins. In diesem ältesten Teil des Ortes wurde 1524 erstmals eine Dorfmühle erwähnt, die sich damals im Besitz des kurfürstlichen Försters Matthes Günther befand. Ihm gelang es auch, beim Kurfürsten die Aufhebung des Mahlzwanges für die Langebrücker Bauern zu erreichen. An die alte Mühle erinnert heute noch der Mühlteich. Hier stand ab 1568 auch die erste Dorfschule. Um 1900 diente der Mühlteich zeitweise als Gondelteich. Einzelne Gebäude: Nr. 22: Das kleine Fachwerkhaus (Foto) gehört zu den ältesten noch erhaltenen Wohngebäuden des Langebrücker Unterdorfes. Es entstand 1856 nach der Zerstörung des Vorgängerbaus bei einem Dorfbrand und wurde 1986/87 saniert. Feuerwehrmuseum: Das Gebäude wurde1898 als Spritzenhaus für die vier Jahre zuvor gebildete Freiwillige Feuerwehr des Ortes errichtet. Diese war entgegen dem Willen des Gemeinderates, der an der bestehenden Pflichtfeuerwehr festhalten wollte, am 25. Februar 1894 ins Leben gerufen worden. Das Haus diente viele Jahrzehnte als Aufbewahrungsort der Feuerspritze und der notwendigen Technik der Kameraden. Nachdem 1994 ein modernes Feuerwehrdepot auf der Lessingstraße eingeweiht werden konnte, entstand im alten Spritzenhaus ein kleines Feuerwehrmuseum. Gasthof Langebrück: Die Geschichte des Langebrücker Gasthofes lässt sich bis ins Jahr 1444 zurückverfolgen, als am “Roten Graben” in der Mitte des Dorfes erstmals ein Erbgericht mit Brauschenke erwähnt wurde. Das Erblehngericht befand sich in Höhe der Kirche an der sogenannten Schenkenbrücke und war lange Zeit politischer und kultureller Mittelpunkt des Dorfes. Zum Areal gehörten später drei weitere Grundstücke, darunter das “Kellerhaus” an der Kirchstraße und die 1738 eingerichtete Oberschenke an der Kreuzung mit der Liegauer Straße. Neben der eigentlichen Schankwirtschaft gehörte auch eine Brauerei, eine Brennerei sowie eine Bäckerei zum Schankgut. 1846 wurde an der Hauptstraße in der Nähe der Eisenbahnstrecke der neue “Gasthof zu Langebrück” gegründet und ersetzte die bisherigen Schankwirtschaften in der Oberschänke und im Erbgericht. Schnell entwickelte sich das Lokal zum gesellschaftliches Zentrum des Ortes. 1925 wurde hier ein Kino eingerichtet, welches als “Filmschau Langebrück” bis 1987 bestand. So wie in vielen unzerstörten Veranstaltungsstätten des Dresdner Umlandes fanden auch im Langebrücker Gasthof nach 1945 gelegentlich Aufführungen des Dresdner Staatsschauspiels und der Staatsoper statt. Mehrfach traten im Saal der Kreuzchor und die Staatskapelle auf. Nachdem diese provisorische Nutzung 1949 beendet wurde, erfolgte ein größerer Umbau. Neben Filmvorführungen gab es hier regelmäßig kulturelle und politische Veranstaltungen wie Schuleinführungs- und Jugendweihefeiern. Seit 1969 war das Haus Schauplatz des überregional bekannten Langebrücker Karnevals. Auf Grund des schlechten Bauzustandes musste die “Filmschau” 1987 geschlossen werden. 1991 erwarb die Gemeinde das baufällige Gebäude. Allerdings scheiterten alle Sanierungspläne zunächst an den hohen Kosten, so dass zeitweise sogar der Abriss des ehemaligen Gasthofes erwogen wurde. 2001 konnte schließlich mit der Sanierung begonnen werden. Seit Oktober 2004 wird das Haus unter dem Namen “Bürgerhaus” als Stadtteilzentrum genutzt. Im früheren Kinosaal entstanden Ausstellungs- und Veranstaltungsräumen, während das Obergeschoss u. a. als Trauzimmer zur Verfügung steht. Lehngericht (Nr. 49): Das zu den größten Bauernhöfen des Ortes gehörende Gut entstand Mitte des 15. Jahrhunderts und war Sitz des Lehnrichters, welcher über kleinere Vergehen wie Diebstahl oder beiStreitigkeiten zwischen Nachbarn entscheiden durfte. Zugleich besaß dieser das Brau- und Schankrecht. Erstmals erwähnt wurde das Gut im Jahr 1444. Lange Zeit diente das mehrfach umgebaute Haus als Gasthof des Ortes, wofür im Obergeschoss sogar ein Tanzsaal existierte. Von 1921 bis 1939 gab es im Haus die Fleischerei von Hugo Stein, ab 1929 ein Weißnäh-Atelier, in dem junge Mädchen auch in verschiedenen Näharbeiten unterrichtet wurden. Nach 1945 wurde der Vierseithof Sitz der örtlichen LPG “Florian Geyer”, welche sich später mit der LPG “An der Heide” zusammenschloss. Für die Rinderzucht entstanden hinter dem Areal mehrere Rinderställe, eine Schweinezuchtanlage folgte 1970-71 am unteren Ortsrand. Heute gehören diese zur Agrarzentrum Grünberg GmbH. Das frühere Gastwirtschaftsgebäude dient Wohnzwecken und wurde 2005 verkauft. Seitdem bemühen sich die neuen Eigentümer um eine schrittweise Sanierung. Teichmühle (Nr. 50): Auf diesem Grundstück befand sich einst die 1524 erstmals genannte Teichmühle unterhalb des noch heute bestehenden Mühlteiches. Besitzer war der Förster Matthes Günther, der zugleich eine Brettschneidemühle in der Dresdner Heide betrieb. 1731/32 erfolgte im Mühlteich der Einbau von Rechen und Absperrgattern zur Karpfenzucht. Das heutige Gebäude entstand 1804 und wurde um 1930 zum Wohnhaus umgebaut. Über der Tür erinnert ein Schlussstein an den Neubau im 19. Jahrhundert.

Gamigstraße:
Palitzschbrunnen: Der Brunnen wurde vermutlich Anfang des 18. Jahrhunderts gegraben und gehörte zum früheren Palitzschgut in Altprohlis. Aus Anlass des 200. Geburtstages von Johann Georg Palitzsch wurde die Anlage 1923 zu einem Denkmalbrunnen umgestaltet. Der Brunnen hat die Form eines Hausgiebels und zeigt ein Porträtmedaillon des Bauernastronomen, darüber einen Kometen sowie zu beiden Seiten zwei Schrifttafeln. 1976 musste der stark verfallene Brunnen abgebaut werden und wurde 1980/81 restauriert. Seitdem befindet er sich auf dem Schulhof der 121./122. Oberschule

Die Hofewiese, auf Langebrücker Flur inmitten der Heide gelegen, wurde 1547 erstmals urkundlich erwähnt. Der Name leitet sich von einer Wiese im Heidegebiet ab, deren Heu zur Wildfütterung des kurfürstlichen Jagdreviers genutzt wurde. Solche Wiesen befanden sich früher auch in anderen Teilen der Heide, woran noch der Flurname Ullersdorfer Hofewiese erinnert. Ihre Verwaltung oblag ab 1593 dem Ostravorwerk, weshalb die Hofewiese früher auch Vorwerkswiese genannt wurde. Vermutlich gab es an dieser Stelle bereits um 1560 zwei Scheunen zur Lagerung des Heus. Dieses musste von den Langebrücker und Klotzscher Bauern geschnitten und bei Bedarf nach Dresden gebracht werden. Noch bis 1830 musste jeder erwachsene Einwohner Langebrücks einen Tag im Jahr unentgeltlich das Gras der Hofewiese mähen. 1724 hatte die Hofewiese einen Umfang von 4.720 Schritten, was ungefähr 4,7 km entspricht. Neben dem Ostravorwerk durften auch die Langebrücker Förster Teile der Wiesen für ihre Zwecke nutzen. Bereits im 16. Jahrhundert entstand an der Langebrücker Hofewiese ein einfaches Gebäude, welches am 21. Juli 1804 vom sächsischen Kabinettsminister Graf Camillo Marcolini in Besitz genommen und durch einen Neubau ersetzt wurde. Außerdem erwarb Marcolini einige Randflächen und ließ das gesamte Terrain mit Sandsteinsäulen einfassen. Die bis heute zum Großteil erhaltenen Säulen weisen durch ihre Inschrift C. M., die Jahreszahl 1804 und den Kurschwertern noch auf diese Aktion hin. 1828 kaufte König Anton die Hofewiese wieder zurück und nutzte sie zeitweise für die Fohlenzucht sowie als Futterstelle der königlichen Marstallpferde. Das Haus diente nun als Wohnsitz des Wiesenvogtes. Dieser richtete hier, zunächst ohne behördliche Genehmigung, einen Ausschank für Bier, Milch und Kaffee ein. Später erhielt er die Erlaubnis für die Einrichung einer kleinen Schankwirtschaft, die 1877 die volle Schankkonzession bekam. Bereits 1873 war in der Hofewiese der erste Dresdner Reitsportverein gegründet worden. Schnell entwickelte sich die “Hofewiese” zum beliebten Rastplatz für die Heidewanderer. Neben dem Ausschank von Getränken gab es auch eine eigene Schlachterei und die Zulassung, Wildgerichte anzubieten. Letzter vom König eingesetzter Wiesenvoigt war ab 1913 Max Frommert, der nach dem Ende der Monarchie und der Auflösung der Hofewiese das Gasthaus als Pächter übernahm. 1935 erhielten die Wettiner die Nutzungsrechte für die Hofewiese zurück. In diesem Zusammenhang erfolgte nochmals eine Erweiterung des Gebäudes, welches mit wertvollen Jagdtrophäen und historischen Gemälden ausgestattet wurde (Foto). Neben einem Stich Canalettos wurden hier einige Bilder des Langebrücker Kunstmalers Karl Hanns Taeger aufgehängt. Die historische Gaststätte blieb auch nach 1945 noch bis 1960 in Privatbesitz, wurde dann jedoch von der HO übernommen. In der Nachkriegszeit dienten die Räumlichkeiten zeitweise als FDJ-Jugendschule für Lehrgänge und politische Schulungen. Da jedoch bauliche Erhaltungsmaßnahmen unterblieben, musste der Gaststättenbetrieb 1985 eingestellt werden. Lediglich ein Kiosk blieb für die Besucher geöffnet. Nach 1990 entwickelte sich ein komplizierter Eigentumsstreit zwischen der Stadt Dresden und der Gemeinde Langebrück. 1992 konnte die Gaststätte an einen Pächter übertragen werden, der erste Sanierungsarbeiten begann und 1993 die Hofewiese wieder eröffnete. Da jedoch für umfangreiche Arbeiten die Mittel fehlten, musste das Lokal wegen seines schlechten Bauzustandes Ende 2000 erneut geschlossen werden. Für Aufsehen sorgte die Sicherstellung der historischen Bilder aus der Gaststube kurz vor Schließung der Hofewiese. 2006 erwarb ein bayrischer Investor das Haus und vermietete dieses an den Verein “Erster Sachsenbund zu Dresden”, der das Haus zu einem Alterswohnsitz der Wettiner ausbauen wollte. Nachdem auch diese Pläne scheiterten und sich der bauliche Zustand immer mehr verschlechterte, erhielt die Stadt Dresden auf Gerichtsbeschluss das historische Gebäude wieder zurück und setzte im Januar 2013 eine Zwangsräumung durch. 2015 wurde die Hofewiese an den FDP-Politiker Holger Zastrow verkauft, der die Bauten schrittweise sanieren und künftig wieder gastronomisch nutzen will. Im Mai 2016 eröffnete bereits eine Sommerwirtschaft mit Imbissbetrieb.

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Das sogenannte Judenlager Hellerberg war ein Sammellager auf dem Heller unweit von Dresden. Es diente vom November 1942 bis März 1943 als Lager für die bei Zeiss Ikon zwangsarbeitenden Juden Dresdens. Alle Lagerinsassen wurden Anfang März 1943 in das KZ Auschwitz deportiert. Nachweislich überlebten nur zehn der 293 Gefangenen des Lagers den Holocaust. Von Mai 1943 bis zum Ende des Zweiten Weltkriegs wurde das Lager unter dem Namen Lager Kiesgrube als Entbindungslager für Kinder von Ostarbeiterinnen weitergenutzt; über 200 Kleinkinder verstarben in dieser Zeit im Lager an bewusster Mangelversorgung. In Dresden hatte es seit 1837 eine jüdische Gemeinde gegeben. Der Anteil der jüdischen Bevölkerung an der Gesamtbevölkerung Dresdens war gering: Im Jahr 1890 waren 0,3 Prozent der Bevölkerung Dresdens Juden, 20 Jahre später waren es 0,7 Prozent (3800 Personen). Ihre Blüte erreichte das jüdische Leben in Dresden in der Weimarer Republik, die jüdische Gemeinde umfasste 1925 ca. 5100 Personen (0,8 Prozent der Dresdner Bevölkerung). Im Zuge des erstarkenden Antisemitismus auch in Dresden verließen viele Juden vor 1933 die Stadt, sodass im Juni 1933 nur noch 4397 „Glaubensjuden“ in Dresden lebten. Mit 0,26 Prozent lag der Anteil der jüdischen Bevölkerung an der Gesamtbevölkerung Dresdens weit unter dem Reichsdurchschnitt von 0,77 Prozent. Ab 1933 begann auch in Dresden die systematische Ausgrenzung der jüdischen Bevölkerung, die vor allem von Martin Mutschmann aggressiv vorangetrieben wurde. In der Pogromnacht vom 9. zum 10. November 1938 wurde die Semper-Synagoge in Dresden zerstört; zudem wurden in dieser Nacht allein in Dresden 151 Juden, darunter der gesamte Vorstand der jüdischen Gemeinde, in die KZs Buchenwald und Sachsenhausen deportiert. Ab 1937/1938 stieg die Zahl der Juden, denen von Wohnungsgesellschaften oder städtischen Wohnungseigentümern die Wohnung gekündigt wurde. Eine Zusammenlegung der Juden in Ghettos wurde 1938 durch Heydrich in polizeilicher Hinsicht abgelehnt und unterblieb auch in Dresden. Mit dem im Mai 1939 verabschiedeten Gesetz über Mietverhältnisse mit Juden wurde es möglich, sogenannte „Judenhäuser“ einzurichten. In Dresden wurde im selben Jahr mit der Einrichtung von Judenhäusern begonnen; insgesamt gab es in Dresden 37 Häuser, in denen Juden isoliert lebten. Erste Deportation von Juden der Dresdner Gemeinde erfolgten bereits 1938, so wurden im Oktober 1938 über 700 polnische Juden aus dem Dresdner Bezirk nach Polen abgeschoben. Im November 1941 umfasste die jüdische Gemeinde nur noch 1228 Mitglieder. Am 20. und 21. Januar 1942 wurden 224 Juden aus dem Regierungsbezirk Dresden-Bautzen in das Ghetto Riga deportiert. Ausgenommen von der Deportation waren Juden in „Mischehe“ und deren Kinder, Personen über 65 Jahren und Personen über 55, die nicht transportfähig waren, im Ersten Weltkrieg ausgezeichnete oder schwer verwundete Personen sowie Juden, die in der Rüstungsindustrie (Goehle-Werk von Zeiss Ikon) beschäftigt waren. In der Folge wurde versucht, die in der Rüstungsindustrie arbeitenden ca. 300 Dresdner Juden in einem gemeinsamen Wohnraum zusammenzufassen, so fragte Zeiss Ikon unter anderem an, ob dafür ein Barackenlager in Prag genutzt werden könne. Der im März 1942 erlassene Beschluss, der Juden die Benutzung öffentlicher Verkehrsmittel untersagte, ließ den Ruf nach einer Konzentration der in der Rüstungsindustrie arbeitenden Juden lauter werden. Zum einen war einem Teil per Sondererlaubnis genehmigt, mit „Ariern“ eine Straßenbahn zu nutzen, was zu „eine[r] gewisse[n] Verkehrsunsicherheit“ führte. Zum anderen waren die Arbeiter, die zu Fuß auf Arbeit erscheinen mussten, aufgrund von Erschöpfung nicht mehr vollständig arbeitsfähig. Die Deportation von Juden über 65 Jahren und Personen über 55, die nicht transportfähig waren sowie von im Ersten Weltkrieg ausgezeichneten oder schwer verwundeten Personen nach Theresienstadt begann in Dresden im Sommer 1942. Im Gegensatz zu anderen Städten erfolgten die Transporte in Kleingruppen von maximal 50 Personen per LKW. Für 1942 waren sieben derartige Transporte angesetzt, die Transporte wurden Ende September 1942 abgeschlossen. Die in Dresden zu dem Zeitpunkt existierende jüdische Bevölkerung bestand nun überwiegend aus Personen, die in der Rüstungsindustrie arbeiteten sowie aus Juden in „Mischehe“ und deren Kindern. Das „Judenlager Hellerberg“ Einrichtung des Lagers Radeburger Straße, links Haus Weinbergstraße 1, gegenüber der Eingang zum Lager Am 10. November 1942 trafen sich Mitarbeiter von Zeiss Ikon mit Mitgliedern der NSDAP-Kreisleitung und der Gestapo, darunter Henry Schmidt. Dabei wurde die Einrichtung des sogenannten „Judenlagers Hellerberg“ beschlossen. Es war dabei eines von zahlreichen Lagern von Zeiss Ikon in Dresden und Umgebung und wurde betriebsintern als „Lager Nr. 16“ geführt. Für die Lagererrichtung stellte Zeiss Ikon ihr Materiallager an der Dr.-Todt-Straße 4 (heute Radeburger Straße 4) nördlich des St.-Pauli-Friedhofs zur Verfügung, das zu dem Zeitpunkt knapp außerhalb des Dresdner Stadtgebietes in einer Sandgrube lag. Zeiss Ikon verpflichtete sich, die Einrichtung des Lagers zu übernehmen. Vorgesehen waren dabei unter anderem „Bettgestelle mit Strohsäcken, Schränke (pro Familie insgesamt 1 Schrank)“. Die Lagerinsassen hatten unter anderem für Geschirr, Decken und Kissen sowie Hand- und Wischtücher zu sorgen. Zudem mussten sie die Einrichtung des Krankenzimmers (darunter zehn Metallbetten) und der Büroräume stellen. Die Außenstelle des Reichsministeriums für Bewaffnung und Munition verpflichtete sich zwar, 200 Stühle für den Speisesaal sowie pro Insasse einen weiteren Stuhl zur Verfügung zu stellen, doch wurde festgelegt, dass bei Nichtlieferung die Stühle durch die jüdische Gemeinde zu stellen seien. Das Lager sollte von den Insassen selbst verwaltet werden, wobei Henry Schmidt die Ernennung des Lagerältesten, des Verwaltungssachbearbeiters und der Köchin oblag. Jeder Insasse des Lagers musste pro Tag 0,60 RM für seine Unterbringung bezahlen. Aus den Geldern wurden von Zeiss Ikon die Grundstückspacht, die Lagerbewachung durch eine Schließgesellschaft, Licht, Heizung, Wasser, Telefonkosten, die Müllabfuhr, Reparaturen und Reinigungsmittel bezahlt. Zeiss Ikon unterlag zudem die Organisation der Nahrungsmittel für die Insassen, die jedoch separat am Monatsende von diesen bezahlt werden mussten. Auf den Marktpreis der Waren erfolgte dabei „ein Zuschlag für Handlungsunkosten und Umsatzsteuer“. Die medizinische Betreuung des Lagers wurde Willy Katz übertragen, dem zu dem Zeitpunkt einzigen Mediziner der Stadt, der Juden behandeln durfte. Die Lagerordnung lag bei der Gestapo. Als Grundsatz wurde festgelegt, dass die Insassen selbst dann im Lager zu verbleiben haben, wenn ihr Arbeitsverhältnis bei Zeiss Ikon endete. Zudem durften freie Lagerplätze mit Juden belegt werden, die nicht bei Zeiss Ikon arbeiteten. Der Status des Lagers als eine Art kurzzeitiges Durchgangslager war von Beginn an besiegelt, so vermerkte das Protokoll der Sitzung am 10. November 1942, dass alle Insassen „bis zum Zeitpunkt des Abtransports“ im Lager leben sollten. Victor Klemperer berichtete in seinen Tagebüchern bereits am 13. November 1942, dass jüdische Arbeiter bei Zeiss Ikon „in Baracken“ kommen werden und dies bereits eine Zeitlang als Gerücht kursiere. Die Deportation von 279 Dresdner Juden, die bis dahin in Judenhäusern gelebt hatten, in das Barackenlager erfolgte am 23. und 24. November 1942. „... diese neue Art der Deportation sei deshalb so schamlos, weil alles so offen vor sich gehe“, befand Eva Klemperer. Alle Gefangenen hatten sich während des Transports einer Untersuchung und Desinfektion in der Dresdner Entseuchungsanstalt zu unterziehen. Laut Victor Klemperer für viele Betroffene der schlimmste Aspekt der Deportation: „Das Schlimmste an der Lageraffäre soll bisher nach mehrfachen Berichten die Entlausung der Frauen gewesen sein. Während sie in der Anstalt nackt zwischen den Passionsstationen herumliefen, wurden sie von der Gestapo photographiert, sie mußten lange mit nassen Haaren bei kaltem Regenwetter im Hof stehen, auch ihr offenes und durchwühltes Gepäck war dem Regen schutzlos ausgesetzt.“ Die Deportation wurde durch Zeiss Ikon filmisch festgehalten, auch die Entlausung wurde dabei gefilmt, wobei die Prozedur von Henry Schmidt vor Ort überwacht wurde. Der Film Zusammenlegung der letzten Juden in Dresden in das Lager am Hellerberg am 23./24. Nov. 1942 wurde erst 1995 der Öffentlichkeit bekannt. Er erlaubt auch eine Lokalisierung des Lagereingangs: Er muss sich gegenüber dem Haus Weinbergstraße 1 befunden haben, so ist das Gebäude auf dem Weg durch das bewaldete Grundstück zum eigentlichen Lager im Hintergrund zu sehen. Es ist möglich, dass die Torpfosten des Grundstücks Radeburger Straße 12A einst zum Lagerzugang gehörten. Mit Abschluss der Deportation in das außerhalb der Stadtgrenze liegende Lager galt Dresden ab Ende November 1942 als „praktisch ‚judenrein‘“. Leben im Lager Das Lager bestand aus sechs Unterkunfts- und einer Gemeinschaftsbaracke. Jede Unterkunftsbaracke bestand aus drei Räumen, die von jeweils ca. 16 Personen belegt waren. Die Unterbringung erfolgte geschlechtergetrennt, eine Ausnahme gab es bei Ehepaaren sowie Kindern unter vier Jahren. Laut Victor Klemperer war die Gemeinschaftsbaracke neun Ehepaaren vorbehalten. Im Lager gab es einen Essraum, Toiletten, eine Krankenstation sowie eine Schneiderei, Schuhmacherei und eine Friseurstube. Zudem existierten zwei Waschräume mit Waschschüsseln sowie durch Einsatz von Willy Katz später auch zwei Badewannen.[21] Das Lager wurde von einer privaten Schließgesellschaft bewacht, die auch die Ausgehzeiten kontrollierte. Eine Umzäunung gab es nicht. Das Lager durfte für die Früh- bzw. Spätschicht im ca. 20 Minuten entfernt gelegenen Goehle-Werk auf der Heidestraße 4 verlassen werden. Für Arztbesuche oder Behördengänge wurden durch die Lagerleitung Passierscheine ausgestellt. Als Lagerältester wurde Siegmund Selig Lehner und als technischer Verwalter Elias Lichtenstein ernannt. Über die Bedingungen im Lager existieren unterschiedliche Angaben. Klemperer schrieb in seinem Tagebuch Berichte nieder, die er von Lagerbewohnern erhalten hatte. Bei den Vorbereitungen der Schlafräume hätten die Bettsäcke mit nasser Holzwolle gestopft werden müssen.[22] Die Bedingungen wurden im Vorfeld als katastrophal wahrgenommen und von Klemperer geschildert: „Unvorstellbar eng und barbarisch primitiv, besonders die Aborte (wandlos nebeneinander und viel, viel zu wenige), aber auch die schmalen Betten usw. Die Zimmerleute hätten gesagt, sie seien im Barackenbau für russische und polnische Gefangene beschäftigt gewesen – Luxushotels gegen dieses Judenlager in Sand und Schlamm!“[23] Gleichzeitig wies Klemperer aber auch auf verhältnismäßig positivere Aspekte hin: „Vergünstigungen wie Postverkehr, Urlaub in Dresden, eine Lagerbibliothek, Spielzeugerlaubnis für die Kinder ... Man muß abwarten.“[23] Erste Reaktionen der Insassen waren vorsichtig optimistisch, was Klemperer mit Skepsis registrierte: „Er [= Martin Reichenbach] hatte es sich eben noch gräßlicher vorgestellt, er war schon glücklich, daß ihn niemand prügelte. [...] Alles in allem also Gefangenschaft und qualvolles Vegetieren.“[24] Am 1. Dezember notierte er: „Die Leute in der Gemeinde scheinen [...] eine verschworene Gemeinschaft zu sein, das Lagerleben als glimpflich hinzustellen: Es sei erträglich [...] Es klingt so, als wenn die Unzufriedenen verwöhnte und undankbare Geschöpfe wären. [...] Aber das Gros der Lagerinsassen ist doch streng gefangen, erhält spärlichsten Stadturlaub, hockt immer aufs engste beisammen usw. usw. Es ist gar zu jämmerlich, daß diese Gefangenschaft schon als halbes Glück gilt. Es ist nicht Polen, es ist nicht das KZ! Man wird nicht ganz satt, aber man verhungert nicht. Man ist noch nicht geprügelt worden. Usw. usw.“[25] Am 19. Dezember notierte Klemperer, dass den Insassen des Lagers der Einkauf von Waren gänzlich untersagt wurde: „Sie sind wieder um einen Höllengrad gefangener und schlechter ernährt als zuvor“.[26] Der Auschwitz-Überlebende Henry Meyer, der auch im Lager Hellerberg gelebt hatte, befand rückblickend „Wir hatten uns im Lager [Hellerberg] eigentlich sehr gut vertragen [...] Ich wünschte, man hätte uns bis Kriegsende dort gelassen. Alle würden noch leben“.[27] Bis zur Auflösung des Lagers verstarb eine Person: Sabine Scholz erlag am 24. Dezember 1942 einer Nierenbeckenentzündung.[28] Auflösung des Lagers Blick in das Gelände des Lagers, Aufnahme 2011 Mit den Richtlinien zur technischen Durchführung der Evakuierung von Juden nach dem Osten (KL Auschwitz) wurde am 20. Februar 1943 die Deportation von in Rüstungsbetrieben arbeitenden Juden ermöglicht. Im Rahmen der reichsweiten sogenannten „Fabrikaktion“ wurden auch die Arbeiter des Judenlagers Hellerberg am 27. Februar 1943 verhaftet. Das Lager wurde auf Befehl von Adolf Eichmann[29] zum Polizeihaftlager deklariert und umzäunt. Neben den bisherigen Lagerinsassen wurden im Lager nun auch bisher außerhalb des Lagers lebende Juden (laut Klemperer „alle Nicht-Mischehlinge“[30]) inhaftiert. Zudem erfolgte die Deportation von Juden aus Erfurt, Halle, Leipzig, Plauen und Chemnitz in das Lager; zu ihnen gehörte auch Justin Sonder aus Chemnitz.[31] Die Lagerräumung erfolgte schließlich am 2. März 1943. Zu dem Zeitpunkt befanden sich unter den Gefangenen 293 Dresdner, die über den Bahnhof Dresden-Neustadt am 3. März 1943 nach Auschwitz deportiert wurden. Die Selektion überstanden ca. 50 der Dresdner Gefangenen.[32] Nachweislich haben nur zehn Insassen des Transports den Holocaust überlebt,[33][34] darunter der Musiker Henry Meyer. Das Lager wurde mit dem Abtransport weitgehend aufgelöst. Es blieben nur 32 Personen im Lager zurück, darunter überwiegend Juden aus Chemnitz, Halle, Leipzig und Plauen, die über 65 Jahre alt waren. Sie wurden Ende März 1943 nach Theresienstadt deportiert. In der Zwischenzeit hatte das Lager auch als Übergangslager für Deportationen nach Theresienstadt gedient.[35] „Weiternutzung“ als Lager Kiesgrube Über das „Lager Kiesgrube“ existieren nur wenige Informationen. Zwischen Mai 1943 und dem Kriegsende diente das Lager als Entbindungslager für Kinder von Ostarbeiterinnen; von mindestens 497 geborenen Kindern verstarben aufgrund von Mangelversorgung nachweislich 225 Säuglinge und Kleinkinder.[36] Das letzte Kind verstarb im März 1945.[37] Eine April 2004 unter dem Titel Zwangsarbeiter in Dresden erschienene Arbeit, die von der PDS-Fraktion im Stadtrat der Landeshauptstadt Dresden herausgegeben wurde, verortete das Lager auf die damalige Dr.-Todt-Straße 120 und grenzte es vom „Judenlager Hellerberg“ auf der Dr.-Todt-Straße 4 ab.[38] Nachforschungen von Annika Dube-Wnek konnten das Lager Kiesgrube jedoch auf dem Gelände des ehemaligen Judenlagers Hellerberg verorten, dessen Baracken so weitergenutzt wurden. Das Lager Kiesgrube wurde offiziell durch die Deutsche Arbeitsfront betrieben; die eigentliche Verwaltung vor Ort oblag ab Juni 1943 der Bauunternehmung W. Strauß & Co, die unter anderem die Mieteinnahmen – jede Frau musste pro Kind 0,30 RM Miete zahlen – an den Barackeneigentümer Zeiss Ikon überwies.[39] Eine Luftbildaufnahme vom 25. März 1945 zeigt das Barackenlager mit noch bestehenden Bauten.[40] Kurz nach 1945 wurden die Baracken abgerissen und die Sandgrube, in der sich das Lager befand, teilweise verfüllt. Das Gelände liegt seit Kriegsende brach und ist inzwischen dicht bewachsen. Spuren des Lagers gibt es nicht mehr.[41]

Waldbab Langebrück:
Nachdem Langebrück im letzten Drittel des 19. Jahrhunderts zum Kur- und Erholungsort geworden war, kamen um 1880 erstmals Pläne zur Errichtung eines Luft- und Freibades auf. 1883 ließ der Gutsbesitzer Moritz Claus an einem kleinen Teich ein Badehaus zur öffentlichen Benutzung aufstellen. 1906 wurde schließlich das erste richtige Bad an der Ecke Friedrich-August / Höntzschstraße eingeweiht. Dieses Bad besaß ein kleines Schwimmbecken mit ca. 250 m² Wasserfläche und wurde bereits 1912 wieder geschlossen. Im gleichen Jahr erwarb die Gemeinde außerhalb des Ortskerns mehrere Grundstücke und legte das heute noch existierende Waldbad Langebrück an. Am 23. Juni 1912 wurde es eingeweiht. Seinen früheren Namen Germaniabad erhielt es nach dem Dresdner Schwimmklub “Germania”, der hier regelmäßig trainierte. Das Bad besaß zwei durch einen Bretterzaun getrennte Bereiche für Damen und Herren, gasbeheizte Duschen und einen Sprungturm mit 3- und 6-Meter-Brett. Außerdem bestand zeitweise ein Gondelverleih. In den Zwanziger Jahren erfolgten einige Erweiterungen, u.a. der Bau neuer Umkleidekabinen, einer kleinen Badgaststätte sowie die Einrichtung eines Familienbades (Foto), in dem nun Männer und Frauen gemeinsam schwimmen durften. In den Wintermonaten diente das Bad als Eisbahn. 1926 wurde ein neuer Sprungturm errichtet sowie eine Wasserrutsche aufgestellt, 1929 nach Plänen des Dresdner Architekten Paul Weiße ein Planschbecken mit Brunnen angelegt. 1946 entstand die noch heute vorhandene Verbindung zwischen dem ehemaligen Damen- und Herrenbad sowie eine Brücke über den Graben zwischen beiden Bassins. Da der Name Germaniabad als nicht mehr zeitgemäß erachtet wurde, erfolgte um 1950 die Umbenennung in Waldbad Langebrück. In den letzten Jahren konnten einige Modernisierungsmaßnahmen wie die Installation einer neuen Rutsche, der Bau moderner Sanitäranlagen sowie die Schaffung weiterer Sportmöglichkeiten umgesetzt werden. Das frühere Damenbad wird seit 1993 zur biologischen Selbstreinigung des Wassers genutzt. 2004 übernahm die städtische Tochtergesellschaft QAD das Langebrücker Waldbad in freie Trägerschaft, seit 2012 gehört es wieder zum städtischen Sportstätten- und Bäderbetrieb.

1940 Gaststätten Spalte 4 (erledigt bis Stahl, Eugen )

add_def_ver("v_h_horn","Hans Horn, Cossebaude","Verlag Hans Horn, Buchbindermeister und Buchhändler, Cossebaude, 1903 Bahnhofstr. 7");

Als Rathaus Weißer Hirsch werden zwei Gebäude bezeichnet, die von der selbständigen Gemeinde Weißer Hirsch als Rathaus genutzt wurden. Dies war in der Zeit von 1894 bis 1905 das 1. Rathaus mit der heutigen Adresse Luboldtstraße 24 und von 1905 bis 1921, dem Zeitpunkt der Eingemeindung nach Dresden das 2. Rathaus mit der heutigen Adresse Bautzner Landstraße 17. Sie waren jeweils Sitz der Gemeindeverwaltung und beinhalteten auch die Beratungsräume des Gemeinderates. Beide Gebäude existieren noch heute (Stand 2018) und werden als Wohnhäuser im repräsentativen Stil (Luboldtstraße) bzw. Ärztehaus (Bautzner Landstraße) genutzt. Ausgehend von einem 1664 errichteten Winzerhaus, dessen damaliger Besitzer 1688 das Schankrecht erhielt und als Fuhrmannsschänke wegen ihrer Lage nahe der Heide „Zum Weißen Hirsch“ genannt wurde, gab diese Schänke schließlich dem gesamten Stadtteil seinen Namen. Diesem wurde 1726 der Status „kanzleischriftsässiges Gut“ verliehen, verbunden mit einigen Privilegien. Im 18. Jahrhundert entwickelte sich um das Gut eine kleine Gemeinde von Obst- und Gemüsebauern, die als Häusler auch als Winzer tätig wurden. Die Gutsprivilegien wurden durch Gesetz 1834 aufgehoben und die nunmehrige Landgemeinde führte Anfang 1839 auf der Grundlage der Sächsischen Landgemeindeordnung von 1838 erstmals Gemeindevorsteher und Gemeindeausschüsse, d. h. eine eigene Gemeindeverwaltung ein. Diese war, wie damals üblich, vor allem in den Räumen des jeweiligen Gemeindevorstandes untergebracht. Der Seifenfabrikant Ludwig Küntzelmann wiederum kaufte 1872 das alte Gut „Weißer Hirsch“ und teilte die Gutsfelder in Parzellen auf, auf denen „eine Colonie der Villen und Sommerfrischen“ entstand. Auf Küntzelmanns Gesuch an das Innenministerium erhielt der Weiße Hirsch im Jahr 1875 den Namenszusatz „klimatischer Kurort“. Die weitere Entwicklung des Weißen Hirschs hin zu einem Kurort von europäischem Rang wurde wesentlich durch Heinrich Lahmann geprägt. Er pachtete 1887 das Fridabad und eröffnete es im Folgejahr als „Dr. Lahmanns physiatrisches Sanatorium“ neu. Insgesamt mietete er 15 Villen in der nahen Umgebung des Sanatoriums an, die als Gästeunterkünfte dienten. Innerhalb weniger Jahre hatte Lahmanns Sanatorium Weltruhm erreicht und wurde jährlich von bis zu 7000 wohlhabenden Patienten aufgesucht. 1. Rathaus Das erste Rathaus von Weißer Hirsch (2011) 1882 war Karl August Adam Gemeindevorstand, die Gemeindeverwaltung war in dessen Wohnhaus Loschwitzer Str. 1 (heute (2018): Plattleite 68) untergebracht und mit der rasanten Entwicklung des Ortes tauchte um 1888 erstmals der Gedanke an ein eigenes Rathaus auf. 1893 wurde der Architekt Friedrich Richard Schaeffer Gemeindevorstand, in dessen Wohnung Bautzner Straße 8 (heute (2018): Bautzner Landstraße 15) nunmehr die Verwaltung untergebracht war, für die er aber auf Grund seines Berufes auch die Pläne für ein erstes Rathaus ausarbeitete. 1894 wurde es eingeweiht, neben der Verwaltung hatte die Ortssparkasse ihren Sitz, des Weiteren waren Dienstwohnungen im Haus untergebracht. Das 1. Rathaus befand sich in der Schulstraße 2 b, heute (2018): Luboldtstraße 24 (?(Lage)). Der Eingang befand sich direkt an der Gebäudeecke und trug über ihm die Aufschrift Rathaus. Allerdings genügte es schon bald nicht mehr den gewachsenen Verwaltungsanforderungen.

Die 1280 erstmals erwähnte Langebrücker Kirche entstand vermutlich im 11. Jahrhundert als kleine Kapelle. Ursprünglich war sie wahrscheinlich aus Holz und wurde erst zum Ende des 14. Jahrhunderts in Stein ausgeführt. Die Betreuung der Gemeinde oblag den Pfarrern der benachbarten Kirchspiele Grünberg, Lausa und Radeberg, die bei kirchlichen Anlässen wie Taufen, Trauungen und Beerdigungen eigens anreisen mussten und in einem kleinen Haus in der Nähe dieser Kapelle übernachteten. Mit Amtseinführung des Pfarrers Georg Schammer wurde die Langebrücker Kirche 1539 protestantisch und der Ort gleichzeitig zur selbständigen Kirchgemeinde erklärt. 1558 entstand das zugehörige Pfarramt, womit die Zuordnung des Dorfes zum Grünberger Kirchensprengel endgültig endete. Zwischen 1674 und 1682 erhielt die Kirche bei Umbauten im Wesentlichen ihr heutiges Aussehen mit dem Chor und den Seitenkapellen. Als Ersatz für den fehlenden Turm wurde 1798 der noch heute existierende Dachreiter mit Wetterfahne aufgesetzt. Als im Oktober 1899 feierlich drei neue Kirchenglocken geweiht werden konnten, entstand abseits der Kirche ein hölzerner Glockenstuhl Erst 1929 wurde ein richtiger Glockenturm als Anbau an das Kirchenschiff errichtet. Hier läutet auch eine um 1350 gegossene Glocke, die zu den ältesten in Sachsen gehört. Die übrigen Glocken mussten 1917, ihre 1929 gegossenen Nachfolger 1939/42 zum Einschmelzen abgegeben werden. 1968 erhielt die Langebrücker Kirche eine 1878 gegossene Bronzeglocke aus dem erzgebirgischen Schwarzenberg. Da diese jedoch seit längerem nicht mehr geläutet werden darf, ist ihre Rückgabe an die Heimatgemeinde geplant. Im Zusammenhang mit dem Umbau der Kirche erfolgte in den Zwanziger Jahren eine Erweiterung der 1905 geschaffenen Jehmlich-Orgel und des Chorraumes mit der Sakristei. Die Weihe der erneuerten Kirche fand am 23. Februar 1930 statt. Zwischen 1982 bis 1984 wurde die Langebrücker Dorfkirche vollständig restauriert. Die moderne Innenraumgestaltung übernahm Gottfried Zawadzki. Neben Gottesdiensten finden hier auch regelmäßig Konzerte und Kammermusikabende statt. Bemerkenswert sind die 1772 eingebauten Emporen an der Nord-, Ost- und Westseite, ein kleiner Altar mit Darstellung von Christi Geburt und Auferstehung vom Ende des 17. Jahrhunderts sowie die aus der gleichen Zeit stammende Kanzel. Der Hauptaltar mit einem Auferstehungsgemälde stammt von 1883. Friedhof: Zeitgleich mit dem Bau der Kirche wurde vermutlich auch der Kirchhof angelegt. Auf dem kleinen Dorffriedhof befindet sich eine Gruft aus der Barockzeit, in der der sächsische Oberregierungsförster Johann George Bruhm (+ 1755) beigesetzt wurde. Weitere historische Wandgräber des 18. Jahrhunderts findet man an der Nordmauer des Friedhofs. Bemerkenswert sind die Gräber des viele Jahre in Langebrück lebenden Komponisten Jean-Louis Nicodé (+1919) und des Malerehepaares Schaberschul. Auch der Gründer des ersten Kindererholungsheims in Sachsen Hugo Hickmann (+ 1922) und sein Sohn, der erste Landesvorsitzende der sächsischen CDU nach 1945 Hugo Hickmann (+ 1955) wurde hier beigesetzt. Eine spätgotische Betsäule aus dem 15. Jahrhundert steht unmittelbar an der Kirche (Foto).

06ku - Halle der Dresdner Werkstätten für Handwerkskunst (C7)
1 Maschinensaal; Herstellung von Maschinenmöbeln, Holzbearbeitungsmaschinen von E. Kießling & Co, Leipzig Plagwitz, Staubabsaugungsanlage von Pollrich & Co, Leipzig- Plagwitz, Elektromotoren von den Elektromotorenwerken Heidenau; Installation von de Blonay & Grunder , Dresden
2 Musik- und Tanzraum
3 Schreibstube
4 Küche Arbeiterwohnung
5 Wohnstube Arbeiterwohnung
6 Schlafstube Arbeiterwohnung
7 Wohnstube, Wohnung für den Mittelstand
8 Herrenzimmer, Wohnung für den Mittelstand
9 Speisezimmer, Wohnung für den Mittelstand
10 Tochterzimmer, Wohnung für den Mittelstand
11 Schlafzimmer, Wohnung für den Mittelstand
12 Bad, Wohnung für den Mittelstand, Einrichtung von Friedr. Siemens, Dresden, Nossener Straße
13 Wohn- und Empfangszimmer, Wohnung für den Mittelstand
14 Flur
15 Sanatorienzimmer
16 Hotelzimmer
17 Herrenzimmer, Gemälde von Hans B. Wieland, München
18 Kunsthandwerkliche Einzelmöbel

Gastwirtschaften 1940 Spalte 1 (erledigt bis Walter, Franz )

Eduard Hübner (* 27. Mai 1842 in Dresden; † 30. August 1924 in Karlsruhe) war ein deutscher Genre- und Porträtmaler der Düsseldorfer Schule sowie Bildhauer und Plakatkünstler. Von 1881 bis 1883 unterrichtete er an der Preußischen Akademie der Künste in Berlin. Hübner war Sohn des Malers, Professors und Galeriedirektors Julius Hübner und dessen Ehefrau Pauline, einer Schwester des Malers Eduard Bendemann. Zu seinen Geschwistern zählten der Altphilologe Emil Hübner und der Chemiker Hans Hübner. Seine Neffen waren die Maler Heinrich und Ulrich Hübner. Seine Cousins waren der Maler Rudolf Bendemann und der Admiral Felix von Bendemann. Nach dem Vitzthumschen Gymnasium besuchte Hübner für ein Jahr die Kunstakademie Dresden, wo sein Vater lehrte. An der Dresdner Akademie unterrichtete ihn Karl Wilhelm Schurig. 1860 wechselte er nach Düsseldorf, wo er bis 1869 blieb. An der Kunstakademie Düsseldorf studierte er von 1861 bis 1867. Dort nahm er Unterricht bei Karl Ferdinand Sohn (2. Klasse Malschule) und Andreas Müller (Kunstgeschichte), vor allem aber bei seinem Onkel Eduard Bendemann (1. Klasse ausübende Genre- und Historienmaler). In Düsseldorf wurde er Mitglied des Künstlervereins Malkasten. Hübner unternahm mehrere Studienreisen nach Italien, drei Winter verlebte er in Rom. 1869 und 1870 hielt er sich in Paris auf. Später ließ er sich in Berlin nieder, wo er von 1881 bis 1883 an der Akademie der bildenden Künste unterrichtete. In folgenden Jahren lebte er in Dresden, Düsseldorf und Konstanz. Ab 1867 beschickte er die akademischen Ausstellungen Dresden, ab 1872 die Berlins. Für die Leipziger Oper stellte er 1882 als Nachbildung einen bemalten Bühnenvorhang her. Außer als Maler war er auch als Bildhauer und Plakatkünstler tätig. Zur Ehrung seines 1884 verstorbenen Bruders Hans fertigte er im Jahr 1886 dessen Büste. Ein besonderer Erfolg war ein Plakat, das er für die Dresdner Tabak- und Zigarettenfirma Kosmos schuf.

Südallee 2 (Großer Garten 17) -> grga017

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Der Rebekka-Brunnen (lt. Brunneninschrift Rebeccabrunnen) ist eine Brunnenanlage hinter der Dreikönigskirche in der Dresdner Inneren Neustadt. Er war von 1863 bis zur Zerstörung Dresdens 1945 in Betrieb, konnte aber erst 1992 saniert und wieder in Betrieb genommen werden. Der Brunnen ist als 1,10 Meter hoher Sandsteintrog mit grundsätzlich quadratischer, abgerundeter Grundfläche gestaltet, der von einer kreisförmigen dreistufigen Treppe umgeben ist. Im Trog steht mittig eine Sandsteinsäule, darüber wiederum eine Säule aus Eisenguss, die die „hohe schlanke Figur der Rebekka“ trägt. An den vier Außenseiten sind kleine, halbkreisförmige Becken angelehnt, in die hinein Delphinköpfe Wasser speien. Der Brunnen hat eine Höhe von etwa 5,70 Meter. Seit wann der Brunnen Rebekka-Brunnen genannt wird, ist nicht nachweisbar . Von der Errichtung an bis 1952 wurde der Brunnen als Brunnen hinter der Dreikönigskirche bezeichnet. Geschichte bis 1945 Nach der Vollendung des Turmes der Dreikönigskirche 1845 bemühte sich die Stadt, den Platz vor dem Turm, der zu diesem Zeitpunkt bebaut war, dem Charakter der Kirche anzupassen. 1859/1860 gelang der Erwerb dieser „königsdörferischen“ Privatgebäude, um sie abzutragen. Dieses Vorhaben wurde von vielen Neustädtern begrüßt, erhofften sie sich dadurch eine Verbesserung ihrer eigenen Wasserversorgung: In einem der von der Stadt angekauften Häuser endete eine Achtelleitung einer Wasserzuführung, die Trinkwasser aus der Dresdner Heide in die Neustadt förderte; man erwartete von der Stadt, dass dieses Wasser nunmehr der Öffentlichkeit zugänglich gemacht werde und die „Wassernot“ in der Inneren Neustadt lindere. Am 19. Juni 1860 wurde durch Wasserinspektor Dachsel eine Skizze für eine Brunnengestaltung für diese Wasserleitung vorgelegt und gleichzeitig die kreisrunde Bepflanzung mit Bäumen rund um den Brunnen empfohlen. Gleichzeitig wurde die öffentlich zugängige eigentliche Quellfassung davon abgetrennt und diese wohl noch 1860 übergeben. Die Diskussionen über den Vorschlag des Brunnenbaus dauerten länger, denn die Bekrönung durch eine von ihm vorgeschlagene Gaslaterne führte zu umfangreichen Erwägungen über den Sinn eines solchen Vorhabens. Die Brunnengestaltung zum oberen Abschluss der mittig im Trog stehenden Säule war jedenfalls noch nicht entschieden, als über die Fertigstellung des Brunnens einschließlich der Mittelsäule am 17. September 1863 der Bildhauer Carl August Hauptmann Rechnung legte. Die Entwürfe für die Gaslaterne müssen jedoch, so Eilfeld anhand historischer Aktenzitate, ungewöhnlich schlecht gewesen sein, dass aus ästhetischen Gründen dieses Vorhaben schließlich im Oktober 1863 gänzlich fallen gelassen wurde. Am 14. Januar 1864 unterbreitete Stadtbaumeister Friedrich seinen Vorschlag für ein winterliches Schutzgehäuse und ein umlaufendes Gitter sowie den eines abschließenden Aufsatzes in Form einer Gesimskrone „auf welcher sich eine weibliche Figur (Wasserträgerin) erhebt“ als „günstigste und zierlichste Vermittlung“. Dieser Vorschlag wird unmittelbar danach angenommen und realisiert, am 12. August 1864 wurde die Zinkfigur von der Berliner Firma Pohl & Comp. angeliefert. Sie wird wohl auch unmittelbar danach aufgestellt worden sein. Vermerkt wird, dass der Brunnen bis mindestens 1883 24 Stunden am Tag Wasser spendete, 1885 wurde er als „von Beginn der Arbeitszeit bis abends 7 resp. 8 Uhr“ betrieben bezeichnet.

add_def_ver("v_e_hornuff","E. Hornuff, Dresden","Eugen Hornuff, Dresden A. 18, 1911 Gutenbergstr. 2");

Die Villa zur Lippe ist ein neobarocker Villenbau aus dem Jahr 1904 in dem Dresdner Stadtteil Blasewitz. Das sanierte Gebäude mit der Adresse Käthe-Kollwitz-Ufer 88 wird heute vom Sächsischen Landkreistag genutzt. Villa zur Lippe vor der Aufstockung (um 1907) Terrasse der Villa (2018) Die nach einem ihrer früheren Besitzer benannte Villa wurde zunächst eingeschossig 1904 im Stil des Neobarock errichtet. Auftraggeber waren der international erfolgreiche Theaterschauspieler Felix Schweighofer (1842–1912) und seine zweite Frau Friederike (1851–1945), die den Architekten Richard Schleinitz mit dem Entwurf beauftragten. Der bewegten, in barocken Formen gebildeten Fassade dieses Gebäudes ist eine große Terrasse mit einem Delphinbrunnen als Wandbrunnen im Erdgeschoss vorgelagert. Allerdings erwies sich das Gebäude schon bald als ungeeignet für die Bedürfnisse des Künstlerpaares, so dass Schweighofer mit seiner Frau bereits wenige Jahre später das Nachbarhaus Nr. 87 (ab dann genannt „Felixhof“, 1945 zerstört) bezog. 1908 kaufte Großherzog Adolf Friedrich V. von Mecklenburg-Strelitz für seine Tochter Victoria Marie vor ihrer absehbaren Scheidung von ihrem Ehemann das Anwesen, die fortan mit den beiden Kindern aus erster Ehe sowohl in Neustrelitz als auch hier lebte. Sie ließ das Gebäude aufstocken und im Inneren umbauen. 1911 ließ sie vom Landschaftsarchitekten J. P. Großmann unter Mitwirkung des Gartenexperten Georg Heinsius von Mayenburg einen großzügigen Garten in sachlicher Formensprache anlegen, der zu den bedeutendsten seiner Art in Dresden gehörte. Unterflurig und mit Natursteinen eingefasst befindet sich in ihm auch eine kleiner Brunnen, ein Wasserspiel mit einer Klarwasserdüse. Am 11. August 1914 heiratete Victoria Marie in Neustrelitz Prinz Julius Ernst zur Lippe (1873–1952), den dritten Sohn von Ernst zur Lippe-Biesterfeld und Karoline, geb. Gräfin von Wartensleben und wurde zur „Prinzessin zur Lippe“. Das Paar bekam hier zwei Kinder und die Villa begann als Villa zur Lippe bekannt zu werden. Nachdem das Paar zunächst das Jagdschloss Waldsee als zweite Residenz nutzte, begann ab 1930 Julius Ernst zur Lippe den Familiensitz, das Lippesche Landhaus in Oberkassel bei Bonn zu renovieren, ab da an verbrachte die Familie den Sommer in Oberkassel und den Winter in dieser Villa. Bei den Luftangriffen auf Dresden wurde zwar durch einen Bombentreffer das Nachbargebäude Käthe-Kollwitz-Ufer 87 zerstört, bis auf kleinere Schäden blieb jedoch die Villa zur Lippe erhalten. Dies nahm die Familie dennoch zum Anlass, nach Oberkassel zu fliehen. Die einrückende Rote Armee requirierte das Gebäude für sich, die Familie wurde enteignet. Ab Anfang der 1950er Jahre, nach Auszug der Roten Armee, wurde dieses Gebäude durch den Stadtverband der Konsumgenossenschaften Dresden genutzt, bei dem es auch bis 1991 verblieb. Nach dem Auszug der Roten Armee gab es zeitweilig eine Nachttanzbar, „Kaskade“, im Haus, damals die einzige Nachttanzbar Dresdens. Nach 1991 übernahm der Sächsische Landkreistag das Gebäude, in dessen Auftrag es saniert wurde (bau- und raumakustische Planung: Ingenieurbüro Löwe, Tragwerksplanung: Firma Kröning·Ulbrich·Schröter aus Dresden). Es beherbergt neben dem Sächsischen Landkreistag die S-Factoring GmbH (ein Unternehmen der Ostsächsischen Sparkasse Dresden und der Sparkasse Leipzig) sowie weitere Büros. Der Delphinbrunnen (Wandbrunnen) an der Villa zur Lippe (2018) Delphinbrunnen An der dem Haus vorgelagerten Terrasse befindet sich ein Wandbrunnen. Mittig ist an der Terrassenmauer ein mit Pilastern gesäumter Rundbogen angesetzt worden. Er umrahmt das Relief einer Jakobsmuschel und trägt auf dem Schlussstein ein Löwenkopfmotiv. Die Jakobsmuschel wird von einem Delphin geziert, der auch als Wasserspeier dient: Aus seinem Maul fällt ein Wasserschleier in ein mit Blei ausgekleidetes halbrundes Becken, aus dem in einzelnen Rinnsalen das Wasser in ein darunter befindliches, ca. 2 Meter * 4 Meter beinahe rechteckiges Becken fällt. Der Brunnen ist saniert und betriebsbereit, wird aber nur selten in Funktion gesetzt.

add_def_ver("v_hoxhold","Hoxhold, Dresden","Photo Hoxhold, Dresden 1, (Hdlg mit photogt. Bedarfsgegenständen, 1918 Inh. Ernst Osk. Alfr. Hoxhold) 1918 Wettiner Str. 7");

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Gustave Eiffel Gustave Eiffel (Aufnahme von Nadar, 1888) Alexandre Gustave Eiffel [al?k's?~d? gys'ta?v ?'f?l] (* 15. Dezember 1832 als Alexandre Gustave Bonickhausen dit Eiffel in Dijon; † 27. Dezember 1923 in Paris) war ein französischer Ingenieur mit deutschen Vorfahren. Graph. Kunstanstalten 1940

Firmen Niedersadlitz 1900

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add_def_ver("v_hygienemuseum","Deutsches Hygienemuseum, Dresden","Verlag Deutsches Hygienemuseum, Dresden A. 1, Lingnerplatz 1");

Die Geschichte der Firma “Melitta” begann im Jahr 1908, als die Dresdner Hausfrau Melitta Bentz aus einem alten Messingtopf den ersten Kaffeefilter herstellte. Nach Durchlöchern des Bodens und dem Einlegen von Löschpapier gelang es ihr, den Kaffee so zu filtern, das der störende Kaffeesatz nicht mehr in die Tassen gelangen konnte. Nach einigen Experimenten mit verschiedenen Papiersorten ließ Melitta Bentz am 15. Dezember 1908 ihr Unternehmen ins Handelsregister eintragen und die Erfindung beim Reichspatentamt anmelden. Obwohl das Familienunternehmen, welches sie gemeinsam mit ihrem Mann zunächst in ihrer Wohnung auf der Marschallstraße 31 betrieb, nur über wenig Startkapital verfügte, gelang es schon bald, den neuartigen Filter in größeren Stückzahlen herzustellen und zu verkaufen (Foto) . Zunächst wurden die Kaffeefilter in Handarbeit gefertigt, später als Auftragsarbeit in verschiedenen Handwerksbetrieben. Da die Wohnräume für das Unternehmen schnell zu klein wurden, pachtete man 1914 eine ehemalige Schlosserei im Hinterhaus der Wilder-Mann-Straße 15 und richtete hier neue Produktionsräume ein. Nach dem Ersten Weltkrieg zog die Firma auf das Nachbargrundstück (Nr. 11-13) um, wo mehr Platz zur Verfügung stand. Zunächst wurden die Filter aus Aluminium, später auch aus Porzellan und Steingut hergestellt. Mitte der Zwanziger Jahre waren bereits auf über 100.000 Kaffeefilter verkauft worden. Da das bisherige Areal in Trachau nicht erweitert werden konnte, verlegten Hugo und Melitta Bentz ihr Unternehmen 1929 nach Minden in Westfalen, wo der Familienbetrieb bis heute seinen Sitz hat. Neben der 1937 in ihrer heutigen Form entwickelten Filtertüte werden von der Firmengruppe auch andere Haushaltsartikel wie Frischhaltefolien und Staubsaugerbeutel gefertigt. Außerdem ist das Unternehmen seit 1966 im Kaffeeverkauf tätig und besitzt die Markenrechte für Toppits, Swirl und Granini-Fruchtsäfte. Weltweit gehören derzeit ca. 3.200 Angestellte zur Melitta Unternehmensgruppe Bentz KG.

add_def_ver("v_t_krull","Th. Krull, Langebrück","Theodore Krull, Langebrück, Phot. Atelier, 1925 Dresdner Str. 24 HG");

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Gabriel Tola (* vor 1525 in Brescia, Italien; † wahrscheinlich vor 1575 in Dresden) war ein italienischstämmiger Maler und Musiker der Renaissance, der am sächsischen Hof in Dresden wirkte. 1549 wurden Gabriel Tola zusammen mit seinen jüngeren Brüdern Benedetto Tola sowie Quirino Tola durch den Fürstbischof von Trient, Cristoforo Madruzzo, von Brescia nach Dresden an den kursächsischen Hof unter Kurfürst Moritz entsandt, wo sie als Musiker, aber auch als Maler arbeiten sollten. Benedict und Gabriel arbeiteten bereits seit 1548 hier als Maler an den Sgraffito-Dekorationen bei der Erweiterung des Residenzschlosses und wirkten als erste Instrumentisten der kurfürstlichen Hofkapelle. Im Jahr 1563 malen sie eine Decke sowie ein Gewölbe im großen Schloßturm. Erhalten geblieben ist ein Briefwechsel mit dem Kurfürsten nach achtjähriger Dienstzeit am Dresdner Hof, in denen Versorgungsansprüche und Auftragsarbeiten behandelt werden. Das Todesjahr der Brüder ist nicht bekannt. Um 1575 kommt keiner der Brüder mehr in den Hofbüchern vor.

add_def_ver("v_iris","IRIS, Dresden","Kunstanstalt IRIS Oscar Baumgürtel, Dresden N 6, 1910 Großenhainer Str. 32");

Kunstanstalten

Das Hotel Bayerischer Hof Dresden ist ein familiengeführtes Vier-Sterne-Hotel in Dresden. Das Hotel liegt in der Antonstraße 33 in der westlichen Inneren Neustadt. Der Bahnhof Dresden-Neustadt liegt 200 Meter nördlich gegenüber. Das Hotel hat 56 Zimmer und Suiten. Geschichte 1855 wurde das Patrizierhaus erbaut. Es steht unter Denkmalschutz. Der Bahnhof Dresden-Neustadt gegenüber wurde 1901 gebaut. Nach der Wiedervereinigung wurde das Haus von 1992 bis Anfang 1994 komplett saniert. Von 1994 bis 2015 führte Karl Steinhauser das Hotel. Im April 2015 übergab er die Leitung an seine Tochter Carolin Steinhauser (* 1978), die seit 2012 auch Professorin für Internationales Hotelmanagement der SRH Hochschule Berlin am Campus Dresden ist.

add_def_ver("v_r_jahn","Rud. Jahn, Dresden","Verlag Rud. Jahn, Dresden, 1905 Waisenhausstr. 14");

add_def_ver("v_r1_jahn","R. Jahn, Rossendorf","Verlag R. Jahn, Schänkhübel Rossendorf, Bautzner Straße 13");

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Das Rathaus Mickten bestand von 1898 bis 1903 als Rathaus der selbständigen Gemeinde Mickten im Nordwesten von Dresden. Das Gebäude an der damaligen Böcklinstraße 17 (Adresse 2018: Scharfenberger Straße 2) wurde 1874 als Schule gebaut, 1898 als Gemeindeamt umgebaut und nur fünf Jahre später, nach der Eingemeindung Micktens nach Dresden 1903 erneut umgebaut in ein Wohnhaus, als das es noch heute dient. Inhaltsverzeichnis Erstmals wurde Mickten als Migtin 1378 erwähnt, der Name ist slawischen Ursprungs und kann sowohl ein Personenname sein, wie auch deutschen Siedler zugeordnet werden. 1468 wurde das seit 1421 existierende Vorwerk an den Bischof von Meißen verkauft, und nach dessen Auflösung die zugehörigen Fluren unter den ansässigen Bauern verteilt. 1590 war Mickten Amtsdorf von Dresden, 1764 eines des Amtes Meißen, seit 1843 unterstand es wieder dem Amt Dresden. Durch diese Wechsel gab es bis 1836 zwei Ortsrichter (Localgerichtspersonen). Mit Kleinmickten und Bortzschen befinden sich außerdem zwei Wüstungen auf der Micktener Flur. Für die ab dem 1. Mai 1839 geltende Sächsische Landgemeindeordnung von 1838 wurden auf deren Grundlage erstmals Gemeindevorsteher und Gemeindeältester sowie weitere Gemeindeausschußpersonen, d. h. eine eigene Gemeindeselbstverwaltung eingeführt. Gewählt wurden in Mickten noch 1838 der Gemeindevorstand, ein Gemeindeältester und sechs Gemeindeausschußpersonen. In dieser Zusammensetzung verblieb der Gemeinderat bis 1875. Damals wurde ein zweiter Gemeindeältester gewählt, diesem wurde zugleich die Polizeibefugnis für die an der Leipziger Straße neu entstehenden Siedlungen übertragen. 1886 wurde die Zusammensetzung des Gemeinderates neben dem Gemeindevorstand und zwei Gemeindeältesten auf acht Gemeindeausschußpersonen erweitert (drei aus den Grundbesitzern, drei aus den Häuslern, zwei aus den Unansässigen), was 1897 erneut geändert wurde: Der Gemeindeausschuß bestand ab dann statt aus acht aus nunmehr dreizehn Personen. Noch bis 1806 waren Gemeindeversammlungen üblich, die mit dem Ruf (wohl slawischen Ursprungs): Betscherremo (d. h. Kommt zusammen) eingeleitet wurden, und die an einem steinernen Tisch unter einer Linde in Altmickten stattfanden. Erst nach 1839 fanden diese regelmäßig in überdachten Räumlichkeiten statt, die allerdings einer Verwaltung ab den 1880er Jahren nicht mehr genügten. Die Gemeinde konnte sich allerdings nicht zu einem Rathausbau entschließen (wie die umliegenden Gemeinden ebenfalls nicht), sondern wählte das Modell aus der angrenzenden Nachbargemeinde Pieschen: Sie entschloss sich zwar, eine Schule neu zu bauen, und das ohnehin zu klein gewordene Schulgebäude als Rathaus zu nutzen, aber erst gegen Ende der 1890er Jahre, diese Idee auch umzusetzen. Das geschah nach dem Ausscheiden von Übigau aus dem Schulverband: Der damalige Schulneubau von 1898 ist heute (2018) die 41. Grundschule an der heutigen Hauptmannstraße 15 (damals: Jahnstraße), die bisherige Schule, die 1874 errichtet wurde, wurde zum Gemeindeamt (Rathaus) umgebaut. Elemente der alten Schule wurden beibehalten, wie der erhöhte Mittelrisalit, der im Giebeldreieck eine Uhr trug, wie auch der auf den First aufgesetzte Glockenturm: Äußerlich wurde vor allem die Fassade aufgewertet. Nur vier Jahre befand sich hier das Rathaus, auch mit seinem Beratungsraum für den Gemeinderat, 1903 erlosch die Eigenständigkeit der Gemeinde Mickten. Kurz darauf wurde das Haus zum Wohnhaus erneut umgebaut, es überstand die Folgezeit leidlich, erst in den 1990er Jahren wurde es saniert. Wenngleich heute einige repräsentative Fassadendetails fehlen (Simsbänder in den Brüstungsebenen, Dreiecksverdachung über dem Risalitfenster der ersten Etage, Zierspitzen in den beiden Zwerchgiebeln), so ist der Putzbau immer noch repräsentativ. Der auf den First aufgesetzte Glockenturm soll besonders an die ehemalige Schul- und Rathausnutzung erinnern, dies ist allerdings im öffentlichen Bewusstsein nicht mehr verankert.

Grabmal- & Steinmetzbetrieb Thomas Häsler Steinmetz- und Steinbildhauermeister Quohrener Str. 9 Dresden (Bühlau/Weißer Hirsch) Wir sind ein traditionell geführter Meisterbetrieb in der 4. Generation. Josef Häsler (Inh. von 1912-1945) übernahm 1912 das Grabmalatelier von Robert Aehlig. Sein Sohn Hansbernhard Häsler (Inh. von 1945-1987) führte ab 1945 den Betrieb weiter und übergab ihn 1987 an seinen Sohn Günther Häsler (Inh. von 1987-2012). Thomas Häsler führt den Betrieb seit 2012 in der 4. Generation fort. Wir gestalten bereits über 100 Jahre individuelle Grabmale und Denkmale aus Naturstein und blicken in unserem Handwerksbetrieb auf viele zufriedene Kunden zurück, unter anderem auch auf bekannte Persönlichkeiten wie zum Beispiel: General Wolkov (russischer Stadtkomandant von Dresden) Dr. h. c. Rudolf Friedrichs (Ministerpräsident von Sachsen) Willy Kleinoschegg (Schauspieler) Karl von Appen (Maler und Bühnenbildner) Prof. Dr. H.-E. Kleine-Natrop (Dermatologe, Medizinische Akademie) Prof. Dr. h. c. mult. Manfred Baron von Ardenne (Physiker) Heinz Melkus (Rennfahrer) ...wir hoffen auch für Sie ein individuell angefertigtes Grabmal gestalten zu dürfen. Ihre Firma Häsler

add_def_ver("v_o_heidrich","Oscar Heidrich, Dresden","Oscar Heidrich, Dresden N. 6, Metzer Str. 3");

add_def_ver("v_ot_jansen","Otto Jansen, Langebrück","Verlag d. Buch- u. Papierhandl. Otto Jansen, Langebrück, 1897 Dresdner Str. 55");

add_def_ver("v_t_janssen","Th. Janssen, Bühlau","Verlag Th. Janssen, Gastwirt, Bühlau, 1911 Bautzner Str. 80");

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Das Rathaus Lockwitz, korrekt das Gemeindeamt Lockwitz, bestand von 1919 bis 1930 als Rathaus der selbständigen Gemeinde Lockwitz im Südosten von Dresden. Das Gebäude mit der Adresse Am Plan 1 wurde 1880 als Wohnhaus gebaut und nach dem Ersten Weltkrieg als Gemeindeamt und Sparkasse umgebaut und 1930 seitens der Sparkasse teilweise als Wohnhaus wieder zurückgebaut, wobei es bei der Nutzung durch die Sparkasse verblieb, die das Gebäude 1993 sanierte und den Haupteingang an die Straßenseite verlegte. Erstes Gemeindeamt (bis 1919) Gemeindeamt von Lockwitz, Altlockwitz 33 (1907) Das sanierte Gebäude des ersten Gemeindeamtes (2012) Lockwitz wurde 1288 als Lucawitz erstmals erwähnt. Der Name leitet sich aus dem sorbischen „Lucavica“ ab und bedeutet „Ort am Wiesenbach“. Es war ein Platzgruppendorf mit zwei Siedlungskernen, die zunächst als Klein- und Großlockwitz unterschieden wurden, später bürgerte sich für die Siedlungskerne „Niederlockwitz“ (das heutige „Altlockwitz“) und „Oberlockwitz“ („Am Galgenberg“) ein. Schloss und Rittergut stammen in ihren Ursprüngen aus dem Mittelalter, das Rittergut war häufig im Besitz reicher Dresdner Familien. Dem Rittergut selbst war als Besonderheit nicht nur die „niedere Gerichtsbarkeit“, sondern auch die „obere Gerichtsbarkeit“ zugeordnet, d. h. sie konnte auch Bestrafungen gegen Leib und Leben verhängen. Die Wirtschaft des Ortes war geprägt durch Mehl- und Brothandel, 1723 werden vier Mühlen am Lockwitzbach verzeichnet. Im 19. Jahrhundert begann mit der Blütezeit der halbindustriellen Mühlenverarbeitung zur ersten Blütezeit des Ortes und zu dem Wandel zum bürgerlichen Ort; 1893 gründete schließlich Emil Donath aus Laubegast die erste Obstmostkelterei Sachsens. Für die ab dem 1. Mai 1839 geltende Sächsische Landgemeindeordnung von 1838 wurden auf deren Grundlage erstmals Gemeindevorsteher und Gemeindeältester sowie weitere Gemeindeausschußpersonen, d. h. eine eigene Gemeindeselbstverwaltung eingeführt und noch 1838 gewählt. Eine genaue Entstehungszeit eines eigenen Gemeindeamtes ist nicht bekannt. Dessen Notwendigkeit hing aber auch damit zusammen, dass sich von 1834 bis kurz nach 1890 die Einwohnerzahl von Lockwitz verdoppelte. Eingerichtet wurde es im Gebäude Altlockwitz 33, das etwa um 1700 errichtet wurde, zusammen mit der örtlichen Sparkasse, wo es bis nach Ende 1919 (bzw. bis in die 1920er Jahre nach Angaben des Besitzers im Jahr 2013 ) blieb. Danach war das Gebäude ein Vier-Familien-Haus und stand nach dem Auszug der letzten Familie leer. 2009 begann die Sanierung durch einen Privatmann für die Eigennutzung und für seine Familie, 2013 war sie im Wesentlichen abgeschlossen. Das Gebäude steht unter Denkmalschutz. Zweites Gemeindeamt (1919–1930) Gemeindeamt Lockwitz, Straßenfassade (2018) Das Gebäude des 2. Gemeindeamtes, das Gebäude, das hier als Rathaus Lockwitz bezeichnet wird, wurde 1880 mit unbekannter Nutzung errichtet und wahrscheinlich erst nach dem Ersten Weltkrieg zum Gemeindeamt mit örtlicher Sparkasse umgebaut, die Gemeinde selbst war darin nur Mieterin bis zur Eingemeindung nach Dresden 1930: Nachweisbar als Gemeindeamt ist es definitiv ab 1919, als unmittelbar davor die Haltestelle Gemeindeamt der Lockwitztalbahn eingerichtet wurde (1930, nach der Eingemeindung, wurde die Haltestelle in Am Plan umbenannt und ist noch so Bestandteil des Netzes des Öffentlichen Verkehrs in Dresden). Das Gebäude selbst war mindestens bis Ende des Zweiten Weltkrieges in Privatbesitz. Die ortseigene Sparkasse, danach die Stadtsparkasse Dresden und jetzt die Ostsächsische Sparkasse Dresden betrieb und betreibt darin noch heute eine Filiale. Vor und nach der Eingemeindung war eine Behördendienststelle, eine Nebenstelle der 29. Wohlfahrtspolizeiwache, hier untergebracht. Zu DDR-Zeiten war es, soweit nicht als Filiale genutzt, Wohnhaus. Bau und Nutzung Gebäude, wie dieses, entstanden nach 1870/71 zu Hunderten in den Dresdner Vororten: Eine streng achsensymmetrische Fassade mit einem repräsentativen Balkon zur Straßenseite, auf der Rückseite das Treppenhaus, das durch ein Türmchen bekrönt wurde. Applikationen der Neorenaissance an der Fassade erheben es nur wenig aus anderen Gebäuden heraus, seitlich (Nordseite zum Platz Am Plan) wurde die Aufschrift Gemeindeamt angebracht. In den späten 1950er Jahren wurde die Filiale der Sparkasse umgebaut, anstelle der Aufschrift Gemeindeamt ist nunmehr die plastische Anschrift Stadtsparkasse Dresden angebracht worden, die nach der Sanierung in ihren typischen Schriftzügen der 1950er Jahre erhalten blieb und heute eine Besonderheit dieses Gebäudes ist. Mit der Sanierung 1993 eines inzwischen völlig maroden Gebäudes (ein Foto von 1991 siehe Weblinks) wurde die martialisch wirkende Vergitterung entfernt und der bisher an der Gebäuderückseite befindliche Haupteingang ersetzt durch ein Treppenpodest zum neuen Haupteingang am Mittelrisalit an der Vorderseite des Gebäudes. Auch die Raumstruktur, die sich bis dahin erhalten hatte, wurde umgestaltet.

Kirche Schönborn:
Die erste Kapelle des Ortes wurde vermutlich bereits um 1250 errichtet. Genauere Angaben aus der Frühzeit fehlen, da alle Dokumente zur Kirchengeschichte bei einem Brand im 17. Jahrhundert verloren gingen. 1555 wird diese Kapelle als Filialkirche der Radeberger Stadtkirche bestätigt. Zwischen 1587 und 1608 entstand an gleicher Stelle eine neue Dorfkirche, die nach ihrer Zerstörung durch einen Blitzschlag in den Jahren 1653 bis 1664 wiederaufgebaut wurde. Dabei erhielt der schlichte Bau im Wesentlichen sein heutiges Aussehen mit dem achteckigen Dachreiter, welcher einen Kirchturm ersetzt. Die Weihe erfolgte am 13. Oktober 1664. Im Inneren finden ca. 200 Personen Platz. Älteste Teile des Bauwerks sind der noch zum Teil in romanischen Formen gestaltete Chor und die beim Brand vermutlich verschont gebliebene Sakristei mit einem spätgotischen Kreuzgratgewölbe. Emporen und Kanzel stammen aus der Zeit des Wiederaufbaus nach 1643. 1664 erhielt der Altar einen von Säulen getragenen Aufbau mit einer Darstellung des Heiligen Abendmahls sowie der Kreuzigungs- und Auferstehungsszene. Wappenbilder erinnern an die Stifter Caspar Heinrich und Hans Ulrich von Grünrodt. 1893/93 wurde dieser Altar neu gestaltet und in diesem Zusammenhang mit den Wappen des Grafen Karl von Brühl und seiner Gemahlin Else von Krosigk ergänzt. Die Orgel stammt aus dem Jahr 1832 und besitzt ein Prospekt in spätklassizistischen Formen. Geschaffen wurde sie in der Werkstatt von Friedrich Nikolaus Jahn. 1938 erfolgte eine umfassende Erneuerung durch Wilhelm Rühle. Bemerkenswert sind außerdem mehrere Bilder an der Empore mit Darstellung der 10 Gebote von 1929. Diese stammen, ebenso wie die Kanzel und ein Gemälde Martin Luthers von Georg Gelbke. Ein weiteres Gemälde “Christi Versuchung” wurde noch vor dem Ersten Weltkrieg von Carl Bertling geschaffen. Jüngstes Kunstwerk ist der 1964 geschaffene Ambo von Werner Juza. Im Dachreiter läuten zwei Bronzeglocken von 1926 und 1990. Zur Kirche gehört auch ein um 1560 angelegter kleiner Friedhof.

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Das Garde-Reiter-Denkmal in Dresden befand sich gegenüber an der heutigen Stauffenbergallee 12. Stadtwärts grenzt der Hechtpark an das Denkmalensemble, von dem nur noch der Sockel erhalten blieb. In der Albertstadt in Dresden befand sich das Garde-Reiter-Denkmal an der heutigen Stauffenbergallee Nummer 12 (vorher König-Georg-Allee) gegenüber dem ehemaligen Haupteingang der ehemaligen Garde-Reiter-Kaserne. Stadtwärts grenzt der Hechtpark an das Denkmalensemble. Das Denkmal erinnerte an die Treue zu König, Kaiser, dem Vaterland und der Pflichterfüllung und in Gedenken an die Gefallenen des ehemaligen Garde-Reiter-Regimentes in dessen 250jährigen Geschichte und hauptsächlich an die gefallenen Mitglieder im Ersten Weltkrieg. Planung und Ausführung Der Dresdner Wilhelm Herbert Lossow, Sohn des bekannten Dresdner Architekten William Lossow, fertigte im Auftrag von sächsischen Militär- und Kriegervereinen den Entwurf für das Denkmal. Es sollte ein hoch in den Himmel ragender Obelisk gestaltet werden, welcher alle Namen der Gefallenen präsentierte. Diese Namen, in Bronzebuchstaben angebracht, befanden sich an der Straßenseite und den Stirnseiten des Obelisken. Straßenseitig war ein Relief mit der Darstellung eines historischen Gardereiters im Kampf angebracht. Oberhalb des Reliefs trug ein auskragender Sims eine verjüngte quaderförmige Bekrönung. Das Denkmal bestand aus Pirnaer Sandstein und hatte eine Höhe von 7 Metern. Der Obelisk stand mittig in einer bastionsartigen Anlage mit in den Ecken befindlichen Sandsteinbänken. Der Dresdner Bildhauer Arthur Lange führte nach der Vorlage von Wilhelm Lossow die bildhauerischen Arbeiten aus. Bedeutung Das Garde-Reiter-Denkmal wurde am Sonnabend, dem 1. November 1919 feierlich eingeweiht. Die Zeremonie fand zeitgleich mit der Auflösung des traditionsreichen und stolzen Dresdner Garde-Reiter-Regiments und der Übernahme in die Reichswehr statt. Das Reiter-Regiment Nr. 12 zog nun in die Kaserne ein, in den 1930er Jahren übernahm die Wehrmacht das Objekt. Die Einweihung des ersten Ehrenmals für die Gefallenen des Ersten Weltkrieges in Dresden fand unter sehr großer Anteilnahme der Dresdner Bevölkerung statt. Unter den zahlreichen Ehrengästen befanden sich ehemalige Regimentsangehörige, das sächsische Offizierskorps mit seiner Königlichen Hoheit Ernst Heinrich von Sachsen, Veteranen und Delegationen der sächsischen Militärvereine sowie Angehörige von den Gefallenen. Nach Militärmusik und einer Ansprache des Hofpredigers Pfarrer Keßler erläuterte der Garde-General der Kavallerie Krug von Nidda die Bedeutung und die 250jährige Geschichte des Garde-Reiter-Regiments. Viele Künstler, Schriftsteller, Handwerksmeister, Ingenieure und andere bedeutende Persönlichkeiten, wie auch Reserveleutnant Wilhelm Lossow selbst, waren Angehörige dieser traditionsreichen Militäreinheit. Eine besondere Ehre war die Verlesung der Namen der Gefallenen des Ersten Weltkrieges: der 3 Beamten, 17 Offiziere, 15 Unteroffiziere und 73 Mannschaftsdienstgrade des Garde-Reiter-Regiments. Geschichte Dresden, Stauffenbergallee 12 (gegenüber) Garde-Reiter-Denkmal 2018 Dresden, Stauffenbergallee 12 (gegenüber) Garde-Reiter-Denkmal 2018 Alljährlich fanden ehrende Gedenkveranstaltungen am Garde-Reiter-Denkmal bis zum Kriegsausbruch 1939 statt. Die Bombardierung Dresdens 1945 überstand das Denkmal schadlos. In den anschließenden Nachkriegsjahren wurde es am 5. Juni 1946 allerdings von den kommunistischen Machthabern als militärisches faschistisches Denkmal von der Landesverwaltung Sachsen (Landesamt für Denkmalpflege) eingestuft. Um das Jahr 1953 erfolgte die Beseitigung des Obelisk. Übrig blieb die bastionsartige Anlage, welche in der weiteren DDR-Zeit dem Verfall preisgegeben war. Die erhaltenen Reste sollen nun bei einer Neugestaltung des Hechtparkes mit integriert werden. Zwischenzeitlich konnten im Jahr 2003 die Fundamente des Garde-Reiter-Denkmales durch Spendengelder vom Arbeitskreis Sächsischer Militärgeschichte e.V., der Landeshauptstadt Dresden, der Stadtsparkasse Dresden, der Sächsische Sandsteinwerke GmbH und des St. Heinrichs-Ordens e.V Bamberg und weiteren zahlreichen Spenden gesichert und erneuert werden. Auch wurde zur Erinnerung eine Gedenktafel aus Bronze angebracht.

add_def_ver("v_g_schmidt","Gustav Schmidt, Dresden","Kunstverlag Gustav Schmidt G.m.b.H., Dresden A. 19, 1906 Plauen, Westendstr. 19, 1920"+v_adr("rose003","Rosenstraße 3")+" 1909,15"+v_adr("west022","Westendring 22"));

Die heutige Berthold-Haupt-Straße geht auf einen ehemaligen Feldweg nach Kleinzschachwitz zurück, der 1897 unter Regie des Leubener Gemeindevorstands Dittrich zur Straße ausgebaut und zunächst Königs-Allee genannt wurde. Bereits 1840 hatte man diesen Weg als Dresden - Pillnitzer Chaussee verbreitert und als Zufahrt zur Elbfähre genutzt. 1925 errichtete die Baugenossenschaft zu Leuben zwischen Königsallee und Pirnaer Landstraße mehrere Wohnhäuser mit über 1500 Wohnungen, welche heute zur Gemeinnützigen Wohnungsbaugenossenschaft Dresden-Ost gehören. Die Straßenbahnstrecke nach Kleinzschachwitz ging 1936 in Betrieb. Foto: Die frühere Königs-Allee um 1920 Am 27. September 1945 wurde die Königs-Allee in Berthold-Haupt-Straße umbenannt. Berthold Haupt (1905-1933), gelernter Buchdrucker, engagierte sich in den Zwanziger Jahren in der Arbeiterbewegung und gehörte der Leubener Ortsgruppe der SPD an. Am 26. Februar 1933 wurde er bei einer Protestdemonstration gegen die Machtübernahme der Nazis in der Nähe des Postplatzes von SA-Leuten erschossen. An ihn erinnert ein Gedenkstein in der Nähe der Einmündung der Freischützstraße. Einzelne Gebäude: Papiermühle (Nr. 87/89): Die frühere Kleinzschachwitzer Papiermühle wurde 1854 unmittelbar an dem von Leuben nach Kleinzschachwitz führenden Weg errichtet. Erster Besitzer war August Friedrich Baumann. Der Gebäudekomplex bestand neben dem eigentlichen Mühlengebäude aus einem Wohnhaus und einem Schuppen. Der für den Antrieb des Wasserrades notwendige Mühlgraben zweigte in der Nähe des Putjatinhauses vom Lockwitzbach ab und führte von dort durch den heutigen Putjatinpark. 1870 verkaufte Baumann sein Unternehmen an den Papierfabrikanten Johann Dziuba. Dem Unternehmen war jedoch kein großer Erfolg vergönnt, so dass die Produktion bereits wenige Jahre später endete. 1887 übernahm Ernst Julius Büttner die leer stehenden Gebäude und richtete hier eine Brauerei ein. Für die Energieversorgung des Betriebes diente noch viele Jahre eine Wasserturbine, so dass der alte Mühlgraben auch weiterhin seine Funktion behielt. Um 1900 wurde die Brauerei Kleinzschachwitz zu einer Malzfabrik umgestaltet und auf Dampfmaschinenbetrieb umgestellt. Ab 1936 befand sie sich im Besitz des Braumeisters Alfred Kretschmer, dessen Familie das Unternehmen noch bis 1981 weiterführte. Danach nutzten einige Handwerksbetriebe die Räume. Seit 2004 befindet sich in den unter Denkmalschutz stehenden Gebäuden das Altenpflegeheim "In der Alten Mälzerei". Nr. 91: Das Ende des 19. Jahrhunderts errichtete Eckhaus beherbergte um die Jahrhundertwende das Restaurant "Waldpark" des Gastwirts Oskar Scharfe. Seit 2009 lädt in den Räumen Sachsens erstes Dunkelrestaurant mit dem Namen “Sinneswandel” zum Besuch ein. Speisen und Getränke werden in absoluter Dunkelheit serviert, um sich so voll auf Geruch und Geschmack konzentrieren zu können. Nr. 109: Dieses Grundstück auf Kleinzschachwitzer Flur befand sich ab 1864 im Besitz des Königlich-Sächsischen Geheimrates Hans Ludwig von Oppell. Oppell übte zwischen 1831 und 1853 das Amt des Dresdner Polizeidirektors aus und war durch Grundstücksgeschäfte in der Äußeren Neustadt zu Wohlstand gekommen. Auf ihn geht die Bezeichnung “Oppellvorstadt” für das heutige Hechtviertel zurück. Das ursprünglich vorhandene bescheidene Sommerhaus in Kleinzschachwitz wurde durch mehrfache Anbauten und Erweiterungen zum repräsentativen Landsitz und blieb über 100 Jahre in Familienbesitz. Nach 1990 wuren die Gebäude liebevoll saniert. Fährhaus (Nr. 130): Bemerkenswert ist die 1860 im Stil eines englischen Kastells errichtete Pontonierkaserne, die nach ihrer Fertigstellung bis 1911 Unterkunft der zur Bedienung der Pillnitzer Fähre eingesetzten Armeeeinheit war. Auch nach dem Betreiberwechsel der Elbfähre zur Sächsisch-Böhmischen Dampfschifffahrt blieb das Haus Aufenthaltsort der Fährleute. Später diente die einstige Kaserne viele Jahre als Verwaltungsgebäude der Dresdner Verkehrsbetriebe und beherbergt seit 2004 im Erdgeschoss eine Gaststätte (Foto). Ein weiteres Lokal befindet sich unmittelbar an der Fähre. Die kleine Schankwirtschaft mit Biergarten entstand 1949 und wurde im Volksmund auch “Holzoper” genannt.

add_def_ver("v_o_john","Otto John, Dresden","Lichtbildberei Otto John, Dresden A. 16, Holbeinstraße 95");

ku01: Ausländer- Galerie links vom Vestibül, (a) Wallot, übernommen von ba00

add_def_ver("v_g_junghanss","Gebr. Junghanß, Dresden","Verlag Gebr. Junghanß, Dresden 10, 1923 Pillnitzer Str. 11");

add_def_ver("v_brockmann","Brockmann's Nachf.","Verlag F. O. Brockmann's Nachf. Rud. Tamme, 1877 Albrechtsstr. 18");

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add_def_ver("v_kaden","Kaden, Dresden","Verlag Kaden & Comp., Dresden, 1905 Zwingerstr. 21 u. 22");

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Christian Gottfried Schul(t)ze (* 1749 in Dresden; † 22. Februar 1819 in Dresden) war ein deutscher (sächsischer) Kupferstecher. Schulze war der Sohn eines Gürtlers und erlernte den Beruf des Vaters. Nachdem er ausgelernt hatte, war er 5 Jahre lang bei ihm als Geselle tätig. Gleichzeitig besuchte er die Dresdner Akademie. 1772 wurde er auf Empfehlung des General-Direktors Christian Ludwig von Hagedorn als Hofstipendiat nach Paris geschickt, um sich bei Johann Georg Wille weiter auszubilden. Nach zehnjährigem Aufenthalt in Paris wurde Schulze als Hofkupferstecher nach Dresden berufen. Schulze arbeitete von 1783 an in Dresden.

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Walther Scholtz Werbeplakat für Graf-Schuwalow-Zigaretten Walther Scholtz (* 20. Februar 1861 in Dresden; † 2. August 1910 in Meersburg) war ein deutscher Genre-, Porträt- und Landschaftsmaler. Leben und Werke Walther Scholtz war ein Sohn des Malers Julius Scholtz. Er begann seine Ausbildung bei Ferdinand Pauwels und studierte später in München weiter. Scholtz' Bild Sonntagmorgen im Dachstübchen, das aus der Münchner Zeit stammte, wurde 1891 auf der Internationalen Kunstausstellung des Vereins der Berliner Künstler gezeigt, und im Jahr 1900 war er auf der 32. Großen Gemäldeausstellung des Kunstvereins in Bremen vertreten. Nicht immer stießen seine Werke auf Begeisterung. In der Zeitschrift für bildende Kunst und in der Kunstchronik hieß es im Jahr 1900, bezogen auf Gemälde Scholtz', die in Berlin zu sehen waren: „Aber das Unerfreulichste, was hier zu sehen ist, das ist eine Ausstellung von F. Walther Scholtz-Dresden.“ Paul Warncke führte weiter aus, die Masse der Bilder, die der wohl noch sehr junge Maler zeige, vermittle einen Eindruck der Öde, und ließ sich in aller Schärfe über einzelne Werke Scholtz' aus. Bei dem Bild mit dem Titel Rätsel sei es nur ein Rätsel, wie so etwas überhaupt ausgestellt werden könne, bei einem weiblichen Akt sei nur „gänzliche Ohnmacht in bezug auf Bewältigung des Vorwurfes“ zu erkennen, und Verlassen sei viel zu schwarz geraten. Andere Bilder ließen wenigstens ein gutes, wenn auch unreifes Talent erkennen, doch z. B. eine „in schreiendes Grün und Rot gekleidete weibliche Gestalt mit Riesenfüssen im Walde“ sei ein Beweis für einen „Mangel an zeichnerischer Fertigkeit, an Farbengefühl und eine Sucht, durch äußerliche Mittel zu wirken“, die Warncke als abstoßend empfand. Er empfahl, der Maler möge nicht wieder so aufdringlich hervortreten, bis er mehr gelernt habe. Ins Stadtmuseum Dresden gelangten laut Thieme-Becker zwei seiner Bilder, die Frauen bei der Pflege verwundeter Soldaten während der Schlacht von Dresden sowie einen Blick von der Brühlschen Terrasse zeigten. Er entwarf auch ein Plakat für die Dresdner Zigarettenfabrik Xanthi, das um 1905 als Chromolithographie vervielfältigt wurde. Ein Exemplar davon befindet sich unter der Inventarnummer SP 1981/6073 ebenfalls im Dresdner Stadtmuseum. Die Fabrik Xanthi gehörte Aron Ewzor Schulmann und produzierte unter anderem die Zigaretten der Marke „Graf Schuwalow“, für die das Plakat nach Scholtz' Entwurf warb. Es zeigt eine elegante junge Dame, die in einem Sessel lehnt und Rauchringe bläst. Die Marke wurde, als Russland Kriegsgegner des Deutschen Kaiserreichs im Ersten Weltkrieg wurde, in „Unsre Kraft“ umbenannt. Schulmanns Fabrik existierte bis in die 1920er Jahre. 1904 malte Scholtz das Brunntor in Kallmünz. Er starb nach kurzer schwerer Krankheit in Meersburg am Bodensee.

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Lockwitz: Schlossgärtnerei. Diese entstand Anfang des 18. Jahrhunderts auf Initiative des Rittergutsbesitzers Gotthelf Friedrich von Schönberg (1681–1746). Nachdem Erwerb der Herrschaft Lockwitz durch die Familie Kap-herr 1866 wurde sie um eine große Orangerie erweitert und mit einer Mauer umgeben

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add_def_ver("v_c_kasten","Curt Kasten, Cotta","Buchdruckerei Curt Kasten, Cotta, 1897 Heinrichstr. 13");

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add_def_ver("v_e_kasten","E. Kasten, Plauen","Verlag Emma Kasten, Plauen- Dresden, Zwickauer Str. 97");

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add_def_ver("v_r_kaestner","R. Kästner, Dresden","Verlag Richard Kästner, Dresden 19, 1906 Bergmannstr. 40");

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add_def_ver("v_a_nora","Atelier Nora, Dresden, Cirkusstr. 36");

add_def_ver("v_f_kayenberg","F. Kayenberg, Dresden","Ferdinand Kayenberg, Dresden- A. 19, 1920 Handlung für photogr. Apparate und Bedarfsgegenst. Augsburger Str. 78 u. Wormser Str. 68");

.vas -> Anlegestelle / Fähre trennen

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pirnaischer Platz -> pirnaische vorstadt

add_def_ver("v_keil-vinke","Keil & Vinke, Dresden","Keil & Vinke, Dresden- A., 1906 Grunaer Str. 12");

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Das ehemalige Verwaltungsgebäude der Landesbauernschaft Sachsen in der Dresdener Ammonstraße 8 wurde 1936–1938 von Otto Kohtz erbaut und war Dienstsitz der Landesbauernschaft Sachsen im Reichsnährstand. Bekannter wurde das Gebäude als Sitz der Reichsbahndirektion Dresden von 1948 bis 1993. Die Deutsche Bahn AG nutzt dieses inzwischen denkmalgeschützte Gebäude bis heute. Die Landesbauernschaft Sachsen wurde als nationalsozialistische ständische Zwangsorganisation für alle Bauern und Landwirte und landwirtschaftliche Unternehmen gemäß dem Gesetz über den Reichsnährstand vom 13. September 1933 gebildet, wobei gleichzeitig alle anderen berufsständischen Organisationen und öffentlich-rechtlichen Körperschaften (wie z. B. die Landwirtschaftskammern) aufgelöst wurden. Der Reichsnährstand selbst wurde u. a. in Landesverbände – hier die Landesbauernschaft Sachsen – untergliedert und verkörperte den nationalsozialistischen Grundsatz von Blut und Boden. Landesbauernführer Sachsen war von Juli 1933 an Hellmut Körner, der bis dahin Präsident der Landwirtschaftskammer war und auch Initiator des Neubaus war. Für die sächsische Dienststelle des Reichsnährstandes wurden mehrere Grundstücke nördlich der Ammonstraße in der Nähe des Hauptbahnhofes ausgewählt, für deren Überplanung und die architektonische Gestaltung nach einem Wettbewerb der Architekt Otto Kohtz (1880–1956) ausgewählt wurde. Das Gebäude wurde von ihm 1936–1938 errichtet und von der Landesbauernschaft bzw. dem Reichsnährstand bis 1945 genutzt. Aufgrund Eisenmangels konnte das Gebäude bereits vor Ausbruch des Zweiten Weltkrieges nur in Pfeilermauerwerk errichtet werden. Lediglich der Mittelteil mit rückwärtigem Flügel wurde als Stahlskelettbau ausgeführt. Bei den Luftangriffen auf Dresden vom 13. bis 15. Februar 1945 wurde auch dieses Gebäude erheblich beschädigt, war jedoch nur teilzerstört. Allerdings wurde das Hauptgebäude der bis dahin westlich vom Dresdner Hauptbahnhof am Wiener Platz und südlich längs der Wiener Straße befindenden Reichsbahndirektion (Rbd) Dresden völlig zerstört. Ihre Tätigkeit als Reichsbahndirektion musste danach ausgelagert und provisorisch fortgesetzt werden und war schließlich über 24 verschiedene Stellen im zerstörten Stadtgebiet verteilt. Um die Arbeitsfähigkeit dieser Verwaltung wiederherzustellen, wurde 1946 das teilzerstörte Gebäude der aufgelösten Landesbauernschaft Sachsen als Verwaltungssitz der Rbd Dresden zugewiesen und durch diese wieder auf- und umgebaut und am 15. Mai 1948 als solches eingeweiht. Nach Auflösung der Reichsbahndirektion Dresden am 31. Dezember 1993 verblieb das Gebäude im Eigentum der Deutschen Bahn AG, die es bis heute für verschiedene Dienststellen nutzt. Beschreibung Flügelrad über dem Haupteingang von 1948 (2007) Otto Kohtz entwarf einen kammartigen, lang gestreckten fünfstöckigen Verwaltungsbau in sachlicher Formensprache mit Elementen des Neoklassizismus. Er wurde an der Schauseite mit einer zweigeschossigen Sockelzone aus Werkstein und einem sich darüber drei Stockwerke erhebenden Hauptbau gestaltet, nach hinten öffnen sich drei Flügel mit nur einfacher Gestaltung. Darüber befindet sich ein sehr flach geneigtes Dach, das als Flachdach wahrgenommen wird und ursprünglich aus verzinktem Eisenblech bestand. Die langen monotonen Fensterreihen als sachliche Lochfassade sind zwar typisch für eine in der NS-Zeit fortlaufende Moderne, es ist jedoch ungewöhnlich, dass die Fenster keine Unterteilung in Sprossen erhielten. Einziger Gliederungspunkt ist das hervorgerückte Entree als kantiger Vorbau. Durch sieben offene, streng rechtwinklige Tore wird von dort aus die Vorhalle erschlossen, von der aus sich ein großzügiges Treppenhaus anschließt. Das Bürohaus ist architektonisch ganz in der Horizontalen gelagert und entspricht damit auch den Intentionen des damaligen Stadtbaurates Paul Wolf (1879–1957), der sich gegen (weitere) Hochhäuser in der Altstadt verwahrte. Das vor 1945 außen angebrachte bildkünstlerische Werk unterstrich suggestiv die Propaganda, welche von Herbert Volwahsen (1906–1988) bewusst als Gegenreflex zu Moderne und Internationalisierung eingesetzt wurde. Als weitere NS-Kunstwerke fertigten der Dresdner Maler Sizzo Stief (1900–1975) das Sgraffito am Mittelflügel des Portales zur Feldgasse, Paul Rößler (1873–1957) das ehemalige Hallengemälde und der Maler Hans Nadler sen. (1879–1958), der die erste Etage ausgestaltete. Alle diese Werke sind 1946–1948 entfernt worden. Nur noch zwei sandsteinerne Fruchtkörbe (von Otto Rost (1887–1970)) deuten in der Eingangshalle an der Treppe auf den ursprünglichen Zweck des Verwaltungsbaus hin. Seit 1948 befinden sich zwei Wandfresken – Planung und Bau sowie Betrieb und Verkehr – links und rechts an den Stirnseiten in der Eingangshalle. Ästhetisch ist diese grafisch gehaltene schwarz-weiße Sgraffito-Kunst einerseits in die propagandistisch gefärbte (ost-)deutsche Nachkriegskunst einzuordnen. Stilistisch knüpfen die Darstellungen allerdings auch an die wenig abstrakte Heimatkunst und Ästhetik während der 1930er und frühen 1940er Jahre an. Diese Fresken wurden von der Deutschen Bahn AG (als Rechtsnachfolgerin der Deutschen Reichsbahn), wie das gesamte Haus, 2004 umfassend saniert. Sie sind in der Eingangshalle an Werktagen öffentlich zugänglich.

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add_def_ver("v_j_kleiner","Johs. Kleiner, Langebrück","Johannes Kleiner, Langebrück, 1907 Hauptstr. 7);

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add_def_ver("v_w_klemich","Wilh. Klemich, Dresden","Wilhelm Klemich & Co., Dresden- A.,"+v_adr("wall012","Wallstraße 12")+"1903 Druckerei Permoserstr. 6");

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wölfnitz eigener stadtteil

add_def_ver("v_l_klemich","Louis Klemich, Dresden","Louis Klemich, Dresden, Postplatz, 1900 Steindruckerei, Papierhandlung, Zwingerstr. 2");

add_def_ver("v_g_klemm","Georg Klemm, Dresden","Verlag Georg Klemm, Dresden- Weißer Hirsch, 1930 Bautzner Landstr. 12");

Altlöbtau bildet den Kern des 1068 erstmals erwähnten Dorfes, welches Mitte des 15. Jahrhunderts aus zwölf Bauernstellen bestand. Bis 1830 blieb diese Größe des Dorfes fast unverändert bestehen. Als Mittelpunkt des Ortes wurde der Dorfplatz von mehreren alten Verbindungswegen durchschnitten, welche später der fortschreitenden Bebauung weichen mussten. So führte eine einst als “Dresdner Weg” bezeichnete Verbindung von der Weißeritzbrücke kommend direkt auf den Anger und von dort weiter in Richtung Wölfnitz. Bis zu seiner Einziehung 1892 trug der Abschnitt zwischen Dorfplatz und der heutigen Löbtauer Straße den Namen Pflaumenallee, der westlich an den Platz anschließende Teil den Namen Feld- bzw. Wiesenweg. Südlich des alten Dorfkerns befand sich im 18. Jahrhundert ein künstlich angelegter Teich, welcher als “Brühlsches Wasserreservoir” der Wasserversorgung des Neptunbrunnens auf dem Areal des Brühlschen Palais in der Friedrichstadt diente. Für diesen Zweck hatte der sächsische Premierminister Heinrich von Brühl am 25. Juni 1743 mehrere Flurstücke von Löbtauer Bauern erworben und von hier eine Röhrfahrt in die Friedrichstadt anlegen lassen. Die Versorgung des Teiches erfolgte von Plauen aus mit Hilfe eines Wasserkunsthauses, welches bei Bedarf über ein Schöpfrad das Wasser der Weißeritz nach Löbtau leitete. Nach Zerstörung der Anlage im Siebenjährigen Krieg verlandete der Teich und ist bereits 1782 als “gänzlich verfallen” erwähnt. Auf dem später als “Am Teiche” bezeichneten Grundstück entstanden Ende des 19. Jahrhunderts Wohnhäuser. Im Zuge der Industrialisierung verlor die landwirtschaftliche Nutzung der Ortsflur an Bedeutung. Bereits 1874 existierten nur noch vier Bauerngüter. Zu dieser Zeit verschwand auch der letzte von einst vier Teichen am Dorfplatz. Zuvor war das gemeindeeigene Grundstück als Wasserreservoir und zeitweise auch als Obstgarten genutzt worden. Auch vom einstigen Löbtauer Dorfbach ist heute nichts mehr zu sehen. Heute haben sich um den früheren Dorfplatz nur wenige Reste der dörflichen Vergangenheit des Ortes erhalten, so die Gehöfte Nr. 4 mit einem Torbogen von 1834 (Foto) und Nr. 18. Das erstgenannte Gut entstand in heutiger Form 1868 (Schlussstein am Wohnhaus) und beherbergte noch bis in die 1950er Jahre ein Stellmacherwerkstatt. Einige Lücken wurden in den letzten Jahren mit an die vorhandene Bebauung angepassten Wohnhäusern geschlossen. Der Dorfanger selbst ist heute mit einem Kinderspielplatz parkartig gestaltet. Einzelne Gebäude Dorfgasthof: Die Geschichte des Löbtauer Dorfgasthofs begann im Jahr 1717, als der Ortsrichter George Barth den bislang üblichen Reiheschank und damit Schankgerechtigkeit für sein Gut Altlöbtau 9 erwarb. In der Folge baute er dieses Anwesen zum Gasthof aus und richtete im Oberschoss sogar einen Tanzsaal ein. 1754 erwarb der Fleischhauer Jeremias Naumann ein Grundstück an der heutigen Lübecker Straße 19 und betrieb dort eine Fleischerei. Obwohl das Recht auf den Ausschank von Bier und Branntwein zunächst verboten war, scheint Naumann in seinem Gebäude ebenfalls Gäste bewirtet zu haben, was zu Differenzen mit der bestehenden Schankwirtschaft führte. Erst eine Entscheidung des Kurfürsten legte diesen Streit 1780 bei. Im 19. Jahrhundert entwickelte sich Naumanns Haus zum Löbtauer Dorfgasthof und wurde später bis zur Zerstörung 1945 als “Bürgergarten” bezeichnet. Gemeindearmenhaus: Bereits Ende des 18. Jahrhunderts besaß Löbtau ein sogenanntes “Gemeindehaus” (Dorfplatz 8), in welchem mittellose und hilfsbedürftige Einwohner Obdach fanden. Ab 1770 befand sich hier die Wohnung des Schullehrers und dessen Unterrichtsraum. Nach Verlegung der Dorfschule übernahm der Nachtwächter des Ortes die Räume. Das Gebäude wurde 1889 wegen Baufälligkeit abgerissen. Danach nutzte man bis zur Eingemeindung einige Gebäude des Kochschen Gutes (Nr. 4) als Ortsarmen- und -krankenhaus. Zugleich diente dieses Haus als “Besserungsanstalt” für Jugendliche und besaß deshalb eine Arrestzelle für kleinere Vergehen. Auch dieses Gebäude ist heute nicht mehr erhalten. Windmühlen: Etwas abseits des Dorfkerns am Lerchenberg gab es wahrscheinlich schon im Mittelalter eine Windmühle. Eine weitere wurde im 16. Jahrhundert in unmittelbarer Nachbarschaft errichtet. Beide Mühlen gehörten der Familie Moses (Moyses), welche zugleich Inhaber eines Mühlenhofes an der Weißeritz war. Mit Erlass des Mahlzwanges zur Plauener Hofmühle durch Kurfürst August 1569 entzog dieser der Familie Moses die Mahlgerechtigkeit, was zur Stillegung der Mühlen führte. Auf dem Grundstück des Mühlenhofes entstand später der Reisewitzsche Garten. 1626 sind in Löbtau erneut zwei Bockwindmühlen verzeichnet. Beide standen in der Nähe der Weißeritz neben der Pulvermühle und wurde 1642 wahrscheinlich bei Kampfhandlungen des Dreißigjährigen Krieges zerstört. 1794 finden sich erneut vier Windmühlen am sogenannten Löbtauer Schlag”. Diese wurden noch bis ins 19. Jahrhundert von Pächtern betrieben. Erst die Einführung moderner Mühlen führten um 1850 zum Abriss der Löbtauer Windmühlen

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Die Wehlener Straße ist Teil der wichtigen in Richtung Osten führenden Verbindungsstraße zwischen dem Stadtzentrum und Kleinzschachwitz. Ihren Namen, den sie nur auf Tolkewitzer Flur trägt, erhielt sie nach der kleinen Stadt Wehlen in der Sächsischen Schweiz. Vor der Eingemeindung wurde sie Dresdner Straße genannt. Ältestes Zeugnis ist ein mittelalterliches Sühnekreuz in der Nähe der Brücke des Niedersedlitzer Flutgrabens (Foto). Noch um 1880 führte die Straße zwischen der Ortsgrenze zu Neugruna und dem Tolkewitzer Dorfkern weitgehend durch bewaldetes Gebiet. Erst nach Anlage des Johannisfriedhofes, dem Bau des Straßenbahnhofes und des Tolkewitzer Wasserwerkes entstanden hier Wohn- und Geschäftshäuser, Blumengeschäfte und Steinmetzwerkstätten, die für den Bedarf des Friedhofes produzierten. Hinzu kamen ausgedehnte Flächen für die ortsansässigen Gärtnereien. Bekannteste Unternehmen dieser Branche waren neben der Baumschule Hauber die um 1919 gegründete Gärtnerei Schleinitz sowie die Gärtnerei von Ludwig Richard Richter. Diese befand sich ursprünglich am Pohlandplatz und wurde erst 1900 ins Tännicht verlegt. Der Volksmund nannte den Betrieb wegen seiner abseitigen Lage vom Ort “Sansibar”. Der Abschnitt zwischen Wasserwerk und Alttolkewitz blieb hingegen bis heute unbebaut, da die Flächen als Überschwemmungsgebiet der Elbe in Hochwasserzeiten dienen. Foto: Historische Ansicht der Wehlener Straße / Ecke Bellingrathstraße. Im linken Eckhaus befand sich früher das Hotel Sachsen-Hof. Einzelne Gebäude: Gasthof “Zum Anker”: Das kleine Lokal entstand um 1880 auf der Wehlener Straße 26 und gehörte mit seinem Gästegarten zu den beliebtesten Lokalen im Ortsteil Neutolkewitz. Nr. 27: Die Ende des 19. Jahrhunderts entstandene sogenannte “Richtersche Villa” wurde nach 1945 als Sowjetische Kommandantur genutzt. Nr. 28 (Bäckerei Gradel): Das traditionsreiche Familienunternehmen wurde 1919 von Max Gradel auf der Striesener Straße 27/29 gegründet und bestand aus einer Konditorei mit angeschlossenem Café sowie einem zugehörigen Lieferservice. 1945 fiel das Gebäude den Bomben zum Opfer, so dass Gradel seinen Betrieb 1949 zur Wehlener Straße 28 nach Tolkewitz verlegen musste. Hier wird die Firma als älteste ununterbrochen in Familienbesitz befindliche Konditorei Dresdens bis heute fortgeführt. Straßenbahnhof Tolkewitz: Nachdem Tolkewitz und Laubegast bereits 1893 Straßenbahnanschluss erhalten hatten, entstand ab 1896 auf dem Gelände eines früheren Bauerngutes der Tolkewitzer Straßenbahnhof. In diesem Jahr erwarb die Dresdner Straßenbahn-Gesellschaft vom Bauern Palitzsch 100.000 m² Ackerland und ließ hier zwei Abstellhallen errichten. 1899 konnte die Anlage in Betrieb genommen werden. 1901 folgte an der Schlömilchstraße ein eigenes Kraftwerk zur Stromversorgung des Betriebshofes. Hinzu kamen ein Verwaltungsgebäude und verschiedene Nebenanlagen. Nach seiner Erweiterung zwischen 1924 und 1927 um zwei zusätzliche Hallen und die Inbetriebnahme der Hauptwerkstatt an der Kipsdorfer Straße war der Tolkewitzer Straßenbahnhof größter Betriebshof der Stadt. In den Räumen des stillgelegten Kraftwerkes richtete man 1928 ein Volksbad für die Angestellten ein. 1945 führten Bombenabwürfe zu erheblichen Schäden an den Gebäuden. Trotzdem gelang schon 1947 die Wiederinbetriebnahme des Straßenbahnhofes. Ab 1969 war der Betriebshof Hauptwerkstatt der Dresdner Verkehrsbetriebe und für die Wartung eines Großteils der Straßenbahnfahrzeuge zuständig. Größeren Schaden richtete 1986 ein Brand in den unter Denkmalschutz stehenden Hallen an. In den Jahren nach 1990 wurden Teile der Betriebswerkstätten nach Trachenberge und Gorbitz verlegt und der Straßenbahnhof am 3. September 2007 komplett geschlossen. Künftig ist hier der Neubau eines Gymnasiums und einer Oberschule geplant. Dafür wurden die ehemaligen Hallen 2016 zum Großteil abgerissen, weitere Gebäude bleiben aus Gründen des Denkmalschutzes erhalten. Die Fertigstellung ist für 2017 vorgesehen. Fotos: Der Straßenbahnhof Tolkewitz um 1910 (links) und 2004 (Mitte/rechts) Gutshof Hauber (Nr. 62): Die Gebäude des Gutshofes Hauber entstanden um 1850 und waren ab 1920 Betriebsteil der bekannten Tolkewitzer Baumschule Hauber. Inhaber war der aus Stuttgart stammende Gärtnermeister Paul Hauber (1867-1930), der zuvor als Obergärtner in der Baumschule Mietzsch in Niedersedlitz beschäftigt war. 1893 gründete Hauber mit finanzieller Unterstützung des wohlhabenden Bankiers Arthur Pekrun eine Baumschule für Form- und Spalierobst. Das Unternehmen an der Kipsdorfer Straße entwickelte sich in den Folgejahren zu einem der bedeutendsten Gärtnereibetriebe im Dresdner Raum und züchtete neben Obstbäumen auch Rosen, Koniferen und andere Ziergehölze. Der wirtschaftliche Erfolg ermöglichte Paul Hauber 1896 den Bau einer Villa in Tolkewitz. 1911 erwarb er zwei Pavillons der I. Internationalen Hygieneausstellung und ließ diese auf sein Betriebsgelände umsetzen, wo sie als Kontor und Packschuppen genutzt wurden. Nach dem Ersten Weltkrieg kam der Gutshof Wehlener Straße 62 dazu. Der mit zahlreichen internationalen Preisen ausgezeichnete Gartenbaubetrieb blieb noch bis 1952 in Privatbesitz, wurde dann jedoch verstaatlicht und bis 1989 vom VEG Saatzucht-Baumschulen genutzt. Die Gebäude des Gutshofes dienten nun als kirchliches Heim, später als Wohnhaus. 1995/97 wurde der Gutshof Hauber zu einem Hotel mit öffentlicher Gaststätte umgebaut.

add_def_ver("v_a_klimpel","A. Klimpel, Torna","Verlag A. Klimpel, Torna, Am Goldenen Stiefel 8");

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Hans Körnig: 1905 am 22. Juni in Flöha (Sachsen) geboren 1916 Umzug nach Dresden 1919-1929 Lehre und Arbeit als Elektriker 1930-33 Studium an der Kunstakademie Dresden bei den Professoren Richard Müller, Hermann Dittrich, Ferdinand Dorsch und Max Feldbauer 1935 Einzug in das Dachbodenatelier im Wallgäßchen Nr. 1b/ 4.Stock, welches ihm der Architekt Jährig ausgebaut hatte 1989 14. Oktober, Freitod in Niederwinkling

Hans Körnig (* 22. Juni 1905 in Flöha; † 14. Oktober 1989 in Niederwinkling) war ein deutscher Maler und Grafiker, dessen Hauptwerk im Dresden der 1950er Jahre entstand und eng mit der Stadt verbunden ist. Als Grafiker widmete er sich bevorzugt der Technik der Aquatintaradierung. Hans Körnig wuchs in Flöha auf, wo seine Eltern das Bahnhofshotel und -restaurant führten. Die Familie zog 1916 nach Dresden und Körnig begann dort 1919 eine Elektrikerlehre. In seiner freien Zeit zeichnete er und lernte Klavier spielen. Von 1930 bis 1933 studierte Körnig an der Kunstakademie Dresden. Er war von 1930 bis 1932 Schüler von Richard Müller und Hermann Dittrich, von 1932 bis 1933 von Ferdinand Dorsch und Max Feldbauer. 1933 verließ Körnig die Kunstakademie aus stillem Protest gegen die Entlassung von Otto Dix. Danach war Körnig als freier Künstler tätig. Er lernte die Pianistin Elise Schwabhäuser kennen, eine ehemalige Schülerin Liszts. Sie wurde in der folgenden Zeit seine Mäzenatin. 1935 und 1936 begleitete er sie auf mehrwöchigen Italienreisen, auf denen er Venedig, Florenz, Rom, Neapel, Mailand, den Gardasee und auch die Schweiz kennenlernte. 1937 folgten ein ausgedehnter Parisaufenthalt und ein kurzer Abstecher nach Südfrankreich. Unter dem Einfluss dieser Reisen wurde Körnigs Malstil freier, er schwelgte in wahren Farborgien, wie er später bekannte. Im Jahre 1940 wurde er zum Kriegsdienst eingezogen und kam an die Front in die Sowjetunion. Während eines Rückzugsgefechts 1945 erlitt er eine Verletzung am rechten Unterschenkel, der daraufhin amputiert werden musste. Im August 1945 kehrte er aus sowjetischer Kriegsgefangenschaft nach Dresden zurück.

Die Clara-Zetkin-Straße, früher nach dem Politiker und Dresdner Ehrenbürger Hermann von Nostitz-Wallwitz (1826-1906) Wallwitzstraße genannt, erhielt 1956 den Namen der sozialistischen Politikerin Clara Zetkin (1857-1933), die bis 1933 Alterspräsidentin des Deutschen Reichstags war und zahlreiche sozialkritische Schriften veröffentlichte. Auf ihre Initiative wurde 1910 der Internationale Frauentag eingeführt. Während der benachbarte Clara-Zetkin-Platz 1993 in Bonhoefferplatz umbenannt wurde, behielt die Straße bis heute ihren Namen. An dieser wurde 1877 die Bürgerschule Löbtau (heute 35. Oberschule) und 1936 die Hoffnungskirche errichtet. Während die Gebäude im unteren Teil bereits in den Jahren nach 1900 entstanden, blieb der obere Straßenabschnitt zunächst unbebaut (Foto um 1910) . Nach dem Ersten Weltkrieg errichteten verschiedene Baugesellschaften Wohnblocks. Außerdem existierte hier noch bis 1992 eine Gärtnerei. 2003 wurde auf deren Areal mit dem Bau der Wohnsiedlung “Am Roßthaler Bach” mit Einfamilien- und Doppelhäusern begonnen. Einzelne Gebäude: Restaurant “Bacchus” (Nr. 15): Das um 1890 errichtete Eckhaus zur Klingestraße beherbergte ursprünglich die Gaststätte “Zur Tulpe”. Nach dem Ersten Weltkrieg wurde diese in “Pilsner- Bierstuben - Löbtauer Casino” umbenannt und existierte unter diesem Namen bis Ende 1978. Danach übernahm das Gastronomenpaar Zepp die Räume und eröffnete hier am 29. November 1979 das Weinlokal “Bacchus” mit 65 Plätzen im Gastraum und im angrenzenden “Bacchuszimmer”. Wegen seiner eleganten Ausstattung, der guten Küche und seiner großen Weinauswahl erwarb sich die Gaststätte einen guten Ruf weit über Löbtau hinaus. Nach mehrfachem Betreiberwechsels befindet sich hier seit 2008 das Restaurant & Weingarten Art Culinare Bacchus. Das äußerlich weitgehend unveränderte Gebäude steht als Baudenkmal unter Schutz. Wallwitzburg (Nr. 21): Auch in diesem Eckhaus an der Einmündung der Dölzschener Straße befand sich in den Erdgeschossräumen früher eine Gaststätte, welche in Anlehnung an den Straßennamen “Wallwitzburg” genannt wurde (Foto). Am 5. September 1905 gründeten Löbtauer Fußballer hier den Sportverein “Löbtauer Viktoria” (seit 1908 Dresdner Spielvereinigung 05). Das nach 1945 geschlossene Lokal wird heute als Büro einer Versicherungsagentur genutzt. Nr. 23 und 25: Die beiden um ca. 1900 erbauten Mietshäuser gehören zu einer Wohnhausgruppe an der Ecke Clara-Zetkin-Straße / Zauckeroder Straße. Sie wurden, ebenso wie die ehemalige “Wallwitzburg” und die Mietshäuser Zauckeroder Straße 1 bis 7, durch den Löbtauer Unternehmer Richard Riedrich errichtet und weisen ähnliche architektonische Gestaltungsformen auf. Riedrich war Inhaber eines Baugewerkes und hatte seinen Firmensitz auf der Zauckeroder Straße 1. Nr. 27/29: Das Doppelhaus an der Einmündung zur Zauckeroder Straße wurde 1926 gebaut. Architekt war Curt Herfurth. Zigarettenfabrik Casanova (später Aurelia) (Nr. 33): Das Unternehmen wurde kurz nach der Jahrhundertwende im Hintergebäude der Wallwitzstraße 33 gegründet und ist 1907 erstmals im Adressbuch genannt. Besitzer der “Casanova Cigarettenfabrik” war der Unternehmer Caspar August. Neuhaus, dessen Initialien “C A N” auch das Markenzeichen des Unternehmens bildeten, stammte aus Nordrhein-Westfalen und war Inhaber einer Zigarrenfabrik in Schwetzingen. Ab 1913 war er Abgeordneter der Deutschen Zentrumspartei im Reichstag. In der Dresdner Niederlassung wurden überwiegend Zigaretten der Marken “Kranz”, “Mirko” und “Rubens” hergestellt. 1912 erfolgte eine Erweiterung der Betriebsgebäude. Nach dem Tod von Neuhaus 1926 ging das Unternehmen in den Besitz der Berliner Zigarettenfabrikanten Garbáty über. Die jüdische Familie gehörte bis 1929 zu den bedeutendsten Herstellern der Branche und besaß neben dem Stammwerk in Berlin zahlreiche Niederlassungen im In- und Ausland. 1929/30 wurde die Firma an den Reemtsma-Konzern verkauft. Ab 1933 war der Dresdner Unternehmer Ernst Karl Müller Inhaber der Zigarettenfabrik auf der Wallwitzstraße 33. Diese firmierte nun bis 1945 unter dem Namen “Aurelia” und stellte Zigaretten der Marken “Araber” und Sultan” her. Nach 1945 siedelte sich auf dem Grundstück Nr. 31/33 eine Niederlassung des VEB Prüfgerätewerks Medingen an. Heute werden die Räume vom Nachfolgeunternehmen P-D Industriegesellschaft mbH Prüfgerätewerk Dresden und weiteren Gewerbetreibenden genutzt. Feuerwache Löbtau: Bereits um 1870 hatte die damals noch selbstständige Gemeinde Löbtau am südlichen Rand der bebauten Gemeindeflur ein größeres Areal erworben, um hier gemeindeeigene Gebäude errichten zu können. U.a war der Bau eines Schlachthofes geplant, was jedoch nicht zustande kam. Stattdessen wurde 1877 die Löbtauer Bürgerschule gebaut (heute 35. Oberschule). 1898 entstand auf dem Nachbargrundstück ein Feuerwehrdepot mit Verwaltungsgebäude, Steigerturm und Marstall (Foto rechts). Die Gebäude dienten der Unterbringung der Pferde und des Löschgerätes. Mit der Eingemeindung des Ortes übernahm die Stadt Dresden die Einrichtung und gliederte sie als “Feuerwache 7” in das städtische Rettungswesen ein. Auch nach 1945 blieb die Feuerwache in Betrieb und wurde ab 2007 grundlegend rekonstruktiert. Dabei entstand ein modernes Sozialgebäude mit Unterkunfts- und Sozialräumen (Foto links). Im Frühjahr 2009 konnte die Wache eingeweiht werden. Sie besitzt acht Stellplätze für Feuerwehr- und Rettungsdienstfahrzeuge sowie Unterstellmöglichkeiten für Löschtechnik. Die Feuerwache ist zuständig für die westlichen Dresdner Stadtteile Altfranken, Gompitz; Gorbitz, Naußlitz, Löbtau, Plauen, Coschütz und Gittersee. Außerdem dient sie als Stützpunkt des Höhenrettungsdienstes. Theater 50: Die kleine Bühne wurde 1986 von der Künstlergruppe “salto vitale” gegründet und hatte ihr Domizil im Erdgeschoss des Hauses Clara-Zetkin-Straße 44. Initiatoren des Kleinkunsttheaters waren die Dresdner Schauspieler Rainer König, Alf Mahlo, Ralf Herzog und Olaf Böhme. Nach 1990 wuchs das Interesse an den Veranstaltungen stark an, so dass das Theater 1994 in größere Räumlichkeiten an der Maternistraße verzog. In den früheren Räumen trat später noch mehrfach Olaf Böhme auf, bevor das nun “bebe” (Böhmes Bühne) genannte Kleintheater seine Pforten für immer schloss.

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add_def_ver("v_oa_klinkmueller","O. A. Klinkmüller, Langebrück","O. A. Klinkmüller, Photo, Bücher, Papier, Langebrück, Dresdner Str. 1");

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Funk, Felix (1905 - 1976) Ausbildung zum Porzellanmaler an der Zeichenschule der Staatlichen Porzellanmanufaktur Meißen 1926 – 1933 Studium an der Kunstakademie in Dresden bei Richard Müller, Hermann Dittrich, Ferdinand Dorsch, Max Feldbauer Meisterschüler von Georg Lührig 1932 erhielt Funk ein Ehrenzeugnis, Auszeichnung aus der Georg-Arnold-Stiftung und Jubiläumsstipendium der Stadt Dresden 1933 Großer Preis aus der Hugo-Göpfert-Stiftung 1933 Rompreis 1934 Aufenthalt in Italien weitere Malfahrten durch Süddeutschland, Schweiz, Nordafrika sowie nach Schweden, Belgien und Holland anlässlich seines 65. Geburtstages war dem Maler eine Sonderausstellung in der Dresdner Galerie ‚Kunst der Zeit’ zum 100. Geburtstag Sonderausstellung zum Lebenswerk im Heimatmuseum der Stadt Wilsdruff „Bildnis eines Geigers“ war längere Zeit im Bankettsaal der Meißner Albrechtsburg ausgestellt Mit Werken u. a. vertreten in Gemäldegalerie Neue Meister Dresden, Heimatmuseum Wilsdruff, Städtische Kunstsammlung Freital

Der heutige Ebertplatz wurde 1890 auf einer Freifläche in der Nähe der Weißeritz angelegt. Ursprünglich stand hier der Zirkusbau von August Schumann, der 1899 den Zirkus Renz in Berlin übernahm. Der neue Platz erhielt am 25. Februar 1891 den Namen Crispiplatz, benannt nach dem italienischen Staatsmann Francesco Crispi. Crispi (1819-1901) war ab 1887 Ministerpräsident des Königreiches Italien und enger Vertrauter Bismarcks. Löbtau unterhielt um 1900 freundschaftliche Kontakte mit Crispis Heimatstadt Palermo, die der Gemeinde 1901 eine Statue des Politikers schenkte. Um den Platz entstanden mehrgeschossige Wohn- und Geschäftshäuser sowie nach der Jahrhundertwende die Wohnanlage des Dresdner Spar- und Bauvereins. 1926 wurde der Crispiplatz in Ebertplatz umbenannt. Diese Namensgebung sollte an den kurz zuvor verstorbenen ersten Reichspräsidenten der Weimarer Republik, Friedrich Ebert (1871-1925), erinnern. Da Ebert als ehemaliger SPD-Vorsitzender von den Nazis als “unwürdig” betrachtet wurde, ließen diese 1933 die Benennung wieder rückgängig machen. 1945 zerstörten Bomben Teile der vorhandenen Bebauung, woraufhin der Platz in eine große Grünanlage mit Kinderspielplatz umgestaltet wurde. Die vorhandenen repräsentativen Wohngebäude an der Weißeritzbrücke wurden im Frühjahr 1988 zugusten der neuen Hochstraße gesprengt (Foto), die seit 1993 die Platzanlage überspannt. An ihrer Stelle entstand 2008 eine kleine, zur Weißeritz geöffnete Parkanlage. 1962 wechselte der Crispiplatz erneut seinen Namen und hieß nun bis 1993 Willi-Ermer-Platz. Willi Ermer (1903-1949) war ab 1925 Mitglied der KPD und leitete die Abteilung Dresden-Löbtau des Roten Frontkämpferbundes. Nach seiner Entlassung aus dem berüchtigten Strafbataillon 999 war er in der Nachkriegszeit in verschiedenen Funktionen der SED tätig. 1993 beschloss der Dresdner Stadtrat, dem Platz seinen früheren Namen Ebertplatz zurückzugeben. Zwischen 1964 und 1974 befand sich hier die Wendeschleife der einzigen Dresdner O-Bus-Linie von Löbtau nach Weißig. Foto: Blick vom Crispiplatz zum Drei-Kaiser-Hof um 1910 Einzelne Gebäude: Crispidenkmal: Das vom italienischen Bildhauer Mario Rutelli (1859-1941) geschaffene Standbild des Politikers Francesco Crispi wurde als Geschenk der Stadt Palermo an Löbtau übergeben und am 26. Oktober 1906 feierlich eingeweiht. Nach Umbenennung des Crispiplatzes in Ebertplatz forderten vor allem linke SPD-Mitglieder die Entfernung des Denkmals. An seiner Stelle sollte stattdessen ein Gedenkstein für den verstorbenen Reichspräsidenten Ebert aufgestellt werden. Lediglich die Erhaltung des von Hans Erlwein gestalteten Denkmalsockels war geplant. Dieser Vorschlag wurde von der Stadt Dresden jedoch abgelehnt. Das Crispidenkmal wurde 1945 bei der Zerstörung der umliegenden Wohngebäude nur leicht beschädigt, fiel jedoch 1946 der politisch motivierten “Bilderstürmerei” zum Opfer. 1948 verschwand auch der Sockel, so dass heute keine Reste mehr auffindbar sind. Dr.-Höhne-Häuser: Die Wohnanlage zwischen Ebertplatz, Freiberger und Oederaner Straße entstand im Auftrag des Dresdner Spar- und Bauvereins. Sie umfasst die Gebäude Ebertplatz 1-3b, Freiberger Straße 113-121 und Saxoniastraße 2-10. Die fünfgeschossige Häusergruppe mit ca. 400 Wohnungen wurde zwischen 1920 und 1921 nach Plänen des Architekten Paul Beck erbaut, welcher auch Schöpfer der Grunaer Gartenheimsiedlung war. Die Gebäude blieben bis heute erhalten und wurden nach 1990 saniert. Graf-von-Posadowsky-Wehner-Häuser: Zwischen 1903 und 1905 entstanden am damaligen Crispiplatz (Nr. 4-9) durch den Dresdner Spar- und Bauverein die “Graf- von-Posadowsky-Wehner-Häuser”. Das Areal des ehemaligen Floßhofs war zuvor vom Reichsamt des Inneren erworben und dem Verein per Erbbauvertrag überlassen worden. Die architektonische Gestaltung oblag dem renommierten Architekturbüro Schilling & Gräbner. Die 1945 zerstörte Häusergruppe mit 300 Kleinwohnungen verfügte über Gemeinschaftsbäder, Innenhöfe mit Kinderspielplätzen und eine Bibliothek und stand vorrangig unbegüterten Mietern offen. Hinzu kamen soziale Einrichtungen wie eine Kinderbewahranstalt und eine Haushaltschule für ältere Mädchen. Die Finanzierung erfolgte durch den Evangelischen Arbeiterverein und den erwähnten Erbbauvertrag des Grafen Dr. Posadowsky-Wehner, welcher Staatssekretär im Reichsinnenministerium war und dessen Namen der Komplex erhielt. Für die damals beispielhafte Wohnanlage erhielt der Verein 1906 eine Goldmedaille der 3. Deutschen Kunstgewerbeausstellung. Nr. 10: Das Wohnhaus an der früheren Delbrückstraße entstand 1926 im Stil der neuen Sachlichkeit und weist an der Fassade und im Treppenhaus auch einige expressionistische Elemente auf. Architekt war der Dresdner Stadtbaurat Paul Wolf. Das durch verschiedene Gesimse horizontal gegliederte fünfgeschossige Gebäude weist in der Mitte einen tiefen Rücksprung auf, wobei die beiden Seitenflügel abgeschrägt sind. Hier befindet sich auch die Durchfahrt zum Hof des Hauses. Das nach 1990 sanierte Gebäude dient bis heute als Wohnhaus und steht unter Denkmalschutz.

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Die über Löbtauer und Cottaer Flur verlaufende Gohliser Straße entstand im Zuge des 1875 erarbeiteten Bebauungsplanes Emil Ueberalls und wurde zunächst als Planstraße P bezeichnet. Da sich an ihrem Löbtauer Ende des bekannte “Café Frieden” befand, nannte man sie im Volksmund zunächst Friedensstraße. Am 14. Dezember 1892 erhielt sie offiziell den Namen Ahlwardtstraße. Namensgeber war der Reichstagsabgeordnete Hermann Ahlwardt (1846–1914), der durch seine antisemitischen Schriften und Flugblätter bereits zu Lebzeiten heftig umstritten war und zu einer mehrmonatigen Haftstrafe verurteilt wurde. Bereits wenige Monate nach der Erstbenennung wurde die Ahlwardtstraße am 19. April 1893 nach den Dörfern Ober- und Niedergohlis umbenannt. Das Straßenbild prägen bis heute mehrgeschossige Mietshäuser in offener Bauweise. Die Häuserzeile Nr. 35-43 entstand zwischen 1919 und 1925 nach Entwürfen von Otto Schubert für den Kleinwohnungsbauverein Dresden, die Häuser der Nr. 38 bis 50 durch Stadtbaurat Paul Wolf. Neben Arbeiterwohnungen gab es hier auch einige kleine Läden und Gaststätten. Neben dem “Café Frieden” und der gegenüberliegenden Konditorei Müller existiert im Eckhaus zur Bramschstraße mit dem Restaurant “Zur Myrte” eine weitere traditionsreiche Gaststätte (Foto). Ein weiteres Lokal gab es früher an der Ecke zur Hermsdorfer Straße (Nr. 17), wo um 1914 die “Wettinburg” des Schankwirts Otto Kloß zum Besuch einlud. An Stelle des heute nicht mehr vorhandenen Gebäudes entstand nach 1990 das Hotel & Apartmenthaus “Altstadtperle” (Nr. 17-19). Café & Konditorei Müller (Nr. 1): Die zu den traditionsreichsten Läden im Dresdner Westen gehörende Konditorei wurde im Jahr 1908 von Konditormeister Paul Müller gegründet. Sie befindet sich Erdgeschoss des Eckhauses zur Kesselsdorfer Straße. 1935 übernahm mit Rudi Müller der Sohn des Firmengründers den Familienbetrieb und führte ihn bis 1961. Danach oblag die Geschäftsleitung Müllers Schwiegersohn Christian Mütze, der nach der Wende in der DDR 1991 ein weiteres Café am Nürnberger Ei eröffnete. Bis heute befindet sich das Unternehmen in Familienbesitz.

Freimund Edlich Freimund Leberecht Gottwald Edlich (* 15. Dezember 1836 in Miltitz; † 7. April 1891 in Dresden) war ein deutscher Landschaftsmaler, Fotograf und Botaniker. Freimund Edlich wirkte in der Zeit von etwa 1860 bis 1891 als naturwissenschaftlicher Maler, Landschaftsmaler und als Fotograf in Dresden. Daneben beschäftigte er sich mit Botanik. Edlich war in Dresden wohnhaft (Dippoldiswaldaer Gasse 9) und war 1860 Leiter des Photographischen Ateliers von Ferdinand Hecker. Von 1863 bis 1891 hatte er mehrere eigene Ateliers in Dresden. 1868 wurde er Mitglied der Naturwissenschaftlichen Gesellschaft „Isis“ in Dresden. Am 1. Januar 1869 wurde er mit dem akademischen Beinamen F. Kaulfuss in der Sektion Botanik zum Mitglied (Matrikel-Nr. 2095) der Leopoldina gewählt.

Die Kesselsdorfer Straße bestand schon gegen Ende des 12. Jahrhunderts als Teil einer alten Verbindungsstraße zwischen dem Kloster Nossen und dem Klosterhof in Leubnitz. Zugleich verband sie die Stadt Dresden mit dem bedeutenden Bergbauzentrum um Freiberg. Ursprünglich wurde sie als “Freybergische Straße” bezeichnet und gehört zu den wichtigsten alten Fernstraßen im Dresdner Raum. August der Starke ließ sie um 1720 zur Poststraße ausbauen und mit Postmeilensäulen versehen, von denen jedoch keine erhalten blieb. 1704 entstand in diesem Zusammenhang an Stelle einer hölzernen Vorgängerin eine steinerne Brücke über die Weißeritz. Als Hauptverkehrsverbindung ins Erzgebirge wurde sie 1767 “Gebürgische Hauptstraße” genannt. Noch bis zum Ende des 19. Jahrhunderts erinnerte eine Wegsäule in der Nähe der Kreuzung mit der Tharandter und Löbtauer Straße an die Bedeutung dieses Verkehrsweges. Zwischen 1810 und 1812 wurde die Straße im Auftrag Napoleons zur Chaussee ausgebaut und erhielt dabei im Wesentlichen ihren heutigen Verlauf. Ab 1871 trug sie zunächst den Namen Wilsdruffer Straße, ab 1904 Kesselsdorfer Straße. Dieser Name wurde nach der Eingemeindung auch auf die Straßenabschnitte in Gorbitz (1926) und in Gompitz (1999) übertragen. Ab 1881 verkehrte eine Pferdebahn bis zum 1875 entstandenen Neuen Annenfriedhof. 1893/96 wurde diese Strecke elektrifiziert und bis zum Straßenbahnhof Naußlitz verlängert. Bereits vor dem Zweiten Weltkrieg entwickelte sich die Kesselsdorfer Straße zum Stadtteilzentrum der westlichen Dresdner Vororte mit zahlreichen Geschäften und Gaststätten. Im unteren Teil (Foto) fielen einige dieser Gebäude 1945 den Bombenangriffen zum Opfer, darunter der bekannte “Drei-Kaiser-Hof” und die “Musenhalle” an der Poststraße. Erst nach 1990 wurde mit der schrittweisen Schließung der Baulücken begonnen. Löbtau: Vor allem der untere Teil der Kesselsdorfer Straße ist bis zur Gegenwart als Einkaufszentrum von Bedeutung. In der zweiten Hälfte des 19. Jahrhunderts entstanden hier zahlreiche Wohn- und Geschäftshäuser. Erwähnenswert sind u.a. das Kaufhaus des Konsumvereins “Vorwärts” (später Modehaus Schacht & Hödel - Nr. 22), das Schuhhaus Schleinitz (Nr. 14) sowie das Kaufhaus Möbius (Nr. 20), eine Filiale des bekannten Dresdner Großkaufhauses auf der Wilsdruffer Straße. Im Hintergebäude des letztgenannten Grundstücks gab es vor 1945 das Kino “Westend-Lichtspiele”. Zahlreiche Gebäude fielen 1945 den Bomben zum Opfer. Die entstandenen Baulücken konnten erst nach 1990 geschlossen werden. Chausseehaus: Das Gebäude entstand 1811 an der Ecke Kesselsdorfer/Tharandter Straße und diente der Erhebung des Chausseegeldes für die Benutzer dieser Straße. Anlass war der kurz zuvor erfolgte Ausbau der Straße, welcher über 17.800 Taler gekostet hatte. Das Haus wurde von G. F. Thormeyer entworfen und war mit über 20.000 Mark jährlicher Einnahme ergiebigstes Einnehmerhaus in Sachsen (Bild). Neben den Expeditionsräumen gab es auch zwei Wohnungen und einen großen Garten, dessen Ertrag dem Chausseegeldeinnehmer ein zusätzliches Einkommen verschaffte. Mit Hilfe hölzerner Schlagbäume konnte die Straße abgesperrt und die Fuhrleute zur Zahlung der fälligen Gebühr veranlasst werden. Nach Aufhebung des Chausseegeldes am 31. Dezember 1885 verlor es seine Funktion und wurde wenige Jahre später abgebrochen. Kesselsdorfer Passagen: Der moderne Gebäudekomplex (Foto) wurde 1997/98 auf dem Grundstück Nr. 2-6 errichte und beherbergt mehrere Läden und Restaurants sowie Büros in den Obergeschossen. Zuvor standen hier noch einige Anfang des 19. Jahrhunderts errichtete Wohnhäuser, darunter das 1945 teilzerstörte Gebäude der Likörfabrik Max Herzog. In Anlehnung an die frühere Gaststätte auf der gegenüber liegenden Straßenseite wurden die “Kesselsdorfer Passagen” 2000 in “Drei-Kaiser- Hof” umbenannt. 2013/15 erfolgte auf dem Nachbargrundstück an der Ecke zur Gröbelstraße der Bau eines weiteren Wohn- und Geschäftshauses (Nr. 8-10). Löbtau-Passage: Das moderne Einkaufszentrum entstand 2008/09 auf dem Grundstück des früheren “Dreikaiserhofes” und einiger Nebengebäude. Im Erdgeschoss befindet sich eine Ladenpassage, im Obergeschoss ein zweigeschossiges Parkdeck. Zuvor war das Grundstück des 1945 zerstörten Hotels zeitweise Standort des HO-Möbelhauses “Das schöne Heim” (Möbelhaus West), später einiger Verkaufspavillons, bevor diese am 28. Juni 1996 durch einen Großbrand zerstört wurden. In den Neubau der Löbtau-Passage wurde auch der Mustersaal der ehemaligen Lampenfabrik Seifert auf der Gröbelstraße integriert. Hier hatte 1906 die erste öffentliche Ausstellung der “Brücke”-Künstler stattgefunden. Kaufhaus “Magnet” (Nr. 11): Das in den Zwanziger Jahren errichtete Kaufhaus blieb bis zur Schließung 1990 eine beliebte Einkaufsstätte weit über die Löbtauer Ortsgrenzen hinaus (im Bild rechtes Gebäude). Vor 1945 wurde es als “Rheinische Kaufhalle” bezeichnet. Im Obergeschoss besaß der Maler Otto Dix ab 1933 seine Atelierräume und nutzte diese bis zu seinem Tod 1969. Nach 1945 gab es im Haus für einige Jahre eine Tauschzentrale (“Tauze”), in der man im Tausch gegen Wertgegenstände Lebens- und Genussmittel erhielt. Zu den Geschäftsführern des Unternehmens gehörte der spätere Vorsitzende des Zentralrates der Juden in Deutschland Ignatz Bubis. Am 25. November 1948 eröffnete in den Räumen das erste “freie” HO-Fachgeschäft Dresdens, in welchem man Textilien, Schuhe und Industriewaren ohne Bezugsscheine erwerben konnte. Später wurde diese Einrichtung in “Textilhaus West”, 1960 im Kaufhaus “Magnet” umbenannt. Ab 1975 standen den Kunden vier “Komplexverkaufsbereiche” zur Verfügung, wodurch sich die Verkaufsfläche deutlich vergrößerte. Das nach der Wende viele Jahre leer stehende Kaufhaus wurde 2010 saniert und dabei äußerlich stark verändert. Nr. 13: Auf dem Grundstück eines 1945 zerstörten Wohn- und Geschäftshauses entstand in der Nachkriegszeit ein einstöckiges Gebäude. Hier war bis 1990 die stadtweit bekannte Schokoladen-Werksverkaufsstelle der Firma “Elbflorenz” untergebracht. Nach 1990 wurde das Gebäude durch ein modernes Geschäftshaus ersetzt. Bekleidungshaus Stohn: Das traditionsreiche Dresdner Modehaus Stohn entstand 1938 im Eckhaus Kesselsdorfer Straße/ Bünaustraße 1 und befand sich im Besitz von Walter Stohn, einem 1906 in Meißen geborenen Textilkaufmann. Zuvor gab es hier das Lokal “Gute Quelle”. Während des Zweiten Weltkrieges wurde der Laden, zu dem auch eine Änderungsschneiderei gehörte, von Stohns Ehefrau Elsa geführt. Den Luftangriff überstand das Gebäude im Gegensatz zu der umgebenden Bebauung ohne größere Schäden. Auch zu DDR-Zeiten blieb das Damen- und Herrenmodegeschäft in privatem Besitz und war weit über die Dresdner Stadtgrenze hinaus bekannt. 1997 gab die Familie den Laden aus Altersgründen auf. Dieser wurde noch kurzzeitig von einem Nachfolger weitergeführt. Heute befindet sich in den Räumen ein Sonnenstudio. Westend-Lichtspiele : Das Filmtheater mit ca. 450 Plätzen wurde 1912 als Westend-Theater gegeründet und befand sich auf der Kesselsdorfer Straße 20. 1917 befand es sich im Besitz von F. A. Wache, ab 1920 der Firma Riegel & Goldhammer. 1934 übernahm Willy Schulze, der auch Inhaber der gegenüber liegenden “Musenhalle” und des Kinos im Dreikaiserhof war, den Betrieb. 1945 fiel das Gebäude den Bomben zum Opfer. Konsument-Warenhaus (Nr. 22): Das Warenhaus entstand in den Zwanziger Jahren als Verkaufsstelle des Konsumvereins “Vorwärts” für Dresden und Umgebung. Nachdem die der SPD nahestehenden Konsumvereine nach 1933 zwangsweise aufgelöst wurden, übernahm die Firma Schacht & Hödel die Räume und betrieb hier bis 1945 ein Modehaus für Kleidung, Schuhe und Textilien. 1945 wurde das Gebäude schwer beschädigt, jedoch bald als erstes Dresdner Kaufhaus der Nachkriegszeit wieder aufgebaut (Foto) . Auch nach Normalisierung der wirtschaftlichen Lage blieb die seit den 1960er Jahren als Konsument-Warenhaus bezeichnete Einrichtung ein Anziehungspunkt der Bevölkerung. Zur Vergrößerung der Verkaufsfläche kamen nach 1950 noch zwei flache Anbauten hinzu. 1990 schloss das Warenhaus seine Pforten und wurde 1996 zugunsten eines Geschäftshauses abgerissen. City-Forum (Nr. 24): Der moderne Gebäudekomplex nimmt das Grundstück des früheren Konsument-Warenhauses und seiner Nachbarflächen ein und wurde 1997 fertiggestellt. Im Erdgeschoss befindet sich eine kleine Ladenpassage, ergänzt um weitere Geschäfte. Die Obergeschosse dienen als Wohnungen bzw. Büroräume. Café Müller: Die Konditorei mit angehörigem Café wurde 1908 im Eckhaus Kesselsdorfer Straße / Gohliser Straße 1 gegründet und gehört zu den traditionsreichsten Unternehmen in Löbtau. Gegenüber befand sich noch bis nach 1990 das ebenfalls weithin bekannte Café “Frieden”. 2008 musste dieses Gebäude dem Neubau eines Geschäftshauses weichen, in welchem eine Bäckereifiliale mit Cafébetrieb die gastronomische Tradition fortsetzt. Kandler´s Hotel & Restaurant: Die Gaststätte wurde 1995 in dem Ende des 19. Jahrhunderts errichteten Wohnhaus Kesselsdorfer Straße 40 eingerichtet. Neben Übernachtungsmöglichkeiten besitzt das Haus auch ein im Stil der Gründerzeit eingerichtetes Restaurant, welches vor allem Gerichte der regionalen Küche anbietet. Zu den Gästen des Hotels gehörten u.a. Johannes Heesters, Lotte Huber und Wolfgang Stumpf. Straßenbahnhof Löbtau: Der Straßenbahnhof Löbtau wurde im Frühjahr 1883 eröffnet und diente als Depot der zwei Jahre zuvor eröffneten Pferdebahn. Diese verkehrte zunächst nur bis zum Glaswerk an der Freiberger Straße, wurde jedoch wenige Monate später, am 8. November 1881, bis zum Neuen Annenfriedhof verlängert. Das Depot wurde nach seiner Fertigstellung zur Unterstellung der Pferde und Pferdebahnwagen genutzt und bestand bis zur Elektrifizierung der Strecke 1895. 1912 entstand auf dem Grundstück nach Plänen Hans Erlweins die Wohnanlage an der Bünaustraße für Angestellte der Städtischen Straßenbahn. An die Pferdebahnzeit erinnert heute noch ein Schuppen auf dem Gelände. Kaiser-Wilhelm-Denkmal: Das heute nicht mehr vorhandene Denkmal wurde aus Anlass des 90. Geburtstages Kaiser Wilhelm I. am 22. März 1887 am Löbtauer Straßenbahnhof aufgestellt. Das Denkmal bestand aus einer Granitplatte mit Inschrift und wurde vom Personal der Straßenbahngesellschaft und Löbtauer Einwohnern finanziert. Mit Elektrifizierung der Straßenbahnstrecke wurde der Pferdebahnhof nicht mehr benötigt und dessen Grundstück 1912 mit der Wohnanlage Bünaustraße bebaut. Vermutlich verschwand in diesem Zusammenhang auch der Gedenkstein. Nr. 43: Das markante Wohn- und Geschäftshaus an der Einmündung zur Saalhausener Straße entstand Ende des 19. Jahrhunderts und wird im Volksmund als “Scharfe Ecke” bezeichnet. Um 1900 gab es im Erdgeschoss ein gleichnamiges Lokal. Nach 1990 bezog eine Bankfiliale diese Räume. Heute hat hier das traditionsreiche Dresdner Fotogeschäft Hahn seinen Sitz. Nr. 50: Das Eckhaus zur Rudolf-Renner-Straße entstand Ende des 19. Jahrhunderts. Am 15. Mai 1911 eröffnete hier der Apotheker Richard Bieber die Kronprinzenapotheke. 1945 übernahm Carl Ritter das Geschäft, welches in der Nachkriegszeit den Namen Robert-Koch-Apotheke erhielt und bis heute existiert. Naußlitz: Die Bebauung der Kesselsdorfer Straße auf Naußlitzer Flur begann ab 1870, als hier erste Mietshäuser entstanden. Der abseits des Dorfkerns gelegene Ortsteil an der Kesselsdorfer und der Pietzschstraße wurde inoffiziell auch als Neu-Naußlitz bezeichnet. Auch hier gibt es bis heute verschiedene Geschäfte. Apollo-Lichtspiele (Nr. 80): In diesem Haus befand sich ab 1912 bis Mitte der 1920er Jahre ein Kino. Zunächst “Apollo- Lichtspiele”, ab 1921 “Reform-Lichtspiele” genannt, besaß das kleine Filmtheater ca. 150 Plätze. Nr. 82: Das um 1910 errichtete Doppelhaus an der Kesselsdorfer Straße 82 / Langestraße gehört zu den architektonisch beindruckendsten Gebäuden in diesem Abschnitt. Mit zahlreichen Loggien und Balkonen und modernen Schmuckelementen orientierte sich dieses Mietshaus an den gewandelten Architekturauffassungen seiner Zeit. Nach 1990 wurde das Gebäude denkmalgerecht saniert. Fotos: Wohnhäuser an der Kesselsdorfer Straße (links Nr. 82, rechts Nr. 86-88) Straßenbahnhof Naußlitz: An der Einmündung Koblenzer Straße / Wendel-Hipler- Straße befindet sich der 1902 eröffnete Straßenbahnhof Naußlitz, einer der wenigen Industriebauten im Jugendstil in Dresden. Das Gebäude entstand ab 1899 nach Plänen des Architekten Edmund Körner und besteht aus einem Verwaltungsgebäude sowie der Wagenhalle an der Koblenzer Straße. 1938/39 diese nochmals erweitert. 1945 erlitt der Bau schwere Beschädigungen, konnte jedoch nach seiner Wiederherstellung bereits im Folgejahr wieder genutzt werden. Zuletzt diente der frühere Straßenbahnhof bis zur Schließung 1996 als Busdepot. Nach dem Verkauf an eine private Investorengruppe entstand hier ein modernes Einkaufszentrum. Die frühere Wagenhalle wurde dabei mit Ausnahme der Außenwände abgerissen. Auf dem Dach befindet sich heute ein Parkdeck. Im denkmalgerecht sanierten Hauptgebäude sind seit 2005 Büros, Arztpraxen und Wohnungen untergebracht. Wölfnitz: Gasthof Wölfnitz: Der Gasthof entstand um 1810 im Zusammenhang mit dem Ausbau der Kesselsdorfer Straße zur Chaussee und wurde 1816 erstmals erwähnt. Zu den Gästen gehörten vor allem Fuhrleute auf ihrem Weg nach Freiberg. 1879 ließ der Gastwirt Friedrich August Köhler einen großen Saal für verschiedene Veranstaltungen anbauen. Für einen zusätzlichen Gästezuwachs sorgte die ab 1. August 1900 bis hier verkehrende Straßenbahn. 1945 wurde im Saal ein als “Filmbühne Wölfnitz” bezeichnetes Kino eingerichtet, wobei Teile der aus der zerstörten Musenhalle geretten Kinotechnik zum Einsatz kamen. Gelegentlich fanden außerdem Konzerte statt. Am 20. Februar 1985 zerstörte ein Brand den Kinosaal, woraufhin der Gasthof drei Jahre später dem Abbruch verfiel. An seiner Stelle befindet sich heute ein Supermarkt. Gorbitz: Während im unteren Teil der Kesselsdorfer Straße ab 1880 zu beiden Seiten mehrgeschossige Wohn- und Geschäftshäuser entstanden, blieb die Gorbitzer Flur bis 1980 weitgehend unbebaut. Lediglich am Rande des Dorfkerns Niedergorbitz standen einige Bauerngüter und Mietshäuser. Pläne zur Errichtung eines großen Wohnviertels zwischen Löbtau und der heutigen Julius-Vahlteich-Straße scheiterten am Beginn des Ersten Weltkrieges. Auch nach 1945 blieben die Flächen des früheren Kammergutes unbebaut und wurden bis in die 1970er Jahre landwirtschaftlich genutzt. Erst der Beschluss zum Aufbau eines großen Neubaugebietes am Gorbitzer Hang veränderte das Bild. Bis 1990 war das Areal bis zur Stadtgrenze in Gompitz fast komplett mit Wohnblocks bebaut. Moderne Einkaufsmärkte und Gewerbebetriebe folgten in den letzten Jahren. Auf der linken Straßenseite sind noch einige historische Bauerngüter von Nieder- und Obergorbitz erhalten, die teilweise saniert wurden. Zu den wenigen Villenbauten an der Kesselsdorfer Straße gehört das Haus Nr. 116. Es wurde 1912 für einen Dresdner Fabrikanten errichtet (Foto). Gasthof “Zum alten Dessauer”: Die frühere Gaststätte auf der Kesselsdorfer Straße 135 verdankt ihren Namen dem Aufenthalt des Fürsten Leopold von Anhalt-Dessau, der im Zusammenhang mit der Schlacht von Kesselsdorf am 15. Dezember 1745 hier weilte. Fürst Leopold, wegen seiner militärischen Fähigkeiten auch “der alte Dessauer” genannt, führte als Feldmarschall die preußischen Truppen während der Schlacht und brachte der sächsischen Armee eine vernichtende Niederlage bei. 1875 entstand ein neuer Gasthof, dessen Räume zuletzt von einer Pizzeria genutzt wurden. Nach 1945 hatte hier zeitweise der Dorfklub Gorbitz sein Domizil. Derzeit steht das Haus leer. Nr. 139: Das Gorbitzer Wohnhaus des Kreishauptmannes Sahrer von Sahr war am 9./10. November 1813 Verhandlungsort zwischen Vertretern der französischen Besatzer und den Verbündeten. Im Ergebnis der Gespräche kapitulierten die französischen Einheiten und zogen kampflos aus Dresden ab, wodurch der Stadt eine lang andauernde Belagerung erspart blieb. An das Ereignis erinnerten später einige in die Fassade eingemauerte Kanonenkugeln, die nach 1990 bei der Sanierung des Gebäudes jedoch beseitigt wurden. Nr. 143: Auch in diesem Gebäude befand sich ursprünglich ein Gasthof, welcher sich um 1900 im Besitz von Ernst Schumann befand. Der Gasthof Niedergorbitz wurde nach 1945 geschlossen und diente später gewerblichen Zwecke. 2004 entstand an seiner Stelle das modernes Kurzzeit-Pflegeheim “Am Gorbitzbach”. Foto: Gasthof Niedergorbitz auf einer historischen Postkarte Nr. 153: Der nach historischem Vorbild gestaltete Dreiseithof wurde zwischen 2007 und 2011 errichtet, wobei für den Bau vorrangig Materialien aus Abbruchhäusern genutzt wurde. Kernstück ist die Scheune des früheren Pfarrgutes von Dorfchemnitz im Erzgebirge, welche 2006 demontiert und in Gorbitz wieder aufgebaut wurde. Heute dient das Anwesen als Wellnesshotel. Nr. 179 / 179a: Der aus Wohnstallhaus, Scheune, Seitengebäude und Resten einer Toranlage bestehende Dreiseitenhof gehört zu den letzten erhaltenen Bauerngütern von Gorbitz und steht unter Denkmalschutz. Heute dient das Areal Wohn- und Gewerbezwecken. Hotel Sächsischer Reiterhof (Nr. 185): Der frühere Dreiseithof Kesselsdorfer Straße 185 steht heute unter Denkmalschutz und wird seit einigen Jahren als Hotel genutzt. Erhalten blieben zwei Torhäuser, dasWohnstallhaus und die frühere Scheune. Auch die benachbarten Grundstücke Nr. 187 und 189 sind frühere Bauernhöfe und als Baudenkmale registriert. Fotos: ehemalige Gehöfte an der Kesselsdorfer Straße: Nr. 179 (links) und Nr. 185 (rechts) Landeskrone: Die Gaststätte (Kesselsdorfer Straße 200) entstand Ende des 19. Jahrhunderts an der Ecke zur Hirtenstraße. Auch nach 1945 blieb das Gasthaus in Betrieb und schloss erst um 1970 seine Pforten. Das Gebäude wird seitdem gewerblich genutzt und nach 1990 umfassend saniert. Heute befindet sich hier ein Fachgeschäft für den Reitsportbedarf. Unweit der “Landeskrone” gab es mit dem “Reichsschmied” ein weiteres bekanntes Gorbitzer Lokal, welches nach 1945 als DEFA-Studio für Trickfilme bekannt wurde. Ziegelei Kunath (Nr. 242): Die Ziegelei auf Obergorbitzer Flur wurde 1873 gegründet und befand sich ursprünglich im Besitz des Premierleutnants Bertram. Nach dessen Konkurs ersteigerte sie 1879 der Gorbitzer Unternehmer Ernst Friedrich Wilhelm Kunath und baute sie zu einem der modernsten Ziegeleibetriebe im Dresdner Umland aus. U.a. ließ er einen neuen Ringofen errichten, stationierte eine Dampfmaschine und mehrere Ziegelpressen. Die Kapazität des Werkes, zu dem auch ausgedehnte Lehmgruben gehörten, betrug zu Spitzenzeiten bis zu 6,5 Millionen Ziegel im Jahr. Zur Beförderung des Rohmaterials setzte Kunath eine elektrisch betriebene Feldbahn ein (Foto). Auch die Fördermaschinen besaßen bereits elektrischen Antrieb, ein Novum zu dieser Zeit. Eine eigens angeschaffte dampfmaschine mit Generator sorgte für deren Energieversorgung und lieferten zugleich Strom für die Obergorbitzer Wohngebäude. Bis zum Zweiten Weltkrieg blieb das Unternehmen in Familienbesitz, musste dann jedoch kriegsbedingt schließen. Erst 1950 wurde die Produktion wieder aufgenommen, nachdem man sich zuvor einige Jahre der Fertigung von Betonfertigteilen, vor allem Dachziegeln gewidmet hatte. 1972 wurde die Ziegelei zwangsweise verstaatlicht und in den VEB Ziegelwerke Dresden eingegliedert. Trotz ausreichender Rohstoffvorräte entschloss man sich 1977, bedingt durch den starken Verschleiß der vorhandenen technischen Anlagen, zur Schließung der Ziegelei. Auf dem Areal entstand wenig später das Neubaugebiet Gorbitz. Gompitz: Oberhalb des Gorbitzer Hangs erreicht die Kesselsdorfer Straße die Fluren von Gompitz. Hier befindet sich u.a. der Ende des 19. Jahrhunderts erbaute Gasthof Gompitz, welcher heute als Schnitzel-Spezialitätenrestaurant “Schnizz” dient. Im Zusammenhang mit dem Ausbau der Straße zum Autobahnzubringer wurden 2007 die Wohnhäuser Kesselsdorfer Straße 306 bis 310 sowie Nr. 271, 275 und 277 abgerissen. Seit dem 29. November 2008 verkehrt parallel zur Straße die Straßenbahn bis zur Gleisschleife in Pennrich. Unterhalb der Gleistrasse entstand ein 75 Meter langer Tunnel mit zwei Röhren für den Autoverkehr.

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Die heutige Tharandter Straße wurde Mitte des 16. Jahrhunderts als Fußweg durch den Plauenschen Grund angelegt. 1712 regten die Ämter Dippoldiswalde und die Stadt Tharandt an, den bestehenden Fahrweg über die Höhen von Coschütz und Plauen in das Weißeritztal zu verlegen und zu befestigen. Wegen des hohen Aufwands und der zu geringen Verkehrsbedeutung wurde das Vorhaben jedoch abgelehnt. Erst nach einer erneuten Eingabe erfolgte 1745 der Ausbau des Talweges zur Fahrstraße, um so eine bessere Verbindung zwischen dem Elbtal und den Dörfern Potschappel und Döhlen zu schaffen. Zuvor hatte bereits 1729 der sächsische Oberlandfeldmesser Christoph Moritz Dietze den Abschnitt zwischen dem Reisewitzschen Garten bis zur Plauener Weißeritzbrücke befestigen lassen. An der Kreuzung Kesselsdorfer/ Tharandter Straße befand sich einst der Löbtauer Weideplatz. Mit Ausnahme einiger Mühlen an der Weißeritz waren die Flächen links und rechts dieses Weges unbebaut. Am Eingang zum Plauenschen Grund lag seit dem 17. Jahrhundert das Areal des Reisewitz´schen Gartens, welcher jedoch in der zweiten Hälfte des 19. Jahrhunderts der zunehmenden Bebauung weichen musste. Zeitweise bestanden in diesem Teil Löbtaus auch einige Handelsgärtnereien. Erst mit der Industrialisierung wuchs die Verkehrsbedeutung dieser Straße. Nach der verstärkten Erschließung der Steinkohlevorkommen in Döhlen und Burgk erfolgte 1807/09 auf Betreiben der Königlichen Steinkohlewerke der Ausbau zur Chaussee, die nun den Namen Kohlenstraße erhielt. 1871 wurde sie auf Löbtauer Flur in Plauensche Straße umbenannt, 1904 in Tharandter Straße. Dieser Name wurde nach der Eingemeindung Dölzschens auch auf den anschließenden Abschnitt bis zur Freitaler Stadtgrenze übertragen. Zu den bedeutenden Gebäuden und Einrichtungen an der Tharandter Straße gehörten das 1897 vollendete Löbtauer Rathaus sowie der Hotelkomplex “Drei-Kaiser-Hof” an der Tharandter Straße, die beide 1945 den Bomben zum Opfer fielen (Foto oben) . Auch zahlreiche Wohngebäude sowie industrielle Anlagen wurden zerstört bzw. schwer beschädigt. Seit 1870 hatte sich der gesamte Bereich zwischen Tharandter Straße und Weißeritz zum Industriegebiet entwickelt. Neben metallverarbeitenden Betrieben wie der Firma Hille (Herstellung von Gas- und Benzinmotoren) und der Eisengießerei Buschbeck & Hebenstreit befand sich hier auch die 1843 gegründete Schokoladenfabrik Petzold & Aulhorn sowie eine Großwerkstatt für Busse und Lkws (Foto) . In der Nachkriegszeit wurden diese Betriebe in volkseigene Unternehmen umgewandelt, so zum VEB Kupplungs- und Triebwerkbau (Nr. 31/33) und VEB Vereinigte Metallgusswerke (Nr. 41). Heute nutzen verschiedene gewerbliche Unternehmen die Gebäude, darunter das Sächsische Druck- und Verlagshaus. Die 1902 entstandene Straßenbahn nach Freital-Hainsberg und Plauen wurde 1974 bzw. 1998 durch eine Buslinie ersetzt. Foto: Abzweig Tharandter Straße/Altplauen kurz vor Einstellung der Straßenbahn 1998 Firma Schulze & Schultz: Das Unternehmen wurde 1914 von den Ingenieuren Richard Josef Schulze und Hugo Schultz als “Schulze & Schultz Apparatebauanstalt” in Niedersedlitz gegründet. Anfangs besaß der Betrieb nur fünf Mitarbeiter. Hergestellt wurden luft- und wärmetechnische Anlagen für industrielle Zwecke, u.a. Luftbefeuchtungsanlagen für die Textilindustrie. Der wirtschaftliche Erfolg ermöglichte die Aufstockung des Personals auf bis zu 200 Arbeiter und den Erwerb eines Firmengrundstücks an der Tharandter Straße 8. 1932 schied Hugo Schultz aus der Firma aus. Während des Zweiten Weltkrieges wurden Panzer- und Bunkerbelüftungsanlagen gebaut. Im Zusammenhang mit dem Volksentscheid in Sachsen 1946 wurde die Firma Schulz & Schultze enteignet und in Volkseigentum überführt. Fortan firmierte das Unternehmen als VEB Luft- und Wärmetechnik und nutzte auch die Räume der ehemaligen Lampenfabrik Seifert auf der Gröbelstraße. 1964 erfolgte die Eingliederung als Betriebsteil in den neu gebildeten VEB Lufttechnische Anlagen mit Sitz in Klotzsche. Nach 1990 wurde die Produktion eingestellt, wenig später folgte der Abriss der Gebäude. Dresdner Strickmaschinenfabrik: Der Betrieb entstand 1868 auf der Freiberger Straße 11, als Georg Laue hier seine Werkstatt einrichtete und mit dem Bau der ersten deutschen Strickmaschinen begann. Zunächst erfolgte die Produktion von Maschinen nach amerikanischem Vorbild, bald jedoch nach eigenen Konstruktionsentwürfen. Der große Erfolg machte wenig später den Neubau einer Fabrik auf Löbtauer Flur erforderlich (Tharandter Straße 31/33). Am 1. Januar 1879 trat Theodor Eduard Timaeus, ein Verwandter des bekannten Schokoladenfabrikanten, in den Betrieb ein, der nun als “Dresdner Strickmaschinenfabrik Laue & Timaeus” firmierte. Hergestellt wurden Strickmaschinen mit Motoren für die Großindustrie, wobei zeitweise bis zu 2000 verschiedene Modellvarianten zum Programm gehörten. Bereits im ersten Jahr gelang der Umbau einer Hand-Strickmaschine zur Musterstrickmaschine, mit der nun auch die Fertigung gemusterter Ware möglich war. 1890 erfolgte ein Besitzerwechsel, so dass das Unternehmen fortan unter dem Name Irmscher & Co (später Irmscher & Witte) tätig war. 1911 wurde der Betrieb in eine Aktiengesellschaft umgewandelt und per 13. März 1912 ins Handelsregister eingetragen. Die Dresdner Strickmaschinenfabrik Irmscher & Witte AG (ab 1937 Irmscher & Witte Maschinenfabrik AG) wurde nach 1945 enteignet und ging 1952 im VEB Kupplungswerk- und Triebwerksbau auf. 1982 wurde durch Zusammenschluss mit dem Kupplungswerk Freital der VEB Kupplungswerk Dresden gebildet, der bis 1990 existierte. Kino in der Fabrik (Nr. 33): Das Kino in der Fabrik (KiF) ging aus einer früheren Probebühne des Staatsschauspiels hervor. Ursprünglich wurden die Gebäude vom VEB Kupplungs- und Triebwerksbau genutzt. Nachdem das “Kleine Haus” an der Glacisstraße aus baulichen Gründen geschlossen werden musste, entstand hier eine Interimsspielstätte, die sich als “TiF” (Theater in der Fabrik) vorrangig dem experimentellen Theater widmete und jungen Künstlern eine Spielstätte bot. Die Einweihung erfolgte am 3. Oktober 1993. Leiter war von 1994 bis 1998 Volker Metzler. Danach übernahm eine freie Schauspielertruppe um Eva Johanna Heldrich den Spielbetrieb und sorgte mit zahlreichen Uraufführungen für überregionale Aufmerksamkeit. Am 12. Juni 2004 wurde dieses Theater geschlossen. Seit dem 16. März 2006 dienen die Räumlichkeiten als privates Programmkino. Die drei von der APO Filmtheater GmbH betriebenen Säle bieten insgesamt Platz für ca. 300 Besucher. Außerdem gibt es ein kleines Restaurant. Nr. 64: In diesem Haus wurde am 4. Dezember 1899 die Malerin Elfriede Lohse-Wächtler geboren. Nach dem Besuch der Kunstakademie gehörte sie der Künstlergruppe Dresdner Sezession um Otto Dix und Conrad Felixmüller an und schuf in den 1920er Jahren zahlreiche expressionistische Gemälde. Nach einem Nervenzusammenbruch 1929 verbrachte sie längere Zeit in verschiedenen psychiatrischen Kliniken, zuletzt in Arnsdorf. 1940 wurde sie in der Tötungsanstalt Pirna-Sonnenstein ein Opfer des nationalsozialistischen Euthanasieprogramms. In Plauen verengt sich das Weißeritztal und bildet hier den eigentlichen Plauenschen Grund, der bis ins 19. Jahrhundert wegen seiner romantischen Landschaftsbilder Anziehungspunkt für Naturliebhaber und Künstler war. Neben einigen Mühlen entstand hier auch die zu Dölzschen gehörende Siedlung Niederdölzschen. Wichtigstes gewerbliches Unternehmen war die aus einem Eisenhammer hervorgegangene Friedrich-August-Hütte, später Eisenhammerwerk Dölzschen genannt. Zeitweise bestand auch ein Schlacke-Kurbad. Die früheren Mühlen entwickelten sich später zum Teil zu Großbetrieben wie den Bienert-Werken in Plauen und der König-Friedrich-August-Mühlenwerke AG in Dölzschen mit angeschlossener Brotfabrik (Foto). Durch den Eisenbahnbau und die Industrialisierung verlor der Plauensche Grund an Bedeutung für den Ausflugsverkehr. Heute ist die hier entlang führende Tharandter Straße eine wichtige Verkehrsverbindung zwischen Dresden und Freital und wurde nach 1990 ausgebaut.

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add_def_ver("v_f_knufmann","F. Knufmann, Plauen","Verlag Fritz Knufmann, Dresden- Plauen, 1902 Bienertstr. 24");

add_def_ver("v_p_fickenscher","Paul Fickenscher, Plauen","Paul Fickenscher, Buchbinderei u. Papierhandlung, Dresden-Plauen, 1906 Coschützer Str. 1");

add_def_ver("v_ko-bi","Koch & Bitriol, Dresden","Koch & Bitriol, Dresden, 1909 Zirkusstraße 24");

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Bruno Kruse Bruno Friedrich Emil Kruse (* 1. Juni 1855 in Hamburg; † 12. Dezember 1926 in Chicago) war ein deutscher Bildhauer und Medailleur In der Zeit von 1876 bis 1884 studierte Bruno Kruse an der Kunstakademie Dresden und war Schüler bei Johannes Schilling, ab 1879 Meisterschüler. Dabei arbeitete er an den Aufträgen seines Professors in dessen Atelier in der Dresdner Eliasstraße 1 mit, besonders an dem monumentalen Niederwalddenkmal für Rüdesheim. Kruse wohnte bis 1885 in der Blumenstraße 38. Er beteiligte sich ab dem Jahr 1878 an den Dresdner Kunstausstellungen mit seinen eigen geschaffenen Exponaten, 1878 eine Weibliche Büste, 1879 eine bronzierte Walküre, den Krieger in den Kampf führend. Dieses Werk wurde im Jahr 1884 an den Alsteranlagen in Hamburg-Uhlenhorst aufgestellt und 1910 durch einen Bronzeguss ausgetauscht. Im Jahr 1885 ließ er sich in Berlin freischaffend nieder und führte ein eigenes Atelier. In den Jahren von 1891 bis 1923 war er an der Handwerkerschule als Lehrkraft angestellt. Neben seinen Kleinplastiken und Marmorbüsten erschuf er Bronzestatuen und er widmete sich sehr der Medailleurkunst. Vornehmlich orientierte er sich an italienische Muster und machte die Gußmedaille neben der beliebten Prägemedaille ebenbürtig. Alle möglichen Plaketten und Medaillen von Fürstlichkeiten, Gelehrten, des Militärs und des Kaiser zeigend trugen seine handwerkliche künstlerische Handschrift. Für den deutschen Luxusdampfer Imperator lieferte er den Entwurf der Bugzier, einen übergroßen Adler. Werke, Auswahl 1878: Weibliche Büste, Gips, Kunstausstellung Dresden. 1879: Walküre, den Krieger in den Kampf führend, Gips, Kunstausstellung Dresden 1880: Walküre, den gefallenen Helden emportragend, Gips, Kunstausstellung Dresden 1888: Bildnisbüste aus Marmor Dr. Hermann Anthony C.Weber, Kaisersaal im Rathaus Hamburg 1888: Bildnisbüste aus Marmor Gustav Christian Schwabe, Hamburg Kaisersaal im Rathaus 1888: Bildnisbüste aus Marmor Bürgermeister Petersen, Kaisersaal im Rathaus Hamburg 1889: Marmorbüste Moltke, Schlieffens und Graf Waldersee im Generalstabsgebäude zu Berlin, 1890: Figur Bacchantin aus Marmor Hamburger Kunsthalle 1890: Bildnisstatue Denver aus Marmor Kunsthalle Hamburg. 1892–93: Bronzefiguren St. Georg und Kaiser Lothar von Sachsen am Rathaus Hamburg 1915: Plakette Mit Gottfür Kaiser und Reich. Der nackte Herkules im Kampf mit der Lernäischen Hydra darstellend. Einseitiger Eisenguss. Münzkabinett, Staatliche Museen zu Berlin, Objektnummer 18234648 Marmorbüste Kaiser Wilhelm I. Marmorbüste Otto von Bismarck weitere Bismarckdenkmale: 1889: Bismarckbüste für Bismarckturm in Cottbus, nach 1945 verschollen. , 24 August 2017 Neuguss einer Büste aus dem Jahr 1889 in Lauchhammer. 1895: Bismarckgedenkstein mit großen Medaillon in Dresden-Rochwitz. 1896: Bismarckdenkmal, Sockel mit großer Büste, Großenhain, Meißner Straße. 1945 abgerissen. 1895: Medaillon, Gettorf in Schleswig-Holstein, Eichstraße Ecke Spritzengang. 1885: Sockel mit Büste, Greiz Heinrichstrße, 1942 Metallspende. 1897–98: Standbild Hamburg Laeiszhof, An der Trostbrücke 1. 1895: Medaillon mit Gedenkstein, Namslau in Schlesien, jetzt Namyslów. 1895: Medaillon am Aussichtsturm in Stade. 1960 abgebrochen. 1906: Sockel mit großer Büste, Weida. 1942 abgebaut und eingelagert, Verbleib unbekannt.

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add_def_ver("v_w_koch","Wilh. Koch, Bühlau","Verlag Wilh. Koch, Buch- u. Pap. Hdlg. Bühlau, 1910 Bautzner Str. 64");

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Verlag Dresdner Farbenfotografische Werkstätten A. P. Walther

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namen gastwirtsch. 1930 Spalte 2 erledigt bis Gasthaus zum Bahnhof

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namen gastwirtsch. 1930 Spalte 3 erledigt bis Vogel, Albert

add_def_ver("v_p_zeil","P. Zeil & Co, Dresden","P. Zeil & Co, Dresden, 1901 Ostraallee 19");

namen gastwirtsch. 1930 Spalte 4 erledigt bis Bienert, Arthur

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namen gastwirtsch. 1930 Spalte 1 erledigt bis Dreßler, Gustav

add_def_ver("v_k_casper","Kurt Casper, Dresden","Kurt Casper, Dresden N,"+v_adr("rule014","Oppellstraße 14")+", Königsbrücker Platz 2");

Die Oschatzer Straße bildete einst die Pieschener Ostgrenze zur benachbarten Neudorfer Flur und wurde deshalb Oststraße genannt. Zunächst gab es hier lediglich einige Gärtnereien, bevor um 1886 die Bebauung mit Wohn- und Geschäftshäusern begann. 1897 erhielt die Oststraße ihren heutigen Namen nach der Stadt Oschatz bei Leipzig. Neben der Bürgerstraße entwickelte sich die Oschatzer Straße zum Geschäftszentrum Pieschens mit zahlreichen Läden unterschiedlichsten Sortiments. Größtes Handelshaus war das um 1898 vom jüdischen Kaufmann Fanger errichtete Gebäude Oschatzer Straße 15 (Foto) . 1930 übernahm der amerikanische Woolworth-Konzern das Kaufhaus, welches später unter dem Namen HAWA - Haus der vielen Waren firmierte. Nach 1945 als Konsum-Warenhaus genutzt, befand sich hier zuletzt die Filiale eines Drogeriemarktes. Kirche der Herrnhuter Brüdergemeine: Die Glaubensgemeinschaft der Herrnhuter Brüder entstand im 18. Jahrhundert und wurde von Nikolaus Graf von Zinzendorf, einem am Hofe August des Starken tätigen Justizrat, gegründet. Sitz der weltweit aktiven evangelischen Gemeinschaft ist bis heute die Stadt Herrnhut in der Nähe von Bautzen. Im April 1904 bildete sich auch in Dresden eine Gemeinde, die bis 1945 einige Räume der Taubstummenanstalt in der Nähe des Hauptbahnhofes nutzte. Nach 1945 fanden die Gottesdienste zunächst in einem Haus auf der Ostra-Allee, später im Gebäude der evangelisch- reformierten Kirche an der Brühlschen Terrasse statt. Erst 1978 konnte die Herrnhuter Brüdergemeine eine kleine Kirche im Hof des Grundstücks Oschatzer Straße 41 erwerben, welche zuvor der evangelisch-methodistischen Kirche als Gemeindezentrum diente. Bis heute treffen sich hier die ca. 280 Gemeindemitglieder zu Gottesdiensten und anderen kirchlichen Veranstaltungen.

namen gastwirtsch. 1930 Spalte 2 erledigt bis Gerbig, Gertrud

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Die Bürgerstraße, ursprünglich Feld- bzw. Flurweg genannt, trug ab 1877 auf Pieschener Flur den Namen Schulstraße. Grund für diese Namensgebung war, dass hier seit 1805 das Pieschener Schulhaus (Bürgerstraße 76) stand. Nachdem das alte Gebäude nicht mehr der gewachsenen Schülerzahl genügte, erfolgte 1861 auf dem heutigen Grundstück Bürgerstraße 68 ein Neubau. Heute wird dieser vom Kinder- und Jugendhaus "Emmers" genutzt. 1886 erhielt zunächst der Abschnitt zwischen Oschatzer Straße und Moritzburger Platz seinen heutigen Namen im Zusammenhang mit der geplanten Bebauung in diesem Bereich. Anlass war die ein Jahr zuvor erstmals gewährte Verleihung des Bürgerrechts an die Bewohner der Gemeinde Pieschen. 1888 konnte das erste Mietshaus bezogen werden. Weitere Gebäude entstanden bis zum Ende des 19. Jahrhunderts in geschlossener Bauweise. Markanteste Bauwerke sind die 1888 geweihte neogotische Markuskirche und das 1891 fertiggestellte Pieschener Rathaus. Mit der Eingemeindung Pieschens wurde der Straßenname Bürgerstraße 1897 auch auf die Schulstraße übertragen und beide Abschnitte zusammengefasst. Während die oberen Etagen der Häuser in der Regel Wohnzwecken vorbehalten waren, gab es in den Erdgeschossräumen Geschäfte und kleine Gewerbebetriebe, darunter die Gaststätte “Bürgerhof” (Nr. 29), Kubaschs Badeanstalt (Nr. 33) und den ersten Pieschener Ratskeller (Nr. 77). Mit Fertigstellung des neuen Rathauses wurde diese Gaststätte in neue Räumlichkeiten verlegt. Auch das Eckhaus zur Oschatzer Straße wurde einst gastronomisch genutzt. Ab 1897 befand sich in den Räumen des früheren Postamtes (Nr. 36) die Gaststätte “Zur Post”. Architektonisch bemerkenswert ist auch ein 1912 nach Plänen von Stadtbaurat Erlwein errichtetes Wohnhaus (Nr. 72) mit mehreren Kleinwohnungen (Foto). Ein weiteres bekanntes Lokal entstand nach 1990 auf der Bürgerstraße 14. Das mehrfach ausgezeichnete Restaurant “ars vivendi” (seit 2006 “Petit Frank”) gilt als eines der besten Feinschmeckerlokale in Dresden. Im Haus Nr. 38/40 hatte seit 1908 die traditionsreiche Spielwarenhandlung „Puppen-Langner“ ihren Sitz, bis zur Schließung 2014 ältestes Spielzeuggeschäft Dresdens. Wichtige Kulturstätten des Stadtteils sind die Kreative Werkstatt im Hof der Bürgerstraße 50 sowie das Kinder- und Jugendhaus „Emmers“ im alten Schulhaus (Nr. 68). Fotos: Polizeirevier Pieschen an der Bürgerstraße / Ecke Osterbergstraße - Spielplatz im Galvanohof Einzelne Gebäude: Bürgerhof (Nr. 29): In diesem Gebäude befand sich seit ca. 1900 das Restaurant "Zum Bürgerhof" sowie das "Bürgerbad", ein Wannenbad für die Anwohner der Vorstadt. Inhaber des Lokals war um 1910 Wilhelm Korb, ab 1914 August Richard Schubert. Heute befindet sich hier ein portugiesisches Restaurant. Restaurant "Zur Post" (Nr. 36): Ursprünglich befand sich in diesem Gebäude seit ca. 1880 das erste Pieschener Postamt. Nachdem dieses 1892 in das neu erbaute Rathaus verlegt worden war, vermietete man die Räume an einen Gastwirt, der hier "Jahn´s Gaststätten", später "Restaurant zur Post" genannt, einrichtete. Neben den Gasträumen und einem Vereinszimmer gehörte auch eine Stehbierhalle zu diesem Lokal. Nach der Wende nutzte viele Jahre der Frankreichladen "Savoir vivre" die Räume. Am 8. April 2016 eröffnete hier das Bistro "&Rausch", eine Kombination von Bistro, Café und Bar. Puppen-Langner (Nr. 40): Das traditionsreiche Dresdner Spielwarengeschäft wurde am 1. Oktober 1894 von Hedwig Langner als Puppen-Klinik gegründet und widmete sich vor allem der Reparatur und Pflege defekter Puppen. Zunächst nutzte man Räume gegenüber der Markuskirche (Nr. 55), bevor das Unternehmen 1908 zur Bürgerstraße 40 umzog. Tochter Johanna begann sich nun verstärkt dem Verkauf von Spielzeug zuzuwenden, während Hedwig Langner auch weiterhin ihre Puppenklinik betrieb. Trotz Kriegszerstörungen und der wirtschaftlichen Probleme der Nachkriegszeit blieb der Laden auch nach 1945 in Familienbesitz und wurde ab 1950 von Johannas Sohn Rudolf Winkler und seiner Frau Christa fortgeführt. 1985 übernahm Hansjochen Langner die Geschäftsführung. 1989 und Anfang der 1990er Jahre gab es umfassende Umbauarbeiten im Geschäft, welches bis zur Schließung Ende 2014 älteste Dresdner Spielzeughandlung blieb. Galvanohof: Der Gebäudekomplex an der Bürgerstraße 50 beherbergte ursprünglich die Geschäftsräume des “Consumvereins für Pieschen und Umgegend”. Später nutzte die Konsumgenossenschaft Dresden, nach deren Zwangsauflösung bis 1945 die “Gemeinschaftswerk Versorgungsring G.m.b.H.” die Räume. Nach dem Zweiten Weltkrieg befand sich hier der Sitz des VEB Galvano Dresden, einer Fabrik zur Herstellung galvanischer Erzeugnisse. Neben dem Pieschener Betriebsteil besaß die Firma ein weiteres Werk auf dem Areal der früheren Schokoladenfabrik Petzold & Aulhorn in Plauen. 1993 schloss die Firma. Die verfallenden Gebäude wurden daraufhin vom 1994 gegründeten Verein “Kreative Werkstatt Dresden” e. V. übernommen. Zunächst richtete man hier einige Räume für Künstler ein, in denen Kurse in Malerei, Bildhauerei und plastischem Gestalten angeboten wurden. Ab 1999 konnten die Bauten schrittweise saniert und für eine dauerhafte kulturelle Nutzung umgebaut werden. Heute befinden sich im Galvanohof Werkstätten für verschiedene künstlerische Betätigungen, eine Galerie sowie Kursräume und Büros. Seit 1996 finden regelmäßige Ausstellungen regionaler und überregionaler Künstler statt. Berkenswert ist die aus 1500 Keramikfliesen bestehende Wandgestaltung am Durchganz zum Hof (Foto) . Schöpfer waren zwischen 2006 und 2009 Kinder und Jugendliche aus dem Stadtteil. Kreative Werkstatt Dresden Galvanohof - Bürgerstrasse 50 - 01127 Dresden www.kreative-werkstatt.de Firma Ostner (O.D.-Werk Willy Ostner): Das Unternehmen wurde 1921 von Willy Ostner (1889-1959) und seinem Bruder als Kraftfahrzeughandlung gegründet und hatte seinen Sitz zunächst auf der Strehlener Straße 21. 1923 übernahm er eine kleine Fahrrad- und Armaturenfabrik im Hintergebäude der Leipziger Straße 154 in Pieschen. Drei Jahre später erwarb er das GrundstückBürgerstraße 56 und begann dort 1927 mit der Herstellung von Motorrädern. Unter dem Markennamen „O. D.“ wurden hier bis 1936 verschiedene Modelle gefertigt. 1932 nahm der Betrieb zusätzlich die Produktion von Nutzfahrzeugen auf. Beliebt waren vor allem die O.D.-Lieferdreiräder für Händler und Kleingewerbetreibende. Außerdem entstanden vierrädrige Lieferwagen mit Zweitaktmotor, später auch mit leistungsstärkeren Motoren der Ford-Werke. Der wirtschaftliche Erfolg ermöglichte ihm 1935 die Übernahme der Elite-Diamant-Werke in Brand-Erbisdorf und 1938 den Erwerb eines größeren Betriebsgeländes. Hier widmete sich Ostner fortan ausschließlich dem Nutzfahrzeugbau. Nach Kriegsende siedelte er nach Bayern über und baute dort eine neue Fahrzeugfabrik auf. 1955 wurde diese von den Faun-Werken übernommen und bis 1958 fortgeführt. Am Pieschener Standort an der Bürgerstraße erinnert heute ein Wandbild an das Unternehmen.

namen gastwirtsch. 1930 Spalte 3 4 erledigt bis Hauschild, Emil

Die Anlage des bis 1906 Lindenplatz genannten Dorfplatzes geht auf das frühere Bauerndorf Pieschen zurück. Hier befanden sich die Wohnhäuser und Stallungen der Pieschener Bauern und Häusler. Mehrfach fielen die Gebäude kriegerischen Auseinandersetzungen oder Dorfbränden zum Opfer, wurden jedoch in der Regel schnell wiederaufgebaut. In der Mitte des Platzes stand noch bis 1897 das Spritzenhaus der Ortsfeuerwehr, der alle Männer des Dorfes angehörten. 1839 ließ der Lehrer Christian Gottlieb Mohn aus Anlass des 300. Jubiläums der Reformation auf dem Dorfplatz zwei Linden pflanzen, die noch bis 1896 den 1882 so benannten „Lindenplatz“ zierten. In den umliegenden Gebäuden entstanden in der Mitte des 19. Jahrhunderts kleine Weinstuben und Gartenlokale, welche den Ort zum Ausflugsziel der Dresdner Bevölkerung machte. Bekannt war das 1899 errichtete "Lindenschlößchen" im Erdgeschoss von Nr. 17. Die Gehöfte an der Westseite des Dorfplatzes wurden um die Jahrhundertwende zugunsten neuer Mietshäuser abgerissen. Dennoch sind hier und an der Robert-Matzke-Straße noch einige alte Bauernhäuser sowie ein historischer Brunnentrog erhalten geblieben. Unter Denkmalschutz stehen unter anderem die Güter Altpieschen Nr. 2 von 1710 sowie Nr. 4 mit einem Schlussstein von 1806. 2005 konnte die Platzanlage begrünt und neu gestaltet werden. Fotos: Dorfkern Altpieschen - links Altpieschen Nr 2, rechts Altpieschen Nr. 4 Städtisches Obdachlosenasyl: Auf dem Grundstück Nr. 9 (heute Altpieschen 5-15), welches früher zum sogenannten “Bischofsgut” gehörte, richtete die Stadt Dresden 1912 ein Asyl für Obdachlose ein. Die aus mehreren Gebäuden bestehende Wohnanlage galt zum Zeitpunkt ihrer Erbauung als eine der modernsten in Deutschland und besaß Räume für 59 obdachlose Familien sowie für 110 alleinstehende Männer. Die Planung oblag dem Dresdner Stadtbaurat Hans Erlwein. Die Wohnungen bestanden aus zwei Zimmern und waren jeweils mit einem Herd ausgestattet. Waschbecken und Toiletten befanden sich im Treppenhaus. Außerdem gab es im Innenhof einen als Treffpunkt für Kinder gedachten “Spielpavillon” sowie ein Brausebad und ein Kinderschwimmbad im Keller. Da die Wohnanlage schon bald ausgelastet war, machten sich bereits 1915 Erweiterungen erforderlich, die nach Erlweins Tod das Dresdner Architektenbüro Hirschmann übernahm. Leider brannte der Spielpavillon in den Zwanziger Jahren ab und wurde nicht wieder aufgebaut. Dennoch wurde das Obdachlosenasyl ab 1926 verstärkt zur Unterbringung kinderreicher Familien genutzt, um zumindest die größte Not der Betroffenen zu lindern (Foto um 1930). Im Eingangsgebäude (Altpieschen 5) existierte zeitweise die Gaststätte “Altpieschener Destille”, deren Räume bis Ende 2012 von der Arbeiterwohlfahrt genutzt werden. Der zu den wichtigen Zeugnissen der Sozialfürsorge in Dresden gehörende Gebäudekomplex wurde 2003/05 saniert und beherbergt heute Mietwohnungen unterschiedlicher Größe. Im Innenhof fand eine Plastik Aufstellung, die einen Fleischer mit einem Schwein zeigt und aus dem ebenfalls von Erlwein entworfenen Dresdner Schlachthof stammt.

namen gastwirtsch. 1930 Spalte 4 erledigt bis Köseberg, Otto

add_def_ver("v_o_koerner","Otto Körner, Dresden","Otto Körner, Dresden, 1909 Dohnaer Straße 7");

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namen gastwirtsch. 1930 Spalte 1 erledigt bis Langer, Paul

namen gastwirtsch. 1930 Spalte 2 erledigt bis Nestler, Max

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Das Kraftwerk an der Cottaer Bahnstraße entstand 1894 zur Strom- und Wärmeversorgung des Bahnbetriebswerkes und einiger öffentlicher Gebäude. 1945 wurde das Werk schwer beschädigt, konnte jedoch 1954 wiederaufgebaut und erneut in Betrieb genommen werden. Bis 1992 diente das Kohlekraftwerk der Energieerzeugung und wurde nach Anschluss der Betriebsgebäude an das Fernwärmenetz geschlossen

namen gastwirtsch. 1930 Spalte 3 erledigt bis Riedel, Alfred

Hermann Hultzsch: 1873 zog er in die Mathildenstraße 37, 1875 an den Striesener Platz 12, 1879 in die Blasewitzer Straße 33, direkt bei seinem Bruder Theodor.

namen gastwirtsch. 1930 Spalte 4 erledigt bis Scholze, Minna

add_def_ver("v_p_kotzsch","Photo Kotzsch, Dresden- Blasewitz","Werner Kotzsch, Dresden- Blasewitz, 1942 Hüblerstr. 19");

Friedrichstraße:
Nr. 9: Das Haus gehörte zu den ältesten Gebäuden der Friedrichstadt und wurde 1673/74 vom Vorwerksverwalter Johann Gottfried Otto errichtet. 1674 erhielt er für sein Haus das Beherbergungs- und Schankrecht. Zunächst "die große Schänke" genannt, setzte sich später der Name Rote Schänke durch. Zuletzt wurde das Lokal bis zur Zerstörung 1945 "Friedrichstädter Hof" genannt. (welche Nummer???)

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namen gastwirtsch. 1930 Spalte 1 erledigt bis Stelzner, Friedrich

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Hermann Hultzsch: 1875: Sein Atelier befand sich zu dieser Zeit im Erdgeschoss in der Pillnitzer Straße 64

namen gastwirtsch. 1930 Spalte 2 erledigt bis Walther, Paul

add_def_ver("v_a_krause","Arthur Krause, Klotzsche","Arthur Krause, Klotzsche- Königswald, 1915 Königsbrücker Str. 83");

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So befand sich die Villa Regerstraße 2 (Foto), 1873/74 von Theodor Lehnert für Premierleutnant Werner Freiherr von Reitzenstein erbaut, zeitweise im Besitz eines Neffen des Grafen von Moltke, der seinen berühmten Onkel mit einer Relieftafel am Haus ehrte. 1910 wurde diese Villa durch einen Neubau des Architektenbüros Schilling & Weidner ersetzt. Im Garten gab es eine 1918 vom Robert-Diez-Schüler Arthur Ernst Berger geschaffene Plastik mit Darstellung eines Hirsches, welche seit 2000 verschollen ist. (stimmt das???)

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add_def_ver("v_h_krellmann","H. Krellmann, Dresden","Verlag Herm. Johannes Krellmann, Dresden- A. 16, Striesener Str. 19");

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Ansichtspostkarten 1935:
Krellmann, Johannes, Striesener Str. 19

add_def_ver("v_h_kriele","H. Kriele, Dresden","Photohaus Hugo Kriele, Dresden, 1938 Altreick 1");

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add_def_ver("v_krille-martin","Krille & Martin, Dresden","Verlag Krille & Martin, Dresden-A. 93, FKD"); add_def_ver("v_f_krille","Felix Krille, Dresden","Kunstanstalt Felix Krille, Dresden- Striesen");

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Reinhold Begas (* 15. Juli 1831 in Schöneberg; † 3. August 1911 ebenda) war ein deutscher Bildhauer. Er war der Sohn des Malers Carl Joseph Begas und gilt als Hauptvertreter der neobarocken Berliner Bildhauerschule.

add_def_ver("v_e_kubitz","Ernst Kubitz, Leuben","Verlag Ernst Kubitz, Leuben, 1902 (Kolonialw-, Wein- u. Delikatessenhdlr.) Bahnhofstr. 54");

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add_def_ver("v_c_ulrich","Carl Ulrich, Dresden","Carl Ulrich, Dresden, Seidnitzer Str. 19");

arc_get("a_w_pinkau","Pinkau, Wilhelm","Baumeister, Dohnauerstr. 47,49","");

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Erste Pläne zum Bau einer Elbbrücke im äußersten Dresdner Westen kamen bereits kurz nach 1900 auf, um die Verkehrsanbindung der Ortschaften in diesem Gebiet zu verbessern und auch hier eine städtische Entwicklung zu fördern. Zuvor standen nur mehrere Fähren zur Verfügung, die jedoch längst nicht mehr den Anforderungen genügten. Vor allem nach Eröffnung des Luftschiffhafens auf Kaditzer Flur machte sich das Fehlen einer Brücke negativ bemerkbar. Zur Abhilfe wurde der Bau einer Interimsbrücke vorgeschlagen, wofür die Teile der 1907-1910 beim Neubau der Augustusbrücke verwendeten Konstruktion verwendet werden sollten. Diese Pläne wurden jedoch nicht realisiert. Erst 1929/30 konnte schließlich mit den Arbeiten begonnen werden. Anlass für den Brückenbau war die geplante Anlage eines Gewerbegebietes zwischen Kaditz, Mickten und Übigau. Die Entwürfe für die Konstruktion stammten von Heinrich Koch, Kurt Beyer und Paul Wolf, die Bauausführung oblag den Firmen M.A.N.-Werk Gustavburg, der Mitteldeutschen Stahlwerke AG Lauchhammer sowie den Dresdner Unternehmen Dykerhoff & Widmann und Grün & Bilfinger. Die zum Zeitpunkt ihrer Entstehung (Foto) längste genietete Blechträgerbrücke Europas überspannt mit 115 Metern Länge die Elbe und verbindet die Stadtteile Cotta und Kaditz. Ihre Gesamtlänge beträgt 308 m. Der am 1. Oktober 1930 eingeweihte und offiziell Kaditzer Brücke genannte Neubau führte zu einer enormen Verbesserung der Verkehrsverhältnisse in diesem Teil Dresdens und beendete die abseitige Lage von Kaditz. Die neue Brücke sollte ursprünglich Teil des geplanten Außenringes über Weißeritzufer - Zellescher Weg und Karcherallee werden, wobei der Bau einer weiteren Brücke in der Nähe des Waldschlößchens vorgesehen war. Trotz Beginns der Arbeiten konnte dieser Ring bis zum Kriegsbeginn nur in Fragmenten realisiert werden. Auch die im Untergeschoss der Kaditzer Brücke geplante Schnellstraßenbahn Pirna - Meißen wurde nie gebaut, obwohl erste Prototypen der Fahrzeuge bereits entwickelt waren. 1945 war auch die Kaditzer Brücke wie alle anderen Elbbrücken zur Sprengung vorgesehen, die jedoch durch den mutigen Einsatz des Dresdners Gustav Heinrich Gröblehner und seiner Tochter verhindert werden konnte. Allerdings hatten Sprengbomben die Brücke in den letzten Kriegstagen so stark beschädigt, dass sie erst 1947 wieder für den Straßenverkehr genutzt werden konnte. 1984 wurde sie nach dem früheren Chefredakteur der kommunistischen Zeitschrift “Arbeiterstimme” in Rudolf- Renner-Brücke umbenannt, ein Name, der sich jedoch nie durchsetzen konnte. Am 18. November 1991 hob der Stadtrat diese Namensgebung wieder auf, wobei die Brücke nun auch offiziell in Flügelwegbrücke umbenannt wurde. Foto: die Flügelwegbrücke vor dem Umbau 2002 Infolge der starken Verkehrsbelastung und daraus resultierender Bauschäden machte sich Ende der 90er Jahre eine komplette Erneuerung der Flügelwegbrücke erforderlich. Am 28. Mai 2001 begannen die Arbeiten mit dem Bau provisorischer Brückenpfeiler, auf die der erste Teil der neuen Brücke montiert wurde. Im Anschluss wurde in mehreren Etappen die alte Stahlkonstruktion abgetragen. Auf den Pfeilern entstand ein moderner Neubau mit drei Fahrspuren. Im letzten Bauabschnitt wurde die zweite Brückenhälfte verschoben und auf die vorhandenen Pfeiler gesetzt, so dass heute insgesamt sechs Spuren zur Verfügung stehen. Am 24. Juni 2004 konnte der Brückenneubau dem Verkehr übergeben werden. Die neue Brücke ist insgesamt 285 m lang, 31 m breit und kostete ca. 17,3 Millionen Euro. 2006 erfolgte noch die Fertigstellung des Zufahrtstunnels auf Altstädter Seite, welcher eine kreuzungsfreie Querung der Hamburger Straße ermöglicht

Rote Häuser:
Die Siedlung Rote Häuser, unmittelbar an der Ortsgrenze zu Pesterwitz gelegen, entstand vermutlich im 18. Jahrhundert. Zu den Häusern gehörten neben einer Schmiede mit Schankgerechtigkeit auch die sogenannten Jägerhäuser, die während der Hofjagden als Unterkunft für die Jagdgesellschaft genutzt wurden. 1794 wurde diese Häusergruppe an die neu gebildete Siedlung Neunimptsch angeschlossen. add_def_ver("v_m_kunath","Max Kunath, Pillnitz","Max Kunath, Pillnitz, 1939 Pirnaische Str. 3");

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Asternweg Der Asternweg wurde, ebenso wie der benachbarte Dahlienweg, im Zusammenhang mit dem Bau einer kleinen Wohnsiedlung an der Kolpingstraße angelegt. Beide Straßennamen nehmen Bezug auf den Zierpflanzenanbau in den umliegenden Gärtnereien. Cossebauder Straße Die Cossebauder Straße verbindet Niedergohlis mit dem benachbarten Cossebaude und geht an der Ortsgrenze in die Gohliser Straße über. Auf dem Grundstück Nr. 4 befindet sich das 1885 erbaute frühere Schulhaus des Ortes. Heute wird das Gebäude vom Verein Lebenshilfe Dresden e.V. als Ferien- und Freizeithaus genutzt. Unmittelbar daneben befindet sich die Wohnanlage “Alte Schule” für geistig Behinderte. Der Gohliser Dahlienweg befindet sich im Neubaugebiet östlich der Schillerstraße. Mit der Benennung nach einer Zierpflanzenart wird, ebenso wie beim benachbarten Asternweg, an den einst bedeutenden Gartenbau im Ort erinnert. Dorfstraße Die halbkreisförmig verlaufende Dorfstraße bildet den Kern des Ortes Niedergohlis, welcher 1329 nach Auflösung des zuvor bestehenden Vorwerkes entstand. Hier haben sich noch zahlreiche Gehöfte und Bauernhäuser aus dem 18. und 19. Jahrhundert erhalten, die zum Teil unter Denkmalschutz stehen. Bemerkenswert sind der große Dreiseithof Nr. 1 mit Wohnstallhaus, Scheune und Nebengebäuden, die Dreiseithöfe Nr. 11, 16 (Foto) und 19 sowie die Bauernhäuser Nr. 8, 10, 17 und 19. Auf der Dorfstraße 12 befand sich früher das Gasthaus "Elbschlösschen" mit großem Saal, Gästegarten und einer angeschlossenen Fleischerei. Hinter den Gebäuden Dorfstraße 19 bis 23 hat sich eine zum Schutz vor Elbehochwasser errichte Bruchsteinmauer erhalten. An der Dorfstraße erinnert außerdem ein Denkmal an die im Ersten Weltkrieg gefallenen Einwohner. Elbstraße Als Elbstraße wird die Hauptstraße der früheren Dorfes Obergohlis bezeichnet. Sie beginnt am alten Dorfkern von Niedergohlis und führt von dort in Richtung Dresden. Ursprünglich trug sie den Namen Dorfstraße, wurde jedoch 1913 in Dresdner Straße umbenannt. Nachdem Gohlis 1974 nach Cossebaude eingemeindet worden war, machte sich eine Umbenennung erforderlich, da es im Hauptort ebenfalls eine Dresdner Straße gab. Dabei entschied man sich wegen der nahen Elbe für den Namen Elbstraße. An der Elbstraße sind noch einige Gebäude aus der Vergangenheit des Ortes erhalten geblieben. Bemerkenswert ist das Fachwerkhaus Elbstraße 1 (Fotos) mit einer Schrifttafel, welche an das Elbehochwasser vom 3. März 1784 erinnert. In diesem Jahr öffnete hier der Gohliser Gasthof. Ober- und Niedergohlis waren immer wieder Opfer von Elbefluten, zuletzt im Jahr 2002, als der Ort zum Großteil unter Wasser stand. Bereits in der Vergangenheit bemühten sich deshalb die Bewohner, ihre Gehöfte zu schützen und errichteten eine mehrere 100 Meter lange Bruchsteinmauer, welche sich bis zum Windmühlenweg zieht. Diese blieb bis zur Gegenwart erhalten und steht ebenso wie einige Gebäude unter Denkmalschutz. Fehrmannweg Der Fährmannweg verbindet Gartenstraße und Elbstraße und erhielt seinen Namen nach dem früheren Obergohliser Gutsbesitzer Adolf Fehrmann. Gartenstraße Die Gartenstraße ist die östliche Fortsetzung der Cossebauder Grenzstraße und bildet zugleich die Flurgrenze zwischen Cossebaude und Niedergohlis. Ihren Namen erhielt sie 1907 nach den zahlreichen Gärtnereien, welche einst wichtigster Erwerbszweig des Ortes waren. Typische Gärtnerwohnhäuser sind u. a. an der Gartenstraße 5 und 84 erhalten geblieben. Außerdem gibt es an der Gartenstraße noch einige Bauernhöfe. Das nach seinem früheren Besitzer sogenannte “Begergut” (Nr. 7) entstand 1863 als Dreiseithof und wurde 2010 zu einer Wohnanlage ausgebaut. Im Haus Nr. 66 hatte bis 1974 die Gemeindeverwaltung des Dorfes ihr Domizil. Grüner Weg Der Grüne Weg verbindet den Ortskern von Obergohlis mit der Dresdner Straße und führt von dort weiter bis zum Ziegeleiweg. Über weite Teile bildet der Weg zugleich die Flurgrenze zwischen Gohlis und Cossebaude. Erstmals ist die Straße als Grüneweg im Adressbuch von 1904 erwähnt. Seit dem Zweiten Weltkrieg ist die heutige Bezeichnung Grüner Weg üblich. Kolpingstraße Die Kolpingstraße in Niedergohlis, eine kurze Seitenstraße der Schillerstraße erhielt ihren Namen nach dem Theoologen Adolph Kolping (1813-1865). Als katholischer Priester befasste sich Kolping mit den sozialen Problemen seiner Zeit und gründete 1849 den Kölner Gesellenverein als Vorläufer des Kolpingwerkes, des sozialen Hilfswerks der katholischen Kirche. Manfred-Streubel-Weg Der erst nach 1990 angelegte Manfred-Streubel-Weg in Obergohlis erinnert an den deutschen Lyriker, Dramatiker und Kinderbuchautor Manfred Streubel (1932–1992). Streubel arbeitete zeitweise für die DDR-Kinderzeitschrift „Frösi“ und war außerdem als Autor für verschiedene Theater tätig. Aus politischen Gründen geriet er in Konflikt mit der DDR-Kulturführung und lebte ab 1963 in Dresden, zuletzt im Wohnhaus Gartenstraße 9 in Gohlis. Schillerstraße Die Schillerstraße bildet die Verlängerung der Heinrich-Mann-Straße in Cossebaude und wurde Ende des 19. Jahrhunderts mit Villen und Mehrfamilienhäusern bebaut. Architektonisch bedeutsam sind die unter Denkmalschutz stehenden Villen Schillerstraße 8 und 10 sowie das Wohnhaus Nr. 23. Ihren Namen erhielt die Straße nach dem deutschen Dichter Friedrich Schiller. Südstraße Die Südstraße in Niedergohlis erhielt ihren Namen nach ihrer Lage südlich des alten Dorfkerns. Die Verlängerung der Straße ist als Südweg in den Stadtplänen verzeichnet. Auf dem Grundstück Südstraße 2 haben sich noch Wohnhaus, Stall und Scheune eines Bauernhofes erhalten. Am nördlichen Ende der Straße befindet sich die Gohliser Anlegestelle der Weißen Flotte. Bis 1956 gab es außerdem eine Personen- und Wagenfähre, welche Gohlis mit dem gegenüber liegenden Kötzschenbroda verband. Diese Fähre wurde erstmals bereits im Jahr 1401 erwähnt. Windmühlenweg Der Obergohliser Windmühlenweg verbindet Dorf und Gohliser Windmühle und führt dabei unmittelbar an der Einfriedungsmauer des Ortes entlang, welche einst zum Schutz vor Elbehochwasser entstand. Früher wurde er als Ziegengasse bezeichnet, da er ursprünglich dem Ziegenauftrieb zu den Elbwiesen diente. Ältestes Gebäude ist das 1695 errichtete Wohnhaus Nr. 1, welches ebenso wie einige weitere Gebäude als Baudenkmal in die Denkmalliste eingetragen ist. Die Windmühle östlich des Ortskerns stammt in ihrer heutigen Form aus dem Jahr 1828 und ist bis heute ein beliebtes Ausflugsziel am Elberadweg (Foto).

Hochschulstraße 4/7??

Valtenbergstraße:
Die Straße entstand 1884 im Zusammenhang mit dem Bau der Siedlung Neurochwitz. Da diese im Volksmund in den Anfangsjahren “Kamerun” genannt wurde, erhielt auch die in Richtung Loschwitzgrund führende Verbindung zunächst den Namen Kamerunstraße. Später wurde diese Straße im unteren Teil in Kattowitzer (heute Scharfensteinstraße), im oberen Teil in Königshütter Straße umbenannt . Ihren heutigen, seit 1967 verwendeten Namen, verdankt sie einem gleichnamigen Berg in der Oberlausitz. Das Wohnhaus Valtenbergstraße 1 im Landhausstil steht unter Denkmalschutz.

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Postämter 1937:
A1 Postplatz 2 A3 Walpurgisstr. 2 A4 Freiberger Str. 28 A5 Schäferstr. 28 N6 König-Albert-Str. 25,27 A7 Paketpostamt Kellstr. 12 N8 Radeberger Str. 1 A9 Neumarkt 9 und Moritzstr. 1 N11 Leipziger Str. 40 N12 Königsbrücker Str. 7 N15 Königsbrücker Str. 90 A16 Gerokstr. 18 u. 20 A18 Lange Str. 24 A19 Wartburgstr. 50 A20 Waterloostr. 16 u. 18 A21 Hofmannstr. 8 N23 Großenhainer Str. 149 u. 151 A24 Bismarckstr. 8 und Prager Str. 62 im Hauptbahnhof, Nordhalle Durchgang III N25 Schlesischer Platz 1 im Bahnhof Neustadt A26 Zwinglistr. 39 A27 Bienerzstr. 17 A28 Wernerstr. 13 A29 Cossebauder Str. 3 N30 Bunsenstr. 4 N31 Kaditzer Str. 30 A32 Langemarckstr. 56 A33 Schlachthofring 7 A35 Tischerstr. 2 A36 Hülßestr. 24 Postagentur N37 Andersenstr. 18 Postagentur A38 Kesselsdorfer Str. 127 A39 Meißner Landstr. 125 A40 Karlsruher Str. 30 A42 Finkenfangstr. 29 Postagentur A43 Altdobritz 15 A44 Neuberinstr. 2 A45 Dieselstr. 41 A46 Hosterwitzer Str. 2 A47 Tögelstr. 6 A48 Hauptbahnhof Ostbau Postamt Dresden Ausstellung Lennéstr. 3 Postamt Weißer Hirsch Bautzner Landstr. 23 Postamt Blasewitz Justinenstr. 1 Postamt Bühlau Bautzner Landstr. 143 Postamt Flughafen, Immelmannplatz Postamt Loschwitzm Pillnitzer Landstr. 30 Postagentur Wachwitz Altwachwitz 9 Bahnpostamt 20 Kellstr. 12

add_def_ver("v_r_kuschmann","R. Kuschmann, Lockwitz","Richard Kuschmann, Buchhandlung, Lockwitz, Dohnaer Str. 308");

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add_def_ver("v_f_grosser","Felix Grosser, Dresden","Lith. Kunstanstalt Felix Grosser, Dresden A., 1902 Alemannenstr. 37");

add_def_ver("v_a_langer","A. Gust. Langer, Dresden- Löbtau","Ad. Gustav Langer, Buch- u. Papierhdlg., 1902 Nostitz-Wallwitzplatz 15");

Die Grundstraße führt von Loschwitz durch das Tal des auch “Trille” genannten Loschwitzbaches und verbindet den Ort mit den nordöstlichen Stadtteilen Dresdens. Neben Loschwitz werden auch die Fluren von Niederrochwitz und Bühlau berührt, bevor die Straße in die Bautzner Landstraße mündet. Im Loschwitzgrund bestanden seit dem Mittelalter mehrere Wassermühlen, die später teilweise in Gewerbebetriebe umgewandelt wurden und heute sämtlich verschwunden sind. Der Bach, der diese Mühlen antrieb, entspringt in der Nähe von Gönnsdorf und mündet unterhalb des alten Loschwitzer Dorfkerns in die Elbe. Durch den Ausbau der wichtigen Verkehrsverbindung 1910 und 1929/36 ist der Bachlauf heute weitgehend kanalisiert und überbaut. In diesem Zusammenhang verschwanden auch zahlreiche ältere Häuser, vor allem im unteren Teil der Straße. Erstmalig wurde der Name Grundstraße 1886 in einem Adressbuch gefunden. Zuvor wurde der entlang des Bachs führende Weg meist Loschwitzgrund bzw. im oberen Teil Bühlauer Grund, zeitweise auch Grundweg genannt. Bis zum Ausbau der Grundstraße zwischen 1920 und 1936 war die Fahrstraße von dem auf dem anderen Ufer der Trille verlaufenden Fußweg getrennt und über mehrere Brücken verbunden. Für diesen hatte sich die Bezeichnung Promenadenweg eingebürgert. Der unterste Abschnitt der Straße zwischen Elbe und Körnerplatz heißt seit 1895 Friedrich-Wieck-Straße. Auf Bühlauer Flur, d. h. ab Einmündung der Neugersdorfer Straße, trug die Straße zwischen 1901 und 1926 amtlich den Namen der Loschwitzer Straße. Im Zusammenhang mit der Eingemeindung Bühlaus wurde die Straßenbezeichnung Grundstraße ab 1. Juni 1926 auch auf die Loschwitzer Straße ausgedehnt. Bis 1945 befand sich an der Einmündung der Grundstraße in den Körnerplatz eine Rangierstelle der Straßenbahn, die ursprünglich Auftakt für eine geplante Linie bis nach Bühlau sein sollte. 1949 wurde diese durch Dresdens einzige O-Bus-Linie ersetzt, die noch bis 1974 zwischen Löbtau und Weißig verkehrte. Ab 1990 bis 2001 wurde die Grundstraße komplett saniert. An der Buswartehalle Steglichstraße (Foto) berichtet ein 1949 von Hermann Glöckner gestaltetes Wandbild mit Inschrift von der Geschichte dieser Straße: DIE GRUNDSTRASSE DURCH SIE VERBANDEN DRESDENS ÖSTLICHE GEBIETE SICH MIT DEM WEG ZUM NAHEN BAUTZNER LAND AN IHRER SEITE FLOSS ZU TAL DIE TRILLE GAB SIEBEN MÜHLEN, EINER SILBERSCHMIEDE KRAFT UND ARBEIT FAND SO MANCHE FLEISS`GE HAND Einzelne Gebäude: Loschwitz: Die Grundstraße nimmt ihren Anfang am Körnerplatz, wo einst das Loschwitzer Rathaus mit dem Ratskeller stand. Es wurde 1994 gemeinsam mit dem Wohnhaus Grundstraße 3 zugunsten des neuen Ortsamtes abgetragen. Erhalten blieben jedoch einige der kleinen Winzerhäuschen in der Nachbarschaft, die früher zum Teil gastronomisch bzw. als Ladengeschäfte genutzt wurden. Bekannte Weinschänken waren das “Sängerheim” (Nr. 17), das Lokal “Zum Kamerad” (Nr. 29) und die Grundschänke (Nr. 37). Auch der heutige Firmensitz der Loschwitzer GmbH Ofenbau Dresden-Ost war einst eine Gaststätte, die den Namen “Zur Amtsschänke” trug (Nr. 58). Zu den kühnen, jedoch nie realisierten Projekten gehörte um 1930 ein Brückenbau über die Grundstraße. Die vom Rochwitzer Architekten Paul Marcus entworfene Brücke sollte als gewaltige Bogenbrücke das Tal des Loschwitzbaches überspannen und so eine Direktverbindung zwischen dem Weißen Hirsch und Oberloschwitz herstellen. Fotos: Die Grundstraße in der Nähe des Körnerplatzes auf historischen Ansichten: Mühlenidyll um 1800 (links), Gaststätte “Sängerheim (Mitte), Blick vom Körnerplatz (2003) Kinderbewahranstalt Loschwitz: Die zu den ältesten Dresdner Kindergärten gehörende Einrichtung wurde 1865 in einem heute nicht mehr vorhandenen Gebäude im früheren Dorfkern eingerichtet. Dieser Straßenabschnitt trägt seit 1895 den Namen Friedrich-Wieck-Straße. Gründerin war die Loschwitzerin Adolphine Geyer, die bereits ab 1851 als Mitglied des Evangelischen Frauenvereins in ihrem Wohnhaus Handarbeitsunterricht für die Kinder des Ortes anbot. Später übernahm ein vom Frauenverein eingesetztes Direktorium die Verwaltung. Aus Platzgründen entstand 1901 ein Neubau auf dem Grundstück Grundstraße 36 (heute Kirchgemeindehaus). Hier bestand der Kindergarten bis 1941, wurde dann als kirchliche Einrichtung aufgelöst und 1946 von der Stadt Dresden übernommen. 1955 verlegte man diese zum Veilchenweg 7. 2004 konnte schließlich ein moderner Neubau an der Fidelio-F.-Finke-Straße bezogen werden. Nr. 3: Die Geschichte des Hauses Grundstraße 3 begann vermutlich im 18. Jahrhundert, da bereits 1716 ein Gebäude auf diesem Grundstück nachweisbar ist. Dieses diente zunächst als Wohnhaus; im Erdgeschoss befand sich eine Milch- und Butterhandlung. 1903 wurden das Haus von der Gemeinde erworben und beherbergte nun verschiedene kommunale Behörden und Einrichtungen. Auch nach der Eingemeindung von Loschwitz blieb das Gebäude Teil des Rathauses und wurde noch bis 1989 als Wohn- und Bürohaus genutzt. 1994 erfolgte der Abbruch zugunsten des neuen Loschwitzer Ortsamtes. Nr. 5: Das aus einem früheren Häusleranwesen hervorgegangene Gebäude mit Kolonialwarenhandlung im Erdgeschoss beherbergte ab 1945 die “Loschwitzer Bücherstube”, eine kleine private Buchhandlung. 1970 wurde der Laden mangels Nachfolger geschlossen. Die Räume nutzt seitdem ein Rundfunkgeschäft. Nr. 18-20: Diese beiden Wohnhäuser beherbergten in ihren Erdgeschossräumen früher kleine Läden, wie sie für diesen Teil von Loschwitz typisch waren. U.a. gab es hier um 1910 das Puppen- und Spielwarengeschäft des Loschwitzer Ortsrichters Richard Rudolph, während in der Nummer 22 Schuhe gekauft und repariert werden konnten ("Schuhhaus Sommer"). Nr. 22: Das bereits 1627 erstmals erwähnte Loschwitzer Anwesen befand sich ab 1886 im Besitz des Bäckermeisters Gottfried Hermann Tanner, welcher hier seine Bäckerei betrieb. Das Geschäft, zu dessen Kunden auch zahlreiche Prominente und die in Wachwitz wohnenden Wettiner gehörten, blieb bis 1947 in Familienbesitz und wurde dann verpachtet. Zuletzt von der Familie Heuschkel betrieben, schloss die Bäckerei 1971 für immer ihre Pforten. 1984 entstand in den früheren Verkaufsräumen eine Garage. Heute dient das Haus Wohnzwecken. Hentschelmühle: Die Hentschelmühle befand sich unmittelbar am Eingang in den Loschwitzgrund (Grundstraße 26) und existierte bereits im 16. Jahrhundert. Nachdem sie viele Jahre im Besitz der Müllerfamilie Köhler war, erwarb 1785 die Familie Hentschel diese Wassermühle, welche daraufhin als Hentschelmühle bezeichnet wurde. Noch bis nach 1870 wurde hier Mehl gemahlen, bevor modernere Mühlen die Einstellung des Betriebes erforderten. Aus dem früheren Mühlengebäude entstand 1881/84 das auch “Rote Amsel” genannte Fachwerkhaus (Foto), welches heute als Leonhardi-Museum bekannt ist. Nr. 28/30: Die einst auf diesem Areal befindlichen vier Gebäude entstanden alten Urkunden zufolge bereits um 1650 und dienten ärmeren Loschwitzer Familien als Wohnung und Arbeitsstelle. Später gab es hier auch einige kleinere Läden. Die baufälligen Häuser wurden um 1970 zugunsten eines geplanten Straßenausbaus abgerissen. Weinschänke “Zum Kamerad” (Nr. 29): Die kleine Gaststätte befand sich seit Ende des 19. Jahrhunderts bis zur Schließung in einem ehemaligen Winzerhaus auf der Grundstraße. Unter Regie des Gastwirts Gerhardt entwickelte sich das 1862 eröffnete Lokal zum Treffpunkt eines Freundeskreises um den Musikpädagogen Friedrich Wieck. Auch der Begründer des Blasewitzer Waldparks, Artur Willibald Königsheim war hier häufig zu Gast. Nicht zuletzt nutzten einige Loschwitzer Vereine das Haus für ihre Versammlungen. Zu den Besitzern gehörte zeitweise Friedrich August Modes, der 1849 geborene älteste Sohn des letzten Loschwitzer Fährmeisters. 1957 verwüstete ein Unwetter die Gasträume und die angeschlossene Kegelbahn. Da eine Reparatur am Materialmangel scheiterte, musste das Haus 1958 geräumt werden und wurde 1965 abgerissen. Kirchgemeindehaus: Das Gebäude an der Grundstraße 36 (Foto) wurde 1901 als Kinderbewahranstalt erbaut und befand sich zunächst in kommunalem Besitz. Erst 1922 erwarb die Kirchgemeinde Loschwitz das Grundstück und richtete hier drei Jahre später ihr Gemeindehaus ein. Im Erdgeschoss entstanden zwei Säle für die Gemeindearbeit, die auch als Treffpunkt verschiedener Loschwitzer Vereine dienten. Das Obergeschoss beherbergte auch weiterhin einen kirchlichen Kindergarten, welcher jedoch 1941 auf Weisung der NS-Behörden geschlossen werden musste. 1944 beschlagnahmte die Wehrmacht das Haus und richtete hier ein Lazarett ein. Nach Zerstörung der Loschwitzer Kirche erhielt die Gemeinde 1945 ihr Eigentum zurück und nutzte dieses wieder für Gottesdienste und andere kirchliche Veranstaltungen. Das Obergeschoss diente bis 1955 als städtische Kindertagesstätte. 1961/62 erfolgte eine grundlegende Sanierung des Hauses. Aus dieser Zeit stammt auch das in Sgraffito-Technik gestaltete Wandbild “Seesturm” (“Jesus bedroht Wind und Wellen”) des Künstlers Albert Herold an der Fassade. Heute treffen sich hier u.a. die Gruppen der Kantorei, außerdem finden gelegentliche Veranstaltungen der Gemeinde statt. Seit 2014 hat im Haus zudem der Ortsverein Loschwitz-Wachwitz sein Domizil. Grundschänke (Nr. 37): Das kleine Lokal entstand 1895 auf der Grundstraße 37 und wurde vom Besitzer des Hauses, dem Fleischermeister Paul Herrmann, zunächst im Nebenerwerb betrieben. Besucher waren vor allem Fuhrleute sowie die bei Bauarbeiten in der Umgebung beschäftigten Arbeiter. Nach dem Tod Paul Herrmanns 1912 führte seine Witwe die Gastwirtschaft gemeinsam mit ihrem zweiten Ehemann weiter. 1931 übernahm Tochter Johanna das Lokal und bewirtschaftete es trotz aller Schwierigkeiten noch bis in die Nachkriegszeit. 1950 wurde die Grundschänke aus wirtschaftlichen Gründen geschlossen. Später hatte in den Räumen viele Jahre die Glaserei Kappelt ihren Sitz. Nr. 40: In diesem Gebäude wohnte ab 1913 bis zu seinem Tod 1942 der Fisch- und Reptilienzüchter Georg Gerlach. In zahlreichen Aquarien und Terrarien hielt er auf seinem Grundstück exotische Fische, Molche, Lurche, Schildkröten und einen Alligator. Als international anerkannter Fachmann verfasste Gerlach außerdem Berichte für Fachzeitschriften und arbeitete als Fachberater für Museen und Forschungseinrichtungen. 1911 war er als wissenschaftlicher Mitarbeiter Karl August Lingners an der I. Internationalen Hygieneausstellung beteiligt. Vettermühle: Die ursprünglich als Niedermühle bezeichnete Mehlmühle (Grundstraße 60/62) entstand im 16. Jahrhundert und war bis Mitte des 19. Jahrhunderts in Betrieb. 1842 siedelte sich auf dem Areal eine Glasfabrik mit angeschlossener Gold- und Silberschmelze an. 1854 erwarb der Chemiker Christian August Leonhardi das Grundstück und gründete eine Tintenfabrik. Mehrfach erweitert und modernisiert, wurden hier bis 1927 Schreibtinten, Farbbänder und andere Büroartikel produziert. Vor allem die durch den Betrieb ausgehende Umweltbelastung führte zur Verlegung der Produktion nach Trachau und 1934 zum Abbruch der Gebäude (im Bild ganz links). Nach der Beräumung des Grundstücks plante die Stadt Dresden zunächst, eine kleine Wohnanlage sowie ein öffentliches Gebäude zu errichten, in dem ein Volksbad, das Standesamt, eine Polizeidienststelle und eine öffentliche Bibliothek unterkommen sollten. Letztlich entschied man sich jedoch für eine parkartige Grünanlage. Rund um den “Tintenteich” wurden Bänke aufgestellt, eine Freitreppe angelegt und zwei Figurengruppen des Bildhauers Robert Diez platziert. Leider fiel die Anlage im Zweiten Weltkrieg dem Bau eines Luftschutzbunkers zum Opfer. 1955 entstand an ihrer Stelle ein Kinderspielplatz, Anfang der 1970er Jahre einige Baracken des benachbarten Ofenbaubetriebs. Heute finden sich nur noch Reste des einstigen Parks. Hänselmühle: Diese Mühle befand sich auf dem Flurstück Grundstraße 80/82 und war einzige Schneidemühle am Loschwitzer Bach. Bereits 1545 wurde sie erstmals erwähnt. 1775 erwarb Johann Gallus Köhlerdie Sägemühle, welche später nach ihrer Besitzerfamilie den Namen Hänselmühle erhielt. Das Holz kam per Floß aus Böhmen über die Elbe und wurde dann von Loschwitz aus zur Sägemühle transportiert. Bereits um 1870 stellte man den früheren Wasserantrieb zugunsten eines Dampfsägewerkes ein. Dieses wurde 1875 bei einem schweren Unwetter völlig zerstört und 1882 als moderner Holzverarbeitungsbetrieb wieder aufgebaut. Das nun als “Dampfsäge- und Hobelwerk Ernst Weigelt” bezeichnete Unternehmen brannte am 6. Mai 1925 durch Blitzschlag nieder, womit die Geschichte dieser Mühle endete. Wenige Meter entfernt stand die ebenfalls im Familienbesitz befindliche Hänsel-Mehlmühle (Grundstraße 76/78). 1549 ist für diese der erste Müller bezeugt. Ebenso wie die anderen Loschwitzer Mühlen stellte auch die Hänselmühle um 1860 ihren Betrieb ein. An gleicher Stelle entstand 1887 ein Neubau für die Loschwitzer Brauerei. Besitzer war der Bühlauer Dampfbrauereibesitzer Carl Adolf Heydel, als Kompagnon fungierte die Nürnberger Handelsgesellschaft S. Wertheimer. Für den ein Jahr später aufgenommen Braubetrieb errichtete Baumeister Adalbert Mirius den noch heute erhaltenen markanten Klinkerbau (im Foto rechts). 1894 meldete Braumeister Heydel sein Gewerbe ab. Sein Nachfolger Moritz Otto Borsdorf nutzte die Räumlichkeiten nur noch als Abfüllbetrieb für Flaschenbiere anderer Hersteller. 1901 baute man im ehemaligen Kesselhaus eine Schmiede ein. Technische Erweiterungen erfolgten unter seinem Sohn Otto Reinhold Borsdorf, der 1913 die Mineralwasserherstellung aufnahm. Als weiteres Standbein kamen nach dem Ersten Weltkrieg eine Spedition und eine Autovermietung hinzu. 1924 stellte Borsdorf den Getränkevertrieb ein und verkaufte vier Jahre später das Areal an die Stadt Dresden, die einen Teil des Grundstücks für die Verbreiterung der Grundstraße in Anspruch nahm. Das Fabrikgebäude blieb auch nach Einstellung des Betriebes erhalten und wurde bis 1994 teils gewerblich, teilweise zu Wohnzwecken genutzt. U.a. gab es zeitweise eine Wäscherei, eine Elektrowerkstatt, eine Heizungsbaufirma und eine Werbeagentur. 2013/14 wurde das unter Denkmalschutz stehende Gebäude saniert und zu exklusiven Wohnungen umgebuat. An einem Nebengebäude erinnert ein Wappenstein mit dem Müllerzeichen an die frühere Hänselmühle. Dammmühle: Die auch Nudelmühle genannte frühere Mehlmühle war letzte Mühle auf Loschwitzer Flur und wurde durch ihre Nudelfabrikation bekannt. Zur Mühle gehörten zwei durch einen Damm getrennte Mühlteiche in der Nähe der Tännichtstraße, die die notwendige Wasserkraft lieferten. Um 1880 wurde der Mahlbetrieb eingestellt und die Gebäude als Fabrik zur Herstellung von Schmirgelpapier genutzt. Seit 1899 befand sich hier Schramms Eiskellerei, welche in den Mühlteichen im Winter Eisblöcke gewann, die dann während der Sommermonate als Kühleis verkauft wurden. Das Gebäude der ehemaligen Dammmühle (Nr. 98) wurde 1936 abgerissen. Foto: O-Bus-Linie 61 auf der Grundstraße um 1970 Niederrochwitz: In der Nähe der Tännichtstraße erreicht die Grundstraße die Gemarkung von Rochwitz. Gegenüber mündet der Säugrund in den Loschwitzgrund, der früher gern von Wildschweinen auf ihrem Weg zur Tränke genutzt wurde. Der zu Rochwitz gehörige Ortsteil im Tal (heute Grundstraße 86 bis 118a) entstand Mitte des 16. Jahrhunderts um die historische Gastwirtschaft “Zur Eule”. Einige Gebäude aus der Frühzeit des Ortes (u.a. Grundstraße 104 und 116) stehen unter Denkmalschutz. Nr. 99: Das Grundstück befand sich seit dem 19. Jahrhundert im Besitz der Loschwitzer Familie Michel, die wie viele Einwohner des Ortes der Lohnwäscherei nachging. 1920 ließ Max Michel im Hof eine Zapfsäule aufstellen und gründete gemeinsam mit seinem Schwager ein Fuhrunternehmen mit angeschlossener Shell-Station. Auch zu DDR-Zeiten blieb die kleine Tankstelle in Familienbesitz und wurde nach 1990 durch eine moderne Station mit Autowaschstraße und Shop ersetzt. Schweizerhaus: Das ungewöhnliche Gebäude im Schweizerstil (Grundstraße 137) wurde Ende des 19. Jahrhunderts vom Tintenfabrikanten Eduard Leonhardi als Armenhaus gestiftet. Heute dient das Haus Wohnzwecken (Foto rechts) . Hinter dem Schweizerhaus sind noch die Reste eines früheren Glimmergranitsteinbruchs zu sehen. Bärmühle: Die Bärmühle soll alten Überlieferungen zufolge bereits im 13. Jahrhundert bestanden haben und wurde in den Hussitenkriegen zerstört. Obwohl die genaue Lage dieser Mühle nicht eindeutig geklärt ist, vermutet man ihren Standort an der Grundstraße 116. An dieser Stelle befindet sich heute ein Wohnhaus. Der alte Mühlteich diente später viele Jahre als Eisteich. Foto: Das Wohnhaus Grundstraße 116, errichtet an Stelle der ehemaligen Bärmühle Zeibigmühle: Die Mühle an der Grundstraße 149 war bis ins 19. Jahrhundert romantischste Mühle im Loschwitzgrund und wurde von Ludwig Richter als Motiv zur Illustration des alten Volksliedes “In einem kühlen Grunde...” genutzt. Die frühere Mehlmühle musste ihren Betrieb wenig später einstellen. Das eigentliche Mühlengebäude fiel 1936 dem Straßenausbau zum Opfer. Am Berghang sind bis heute noch Reste des früheren Mühlgrabens erhalten geblieben. Der Mühlteich ist heute verfüllt und wurde lange Zeit als Kohlenlagerplatz der Firma Hippe genutzt. Bühlau: Im oberen Teil erreicht die Grundstraße Bühlauer Flur. Dieser Ortsteil wurde früher auch als Adelig-Bühlau bezeichnet, da die hiesigen Grundstücke der Grundherrschaft Helfenberg unterstanden. Zu den ältesten Häusern gehört die Nr. 199, welche 1864 in heutiger Form errichtet wurde. Eis- und Kohlehandlung Hippe: Das Unternehmen wurde 1880 von Gustav Adolf Hippe gegründet und handelte zunächst mit Kühleis. Für die Eisgewinnung nutzte man einen kleinen Teich auf dem firmeneigenen Grundstück Grundstraße 126, der später verfüllt wurde und als Lagerplatz diente. Nach dem Ersten Weltkrieg kam ein weiterer Eiskeller in Weißig hinzu. Mit dem Vordringen elektrischer Kühlschränke verlor der Eishandel jedoch an Bedeutung. Die Firma widmete sich nun verstärkt dem Verkauf von Kohlen und Holz. Sie blieb auch nach dem Zweiten Weltkrieg in Familienbesitz und wurde in den 1950er Jahren um einen Fuhrbetrieb erweitert. 1984 übernahm die Unternehmerin Christa Müller den Traditionsbetrieb, der heute vor allem als Recycling-Unternehmen tätig ist. 1999 wurde auf dem Grundstück ein neues Verwaltungsgebäude errichtet. Gärtnerei Pelz: Die Gärtnerei wurde 1911 auf der Grundstraße 144 von Wilhelm Pelz gegründet und war eine von insgesamt drei Bühlauer Gärtnereien. Zu den Kunden des auf Gemüse und Schnittblumen spezialisierten Betriebes gehörten neben verschiedenen Gaststätten auch die Sanatorien Lahmann und Teuscher auf dem Weißen Hirsch. Auch nach 1945 blieb die Gärtnerei in Familienbesitz und wurde 1955 um einen weiteren Betrieb auf der Quohrener Straße ergänzt. 1960 wurde sie mit anderen Gartenbaubetrieben zur GPG Bühlau - Weißer Hirsch zusammengeschlossen. Bühlauer Schützenhaus: Das Haus an der Grundstraße 148 entstand 1896 als Gaststätte “Zum grünen Tal”. Nachdem in den Zwanziger Jahren der Bühlauer Schützenverein das Gelände oberhalb des Lokals als Schießplatz erworben hatte und das Gebäude als Vereinshaus nutzte, wurde die Gaststätte 1928 in “Bühlauer Schützenhaus” umbenannt. An den 1945 aufgelösten Verein erinnert neben dem noch erhaltenen Gebäude auch der hier auf die Grundstraße treffende Bühlauer Schützensteig. Fotos: Die Gastwirtschaft "Zum grünen Tal" um 1900 (links) und das Gebäude des früheren Bühlauer Schützenhauses heute (rechts) Lohmühle: Die Mühle entstand auf Bühlauer Flur zum Mahlen von Eichenrinde aus der Dresdner Heide, die als “Lohe” in der Gerberei benötigt wurde. Neben der Mühle am Loschwitzbach gehörte ein Stapelplatz an der Bautzner Landstraße dazu, auf dem später die Lohschänke entstand. Diese Gastwirtschaft war Vorläufer des bekannten Tanz- und Vergnügungslokals “Weißer Adler”. Das alte Mühlengebäude wurde 1847 durch einen Brand zerstört und an einem neuen Standort ca. 100 Meter entfernt wiederaufgebaut. Hier war die frühere Lohmühle (Foto) noch bis 1890 als Mehl- und Ölmühle, Dampfwäscherei und zuletzt bis 1944 als Bäckerei in Betrieb. Aus dem früheren Mühlteich entstand 1931 das Bühlauer Freibad. Das Hauptgebäude Grundstraße 171 ist bis zur Gegenwart als Wohnhaus erhalten. Nr. 174: Das Eckhaus zur Grundstraße wurde 1886 von der Familie Schäfer erworben, die hier ein Textilwarengeschäft einrichtete. Der mehrfach erweiterte Laden gehörte zu den wichtigsten Geschäften in Bühlau und wurde später als Warenhaus Friedrich Schäfer bezeichnet, da man hier neben Haushaltwaren auch Textilien, Schuhe, Kurzwaren und andere Dinge des täglichen Bedarfs erwerben konnte. 1964 gaben die Besitzer ihren Laden auf. Das Gebäude selbst wurde 1994 zugunsten eines neuen Wohn- und Geschäftshauses abgebrochen. Nr. 185: Das Fachwerkhaus entstand 1810 als Wohn- und Stallgebäude einer Bühlauer Kleinbauernfamilie, welche sich im Nebenerwerb in der Lohnwäscherei betätigte. Das unter Denkmalschutz stehende Haus befindet sich bis heute im Familienbesitz und wurde 2010 saniert.

Die Goetheallee wurde im letzten Drittel des 19. Jahrhunderts als Wohnstraße angelegt und hieß bis 1949 Emser Allee. Mit diesem am 1. April 1873 amtlich eingeführten Namen sollte an die Ereignisse des Deutsch-Französischen Krieges 1870/71 erinnert werden. Die von Bismarck politisch geschickt ausgenutzte "Emser Depesche" war Auslöser der Kämpfe zwischen beiden Ländern. Nicht zuletzt die hohen Reparationszahlungen Frankreichs nach Kriegsende trugen zum wirtschaftlichen Aufschwung und der Entstehung der Blasewitzer Villenviertel bei. Die Emser Allee entwickelte sich bis zur Jahrhundertwende zu einer der vornehmsten Straßen in Blasewitz. Noch heute lassen die zum Großteil erhaltenen Villen den einstigen Reichtum der hier ansässigen Hauseigentümer erkennen. Ursprünglich führte sie nur bis zur Einmündung des Käthe-Kollwitz-Ufers, während der übrige Abschnitt bis zum Barteldesplatz zu Naumannstraße gehörte. Erst nach der Eingemeindung von Blasewitz wurde dieses Straßenstück 1926 der Emser Allee zugeschlagen. Bis 1945 verkehrte auch die Straßenbahn von Johannstadt kommend durch die Emser Allee bis zum Schillerplatz. Aus Anlass des 200. Geburtstages des Dichters Johann Wolfgang von Goethe wurde die Straße am 28. August 1949 in Goetheallee umbenannt. Das Foto zeigt das Landhaus Goetheallee Nr. 49. Einzelne Gebäude: Nr. 2: Das heute nicht mehr vorhandene Gebäude an der Ecke zur Schubertstraße entstand Ende des 19. Jahrhunderts im neogotischen Tudorstil und gehörte als Pensionshaus "Gotthardsburg" zum "Weißen Schloss" am Königsheimplatz. 1945 fiel es den Bomben zum Opfer. Heute befindet sich auf dem Grundstück ein in den 1950er Jahren entstandener Neubau, der heute von der Kinder- und Jugendpsychiatrie des Uniklinikums genutzt wird. Nr. 4 (Villa Königswald): Das Gebäude entstand 1863 nach Plänen von Theodor Lehnert für den Regierungsrat Arthur Willibald Königsheim. Dieser gehörte als Gründer des Waldparkvereins zu den engagiertesten Blasewitzer Bürgern und setzte sich für eine planmäßige Entwicklung des Ortes unter Wahrung künstlerischer Belange ein. Den Garten des Hauses gestaltete der preußische Hofgärtner Neumann, der auch die gärtnerische Gestaltung des Waldparkes übernahm. Neumanns Ideen waren Anregung für zahlreiche Blasewitzer Villengärten, die das Vorbild der Königsheim-Villa aufgriffen. Im Juni 2003 wurde am Haus eine Gedenktafel angebracht. Nr. 6: Das Haus an der Einmündung der Händelallee entstand 1886 im Landhausstil und wurde vom Blasewitzer Architekten Emil Scherz entworfen. Der schlichte eingeschossige Bau, auch "Villa Waldeck" genannt, weist typische Formen der Entstehungszeit dieses Villenviertels auf, gehört jedoch zu den eher bescheideneren Wohnhäusern der Goetheallee. Besitzer war zeitweise Ernst Robert Böhme, Inhaber der Zigarettenfabrik "Kios". Nr. 8: Die Villa entstand 1896 für den großbürgerlichen Besitzer und Kammerrat Franz Adolph Lange. Nach 1945 hatte hier die Christengemeinschaft ihre Versammlungsräume, bevor diese einen Neubau auf der Reichenbachstraße beziehen konnte. Nr. 10: Der um 1900 entstandene neobarocke Villenbau war ab 1910 Wohnsitz Dr. Rudolf Steiners. Der für seine reformpädagogischen Ansätze bekannte Steiner war Gründer der Anthrosophischen Gesellschaft und der bis heute populären Waldorfschulen. Später befand sich im Haus das Pensionat Dyckerhoff. 1937 lebte hier der Oberassistenzarzt des Johannstädter Rudolf-Hess-Krankenhauses Dr. Rudolf Leutiger, der mehrere wissenschaftliche Arbeiten u.a. zur Diabetes-Krankheit verfasste. Die Villa wurde nach 1990 saniert und anschließend als Wohn- und Bürohaus genutzt. Zeitweise befand sich im Haus der erste jüdische Kindergarten Ostdeutschlands. Nr. 12: Die Villa wurde 1898 durch den Blasewitzer Baumeister Emil Wägner errichtet und gehört zu den für diese Zeit typischen Wohnbauten am Rande des Waldparks. Das Haus besitzt eine Klinkerfassade und wurde mit verschiedenen Balkons, Holzverkleidungen und einem kleinen Dachtürmchen landhausartig gestaltet. Während die Innenausstattung fast völlig verloren ging, haben sich Fenster und Ornamentverglasungen bis heute erhalten. Nach 1945 nutzte die Medizinische Akademie (Universitätsklinik) das Haus bis 2011 als Kinder- und Jugendpsychiatrie. Im Anschluss erfolgte eine umfassende Sanierung und der Umbau zu einer Kindertagesstätte. Nr. 13: Auch diese Villa entstand im letzten Drittel des 19. Jahrhunderts für einen wohlahabenden Kaufmann. Der Bau ist im Neorenaissancestil gestaltet und wurde nach 1990 denkmalgerecht saniert. Seit 2003 nutzt der Förderkreis für krebskranke Kinder e. V. das Haus unter dem Namen “Villa Sonnenstrahl” als Begegnungsstätte für betroffene Eltern und Kinder. Dafür wurden einige Gästewohnungen eingerichtet, in denen Angehörige während des Klinikaufenthalts ihrer Kinder übernachten können. Nr. 14:Das repräsentative Wohnhaus entstand 1910 in der Tradition der großbürgerlichen Villenarchitektur, weist jedoch bereits Elemente einer moderneren Bauauffassung auf. In den 1930er Jahren befand sich im Haus ein Heim des christlichen Wohltätigkeitsvereins "Idea". Nr. 18 (Villa Schmitz): Die landhausartige Villa wurde 1901/02 vom Blasewitzer Baumeister Karl Emil Scherz für Ernst Schmitz-Havre errichtet. Ab 1903 wohnte hier der Textilfabrikant Oscar Schmitz, der sich einen guten Ruf als Kunstsammler erwarb und in seinem Haus eine der bedeutendsten privaten Sammlungen moderner Kunst zusammentrug. U.a. gehörten Bilder der französischen Impressionisten Cèzanne, Courbet, Delacroix und Manet, aber auch von Max Liebermann, Max Slevogt, Wilhelm Trübner und Fritz Uhde zum Bestand. Außerdem war Schmitz seit 1913 Mitglied der Ankaufskommission der Staatlichen Kunstsammlungen und gehörte dem Vorstand der Kulturstiftung des Landes Sachsen an. 1931 verlegte er seinen Wohnsitz nach Zürich und verstarb dort 1933. Fotos: Die Villa Goetheallee 18 in den 1930er Jahren Die in Dresden verbliebenen jüdischen Nachkommen wurden während der Nazizeit enteignet und mussten fast alle Bilder verkaufen. Einige wenige gelangten bereits zu Schmitz´ Lebzeiten in die Dresdner Galerie. Bis zum Ende des Zweiten Weltkrieges diente das Haus nun als NS-Schwesternheim. In der Nachkriegszeit blieb die Villa Bürohaus. Später hatte hier die Dresden International School, eine Schule mit englischer Unterrichtssprache, ihr Domizil. Nach deren Auszug 2008 wird das Gebäude als Kindereinrichtung genutzt. Nr. 23: Die Villa wurde 1901 von Heinrich Watzlawik im Jugendstil erbaut und gehört zu den jüngeren Blasewitzer Wohnhäusern. Um 1911 befand sich hier das Konsulat von Siam. In den 1930er Jahren betrieb der Arzt Dr. med Adolf Hußmann im Haus eine ärztliche Fortbildungsschule. Ursprünglich als Zweifamilienhaus konzipiert, wurde das Haus später in Etagenwohnungen aufgeteilt. Nach erfolgter Sanierung 1998/99 wird die Villa heute als Bürohaus genutzt. Fotos: Villen an der Goetheallee: Nr. 23 (links), Nr. 24 (Mitte), Nr. 29 (rechts) Nr. 24 (Villa Muttersegen): Der schlossartige Neorenaissancebau entstand 1891/94 nach Plänen des Architektenbüros Schilling & Gräbner. Nach dem ersten Besitzer, dem Dramatiker Franz von Schönthan Edler von Pernwald, wurde das Haus auch Pernwaldhaus genannt. Schönthan, der als Autor des Theaterstücks “Der Raub der Sabinerinnen” bekannt wurde, verkaufte seinen Besitz jedoch bereits 1896 an neue Eigentümer. Zeitweise hatte hier das königlich-niederländische Generalkonsulat seinen Sitz. Später befand sich in der Villa eine von der schweizerischen Pädagogin Anna Paulini geleitete Bildungsanstalt für höhere Töchter. Seit 1992 nutzt das Europäische Institut für postgraduale Bildung (EIPOS) das Haus. Nr. 26 (Villa Fliederhof): Die Villa wurde 1892/93 von Schilling & Gräbner für den Schauspieler Sigward Johannes Friedmann, Mitbegründer des Deutschen Theaters in Berlin, errichtet. Friedmann war mit der Schriftstellerin Henriette von Dönnings verheiratet. Deren erster Ehemann erschoss 1864 in einem Duell den bekannten Arbeiterführer Ferdinand Lasalle. Nach dem Ersten Weltkrieg kam das Haus 1918 in den Besitz der Familie Schuncke. Wilhelm Schuncke war als Generaldirektor der Filz- und Kratzentuchfabrik Dittersdorf (bei Chemnitz) zu Wohlstand gekommen und hatte das Haus als Altersruhesitz gekauft. Zudem war er ein begeisterter Kunst- und Musikliebhaber und besaß einen großen Kreis von Künstlerfreunden. Zu diesem gehörte auch die ebenfalls in Blasewitz lebende Exil-Russin Warwara Satina, deren Tochter Natalja 1902 den Komponisten Sergej Rachmaninow geheiratet hatte. Diese freundschaflich-verwandtschaftlichen Beziehungen veranlassten Rachmaninow, ab 1922 regelmäßig im "Fliederhof" sein Sommerquartier zu nehmen und hier eine Reihe seiner Partituren zu schreiben. Zu den Bewohnern und Gästen der Villa gehörten auch der Hofkapellmeister Hermann Kutzschbach mit seiner Tochter Senta, der expressionistische Maler Ludwig Meidner, der Romantiker Ernst Hermann Walther und der Philosoph Graf Hermann Keyserling. 1938 fand im Haus die jüdische Familie Hepner Unterschlupf, nachdem sie ihre Wohnung in der Südvorstadt aufgeben mussten. Unter großen persönlichen Einsatz gelang es den Hausbesitzern, die drei Personen vor Repressalien der Gestapo zu schützen. Erst im Oktober 1944 wurde Richard Hepner verhaftet und in das KZ Sachsenhausen verbracht. Mit Glück überlebte er die NS-Zeit und lebte bis zu seinem Tod 1950 im “Fliederhof”. Seine Witwe emigrierte später mit ihrem Sohn in die USA. An das Schicksal der Hepners erinnern seit 2014 drei Stolpersteine vor dem Grundstück. Bis 1945 blieb die Villa des musikinteressierten Besitzers Wilhelm Schuncke regelmäßiger Treffpunkt Dresdner Künstlerkreise und beherbergte zudem eine reichhaltige Sammlung von Erinnerungsstücken an Rachmaninow sowie Richard Strauss, der eng mit Hermann Kutzschbach und dessen Tochter, der Gesangspädagogin Senta Kutzschbach befreundet war. Am 28. Mai 1945 wurde vor dem Haus Baron Paul von Seiller von betrunkenen Sowjetsoldaten ermordet und kurz darauf im Garten des Grundstücks begraben. Später ließ ihn die Familie ins Familiengrab in Dittersdorf umbetten. Der “Fliederhof” blieb auch nach dem Zweiten Weltkrieg zunächst in Privatbesitz. Neben Wohnungen gab es hier ab 1960 eine Druckwerkstatt, welche vor allem bei Dresdner Künstlern wie Lea Grundig beliebt war und bis heute unter dem Namen Grafikwerkstatt Dresden existiert. Da die hohen Unterhaltskosten des Hauses die Besitzer jedoch überforderten, war 1970 eine Schenkung an die Dresdner Musikhochschule geplant. Aus politischen Gründen wurde diese jedoch verhindert. Stattdessen erwarb 1974 der Arzt Dr. Flach das traditionsreiche Haus. Bei einem Familiendrama 1979 setzte Flachs Ehefrau die Villa absichtlich in Brand, wobei beide Eheleute ums Leben kamen. Die wertvolle Innenausstattung sowie unersetzliche Strauss-Partituren aus dem Besitz der im Haus lebenden Künstlerin Senta Kutzschbach wurden dabei vernichtet. Die Brandruine wurde wenig später abgerissen und nach 1990 durch einen modernen Neubau ersetzt. Seit April 2010 befindet sich an der Einfassung des Grundstücks eine Gedenktafel, welche über die Geschichte des Hauses und den Aufenthalt Sergej Rachmaninows informiert. Nr. 28: Das Gebäude an der Einmündung des Vogesenweges (ehem. Elsasser Weg 4) entstand 1895 als Villa Lürmann. Das landhausartige Gebäude steht einschließlich der noch weitgehend im Ursprungszustand erhaltenen Gartenanlage unter Denkmalschutz (Foto um 1920). Nr. 29 (Villa Doehn): Das Gebäude wurde 1903 nach Plänen des Dresdner Architektenbüros Schilling & Gräbner für den Rechtsanwalt Bruno Doehn (1866-1924) erbaut. Doehn war der Sohn des deutsch-amerikanischen Schriftstellers und Politikers Rudolf Doehn, der nach seiner Auswanderung in die USA zu den Mitbegründern der Republikaner gehörte und ab 1866 nach seiner Rückkehr nach Dresden literarisch tätig war. Nr. 32 (Haus Helene): Die Villa wurde 1890 im Schweizer Landhausstil errichtet und befand sich ab 1892 im Besitz des Königlich-sächsischen Hofapothekers Dr. Oskar Emil Julius Giesecke. Er war Inhaber der Hofapotheke an der Schlossstrasse im Zentrum. Seine Tochter Martha, Ehefrau des Kurdirektors des Weißen Hirschs, lebte noch bis 1945 in der Villa, die beim Luftangriff nur leicht beschädigt wurde. 2015 erfolgte eine Sanierung des Gebäudes. Nr. 35: In diesem Haus wohnte um 1912 der jüdische Fabrikant Richard Hammer, Inhaber der Schuhfabrik Hammer an der Augsburger Straße 1 (später “eg-gü”). Hammer gehörte zu den reichsten Männern Dresdens und war auch Konsul des Königreichs Siam (Thailand) in Sachsen. Nach dem Ersten Weltkrieg verzog die Familie in die Villa Goetheallee 47. Nr. 37: Das Gebäude entstand 1928/29 nach Plänen des Architekten Bruno Paul als Wohnhaus des Dresdner Zigarettenfabrikanten Carl Bergmann. Bergmann hatte 1923 die “Haus Bergmann Zigarettenfabrik AG” gegründet, die ihre Produkte unter dem Markennamen “HB” vertrieb. Das Gebäude erhielt eine heute nur noch in Teilen vorhandene Innenausstattung und gehört zu den qualitätvollsten Villenbauten seiner Zeit im Dresdner Raum. Seit 1991 hat hier die Architektenkammer Sachsen ihren Sitz. Zwischen 1995 und 1997 erfolgte eine umfassende Sanierung des unter Denkmalschutz stehenden Gebäudes. 2013 wurde das Haus im Inneren erneut modernisiert. Regelmäßig finden hier Fortbildungsveranstaltungen für Architekten und Städteplaner, aber auch Beratungsabende für Bauwillige statt. Nr. 43: Die zweigeschossige Villa entstand 1894 als Gärtnerwohnhaus nach Plänen des Architektenbüros Schilling & Gräbner. Ursprünglich gehörte sie zum gegenüberliegenden “Pernwaldhaus” (Goetheallee 24) Der auf unregelmäßigem Grundriss errichtete Bau weist verschiedene Stilformen auf, deren Hauptblickpunkt der dreigeschossige Treppenturm ist. An Stelle des früheren Wintergartens wurde bei der Sanierung ein moderner Anbau errichtet (Foto). Nr. 51: Die Villa entstand zwischen 1899 und 1900 als dreigeschossiges Wohnhaus für den Rentier Theodor Grimme. Am Bau beteiligt waren neben Baumeister Oskar Menzel verschiedene Blasewitzer Firmen, die dem Haus sein repräsentatives Äußeres gaben. Stilistisch gehört diese Villa der Übergangszeit vom Historismus zum Jugendstil an. Bemerkenswert ist an der Fassade eine Holzschnitzerei mit dem Motiv “Adam und Eva”. Nr. 55 (Villa Weigang): Die prächtige Villa wurde unter Verwendung verschiedener Stilformen 1894/95 für den Architekten Max Poscharsky unter Mitwirkung der Architekten Schilling & Gräbner als eigenes Wohnhaus entworfen. Späterer Besitzer war der Bautzner Industrielle Karl Ernst Otto Weigang, dem das Haus seinen Namen verdankt. 1930 übernahm die Freitaler Kreditbank AG, 1947 die Sächsische Landesbank das Grundstück. Nach 1945 befanden sich hier u. a. die Betriebsräume der Firma Seidenschneider, ab 1964 eine Meldestelle der Volkspolizei sowie ein Standesamt. 1991-94 wurde das Gebäude nach historischem Vorbild komplett saniert und beherbergt heute das Dresdner Standesamt. Bemerkenswert ist die weitgehend erhaltene Innenausstattung der Entstehungszeit. Im Garten befindet sich ein interessanter Brunnen, der bereits beim Bau der Villa angelegt wurde. Der in einer kleinen Senke liegende Brunnen besteht aus einem Sandsteinbecken und einer darauf stehenden gußeisernen Plastik. Leider ging die ursprünglich vorhandene Figur in der Nachkriegszeit verloren. An ihrer Stelle steht heute eine Puttengruppe mit Blumenkelch, der zugleich als Wasserspeier dient. Diese Plastik stand ursprünglich im Garten des Palais Oppenheim auf der Bürgerwiese, konnte dort nach 1945 aus den Trümmern geborgen werden und kam 1999 nach Blasewitz. Nr. 57 (Villa Baumann): Das Haus entstand im Kern bereits 1865 und gehört so zu den ältesten Blasewitzer Villen. 1883 wurde die Villa im Stil der Nicolai-Schule umgebaut und erweitert, wobei sie auch den markanten zweigeschossigen Turm erhielt. Die Innenausstattung des 2000 sanierten Gebäudes ist bis heute weitgehend erhalten geblieben. Zum Komplex gehören neben der Villa zwei kleinere Nebengebäude, die früher als Wohnung der Hausangestellten dienten. Um das Haus entstand ein Park mit einem noch erhaltenen Gartenhäuschen, Teich mit Grotte sowie einer Aussichtsterrasse zur Elbe. Im Garten erinnert ein Findling mit Inschrift an das 50. Amtsjubiläum und den 70. Geburtstag des Reichskanzlers Otto von Bismarck am 1. April 1885. Stifter war der Dresdner Hotelier Ehregott Richard Baumann. Ursprünglich war der Stein auf dem Areal Käthe-Kollwitz-Ufer 101 zu finden.

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Mitte des 19. Jahrhunderts befassten sich erstmals Fachleute mit der künftigen Gestaltung des Elbuferbereichs. Pläne sahen hier die Anlage breiter Hochuferstraßen vor, welche den Fluss kanalisieren und die dahinter liegenden Flächen zum Bauland machen sollten. Zahlreiche Bürgerproteste sowie Einwände des Wasserbauinspektors Schmidt verhinderten letztlich die Realisierung. Stattdessen nutzte man die Elbwiesen für verschiedene Großveranstaltungen sowie ab 1874 alljährlich als Schauplatz der Vogelwiese. Lediglich in der Innenstadt wurde der unterhalb der Brühlschen Terrasse gelegene Uferbereich aufgeschüttet und ab 1852 zur Straße ausgebaut. Abschnittsweise erfolgte später die Verlängerung des Terrassenufers, wobei der Abschnitt zwischen Sachsenplatz und Vogelwiese den Namen Johannstädter Ufer erhielt. 1936 wurde diese Straße nach dem preußischen Generalfeldmarschall Paul von Hindenburg (1847-1934) in Hindenburgufer umbenannt, nach 1945 in Käthe-Kollwitz-Ufer. Dabei bezog man auch den früher Hochuferstraße genannten Abschnitt auf Blasewitzer Flur ein. Käthe Kollwitz (1867-1945) gehört zu den bedeutendsten Graphikerinnen und Bildhauerinnen des 20. Jahrhunderts und verbrachte ihre letzten Lebensmonate auf Einladung der Wettiner in Moritzburg, wo heute eine Gedenkstätte an sie erinnert. Einzelne Gebäude: Johannstadt: Senioren- und Pflegeheim „Am Elbufer“: Das Heim entstand 2005 auf dem Areal der 1945 zerstörten Jägerkaserne und wurde im Juli 2006 eröffnet. Insgesamt stehen 59 Einzel- und 20 Doppelzimmer zur Verfügung (Foto). Naumannsche Schwimmanstalt: Diese Badeanstalt, unterhalb des Schlößchen “Antons” am Elbufer gelegen, entstand 1839 unter dem Namen Amalienbäder und besaß insgesamt neun Badehäuschen. Als eines der ersten Bäder überhaupt war dieses als Familienbad deklariert und durfte sowohl von Frauen als auch von Männern besucht werden. 1867 übernahm der aus Pieschen stammende Fischermeister Hottewitzsch die Badeanstalt und führte sie unter seinem Namen weiter. 1901 kaufte Arthur Naumann das Bad und ließ es modernisieren. Dieses existierte noch bis Ende der Zwanziger Jahre und war eines der preiswertesten Elbebäder der Stadt. Fährgarten Johannstadt: Das kleine Ausflugslokal befindet sich ungefähr gegenüber der Prießnitzmündung am Elbufer und wurde ursprünglich nach der Besitzerfamilie “Focke´s Strand-Restaurant” genannt. An den Wochenenden fanden hier gelegentlich Konzerte statt, wofür eigens eine hölzerne Musikmuschel errichtet worden war. Stadtbekannt wurde das Lokal nach dem Ersten Weltkrieg unter dem Namen “Eis-Krause”. Ein ähnliches Lokal, volkstümlich als “Hol-über- Hütte” bezeichnet, gab es in Höhe der Schubertstraße. 1945 wurden die Bauten der Sommerwirtschaft zerstört, jedoch bald wieder aufgebaut und nun als “Volksgaststätte Elbfrieden” weitergeführt. Heute trägt die beliebte Gartenwirtschaft den Namen “Fährgarten Johannstadt” und gehört zu den beliebtesten Biergärten Dresdens. Nach dem Elbehochwasser 2002, welches auch am Fährgarten erheblichen Schaden anrichtete, entstanden neue flutsichere Wirtschafts- und Sanitäranlagen. Unmittelbar am Fährgarten überquert eine Elbfähre den Fluss, letzte von einst drei Fährstellen des Stadtteils. In der Nähe steht seit 2012 die Plastik “Undine geht” der Künstlerin Angela Hampel. Das Objekt entstand ursprünglich für eine Kunstaktion in Bonn und bildet das Gegenstück zur Plastik “Undine kommt” an der Pieschener Molenbrücke. Blasewitz: Nr. 79: Die unter Denkmalschutz stehende Villa befand sich vor dem Zweiten Weltkrieg im Besitz von Heinrich Galm, Direktor der Zigarettenfabrik Kosmos, auf der Fürstenstraße 70 (Fetscherstraße). Nr. 80: Die zweigeschossige Villa wurde um 1910 errichtet und stellt ein Beispiel für reformorientierte Villenarchitektur in Abkehr von historisierenden Stilen dar. Nr. 81: Auch dieses 1906 errichtete Gebäude gehört zu den zahlreichen Baudenkmalen der früheren Hochuferstraße. Es entstand 1906 nach einem Entwurf von Erich Kleinhempel für den Verlagsbuchhändler Otto Schambach und wird deshalb auch Haus Schambach genannt. Heute wird es als Internat der Hochschule für Kirchenmusik genutzt. Villa Rautendelein (Nr. 84 - ehem. Hochuferstraße 12): Die repräsentative zweigeschossige Villa an der Einmündung zum Lothringer Weg entstand 1899/1900 für den Dichter Gerhard Hauptmann. Die Planungen oblagen dem bekannten Architektenbüro Schilling & Gräbner. Das nach einer Figur aus Hauptmanns Drama “Die versunkene Glocke” Villa Rautendelein genannte Haus erregte wegen seiner außergewöhnlichen und monumentalen Gestaltung weit über Dresden hinaus großes Aufsehen. Das stilistisch der Reformbaukunst zugerechnete Gebäude galt als "Höhepunkt des neuen Bauens" und vereinte Elemente des Jugendstils mit den Stilmitteln des monumentalen Materialstils. Im Inneren gruppierten sich die Räume um eine große Diele. Im Erdgeschoss befanden sich Wohn-, Gesellschafts- und Speisezimmer, im ersten Obergeschoss u.a. Küche und Schlafzimmer. Nach der Scheidung Hauptmanns 1904 überließ er das Haus seiner Frau Marie und den gemeinsamen Kindern, die es bis zu Maries Tod 1909 bewohnten. 1945 fiel die Villa dem Luftangriff zum Opfer. An ihrer Stelle befindet sich heute ein Neubau mit dem Sitz des Bischöflichen Ordinariats des Bistums Dresden-Meißen. Nr. 87 (Villa Felixhof): Das Grundstück war einst Standort der 1903 erbauten und 1945 durch den Bombenangriff zerstörten Villa “Felixhof”, benannt nach dem Schauspieler Felix Schweighofer (1842-1912), der hier seine letzten Lebensjahre verbrachte. Schweighofer gehörte zu den reichsten Blasewitzer Einwohnern und trat auch als Mäzen in Erscheinung. Nach dem Abriss der Ruine entstand hier eine noch bis in die 1980er Jahre betriebene Zuchtanlage für Karpfen. 2005 wurde das Areal mit zwei modernen neuen Wohnhäusern bebaut. Foto: Blick vom Garten auf die Villa Felixhof um 1910 Nr. 88 (Villa zur Lippe): Die nach einem ihrer früheren Besitzer benannte Villa wurde 1904 im Stil des Neobarock errichtet (Foto). Auftraggeber waren der international erfolgreiche Theaterschauspieler Felix Schweighofer und die Opernsängerin Fritzi Blum, die den Architekten Richard Schleinitz mit dem Entwurf beauftragten. Allerdings erwies sich das Gebäude schon bald als zu groß für die Bedürfnisse des Künstlerpaares, so dass Schweighofer mit seiner Frau bereits wenige Jahre später das Nachbarhaus Nr. 87 bezog. Nächste Besitzerin war für einige Jahre die Großherzogin von Mecklenburg-Strelitz, die das Gebäude aufstocken und umbauen ließ. Kurz darauf erwarb Prinz Julius zur Lippe das Anwesen und ließ sich 1911 vom Landschaftsarchitekten Großmann unter Mitwirkung des Gartenexperten Georg Heinsius von Mayenburg einen großzügigen Garten anlegen, der zu den bedeutendsten seiner Art in Dresden gehörte. In der Nachkriegszeit befand sich in der Villa Dresdens einzige Nachttanzbar “Kaskade”. Heute nutzt der Sächsische Landkreistag das nach der Wende sanierte Haus. Nr. 90: Die Villa Hochuferstraße 19 (heute Käthe-Kollwitz-Ufer 90) entstand als eines der letzten Häuser am Elbufer 1909 für den Major Raoul Zeysing und seine Frau Margarete. Das Haus weist bereits Elemente der Reformarchitektur auf und wurde vom Blasewitzer Baumeister Karl Emil Scherz entworfen. Wie die meisten erhaltenen Villen in diesem Bereich steht auch die Villa Zeysing unter Denkmalschutz. Nr. 92: Die dreigeschossige Villa im Landhausstil mit Treppenturm und Fachwerkzierrat wurde 1896/97 nach Plänen von Kurt Diestel im Stil der deutschen Neorenaissance errichtet. Bis 1944 befand sie sich im Besitz des Regierungsrates Dr. jur. Kurt Morgenstern. Morgenstern arbeitete zunächst im sächsischen Innenministerium, war von 1901 bis 1904 Leiter der Amtshauptmannschaft Flöha und später Kreishauptmann von Zwickau. Im Ruhestand verzog er nach Dresden und gehörte zeitweise dem Landeskirchenausschuss der Evangelischen Landeskirche an. Den Zweiten Weltkrieg überstand das Haus ohne größere Schäden. 1975 wurde es von Klaus Hennig für sein privates Institut für Alternative Medizin erworben und renoviert. Ende der siebziger Jahre wohnte zeitweise sein Freund, der russische Porträtmaler Peter Bendel als Gast im Haus. Weitere bekannte Gäste waren die russischen Wissenschaftler Ilja Frank und Nikolai Bogoljubow. Nr. 96: Die Villa entstand um 1900 und wurde vom Architekten Erich Kleinhempel entworfen. Besitzer war der Verlagsbuchhändler Theodor Steinkopf (1870-1955), der hier am 1. Januar 1908 seinen Verlag gründete und verschiedene wissenschaftliche Publikationen herausgab, u.a. zur Kolloidchemie und zu medizinischen Themen. 1929 erhielt er die Ehrendoktorwürde der Technischen Hochschule. 1978 wurde der Verlag aufgelöst. Die Villa wird heute von der Hochschule für Kirchenmusik genutzt und ist u.a. mit zwei Orgeln für die Studenten ausgestattet. Hochschule für Kirchenmusik (Nr. 97): Die Einrichtung wurde 1949 vom damaligen Kantor der Striesener Versöhnungskirche Martin Flämig gegründet. Ziel ist die Ausbildung junger Musiker, die hier Unterricht im Orgelspiel, Kirchenmusik und Chorleitung erhalten. Zunächst Landeskirchenmusikschule genannt hat sie heute den Status einer Hochschule und ist eine der kleinsten in Sachsen. Neben der Villa Käthe-Kollwitz-Ufer gehören auch ein Verwaltungsgebäude und ein 1999 errichteter Neubau mit Chorprobenraum zum Campus. Das zugehörige Internat ist am Käthe-Kollwitz-Ufer 81 untergebracht.

add_def_ver("v_j_latussek","J. Latussek, Dresden","Verlag J. Latussek, Photo- Werkstätten, Dresden A., 1923 Am See 18");

Gärtnerlehranstalt: Im Grundstück Nr. 52 (ehem.Friedrichstraße 26) nahm am 1. Oktober 1856 die erste Gärtnerlehranstalt des Landwirtschaftlichen Kreisvereins zu Dresden den Unterricht auf. Die Eröffnung war Ausgangspunkt der zielgerichteten schulischen Gartenbauausbildung. Unter Leitung des Vorsitzenden des Kreisvereins und drei weiterer Lehrer erhielten hier angehende Gärtner Kenntnisse im Obst- und Gemüsebau vermittelt. Ursprünglich sollten diese nach erfolgreichem Abschluss als Gartenbauexperten auf sächsische Landgüter vermittelt werden, was jedoch nicht gelang. Stattdessen suchten sich die meisten Arbeit in Gartenbaubetrieben der Umgebung, weshalb die Lehranstalt 1873 aufgelöst wurde. Stattdessen übernahm die Gartenbauvereinigung "Flora" den Betrieb und unterrichtete ab 1. November 1874 wieder Schüler in Botanik, Pflanzen- und Bodenkultur, Meteorologie und ähnlichen Fächern. 1875 verlegte man die Bildungseinrichtung in das "Flora"-Stammhaus auf der Brückenstraße 6 in Kemnitz.

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Friedrichstraße:
Turnlehrerbildungsanstalt (Nr. 56): Hier war zwischen 1850 und 1863 die Königliche Turnlehrerbildungsanstalt untergebracht, in welcher Volksschullehrer in mehrwöchigen bzw. ganzjährigen Kursen zu Turnlehrern ausgebildet wurden. Eröffnet wurde die Einrichtung am 16. Oktober 1850 und war erste ihrer Art in Deutschland. Geleitet wurde die Bildungsanstalt von Moritz Kloß (1818-1881). Kloß arbeitete ab 1840 als Lehrer in Zeitz und setzte sich nach einer Bekanntschaft mit dem deutschen “Turnvater” Friedrich Ludwig Jahn engagiert für die Förderung des Turnsports und dessen Einführung als Unterrichtsfach ein. Ab 1873 war Turnen obligatorisches Unterrichtsfach an allen sächsischen Volksschulen. Zunächst stand die Turnlehrerbildungsanstalt ausschließlich männlichen Bewerbern offen, die hier zu “tüchtigen, pädagogisch vorgebildeten Männern” geschult werden sollten. Ab 1860 gab es jedoch auch Kurse im Mädchenturnen. Drei Jahre später erfolgte die Verlegung der Einrichtung zur Carusstraße in die Pirnaische Vorstadt. Hier existierte sie, ab 1925 als Teil der Technischen Hochschule, noch bis 1945. Die Bauten der Turnlehrerbildungsanstalt an der Friedrichstraße fielen um 1900 einer Erweiterung der Spirituosenfabrik Bramsch zum Opfer.

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1885 Ausschankstellen des Münchener Bürger- Bräu: A. Klingen, Albrechtstr. 10b, Germania

add_def_ver("v_m_hammerschmidt","M. Hammerschmidt, Klotzsche","M. Hammerschmidt, Kiosk, Klotzsche");

Constantin Schroeter Zur Navigation springen Zur Suche springen Johann Friedrich Carl Constantin Schroeter (* 21. März 1795 in Schkeuditz; † 18. Oktober 1835 in Berlin) war ein deutscher Genre- und Porträtmaler der Biedermeierzeit. Leben Constantin Schroeter lernte zunächst Tischler bei seinem Onkel in Stuttgart. Nach der handwerklichen Ausbildung ging er von 1811 bis 1817 zum Studium an die Kunstakademie in Leipzig und anschließend von 1817 bis 1819 an die „Allgemeine Kunst-Academie der Malerey, Bildhauer-Kunst, Kupferstecher- und Baukunst“ nach Dresden. Dort nahm ihn sein Lehrer, der Historien- und Bildnismaler Traugott Leberecht Pochmann, in seinem Atelier auf, um Schroeter zum Historienmaler auszubilden. Ende 1819 ging er nach Leipzig zurück, wo er sich hauptsächlich mit der Malerei von Porträtgemälden beschäftigte. 1826 übersiedelte er nach Berlin und wandte sich vermehrt der Genremalerei zu. Noch im selben Jahr zeigte er auf der Berliner Akademieausstellung erstmals einige seiner Arbeiten. In den 1830er Jahren erkrankte Schroeter an Schwindsucht, hielt sich 1833 zur Kur im niederschlesischen Bad Salzbrunn auf und verstarb 1835 in Berlin. Constantin Schroeter war um 1830 einer der ersten und bekanntesten Genremaler, noch bevor sich die Genremalerei an der Akademie in Düsseldorf durchsetzen konnte. Für seine Darstellungen wählte er volkstümliche Motive, die dem Geschmack der Biedermeierzeit entsprachen. Seine Bilder entstanden im Stil der niederländischen Malerei des 17. Jahrhunderts und der deutschen bürgerlichen Malerei des 18. Jahrhunderts. Viele seiner Werke sind durch Lithografien vervielfältigt worden. Er ist nicht zu verwechseln mit dem Universitätszeichenmeister Johann Friedrich Schröter.

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add_def_ver("v_c_lehmann","Carl Lehmann, Dresden","Verlag Carl Lehmann, Dresden N. 23, Grossenhainer Str., 1930 (Papierwhdlg. Karl Lehmann) Burgsdorffstr. 2");

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Freiwillige Feuerwehr Lockwitz:
1899 wurde das Spritzenhaus mit einem Steigerturm fertig gestellt.

Friedrichstraße:
Nr 58 / 58a / 60b (Menageriegarten und kurfürstliche Wachsbleiche): Das zum ehemaligen Menageriegarten gehörende Grundstück war einst Standort der um 1718 gegründeten kurfürstlichen Wachsbleiche. Die Menagerie diente ursprünglich der Kleintier- und Bienenhaltung sowie dem Anbau von Nutzpflanzen. Im Zentrum der Anlage stand ein von Christian Wilhelm Pfund entworfenes, heute nicht mehr vorhandenes Landhaus, welches von zwei noch heute vorhandenen Nebengebäuden flankiert wurde. Erhalten blieben neben der Umfassungsmauer mit Eingangstor das Gebäude der früheren Wachsgießerei und Kerzenmanufaktur sowie das gegenüber stehende Imkerwohnhaus. Beide Häuser wurden 2009 saniert und dienen seitdem Wohnzwecken. 1849 soll sich in einem der Gebäude der russische Anarchist Bakunin, einer der Köpfe der Revolution, versteckt und mit Gleichgesinnten getroffen haben. An Stelle der einstigen Menageriegärten befindet sich heute eine Kleingartenanlage.

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Schilling & Graebner: Magazin-Gebäude Lahmann-Sanatorium (1923)

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add_def_ver("v_a_beyer","A. Beyer, Niederpoyritz","A. verw. Beyer, Drogerie zum riten Kreuz, Niederpoyritz");

„Forsthaus Helfenberg (Weinpresse)“ – so lautet die offizielle Bezeichnung in der Denkmalbegründung zum ortsüblich eher als „Alte Försterei“ bekannten Objekt oberhalb des früheren Rockauer Weinberges in der Kucksche. Die Errichtung des Vorgängerbaues vom heutigen Forsthau s, ein Presshaus (Winzer- bzw. Kelterhaus) mit Weinpresse geht auf die Zeit der Einführung des Obst- und Weinbaues im 17. Jahrhundert durch die damaligen Besitze r vom Gut Helfenberg (Adelsgeschlecht der Dehn-Rotfelser) an den Hängen entlang des Elbtals zurück. Mit dem Erwerb des Rittergutes durch König Albert von Sachsen ging auch das Presshaus in den königlichen Besitz über. Mit dem Niedergang des Wein anbaus am Elbhang aus wirtschaftlichen Gründen sowie auch infolge der unaufhaltsamen Ausbreitung der Reblaus gegen Ende des 19. Jahrhundert veranlasste der König Albert von Sachsen den Umbau der Weinpresse. König Albert von Sachsen lies nun die Fläche um die Weinpresse mit königlichen Wald aufforsten. Der Gebäudekomplex sollte fortan den königlichen Jagdausflügen dienen. Die Veränderungen betrafen insbesondere das Innere des Presshauses mit einer Aufsto ckung sowie den Anbau eines Jagdsaales zum Jagdhaus. Die Erdgeschossräume dienten seitdem zuweilen als Nachtquartier des Kronprinzen und späteren König Friedrich August II., der hin und wieder mit seinem Leibwächter in diesem Gebiet auf die Pirsch ging. Das bisherige Winzerhaus wurde von nun an als Forsthaus genutzt. Der Jagdsaal verfügte zu diesem Zeitpunkt über eine einheitliche Ausstattung, die hölzerne Wandverkleidung en, Treppengeländer und Fensterrahmen umfasste. Die Fensterrahmen waren von geschnitzten Wildköpfen belebt. Das auf das alte Presshaus aufgestockte Zimmer war vom Jagdsaal aus über eine Treppe und der sich im Jagdsaal befindlichen Empore erreichbar. Der Saalraum war von einem brettbeschlagenen Tonnengewölbe mit dekorativer Malerei in Grün auf weißem Grund überfangen. Auch befand sich ein Kamin im Jagdsaal.

add_def_ver("v_w_leutert","Wilh. Leutert, Striesen","Wilh. Leutert, Dresden Striesen, 1903 Hüblerplatz 2");

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Der Königsheimplatz entstand im Zusammenhang mit der Entwicklung des Blasewitzer Villenviertels. Seinen Namen erhielt er am 5. Mai 1921 nach dem sächsischen Regierungsrat Arthur Willibald Königsheim (1816-1886), der 1867 den Waldparkverein gründete und sich für den planmäßigen Ausbau der umgebenden Straßen einsetzte. Königsheim selbst besaß eine Villa auf der Goetheallee mit einem parkartigen Garten, dessen Gestaltung zum Vorbild für weitere Blasewitzer Villengrundstücke wurde. Auf ihn gehen auch die 1870 im Ort eingeführten Straßennamen nach Schauplätzen des Deutsch-französischen Krieges 1870/71 und der folgenden patriotischen Bewegung zurück. "Während hundert und aber hundert deutsche Gemeinden sich daran genügen lassen müssen, ihre patriotische Dankbarkeit und Freude über die große Errungenschaft des deutsch-französischen Krieges ganz im Allgemeinen durch ein vereinzeltes äußeres Zeichen, vielleicht nur durch die Namenswahl einer zufällig fertig gewordenen Straße oder durch einen eigens hierzu gepflanzten Baum Ausdruck zu geben, sind wir in der begünstigten Lage, durch die würdige Bezeichnung eines vollständigen Systems neuer Straßen und eines förmlichen Labyrinths von Baumgängen eine ganze Kette lebendiger Erinnerungszeichen an eine ganze Kette verneigungswürdiger Momente schaffen, oder beide, je in ihrer Gesammtwirkung aufgefaßt, der deutschen Großthat von 1870 in unserem Wald- und Villenpark auch ein Monument en groß gegenüber stellen zu können." Schreiben von Königsheim an den Blasewitzer Gemeindevorstand Tauscher vom 14. Dezember 1872. Während ein Großteil der zwischen 1870 und 1900 erbauten Gebäude bis heute erhalten geblieben ist, fielen die Häuser um den Königsheimplatz 1945 zum größten Teil den Bomben zum Opfer. Erhalten blieb jedoch die nach der Eingemeindung geschaffene Brunnenanlage Georg Wrbas sowie die Grundkonzeption des Platzes. In den 1970er und 80er Jahren wurden am Königsheimplatz neue Wohnblocks in der DDR-typischen Plattenbauweise errichtet. Nach 1990 erfolgte eine Wiederherstellung der Grünflächen nach historischem Vorbild. Weißes Schloss: Die schlossartige Villa am Königsheimplatz, Ecke Händelallee entstand 1860/62 nach Plänen von Theodor Lehnert und war bedeutendster Wohnbau im Ort. Bauherr war der Unternehmer Carl August Spiegelthal, der das dreigeschossige Gebäude mit Treppenturm zunächst selbst nutzte. Lehnert wählte für die architektonische Gestaltung den neogotischen Tudorstil mit Zinnen, Flach-, Spitz- und Korbbogenfenstern, aufwendigen Balkonen und Dekors in Anlehnung an gotische Herrenhäuser. Auch die Inneneinrichtung folgte höchsten Ansprüchen und besaß geschnitzte Wandverkleidungen aus Eichenholz, Balkendecken und eine auf Säulen gelagerte Arkade in der Diele. Die einzelnen Räume waren über eine Prachttreppe erreichbar, die offen vom Erdgeschoss bis ins dritte Obergeschoss führte. Jeder Türdurchgang war individuell gestaltet und mit aufwendigen Verzierungen und Beschlägen geschmückt. Für die Ausstattung zeichnete die Dresdner Innenausstattungsfirma Udluft und Hartmann verantwortlich. Wegen ihres Aussehens und der hellen Fassade wurde die Villa im Volksmund “Weißes Schloss” genannt. Als Nebengebäude entstand die “St. Gotthardsburg” an der Emser Allee, Ecke Schubertstraße. Außerdem gehörte ein Bedienstetenhaus sowie eine ausgedehnte parkartige Gartenanlage zum Areal. 1880 erwarb der Besitzer des “Weißen Adlers” Carl Friedrich August Lorenz das Gebäude und wandelte es in eine internationale Hotelpension um, zu der schon bald weitere Häuser in der Nachbarschaft kamen. Die Eröffnung erfolgte am 24. Mai 1890. Fortan standen hier bis zu 150 Ferienwohnungen in exklusiv ausgestatteten Zimmern zur Verfügung. Zudem gab es einen großen Gesellschaftssaal, mehrere kleine Säle und einen gut ausgestatteten Fuhrpark mit Kutschen und Automobilen. Allerdings geriet das Unternehmen unter seinem neuen Besitzer Carl Hermann Wunderlich kurz vor dem Ersten Weltkrieg in Zahlungsschwierigkeiten. Immobilienspekulationen und hohe Kredite führten zur Überschuldung. Im Februar 1914 wurde Wunderlich verhaftet, wegen Hochstapelei, Meineids und betrügerischen Bankrotts angeklagt und später zu 12 Jahren Haft verurteilt. Das Hotel musste daraufhin seinen Betrieb einstellen und verfiel. 1916 beschädigte zudem ein Blitzschlag Teile des "Weißen Schlosses". Erst der Verkauf der neogotischen Villa an den Zahnarzt Willy Alfred Mauksch beendete den Verfall. 1920 ließ der neue Eigentümer das Haus sanieren und nutzte es fortan als Wohnhaus und Praxis. Im hinteren Teil entstand 1930 das Haus der Ärzteschaft. 1945 wurde das “Weiße Schloss” von mehreren Brand- und Sprengbomben getroffen und brannte komplett aus. Die zunächst für einen möglichen Wiederaufbau beräumte Ruine wurde 1952 gesprengt und die Reste abgetragen (Foto: Wikipedia). 1988 entstanden an gleicher Stelle Wohnblocks. Europabrunnen: Der Brunnen mit einer Plastik von Georg Wrba wurde 1922 auf dem Königsheimplatz aufgestellt. Die Plastik zeigt einen Bullen mit einer auf ihm sitzenden nackten Frau und stellt “Europa mit dem Stier”, eine Gestalt der griechischen Mythologie dar. In dieser Sage wird die phönizische Königstochter Europa vom Göttervater Zeus nach Kreta entführt, der dabei in Form eines Stieres auftritt. Da das bei seiner Aufstellung umstrittene Kunstwerk 1922, ein Jahr nach der erzwungenen Eingemeindung von Blasewitz, seinen Standort erhielt, wurde die Figur von den Einwohnern auch spöttisch als die vom Dresdner Oberbürgermeister Blüher entführte Gustel von Blasewitz interpretiert. Mit über 14 Metern Länge gehört der Europabrunnen zu den größten Anlagen Dresdens. Das Brunnenbecken zeigt expressionistische Gestaltungselemente und wurde unter der Leitung von Amtsbaurat Borrmann von der Firma Gebrüder Eberlein hergestellt, den Guß der Bronzefigur übernahm die Kunstgießerei Oswald Zinke. Während des Zweiten Weltkrieges wurde die Plastik von ihrem Sockel entfernt und war 1944 zum Einschmelzen für die Rüstungsproduktion vorgesehen. Obwohl sie die Kriegsjahre letztlich überlebte, war sie dennoch so schwer beschädigt, das eine Rekonstruktion unmöglich war. Die Brunnenanlage selbst überstand den Krieg unbeschadet und wurde nach jahrzehntelanger Vernachlässigung 1985/86 saniert. 1995 konnte der Europabrunnen mit einer Kopie des Kunstwerkes, finanziert von der Dussmann-Stiftung, vervollständigt werden. Schöpfer der neuen Plastik war der Bildhauer Lothar Janus.

Die früher Eliasplatz genannte Anlage entstand 1875 und sollte ursprünglich als halbkreisförmige Fläche mit einem Denkmal den repräsentativen Auftakt zur Sachsenallee bilden. Da man für den Ausbau jedoch Teile des historischen Eliasfriedhofes hätte beseitigen müssen, gab man diesbezügliche Planungen später auf. Stattdessen entstanden auch hier mehrstöckige Wohn- und Geschäftshäuser. Zuvor hatte es lediglich einige als “Wolfs Ruhe” bezeichnete Gebäude gegeben, welche an Stelle einer alten Schanze aus den Napoleonischen Kriegen errichtet worden waren

1929 Konsulat Argentinien Residenzstr. 22 (Loschwitz)

Am Burgberg Der Straßenname Am Burgberg erinnert an den einst hier gelegenen Burgward “Gwosdez” bzw. “Woz”, welchem Niederwartha seine Existenz und auch seinen Namen verdankt. Die Anlage entstand vermutlich im 7./8. Jahrhundert und diente der slawischen Bevölkerung als Zufluchtsort in Kriegszeiten. Heute sind von der Anlage nur geringe Reste sichtbar. Am Fährhaus Markantestes Bauwerk der kleinen Straße Am Fährhaus sind die Gebäude des Pumpspeicherwerkes, das hier 1927/28 errichtet wurde. Ihren Namen verdankt sie dem alten Niederwarthaer Fährhaus von 1765, welches heute als Gaststätte am Elberadweg dient. Der Fährbetrieb selbst wurde bereits 1877 nach Einweihung der Elbbrücke bzw. nach seiner Wiederaufnahme in der Nachkriegszeit 1973 eingestellt. Kurz nach Eröffnung der Brücke entstand auf dem Grundstück Am Fährhaus 2 das Gasthaus "Bahnschlösschen". Heute dient das nach 1945 geschlossene Lokal als Wohnhaus (Foto). Noch bis 1954 gehörte das Areal am Fährhaus zur Stadt Radebeul am gegenüberliegenden Elbufer, da sich hier einst die Kötzschenbrodaer Weiherwiesen befanden. Friedrich-August-Straße Die Friedrich-August-Straße wurde Ende des 19. Jahrhunderts zur Erschließung eines neuen Wohngebietes oberhalb der Meißner Straße angelegt. Das Straßenbild prägen bis heute Villen und Landhäuser aus der Zeit vor dem Ersten Weltkrieg. Zahlreiche Gebäude stehen unter Denkmalschutz. Ihren Namen erhielt die Straße nach dem letzten sächsischen König Friedrich August III (1865-1932), der bis zur Revolution von 1918 das Land regierte. Wilhelmsburg: Das traditionsreiche Ausflugslokal wurde 1895 vom Cossebauder Tischlermeister Karl Hohnstein eingerichtet, der sich für die Namensgebung sogar eine Genehmigung des Kaisers aus Berlin beschaffte. Das Haus besaß neben Gasträumen und einem Kaffeegarten einen Tanzsaal im Obergeschoss, der nach 1945 jedoch zu Wohnzwecken umgebaut wurde. An der unteren Grenze des Grundstücks ließ Hohnstein den Nachbau einer mittelalterlichen Burgmauer mit Zinnen und Türmen errichten. Dieser fiel später dem Bau des Pumpspeicherwerks zum Opfer. Außerdem gab es einen Waldspielplatz im nahen Amselgrund. Vor allem zur Zeit der Baumblüte erfreute sich die “Wilhelmsburg” großer Beliebtheit. Auch nach 1945 wurde der Gastronomiebetrieb noch bis 1999 weitergeführt, zeitweise unter dem “unpolitischen” Namen HO-Gaststätte “Am Stausee”. 2007 übernahmen neue Besitzer das Haus und eröffneten das Lokal wieder unter seinem ursprünglichen Namen “Wilhelmsburg”. 2012 wurde das Hotel jedoch geschlossen und soll künftig als Kinderheim genutzt werden. Grunaweg Der Straßenname Grunaweg erinnert an das einst selbständige Dorf Gruna, welches im 14. Jahrhundert in den Besitz der Herren von Saalhausen kam und dadurch mit Niederwartha vereinigt wurde. Am Grunaweg haben sich noch zwei Gehöfte aus der dörflichen Vergangenheit des Ortes erhalten. Beide Höfe (Grunaweg 1 und 3) stehen unter Denkmalschutz. Hermann-Große-Straße Die Hermann-Große-Straße im alten Dorfkern Niederwarthas verdankt ihren Namen dem früheren Gemeindevorstand des Ortes Hermann Große (1848-1928), der sich sehr für die Belange seines Heimatortes engagierte. Meißner Straße Als Meißner Straße wird der auf Cossebauder und Niederwarthaer Flur verlaufende Straßenabschnitt der Bundesstraße 6 nach Meißen zwischen Hauptstraße und Stadtgrenze bezeichnet. Im Zusammenhang mit dem Bau der neuen Straßenbrücke nach Radebeul erfolgten zwischen 2006 und 2012 umfangreiche Ausbauarbeiten an dieser Straße. Um die Ortsdurchfahrt zu entlasten, ist jedoch künftig eine Verlegung der Straße parallel zur Eisenbahnstrecke geplant. Zu den bemerkenswerten Gebäuden an der Meißner Straße gehören die unter Denkmalschutz stehenden Wohnhäuser Nr. 2, 18, 20 sowie das Doppelhaus Nr. 43/45. Im Haus Meißner Straße 35 hatte einst die Ortsbehörde Niederwarthas ihren Sitz. Oberwarthaer Straße Die Oberwarthaer Straße verbindet das im Elbtal gelegene Niederwartha mit dem Nachbarort Oberwartha und führt in steilen Serpentinen den Elbhang hinauf. Bemerkenswertestes Gebäude ist das sogenannte “russische Landhaus” (Oberwarthaer Str. 4). Tännichtgrundstraße Die Tännichtgrundstraße führt vom Ortszentrum zum Eingang in das Tal des Tännichtgrundbaches, dem sie auch Ihren Namen verdankt. An der Einmündung zur Weistropper Straße weist eine historische Wegsäule auf bestehende alte Verkehrsverbindungen nach Weistropp und Oberwartha hin. Tännichtgrundmühle: Die früher auch Obermühle bzw. nach ihrem Besitzer Appeltmühle genannte Sägemühle am Ende der Tännichtgrundstraße wurde 1842 durch den Gutsbesitzer Johann Gottlieb Fehrmann als Mahl- und Schneidemühle erbaut. Die Wasserversorgung des neun Meter großen Wasserrades erfolgte über einen eigens angelegten Mühlteich, der einen kontinuierlicheren Betrieb ermöglichte. Angeschlossen war auch eine Bäckerei. Während der Mahl- und Backbetrieb bereits im 19. Jahrhundert wieder eingestellt wurde, blieb die Sägemühle bis zur Gegenwart in Betrieb, wird heute jedoch nur noch gelegentlich und elektrisch betrieben zur Brennholherstellung genutzt. Das Hauptgebäude dient Wohnzwecken. Am Damm des Mühlteiches im Tännichtgrund erinnert ein Mühlenmodell an das einstige Aussehen der Tännichtgrundmühle. Weistropper Straße Die Weistropper Straße wurde um 1900 als Staatsstraße zwischen Wilsdruff und der Fährstelle Niederwartha angelegt und erhielt ihren Namen nach dem benachbarten Ort Weistropp, heute ein Ortsteil der Gemeinde Klipphausen. Historische Baudenkmale sind der Gasthof Niederwartha an der Einmündung in die Meißner Straße, die frühere Reibigmühle (Nr. 1/3) sowie mehrere Bauernhöfe (Weistropper Straße 4, 6 und 10). Reibigmühle: Die Wassermühle im alten Ortskern von Niederwartha wurde 1397 erstmals urkundlich erwähnt, als Markgraf Wilhelm von Meißen den Brüdern Hans und Friedrich Kundige die Dörfer Wildberg und Niederwartha zum Lehen gab. Ab 1535 befand sie sich für zwei Jahrhunderte im Besitz der Familie Ryssel und wurde deshalb auch Rysselmühle genannt (Foto). 1894 erfolgte im Auftrag des neuen Eigentümers Max Tittel ein umfassender Umbau zur Mühle mit angeschlossener Bäckerei. 1927 übernahm die Müllerfamilie Reibig das Anwesen und betrieb die Mühle noch bis 1960. Das Nebengebäude (Nr. 3) wurde noch bis 1971 als Bäckereiverkaufsstelle genutzt. Heute dient die ehemalige Mühle als Wohnhaus, das Nebengebäude wurde 2014 wegen Baufälligkeit abgetragen.. Gasthof Niederwartha: Zu den ältesten Grundstücken Niederwarthas gehört der bereits 1397 erstmals genannte Gasthof an der Landstraße nach Meißen. Neben der Schankgerechtigkeit besaß dieser auch das Recht zum Betreiben einer Fähre, damals einzige Flußquerung zwischen Dresden und Meißen. Im 19. Jahrhundert gewann der nun meist als "Brauschänkengut" bezeichnete Gasthof Bedeutung als Ausflugslokal und wurde kurz vor der Jahrhundertwende deutlich vergrößert. 1945 quartierten sich hier russische Soldaten ein, womit der Gastwirtschaftsbetrieb vorerst endete. Erst nach 1990 konnte das Lokal wieder gastronomisch genutzt werden. Seit 1994 befindet sich in den Kellerräumen und im großen Saal die mittelalterliche Erlebnisgaststätte "Zarenkeller" (seit 2015 Prinzenkeller), im Erdgeschoss ein italienisches Restaurant.

Die Loschwitzer Straße bildete bereits vor ihrem Ausbau im 19. Jahrhundert die wichtigste Verbindung zwischen Blasewitz und der Innenstadt. Jedoch erst mit der “Entdeckung” des Dorfes als Sommerfrische und Wohnvorort erhielt sie eine größere Verkehrsbedeutung und wurde 1863 verbreitert und ausgebaut. In den Folgejahren entstanden hier repräsentative Villen unterschiedlichster Stilrichtungen, die zum Großteil bis heute erhalten blieben und in den letzten Jahren liebevoll saniert wurden. Am 26. September 1872 fuhr die erste Pferdebahn über die damalige Residenzstraße zu ihrem vorläufigen Endpunkt am Schillerplatz. Mit ihrer Einweihung begann die Geschichte der Dresdner Straßenbahn. 1891 wurde die Strecke elektrifiziert und zwei Jahre später bis Pillnitz verlängert. Bis heute wird diese Linie von den Bahnen der Dresdner Verkehrsbetriebe bedient, auch wenn der Abzweig über das Blaue Wunder nach Pillnitz 1985 stillgelegt werden musste. Beim Luftangriff auf Dresden am 13./14. Februar 1945 wurden auch einige Gebäude an der Loschwitzer Straße zerstört. Zu den schmerzlichsten Verlusten gehören das Naumann-Palais sowie das “Weiße Schloss” am Königsheimplatz. Nach Abbruch der Ruinen blieben die betroffenen Grundstücke zumeist ungenutzt. Erst nach 1990 konnten die meisten Baulücken geschlossen werden. Markantester Neubau an der Loschwitzer Straße ist das im Dezember 2000 eröffnete Einkaufszentrum “Schiller-Galerie” mit Ladenpassage und Großkino “CINEMAXX”. In der Nachbarschaft eröffnete 1992 das Hotel “Am Blauen Wunder”, entworfen vom damaligen Dresdner Baudezernenten Gunter Just. 2011 folgte der Neubau eines Wohn- und Geschäftshauses mit einer Mc-Donalds-Filiale. Einzelne Gebäude: Nr. 4: Die zweigeschossige Villa entstand 1902 und wurde vom Architekten Heino Otto entworfen. Obwohl sich das Äußere noch am Neobarock orientiert, weist diese Villa auch erste Jugendstilformen auf. 1999 wurde das Haus saniert und heute gewerblich genutzt. Nr. 9 (Haus Friedland): Das in der Gründerzeit entstandene “Haus Friedland” gehörte zu den schlichteren Blasewitzer Villenbauten. Obwohl das Gebäude Krieg und Nachkriegszeit relativ gut überstand, wurde es 1993 trotz Bürgerprotesten abgebrochen. An gleicher Stelle entstand ein Wohnhaus mit mehreren Eigentumswohnungen. Der Abriss der nicht unter Schutz stehenden Villa war charakteristisch für die nach 1990 entstandenen Gefahren für historische Gebäude, sofern diese nicht dem Vermarktungswillen der neuen Eigentümer entsprachen. Nr. 19 (Villa Freisleben): Die Villa wurde 1916 von Hans Paulick im neoklassizistischen Stil mit Jugendstilelementen erbaut und blieb auch zu DDR-Zeiten im Privatbesitz der Familie Freisleben. Diese betrieb hier eine kleine Firma für Elektroartikel. Zeitweise hatte auf dem Grundstück auch die einzige Blattgoldschlägerei der DDR ihren Firmensitz. Das Unternehmen war 1830 als Blattgold- und Prägefolienfabrik Ferdinand Müller gegründet worden und produzierte auf der Dürerstraße 104, während die Villa Sitz der Verwaltung war. Ab 1973 befand es sich als VEB Blattgold Dresden in staatlichem Besitz. Nach 1990 wurde das Haus saniert und 1994 als Aparthotel Villa Freisleben eröffnet. Im Inneren sind noch Teile der früheren Ausstattung erhalten, u.a. ein Wandbrunnen aus Meißner Porzellan. Nr. 21 (Villa St. Petersburg): Das Haus wurde 1872 im Stil des Historismus errichtet und gehört zu den qualitätsvollsten Bauten in Blasewitz. Bauherr war der frühere Hofgärtner des russischen Zaren, Robert Henry Lüdicke, der hier seinen Alterswohnsitz nahm. Von 2008 bis 2012 nutzte die private Ganztagsschule des Institutes für Bildung und Beratung (IBB) das 1995 sanierte Gebäude (Foto) . 2013 verzog die Bildungseinrichtung in einen Neubau nach Striesen. Nr. 22: Das Gebäude wurde um 1870 erbaut und gehörte zu den eher schlichteren Blasewitzer Villenbauten. Zuletzt gehörte es der Stadt Dresden und wurde als Mietshaus genutzt. Nach dem Verkauf an einen privaten Investor erfolgte, trotz erheblicher Proteste, 2014 der Abriss, da das Haus nicht unter Denkmalschutz stand. An seiner Stelle sind zwei moderne Stadtvillen geplant. Nr. 23: In der Villa befindet sich seit September 2009 der private Kindergarten “Villa für Kinder”. Die Einrichtung bietet berufstätigen Eltern eine Rundumbetreuung für ihre Kinder an und setzt die Tradition der zuvor geschlossenen “Kindervilla” am Großen Garten fort. Nr. 31 (Villa Kemmer): Das Gebäude entstand 1889 im Stil der italienischen Renaissance und wird heute als Bürohaus genutzt. Die zweigeschossige Villa weist neben Renaissanceformen im Stil der Nicolai-Schule auch einige Neobarockelemente auf. Nr. 33 (Villa Seidlitz): Die Villa wurde um 1890 im Stil des Historismus für Woldemar von Seidlitz errichtet. Seidlitz war Doktor der Philosophie und gehörte viele Jahre der Direktion der Dresdner Kunstsammlungen an. Auch privat war er eifriger Kunstsammler. Zu seinem Freundeskreis gehörten die Maler Oskar Zwintscher, Sascha Schneider, Robert Sterl und Max Liebermann, die ihn gelegentlich in seinem Blasewitzer Haus besuchten. Nr. 34: Das Gebäude entstand 1864 als Ländliche Lehr- und Erziehungsanstalt für Knaben. Gründer dieser Privatschule war Dr. Richard Pietzsch, Vater des bekannten Dresdner Kino-Architekten Martin Pietzsch, welcher u.a. die Schauburg und den 1945 zerstörten UFA-Palast an der Prager Straße entwarf. Am Haus erinnert noch eine lateinische Inschrift mit einem Zitat von Cicero an die einstige Nutzung: Quod munus rei publicae afferre maius meliusque possumus, quam si docemus atque erudimus iuventutem ("Welch größeren und besseren Dienst können wir dem Staat erweisen, als die Jugend zu unterrichten und zu erziehen"). Ab 1876 wohnte hier der Porträtmaler Emil von Hartitzsch. Heute dient die Villa als Wohnhaus. Nr. 37 (Villa Ilgen): Das Haus entstand um 1890 nach Plänen von Martin Pietzsch für einen Offizier der sächsischen Armee, der seinen Wohnsitz “Tusculum” (Lieblingsaufenthalt) nannte. 1899 kaufte der durch die Erfindung eines Mäusegiftes zu Reichtum gekommene Apotheker Hermann Ilgen das Haus. Ilgen war Besitzer eines repräsentativen Geschäftshauses am Pirnaischen Platz und wählte nun das ruhigere Blasewitz als Wohnort. Bekannt wurde er als Mäzen des entstehenden Dresdner Sportlebens. Auf eine Stiftung Hermann Ilgens geht u. a. die Anlage des heutigen Rudolf- Harbig- Stadions zurück. Das Gebäude besitzt nur ein Stockwerk und ist mit einer Säulenvorhalle sowie weiteren Schmuckelementen im klassizistischen Stil gestaltet. Allegorische Darstellungen über den Giebelfenstern zeigen u.a. die Götter der Landwirtschaft (Demeter) und des Handels (Merkur), die Saxonia als Verkörperung Sachsens und Personifizierungen von Industrie, Handel, Kunst und Wissenschaft. Trotz Nutzung als Firmensitz einer Baufirma in der Nachkriegszeit und verschiedenen Umbauten blieb im Inneren ein Großteil der historischen Ausgestaltung erhalten (Foto). 1991 wurde die Villa an die Nachkommen Ilgens rückübertragen und 1994/96 denkmalgerecht saniert. Seit November 2007 erinnert eine von der Bürgerstiftung finanzierte Gedenktafel an den Unternehmer. Foto: Die Straßenseite der Villa Ilgen Nr. 42 (Villa Sidonienhof): Die Villa Sidonienhof wurde 1875 im toscanischen Landhausstil erbaut. Bauherr und erster Besitzer war der preußische Hofgartendirektor Hermann Sigismund Neumann (1829-1980), der u.a. an der Gestaltung der ausgedehnten Parkanlagen von Schloss Albrechtsberg beteiligt war. In Blasewitz gestaltete Neumann mehrere Villengärten und Teile des Waldparks und besaß eine Baumschule. Benannt ist das Haus nach seiner Ehefrau Sidonie Preißler, einer Tochter des Weinbergsbesitzers Johann Preißler (Gut Weißer Hirsch). Heute befinden sich in der 1993 sanierten Villa Wohnungen und Geschäftsräume. Nr. 43: Das "Villa Diana" genannte Gebäude war ab 1874 Sitz der Naturalienhandlung des Insektenkundlers Otto Staudinger, der als Schmetterlingsexperte international bekannt war. Gemeinsam mit seinem Schwiegersohn Andreas Bang-Haas verkaufte er von hier aus exotische Schmetterlinge und Insekten an Sammler in aller Welt. 1884 verlegte Staudinger sein Unternehmen aus Platzgründen zur Prellerstraße 11. Die bis heute erhaltene und zu DDR-Zeiten um einen Anbau erweiterte Villa ist heute Sitz des Polizeireviers Blasewitz. Hotel “Am Blauen Wunder” (Nr. 48): Das moderne Hotel entstand 1992 nach Plänen des Architekten und damaligen Dresdner Baudezernenten Gunter Just. Neben Restaurant und Bar stehen den Besuchern auch Konferenzräume sowie 40 Zimmer zur Verfügung. Nr. 50: Auf diesem Grundstück in der Nähe des Schillerplatzes ist seit Anfang 2016 die Glocke "Hannah" der Dresdner Frauenkirche aufgestellt. Dabei handelt es sich um einen ersten Fehlguß, der wegen der falschen Tonlage nicht verwendet werden konnte. Ursprünglich war diese Glocke im Militärhistorischen Museum ausgestellt, bevor die George-Bähr-Stiftung sie zur Erinnerung an ihren Gründer Fritz Büttner (+2003), einen Förderer des Wiederaufbaus, nach Blasewitz verbrachte. Hier kann sie durch Münzeinwurf zum Klingen gebracht werden. Naumanns Palais: Das Gebäude entstand Ende des 18. Jahrhunderts auf einem Grundstück an der heutigen Loschwitzer Straße 56 für den Hofkapellmeister und Komponisten Johann Gottlieb Naumann. In unmittelbarer Nachbarschaft war der zu den bedeutendsten Musikern seiner Zeit gehörende Naumann am 17. April 1741 in ärmlichen Verhältnissen geboren worden. Sein Vater verdiente sich seinen Lebensunterhalt als Gärtner und Dorfmusikant. Zeitweise betrieb die Familie hier auch eine kleine Gartenwirtschaft. Das eigentliche Geburtshaus wurde 1901 abgerissen. Die zweistöckige Villa stand in einem großzügigen Park und wurde von den Blasewitzern Naumanns Palais genannt. 1890 erfolgte ein umfassender Um- und Ausbau des Hauses sowie der Anbau eines imposanten Turmes. 1945 fiel das Gebäude einem Luftangriff zum Opfer und wurde später abgetragen. An gleicher Stelle befindet sich heute das Einkaufszentrum “Schiller-Galerie”. Schiller-Galerie: Der moderne Gebäudekomplex zwischen Loschwitzer, Berggarten- und Hüblerstraße wurde zwischen 1997 und 2000 erbaut und beherbergt im Erd- und im Untergeschoss ein Einkaufszentrum mit Tiefgarage. Außerdem befindet sich hier das am 1. Dezember 2000 eröffnete Kino “CinemaxX” mit acht Kinosälen und ca. 2000 Plätzen. Im Oktober 2001 wurde auf dem Vorplatz der Schillergalerie eine vom Loschwitzer Künstler Detlef Schweiger entworfene Gedenkstele für Johann Gottlieb Naumann eingeweiht. Das schlichte, aus Sandstein und Glas angefertigte Denkmal erinnert an Naumanns bedeutendste Werke, zu denen auch zahlreiche Kompositionen für die zu seiner Zeit neuartige Glasharmonika gehören. Außerdem trägt die Säule den Namenszug sowie Geburts- und Sterbejahr (1801) des Künstlers. “Potz Blitz”: Die volkstümliche Gaststätte entstand Mitte des 19. Jahrhunderts in der Nähe des Schillerplatzes. Ihren Namen verdankte die Schänke, zu der neben Kaffeegarten, Wein- und Bierschank auch ein Fahrradverleih gehörte, dem bekannten Schiller-Zitat über die “Gustel von Blasewitz”. Die Gaststätte mit angeschlossener Bäckerei existierte bis 1939. Anschließend wurde das einstöckige Gebäude gewerblich genutzt und 1975 abgerissen.

Der Schillerplatz entstand im 19. Jahrhundert an Stelle des früheren Blasewitzer Dorfplatzes. Noch um 1850 lagen hier die Gehöfte der Bewohner, umgeben von Gärten und Feldern. In einem dieser Güter kam am 20. August 1802 der Maler Woldemar Hottenroth (1802-1894) zur Welt, dessen Vater das Anwesen 1798 erworben hatte, 1810 jedoch wieder verkaufte. Als eines der wenigen Gebäude der dörflichen Vergangenheit ist dieses Haus unmittelbar neben dem Schillergarten (Schillerplatz 10) bis heute erhalten geblieben (Foto). Zwischen 2006 bis 2017 befand sich hier die kleine Pension "Nebenan". 2010 wurde am Gebäude eine von Elke und Peter Ressel gestaltete Gedenktafel zu Ehren des Künstlers und seines Bruders Edmund Hottenroth (1804-1889) angebracht. Nachdem viele Bauern durch den Verkauf ihrer Parzellen an Bauinteressenten zu Wohlstand gekommen waren, errichteten sie an Stelle der früheren Gehöfte neue Wohnhäuser mit Läden, kleinen Handwerksbetrieben und Gaststätten. Bereits 1875 gab es nur noch ein einziges Bauerngut im Ort. Um 1860 hatte der Platz den Namen des Dichters Friedrich Schiller erhalten, womit an dessen häufige Besuche im Gasthof Blasewitz erinnert werden sollte. Nach Erlass einer veränderten Bauvorschrift erlaubte die Gemeinde am Schillerplatz die Errichtung geschlossener Häuserzeilen, während im übrigen Gemeindegebiet lediglich Villen und Landhäuser zulässig waren. Die Pläne für die Umgestaltung des Platzes stammen zum Großteil vom Blasewitzer Baumeister Emil Scherz, der auch die Gebäude des Körnerplatzes am gegenüberliegenden Brückenkopf entwarf. Um 1890 entstanden hier mehrgeschossige Wohn- und Geschäftshäuser mit reich verzierten Fassaden im Stil des Historismus. Lediglich an der Ostseite des Platzes blieben der alte Gasthof und einige kleinere Wohnhäuser erhalten. An Stelle des letzten Blasewitzer Bauerngutes wurde 1896 das Café Toscana errichtet, welches seinen Namen der Heimat der letzten sächsischen Kronprinzessin Luise verdankt. Ein weiteres Lokal bestand bis in die Dreißiger Jahre als “Goethegarten” in den späteren Räumen der Stadtsparkasse (Foto). Von den zahlreichen Traditionsgeschäften rund um den Platz ist heute keines mehr vorhanden. 2016 schlossen als letzte das Modehaus Borrmann als auch das 1924 von Kurt Dunger gegründete stadtweit bekannte Schirmhaus Dunger. Mit der Eröffnung des Blauen Wunders 1893 erhielt der Schillerplatz endgültig sein heutiges Bild. Leider wurde dieses 1945 durch die Zerstörung des Eckhauses an der Nordostseite (Tolkewitzer Straße 1) beeinträchtigt. Das repräsentative Geschäftshaus, wegen seiner Reliefs auch als “Schillerhaus” bezeichnet, wurde kurz nach 1900 von Edmund Scholze entworfen und beherbergte u. a. eine Filiale der Deutschen Bank. Plastiken am Eckerker zeigten Szenen aus den bekanntesten Werken des Dichters. Eine 1909 aus Anlass des 150. Geburtstages des Dichters angebrachte Gedenktafel befindet sich heute am Nachfolgebau. In der Nachkriegszeit wurde die Fläche beräumt und u. a. von einem Kiosk und dem "Vitamin-Basar" genutzt. Zeitweise war hier der Bau eines Festspielhauses vorgesehen - ein Projekt, welches jedoch schon bald wieder in der Schublade verschwand. Auch die Vorstellungen für eine völlige Umgestaltung des Platzes, für die neben zahlreichen Wohnhäusern auch das “Blaue Wunder” abgerissen werden sollte, kamen glücklicherweise nicht zustande. 2003/04 entstand auf dem Areal an der Tolkewitzer Straße ein neues Wohn- und Geschäftshaus mit Filiale der Stadtsparkasse, dem Vitanas Senioren Centrum und weiteren Geschäften (Foto). Von Bedeutung war und ist der Schillerplatz als Verkehrsknotenpunkt. Hier treffen die bereits früher für Blasewitz wichtigen Verbindungsstraßen nach Osten (Tolkewitzer Straße), Westen (Loschwitzer Straße) und Süden (Hüblerstraße) zusammen, außerdem die zum Elbufer führende Naumannstraße. Am 26. September 1872 fuhr zum ersten Mal eine Pferdestraßenbahn vom Schlossplatz zum Schillerplatz, womit die Geschichte der Dresdner Straßenbahn begann. Weitere Linien verkehrten bis 1945 auf der Goetheallee (Emser Allee) und der Hüblerstraße. 1891 wurde die Bahn elektrifiziert und 1893 um einen Abzweig nach Pillnitz über das Blaue Wunder ergänzt. Infolge der eingeschränkten Tragfähigkeit der Brücke musste dieser Abschnitt 1985 stillgelegt und durch Busse ersetzt werden. In den letzten Jahren wurden die Verkehrsanlagen und Haltestellen am Schillerplatz umgestaltet. Mit Einweihung der Ampelanlage verschwand 1994 auch der stadtweit bekannte Verkehrspolizist Günter Jacob von der Kreuzung, der als “Karajan vom Schillerplatz” zu den Dresdner Originalen der 1960er und 70er Jahre gehörte. Einzelne Gebäude: Mauleselschänke: Diese kleine, heute längst verschwundene Kneipe am Schillerplatz verdankte ihren Namen einem kuriosen Kapitel der Dresdner Straßenbahngeschichte. Nachdem 1872 die erste Pferdebahnlinie zwischen der Innenstadt und Blasewitz eröffnet worden war, kamen 1873 auch Maulesel als Zugtiere zum Einsatz. Während ihrer Ruhepausen kehrten die Kutscher und Kondukteure der Bahn gern in der kleinen Schänke ein, die sich offiziell “Restauration zur Wartehalle” nannte. Nachdem das Experiment mit den Mauleseln mangels Erfolg abgebrochen werden musste, entstand der spöttische Name “Mauleselschänke”. Um 1900 wurde die Gaststätte geschlossen und zugunsten des Wohn- und Geschäftshauses Schillerplatz 15 abgebrochen. Später nutzten die Dresdner Bank und das Modehaus Borrmann diese Räume. Goethegarten: Die ehemalige Gaststätte “Goethegarten” ging ursprünglich aus dem früheren Reiheschank im Ort hervor. Mitte des 19. Jahrhunderts wurde dieser, gegen den Willen des Blasewitzer Gasthofsbesitzers, verpachtet und entwickelte sich zu einer neuen Restauration im Ort. Ab 1862 durften auch heiße Getränke und Speisen verkauft werden. Zu den mehrfach wechselnden Pächtern gehörte u.a. Carl Christian Donath, welcher später gemeinsam mit seinem Bruder Hermann “Donaths Neue Welt” in Tolkewitz gründete. 1881 übernahm David Wilhelm Wolff das nach dem Vorbesitzer “Heinemann´s Restauration” genannte Lokal und ließ es umbauen und erweitern. In Anlehnung an den Schillergarten auf der gegenüberliegenden Platzseite nannt Wolff sein Restaurant “Goethegarten” und lockte seine Gäste mit “vorzüglichen Speisen und feinen, reinen Weinen” sowie regelmäßigen Konzerten an. 1889 kamen einige Fremdenzimmer hinzu. Die nach Wolffs Tod noch kurze Zeit von seiner Witwe weitergeführte Gastwirtschaft ging 1893 in den Besitz von Emil Ehrler über, welcher das Gebäude abreißen und durch einen repräsentativen Neubau (Foto) ersetzen ließ (Schillerplatz 1-3). Im Erdgeschoss zog wieder eine Gastwirtschaft gleichen Namens ein, im ersten Stock befanden sich mehrere Hotelzimmer. Die gastronomische Tradition des “Goethegartens” wurde auch nach der Zwangsversteigerung des Hauses 1909 fortgesetzt. Obwohl öffentliche Tanzveranstaltungen nicht erlaubt waren, gelang es den Pächtern immer wieder, im Rahmen geschlossener Vereinsfeiern oder Familienfesten dieses behördliche Verbot zu umgehen. Nach dem Ersten Weltkrieg endete der Hotelbetrieb des Goethegartens, die Gaststätte selbst existierte noch bis 1938. Später nutzte viele Jahre die Dresdner Stadtsparkasse die Restaurationsräume. Café Toscana: Das Lokal wurde 1897 vom früheren Besitzer des “Schillergartens” Friedrich Louis Köhler im neu errichteten Geschäftshaus Schillerplatz 7 unmittelbar am Brückenkopf des “Blauen Wunders” eingerichtet und zunächst nur als Kaffeerösterei mit Ausschank bezeichnet. 1901 ist es erstmals als “Café Toscana” in den Adressbüchern eingetragen. Mit der Namensgebung wollten die Inhaber an die sächsische Kronprinzessin Luise von Toscana erinnern, die sich 1904 von ihrem Ehemann Friedrich August III. trennte und mit dem Sprachlehrer ihrer Kinder vom Hof floh. Trotz des Skandals blieb Luise im Volk sehr beliebt und hielt auch später brieflichen Kontakt zu den Cafébetreibern, die ihr alljährlich einen Baumkuchen aus eigener Produktion ins Exil schickten. 1905 übernahm mit Hugo Zimmermann ein Verwandter Köhlers das Café und ließ es wenig später umbauen und erweitern. Unter ihm erwarb sich das “Café Toscana” seinen legendären Ruf für Torten und Süßspeisen und galt schon bald als ein Höhepunkt der Dresdner Kaffeehauskultur. Nicht zuletzt wegen des schönen Ausblicks auf die Elbhänge besuchten zahlreiche Gäste das Haus. Trotz mehrfacher Eigentümerwechsel überstand das Café alle Wirren der Zeit und gehört bis heute zu den beliebtesten Blasewitzer Einkehrstätten. 1945 übernahm Konditormeister Werner Anders, zuvor Inhaber des bekannten Cafés Beyer auf der Wilsdruffer Straße, das “Toscana”, bevor er 1959 in einem inszenierten Prozess wegen angeblicher Unterschlagung von Eiern verurteilt und aus dem Gaststättenbetrieb gedrängt wurde. Fortan führte bis 1989 die HO die Kaffeehaustradition fort. 1992/93 erfolgte eine umfassende Renovierung des Gebäudes und die Wiedereröffnung der Terrasse zum Elbufer. 2016 wurden die Gasträume erneut behutsam umgestaltet. Schillerapotheke: Die Schillerapotheke wurde am 15. August 1896 im Eckhaus Tolkewitzer-/ Reinhold-Becker-Straße eröffnet, 1904 jedoch zur Brucknerstraße 1 verlegt. Erster Besitzer war der Apotheker Robert Paul Wolf, der sie 1937 an seinen Sohn Johannes übergab. Neben dem Arzneimittelverkauf gehörte früher auch ein eigenes pharmazeutisches Laboratorium dazu. Trotz Zerstörung des Gebäudes 1945 konnte der Betrieb auch in der Nachkriegszeit fortgesetzt werden. Am 9. Dezember 1949 wurde die Schillerapotheke als erste Dresdner Apotheke verstaatlicht und in eine Poliklinik- Apotheke umgewandelt. Dr. Johannes Wolf behielt jedoch die Leitung. Nach seinem Tod 1952 übernahm der Apotheker Herbst die Geschäftsführung. Zweigstellen entstanden im Ärztehaus Naumannstraße (ehem. Präsidentenvilla) und in Pillnitz. Im Dezember 1960 erhielt die Schiller-Apotheke neue Geschäftsräume an der Tolkewitzer Straße 2. Ein geplanter Neubau in den 1970er Jahren scheiterte, so dass man sich 1985/86 zu einer Sanierung des Gebäudes und umfassenden Moderniserungsarbeiten entschloss. 1990 kam die Schillerapotheke wieder in Privatbesitz. Seit Ende Januar 2004 hat sie in der Schillergalerie ihr Domizil.

Die Tolkewitzer Straße verband den früheren Blasewitzer Dorfkern mit den östlich gelegenen Nachbargemeinden Tolkewitz und Laubegast. Auf Tolkewitzer Flur trug sie deshalb bis zur Eingemeindung des Ortes 1912 den Namen Blasewitzer Straße. Ab Mitte des 19. Jahrhunderts wurden auch hier repräsentative Villen, später Wohn- und Geschäftshäuser errichtet. So befand sich im Haus Tolkewitzer Straße 53 zeitweise der Sitz der renommierten Pianofortefabrik Rosenkranz, bevor das Unternehmen in die Johannstadt umzog. Später erwarb der Sohn des bekannten Glashütter Uhrenfabrikanten Lange die Villa als Wohnhaus. Zu den Bauherren der zahlreichen Villen im östlichen Teil der Tolkewitzer Straße gehörte der Komponist und Musikkritiker Ludwig Hartmann, an den eine Straße in Neugruna erinnert. Hartmann war ein Schüler von Franz Liszt und wirkte als Pianist und Komponist, später vor allem als Musikkritiker. Durch seine geschickte Geschäftstätigkeit erwarb er mehrere Grundstücke in dieser Gegend und war Eigentümer der Wohnhäuser Tolkewitzer Straße 31 und 34. Er selbst bewohnte bis zu seinem Tod 1910 das Haus Nr. 59, besaß jedoch auch eine Stadtwohnung am Ferdinandplatz. Die Grundstücke in der Nähe des Schillerplatzes wurden ab 1880 im Gegensatz zu den meisten Blasewitzer Straßen mit geschlossenen Häuserfronten bebaut. Bemerkenswert war das Eckhaus Tolkewitzer Straße 1, welches wegen seiner Relieftafeln als “Schillerhaus” bezeichnet wurde, 1945 jedoch den Bomben zum Opfer fiel. Das gleiche Schicksal traf die gegenüberliegende Gebäudegruppe Nr. 8-10, in der u. a. der Bildhauer Bruno Fischer sein Atelier besaß. Fischer ist Schöpfer des Nymphenbrunnens in der Bürgerwiese und weiterer Plastiken und fertigte 1902 auch die Gedenktafel für Johann Gottlieb Naumann am Blasewitzer Rathaus an. Erst nach 1990 wurden die entstandenen Baulücken mit modernen Neubauten geschlossen. Heute befinden sich hier u.a. eine Sparkassenfiliale und ein Seniorenheim. Auf Tolkewitzer Flur sind noch Reste des einstigen Tännichts, eines ausgedehnten Kiefern- und Birkenwäldchens, zu sehen. Ab 1880 wurde das Tännicht für den Bau neuer Wohnsiedlungen und die Anlage des Johannisfriedhofes gerodet. Am Ausgang dieses Friedhofes erinnert heute noch das frühere Forsthaus Tolkewitz an diese Zusammenhänge. Einzelne Gebäude: Nr. 47: Zu den bemerkenswerten Wohnhäusern an der Tolkewitzer Straße gehört die 1895 von Karl Emil Scherz für die pommersche Adelsfamilie von Borcken gebaute Villa Nr. 47. Zeitweise wohnte hier der bekannte Dresdner Galerist Heinrich Kühl. Nr. 49: Die Villa an der Ecke zur Helfenberger Straße ist seit 2014 Logenhaus der Dresdner Freimaurerlogen “Zu den drei Schwertern und Asträa zur grünenden Raute“ und “Zum Goldenen Apfel”. Beide entstanden im 18. Jahrhundert und gehören zu den ältesten noch existierenden Logen in Deutschland. Bis zum Verbot 1933 besaßen die Freimaurer ihr Logenhaus an der Ostra-Allee. Das Gebäude wurde 1944 beim ersten Bombenangriff auf Dresden zerstört und nach 1945 abgerissen. 2014 entdeckte man bei Bauarbeiten zwei in der Nachkriegszeit vergrabene Sphinx-Figuren, die nach ihrer Restaurierung künftig vor der Villa aufgestellt werden sollen. Der Erwerb des neuen Stammhauses konnte durch den Verkaufserlös des früheren Logengrundstücks ermöglicht werden. Die in griechischer Sprache verfasste Inschrift am Portal bedeutet „Erkenne dich selbst“, Leitspruch der Freimaurer. Nr. 57: Ursprünglich befand sich dieses Grundstück im Besitz des sächsischen Kabinettsministers und Geheimen Rats Adolf Magnus von Hoym, dem Ehemann der als Gräfin Cosel bekannt gewordenen Anna Constantia von Brockdorff. Um 1902 entstand hier die Villa Romana, Wohnsitz der Geheimen Rechnungsrats Wilhelm E. Kostrzewski. Nach dem Ersten Weltkrieg wurde das Gebäude von seinen neuen Besitzern umgebaut und erhielt dabei sein späteres Aussehen. Das Haus stellte wegen seiner architektonischen Ausführung ein wichtiges Zeugnis der künstlerischen Entwicklung zwischen Neobarock, Art deco und Neuer Sachlichkeit dar und stand deshalb ab 1990 unter Denkmalschutz. Bemerkenswert war auch die Innenausstattung mit versenkbarer Wand im Wohnzimmer, einer Sandsteintreppe zur Elbseite sowie einem Marmorrelief von Robert Diez im Treppenhaus. Bis zum Ende des Zweiten Weltkriegs bewohnte der Verleger Fritz Schettler, Chefredakteur der “Dresdner Nachrichten” in der Villa. Schettler wurde 1946 in ein sowjetisches Straflager interniert und kam dort ums Leben. 1977 mussten die Besitzer ihr Haus wegen ihrer Ausreise in die Bundesrepublik verkaufen. Neuer Eigentümer war die katholische Kirche, die hier eine Förderwerkstatt der Caritas für behinderte Jugendliche einrichtete. Im Obergeschoss befanden sich Wohnungen für Mitarbeiter des Bistums Dresden-Meißen. 1997 wurde die Villa an den früheren Eigentümer zurückgegeben, der das Haus trotz Denkmalschutzes und Anordnung der Bauaufsicht 2014 illegal abreißen ließ. Zuvor hatte es mehrere ungeklärte Brände im Haus gegeben. Per Gerichtsbeschluss soll die Villa jedoch nach erhaltenen Bauunterlagen im originalen Stil wiederaufgebaut werden. Nr. 92: Ab 1912 hatte der Elfenbeinbildhauer Otto Ernst Richter sein Atelier in diesem Haus. Richter schuf vor allem Blumen- und figürliche Motive und gilt als einer der letzten bedeutenden Meister dieser Kunst. Straßenbahnhof Blasewitz: Der Betriebshof Neugruna (Tolkewitzer Straße 38) wurde 1872 als erster in Dresden im Zusammenhang mit der Eröffnung der Pferdebahnlinie Schlossplatz - Blasewitz am 25. September 1872 eröffnet. Bis zur Einstellung des Pferdebahnbetriebes waren hier über 100 Pferde sowie die zugehörigen Fahrzeuge der Continental - Pferdeeisenbahn - Gesellschaft untergebracht. Mit Elektrifizierung der Bahn wurde der Betriebshof 1893 zum Depot der “Elektrischen” umgewandelt. 1925 entstanden nach Plänen des Stadtbaurates Paul Wolf die noch heute vorhandenen denkmalgeschützten Hallen, welche ab 1936 als zentrales Busdepot der Dresdner Verkehrsbetriebe dienten. Zwischen 1947 und 1975 wurden hier die Fahrzeuge der einzigen Dresdner O-Bus-Linie gewartet und abgestellt. Erst 1997 wurde der Betriebshof geschlossen. Später fanden zeitweise noch Trödelmärkte statt. 2009/10 erfolgte der Umbau der unter Denkmalschutz stehenden Fahrzeughalle zum Einkaufszentrum mit einem Lebensmittelmarkt und kleineren Läden. Außerdem entstanden auf dem Areal einige Stadtvillen. Erhalten blieb auch das villenartige ehemalige Verwaltungsgebäude, welches heute Wohnzwecken dient.

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add_def_ver("v_p_krause","Paul Krause, Dresden","Paul Krause, Dresden, 1901 Ostraallee 19, 1904"+v_adr("duer042","Dürerstr. 42"));

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1885 Ausschankstellen des Münchener Bürger- Bräu: Hotel Grünzig, Wilsdruffer Str. 26

Bergstraße:
Nr. 64 (Gärtnerei Quaasdorf): Der 1911 von Louis Quaasdorf gegründete Gartenbaubetrieb war einer von einst drei Gärtnereien auf Räcknitzer Flur. Während die Gärtnerei Meurer (Bergstraße 51) bereits vor dem Zweiten Weltkrieg aufgegeben wurde, existierten Quaasdorfs Gärtnerei sowie der 1921 gegründete Gartenbaubetrieb Eugen Fiedler noch bis 1951. Nach Kündigung des Pachtvertrages wurden die Flächen der Technischen Universität zugeschlagen, welche hier zunächst Baracken für die Fakultät Bauingenieurwesen errichtete. Heute steht auf dem Grundstück das Hörsaalzentrum der TU.

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Emil & Leopold Erasmus Römmler & Jonas Ort: Dresden Strasse: Pillnitzer Str. 31, später Blasewitzer Straße 27 Filiale: Atelier Emil Römmler Dresden: Halbegasse 13 (1861-1865, anfänglich unter dem Namen des Vaters!); Amalienstr. 13 (1866-1867) Zeitraum: 1871-1945 Atelier: Lithograf: Auszeichnungen: Bemerkungen: Die Emil Römmler (Fotograf) und Erasmus Jonas (Geldgeber und Verwaltungsmann) 1871 gründeten die Kunstdruckanstalt für Lichtdruck und wurden mit dem Titel „Hoffotografen“ bedacht, obwohl Jonas sicher niemals ein Foto gemacht hat. Römmler heiratete Helene Arndt, geb.16. 02. 1842 in Mittweida, und starb 1941. Vater: Fotograf Carl Gottlob Römmler (Chemnitz), Mutter: Wilhelmine geb. Irmscher; Ich Danke Dr. med. Günter Voigt für die Informationen

add_def_ver("v_f_linke","Friedrich Linke, Dresden","Verlag Friedrich Linke, Dresden Striesen, 1901 (Buch-u. Papierwhdlg.) Wittenberger Str. 41");

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Postämter 1920

Postämter 1920

Postämter 1920

Postämter 1920

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1940 Spalte 1 (erledigt bis Eisold, Frieda )

add_def_ver("v_a_haensel","Atelier Hänsel, Lausa");

add_def_ver("v_lissner-brandt","Lissner & Brandt, Dresden","Lissner & Brandt, Dresden N., 1901 Alaunstr. 14");

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Hermann Donath Christian Hermann Donath (* 1833 in Bärenstein zu Annaberg; † 1909 in Lockwitz) war ein Dresdner Fotograf und Maler, der zusammen mit seinem Bruder, Rinaldo Donath (1823–1897) den alten Tolkewitzer Gasthof kaufte und in "Donath's Neue Welt" umwandelte. Die Brüder entwickelten damit ein Konzept eines Ausflugslokals mit vielen Attraktionen, wie z.B.: die künstliche Turmruine mit Storchennest, ein Tiergarten, eine Riesenrutsche, die Märchengrotte, eine Camera obscura und vor allem die künstliche Alpenkulisse mit Alpenglühen und Alpengewitter. Leben und Wirken Christian Hermann Donath wurde 1833 in Bärenstein nahe dem heutigen Annaberg-Buchholz im Erzgebirgskreis geboren. Er erlernte den Beruf eines Drechslers und ging in seinen jugendlichen Wanderjahren bis in die Schweiz. 1855, im Alter von 22 Jahren, heiratete Hermann Donath die Posamentennäherin, Spitzenklöpplerin und Schneiderin Mathilde Wilhelmine Estel aus Stahlberg, heute ein Ortsteil von Bärenstein bei Annaberg-Buchholz. Das Paar hatte acht Kinder, u.a.: Albert Donath (1863–1935), zusammen mit seinem Bruder Emil Begründer der Saftkelterei Donath, der späteren Kelterei Lockwitzgrund, Emil Donath (1868–1945) , Student an der Kunstakademie Dresden und zusammen mit seinem Bruder Albert Begründer der Saftkelterei Donath, Helene (1870–1974), die unverheiratet blieb. Christian Hermann Donath machte sich in seinen Jugendjahren vor allem als Kunstdrechsler und Kunstmaler einen Namen und zog 1875 mit seiner Familie nach Laubegast, wo er in den Gaststättenbetrieb seines Bruders Rinaldo einstieg. Hermann Donath wohnte im Haus Nummer 5 in der damaligen Hauptstraße von Laubegast, der späteren Österreicher Straße , nach der 1921 erfolgten Eingemeindung von Laubegast nach Dresden. Die Donathstraße in den Ortsteilen Tolkewitz und Laubegast erinnert an die beiden Brüder Hermann und Rinaldo Donath.

add_def_ver("v_e_loeber","Eugen Loeber, Dresden","Verlag Eugen Loeber, Dresden, Ritterstr. 12");

Die Amerikanische Kirche wurde 1883 im Auftrag der Stiftung “American Church of St. John in the City of Dresden” am Reichsplatz errichtet und ein Jahr später am Ersten Weihnachtsfeiertag eingeweiht. Diese Stiftung war am Ostersonntag 1869 gegründet worden, um für die zahlreichen in Dresden lebenden Amerikaner eine Andachtsstätte zu schaffen. Zunächst fanden die Gottesdienste der zur Protestantischen Episcopalkirche der USA gehörenden Gemeinde in der alten Waisenhauskirche statt. Architekt des neogotischen Baus war Friedrich Wilhelm Dögel. Die Glasfenster stammten von Anton Dietrich und wurden vom Dresdner Glasgestalter Bruno Urban hergestellt. Die Kirche bestand aus einem dreischiffigen Langhaus, einem kleineren Querschiff und dem angrenzenden Chor sowie einem vorgesetzten Turm. Unmittelbar neben der Kirche befand sich das Gemeindehaus. 1945 wurde die Amerikanische Kirche schwer beschädigt und brannte aus. Erhalten blieb neben den Außenmauern auch der Turm, weshalb man 1953 den Wiederaufbau der Ruine für die Evangelisch-Reformierte Gemeinde plante. Nachdem diese jedoch neue Räume in der früheren Hofgärtnerei an der Brühlschen Terrasse bezogen hatte, wurde ein Ausbau für die Studentengemeinde erwogen. Gegen diese Planungen legte das Stadtplanungsamt unter Hans Bronder Widerspruch ein, da sich mit der Russischen Kirche und der Lukaskirche bereits zwei Gotteshäuser in unmittelbarer Nähe befanden und man in der Nähe der Technischen Universität keine weiteren kirchlichen Bauten wünschte. Die gut erhaltene Ruine der Amerikanischen Kirche wurde daraufhin Ende 1959 gesprengt. Das Grundstück sollte später für das geplante Auditorium Maximum bzw. einen Bibliotheksneubau der TU genutzt werden, blieb jedoch bis heute unbebaut.

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Die Salzburger Straße war in früheren Zeiten ein Kommunikationsweg zwischen Dobritz und Laubegast. Er führt durch ein Gebiet, welches bei Hochwasser überflutet war. Das war ein alter Elbarm, der bei Tolkewitz wieder in die Elbe mündet. Auf diesem letzten Stück befindet sich heute noch der Niedersedlitzer Flutgraben. In Dobritz war es früher die Laubegaster Straße, in Laubegast die Dobritzer Straße. In Dobritz taucht der Name Laubegaster Straße bereits in einer Akte von 1899 auf. Vorher war es der Laubegaster Weg. Mit Beschluss vom 19. Februar 1926 wurde die Dobritzer Straße in Laubegast in Salzburger Straße umbenannt (die Dobritzer Straße gab es bereits in Seidnitz). 1927 wurde beschlossen, die Salzburger Straße bis nach Dobritz zu verlängern (also Umbenennung der Laubegaster Straße in Dobritz) . Nr. 17 und 19: Mehrfamilienhäuser (Kulturdenkmale) der sog. Siedlung Frauendank, Entwurf Architekturbüro Schilling (vormals Schilling & Graebner), um 1926 Nr. 38: VEB „Dresdner Milchwerke“ (als Werk II und Hauptadresse, auch Würzburger Straße 9, Werk I und Werk Mohorn) Nr. 80: KGV „Salzburger Straße e.V.“, seit 1927 mit 269 Gärten und ein Vereinsheim „Grünes Wohnzimmer“ mit ca. 80 Plätzen

add_def_ver("v_on_lohse","Otto Lohse Nachf, Plauen","Verlag von Otto Lohse Nachf., Inh. Hermann Pfeiffer, Plauen- Dresden, 1901 Chemnitzerstr. 43 u. Falkenstr. 40");

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add_def_ver("v_a_riedrich","A. Riedrich, Dresden","Alfred Riedrich, Dresden);

add_def_ver("v_r_lorenz","Rich. Lorenz, Bühlau","Richard Lorenz, Bühlau, 1911 Bautzner Str. 9");

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Ockerwitzer Allee 128: Vor etwa 220 Jahren gab es in Pennrich Hauslehrer, die mit einem geringen Gehalt in Form von Naturalien (Essen) bezahlt wurden. Seit 1790 bilden Gompitz und Pennrich ein gemeinsames Schulwesen. Im kleinen Häuschen Pennrich Nr. 1 unterrichteten die Lehrer Oßwald, Fraas, Pilz und Walter. 1879 wurde ein neues Schulhaus erbaut. Die Kinderzahl nahm rasch zu, da viele Gärtner in Gompitz ansiedelten. Gompitz erhielt 1901 die Genehmigung zur Gründung einer eigenen Schulgemeinde. Am 21. April 1902 erfolgte die Einweihung der Schule. 10 Jahre lang stand Oberlehrer Robert Glöckner der neuen Schule vor. Es gab 2 Klassen, später auch 4 Klassen (wie heute).

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add_def_ver("v_r_ludwig","Richard Ludwig, Trachau","Richard Ludwig, Trachau, 1910 Buch- u. Papierhdlg, Leipziger Str. 155");

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Fotograf: Julius Bethge Ort: Dresden Strasse: Bautznerstr. 75 Filiale: New Orleans: 157 Poydras Street Zeitraum: 1883 - 1885

1940 Spalte 2 (erledigt bis Hajek, Friedrich)

add_def_ver("v_p_lust","Paul Lust, Plauen","Verlag Paul Lust, Plauen- Dresden, 1902 Coschützer Str. 5");

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Carl Theodor von Götz selbst ist erstmals 1852 im Adressbuch von Dresden als Oberleutnant in der Lüttichaustraße 20 verzeichnet

Güntzstraße:
Nr. 30/32: In diesem nach dem Ersten Weltkrieg abgebrochenen Haus hatte einst der Bildhauer Ernst Hähnel sein Atelier. Dieses übernahm später Johannes Schilling, der hier zahlreiche seiner Werke schuf und am 17. September 1882 sogar Kaiser Wilhelm I. zur Besichtigung seines Entwurfs für das Niederwalddenkmal begrüßen durfte. Nach dem Abriss entstand auf dem Grundstück ein Neubau für die Landesversicherungsanstalt, welcher 1945 den Bomben zum Opfer fiel. add_def_ver("v_o_manegold","Otto Manegold, Blasewitz","Verlag Otto Manegold, Blasewitz, 1905 Tolkewitzer Str. 43");

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Schokoladenfabrik Petzold und Aulhorn Fabrikationsgebäude um 1860 auf der Falkenstraße Situationsplan der Fabrik um 1865 auf der Falkenstraße Fabrikneubau um 1900 auf der Bienertstraße In Gemeinschaft mit dem Konditor Carl Christian Petzold gründete Kaufmann Ernst Louis Aulhorn die Schokoladen- und Zuckerwarenfabrik "C.C. Petzold & Aulhorn" im Jahre 1843. Der rasch an Bedeutung gelangenden Fabrik wurden die ursprünglichen Geschäftsräume in Dresden "Am See No. 10" zu klein. Am 22. September 1855 wurde das Fabrikgrundstück Falkenstraße 49 (später Zwickauer Str. 22) von den Sippel'schen Erben erworben. Es handelte sich um ein Mühlengelände am ehemaligen Weißeritzmühlgraben unterhalb des Feldschlösschens. Mit Vergrößerung der Fabrikationsstätte wurde auch eine eigene Zuckerraffinerie eingerichtet. Am 12. Juli 1860 kaufte man das Hausgrundstück Wilsdruffer Straße Nr. 7 (später Nr. 9) in Dresden. Die Fabrik gründete weitere Zweiggeschäfte in Berlin, Leipzig, Breslau, Nürnberg, Chemnitz und Frankfurt/M.. Als eine der ersten Schokoladenfabriken ihrer Art wurde sie in ganz Deutschland bekannt. Um 1896 gab es drei Detailgeschäfte in Dresden auf der Wilsdruffer Straße 9, Hauptstraße 2 und Bautzner Straße 41. Nach Auflassung und Ankauf von Flächen des ehemaligen Reisewitzer Parkes in Plauen bei Dresden konnte sich um 1897/1898 die Fabrik mit einem neuen und größeren Betriebsgelände auf der Bienertstraße 1 niederlassen. Die Firma verkaufte ihre Schokoladen unter anderem mit dem Markennamen "Pea". Während des II. Weltkrieges wurde das Gelände durch Bombenangiffe stark zerstört. Nach Kriegsende erfolgte ein teilweiser Wiederaufbau des Eckgebäudes an der Tharandter Straße/Bienertstraße, überwiegend nur einstöckig als Fabrikationsgebäude des VEB Galvano Dresden (später auch durch Kombinat Pumpen und Verdichter Halle, Außenstelle Dresden, genutzt). Nach dem Ende des zweiten Weltkrieges 1945 siedelte Petzold & Aulhorn nach Hamburg um. In den 90er Jahren des 20. Jahrhunderts wurde die Firma von Barry Callebaut übernommen. Die Marke "Pea" wurde von einem Unternehmen in Veitshöchheim weitergeführt und besteht bis heute unter dem Namen "Pea Süsswaren GmbH".

Carl Theodor von Götz: Von Götz zog als Major in den Deutsch-Französischen Krieg 1870/71 und wurde danach zum Oberstleutnant befördert. Nach dem Krieg wurde er in den vorläufigen Ruhestand versetzt und zog in Dresden in die Christianstraße 24.

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Heinrich Vogel Die Schokoladenfabrik "Hartwig & Vogel AG" in der Freiberger Straße um 1925 "Hartwig & Vogel AG", Sammelbild, Tell Cacao "Hartwig & Vogel" AG, Sammelbild, Tell Chocolade Christoph Friedrich Heinrich Vogel (* 31. Oktober 1844 in Herreth/ Bayern; † 11. Juni 1911 in Dresden) war ein deutscher Unternehmer, Mitinhaber der Dresdner Schokoladenfabrik "Hartwig & Vogel", zuletzt mit Titel eines königlich-sächsischen Geheimen Kommerzienrates. Er war mit seiner Firma Hoflieferant des sächsischen Königshauses sowie des bayrischen Herzogs. Heinrich Vogel kam 1869 nach Dresden und ist erstmals im Dresdner Adressbuch von 1870 als Kaufmann aufgeführt. Er wohnte anfangs in der Zwingerstraße 3. Noch 1870 zog er in den Rosenweg 64 und wurde Teilhaber der Firma "Hartwig & Vogel". 1882 ist er neben Carl Ernst Vogel als Mitinhaber der Schokoladenfirma aufgeführt, mittlerweile war Heinrich Vogel Hausbesitzer des Hauses in der Rosenstraße 32, wo er auch wohnte. Ein Jahr später eröffnete Vogel zwei weitere Filialen in der Altstadt am Altmarkt 24 und in der Neustadt in der Hauptstraße 13, ab dem 1. April 1890 dann in der Hauptstraße 26. 1891 zog Vogel privat in die Bergstraße 39, wo er mit seiner Familie bis zuletzt in einer geräumigen herrschaftlichen Villa im Erd- sowie im ersten Obergeschoss wohnte. Er beließ aber die Schokoladenfabrikation in der Rosenstraße 32. 1898 wurde Vogel zum königlich-sächsischen Kommerzienrat ernannt. 1905 eröffnete er eine dritte Filiale in Löbtau in der Hainsberger Straße 9. Ein Jahr später wurde seine Firma "Hartwig & Vogel" Hoflieferant des sächsischen Königs Friedrich August III., 1907 dann zusätzlich herzoglich-bayrischer Hoflieferant. Sehr bekannt waren u.a. die "Tell-Chocolade" und der "Tell-Cacao". 1910, ein Jahr vor seinem Tod wurde Vogel vom sächsischen König noch der Titel eines "Geheimen Kommerzienrates" verliehen. Vogel wurde auf dem Johannisfriedhof in Tolkewitz beerdigt. Nach seinem Tod wohnten Vogels Witwe Agnes weiter in der Villa "Vogel" in der Bergstraße sowie der Gärtner Paul Goldberg und der Kutscher Reinhold Heinzelmann.

add_def_ver("v_c_martens","C. Martens, Dresden","Verlag C. Martens, Dresden- N., 1910 Lößnitzstr. 17, 2.HG");

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Otto Rüger ehemalige Schokoladenfabrik Rüger im Lockwitzgrund Firmenansicht anno 1893 Otto Rüger's Schokoladenfabrik im Lockwitzgrund (ehemalige Lobeck'sche Mühle), die spätere "Obere Fabrik" am Fußweg nach Sobrigau Conrad Otto Rüger, auch Konrad Otto Rüger (* 9. Juli 1831 in Dresden, † 20. August 1905 ebenda) , war ein königlich-sächsischer Kommerzienrat, Fabrikbesitzer und Schokoladenfabrikant im Lockwitzgrund. Außerdem förderte er mit seinem Engagement den Bau der Lockwitztalbahn, der ehemaligen Linie 31 der späteren Dresdner Verkehrsbetriebe. Otto Rüger entstammte der Familie Rüger mit dem Stammvater Egidius Rüger (1553–1610). Sein Großvater war der königlich-sächsische Regierungssekretär zu Dresden und deutsche Numismatiker Carl Conrad Rüger (1747–1807). Rüger wurde 1831 als zweiter Sohn des königlich-sächsischen Hauptmanns der Artillerie, Johann Conrad Wilhelm Rüger (1788–1838) und dessen Ehefrau, Wilhelmine Theodore Leonhardi (1804–1875), der Tochter des königlich-sächsischen Oberst der Artillerie und Grundsteuer-Vermessungsdirektors, Gottfried Wilhelm Leonhardi (1779–1867) geboren. Die Familie wohnte zu dieser Zeit am Kohlmarkt 20 in der Neustadt. Otto Rüger hatte noch vier Geschwister: Conrad Robert Rüger (1829–1899), kaiserlicher Reichsgerichtsrat in Leipzig, Conrad Hermann Rüger (1833–1899), königlich-sächsischer Oberamtsrichter in Dresden, Clara Wilhelmine Rüger (1835–1911) und Conrad Wilhelm Rüger (1837–1916), Jurist, späterer Bürgermeister von Dresden, sächsischer Justiz- und Finanzminister sowie Vorsitzender des Gesamtministeriums von Sachsen. Am 9. Juli 1859 heiratete Otto Rüger Amalie Luise geb. Uhlich (* 7. März 1837 in Bautzen; † 8. Oktober 1900 in Dresden), Tochter des Kaufmanns Karl Heinrich Eduard Uhlich (1797–1872) und dessen Ehefrau Johanna Christiane Henriette geb. Rudolph (1803–1884). Das Ehepaar Rüger wohnte in Sobrigau und hatten sieben Kinder: Johannes Conrad Rüger (* 10. Mai 1860 in Sobrigau), Schokoladenfabrikant in Bodenbach Amalie Hermine Rüger (* 13. Juli 1862 in Sobrigau), Conrad Max Rüger (* 7. November 1863 in Sobrigau; † 1. Februar 1944 in Dresden), königlich-sächsischer Kommerzienrat, Fabrikbesitzer und Schokoladenfabrikant. Conrad Georg Rüger (* 29. November 1864 in Sobrigau; † 17. August 1935 in Dresden-Lockwitz), Fabrikbesitzer 8 1895 Hermine Maria geb. Janitsch (1876–1950) Conrad Alexander Rüger (* 10. November 1867 in Sobrigau; † 9. September 1918), Fabrikbesitzer und Schokoladenfabrikant. Hermine Frieda Rüger (* 7. März 1870 in Sobrigau; † 26. Mai 1946 in Dresden). Sie heiratete in zweiter Ehe den Geheimen Regierungsrat und Präsidenten des Sächsischen Roten Kreuzes, Egon von Bose (1864–1939). Henriette Wilhelmine Elisabeth Rüger (* 14. Februar 1873 in Sobrigau). Rügers Frau gründete 1893 die Kinderbewahranstalt in Lockwitz, Am Wehr (nach ihrem Tod "Amalie-Rüger-Gedächtnis-Stiftung"). Ab 1898 wohnten sie in Dresden-Südvorstadt, Lukasstraße 6, II. Otto Rüger besichtigte 1857 erstmals die Kakaomühle des Fabrikbesitzers Ferdinand Lobeck im Lockwitzgrund bei Sobrigau und war von der Schokoladenherstellung sofort angetan. Nachdem Rüger Lobeck mehrmals besuchte und bei der Fabrikation half, pachtete er schließlich selbst die Mühle und die Fabrik am 3. Juli 1858. Dies galt später als Gründungstag der "Schokoladenfabrik Otto Rüger". Er kaufte das Anwesen im Oktober 1859 für 1.300 Taler von Lobecks Sohn, August Friedrich ab und erst am 15. April 1860 firmierte der Betrieb unter Rügers Namen. Ab 1860 ließ Rüger zum Transport seiner Waren die Lockwitztalstraße ausbauen und befestigen. Außerdem setzte er sich mehrmals für den Bau einer Eisenbahnlinie im Lockwitztal ein, so 1879/80 nach Dippoldiswalde bzw. 1887/88 nach Altenberg, deren Vorhaben jedoch beide scheiterten. 1877 war Rüger Mitbegründer des Verbandes deutscher Schokoladenfabrikanten, dessen Vorsitzender er ab 1881 wurde. Dieses Amt hatte er 16 Jahre, bis 1897 inne. Weiterhin war Rüger am 11. Oktober 1892 als Vorsitzender des Genossenschaftsverbandes auf der Jahresversammlung der Nahrungsmittel-Berufsgenossenschaft in Posen (heute Poznan/ Polen) vertreten. 1883, zum 25-jährigen Betriebsjubiläum besuchte der sächsische König Albert die Rügersche Fabrik, der ihm auch 1890 den Titel eines königlich-sächsischen Kommerzienrates verlieh. Rüger war nicht nur königlicher-sächsischer Hoflieferant sondern nach der Eröffnung eines weiteren Werkes 1896 in Bodenbach (heute Decín/ Tschechische Republik) ebenfalls K.u.K. Hoflieferant für den kaiserlichen Hof in Wien. Zu diesem Zeitpunkt war Rüger einer der größten Schokoladenfabrikanten im deutschen Kaiserreich. 1885 kaufte Otto Rüger die Hintermühle in Lockwitz und eröffnete dort einen weiteren Zweigbetrieb für seine Kakaoproduktion. Begann er 1858 mit fünf Arbeitern im damals verarmten Gebiet um Kreischa, so hatte Rüger 1875 bereits 200 Mitarbeiter. Zum 30-jährigen Betriebsjubiläum, 1888 eröffnete Rüger auch eine Invaliditäts- und Altersversorgungskasse für seine Arbeiter mit einem Grundkapital von 18.000 Mark. Wie seine Ehefrau kümmerte sich auch Otto Rüger um soziale Belange seiner Belegschaft. Gegen Ende des 19. Jahrhunderts zog sich Otto Rüger aus dem Tagesgeschäft seines Unternehmens zurück und übergab die Leitung des Betriebes an seine Söhne Conrad Max und Conrad Alexander. Rügers Söhne schufen schließlich mit der Werbefigur "Hansi" eine nicht nur in Sachsen, sondern in ganz Deutschland bekannte Schokoladenmarke, die auch in andere Länder Europas sowie in die Vereinigten Staaten von Amerika exportiert wurde. 1898 trat Rüger in den "Verein für Geschichte Dresdens" ein, dem Herausgeber der Dresdner Geschichtsblätter. Otto Rüger selbst war weiterhin, vor allem ab 1895 mit dem Ingenieur Oskar Ludwig Kummer (1848–1912) aktiv, um im Lockwitztal eine elektrische Bahn zu bauen, die den umliegenden Gemeinden einen weiteren wirtschaftlichen Aufschwung geben sollte. Nach dem 1901 erfolgten Konkurs von Kummers AG Elektrizitätswerke (aus denen später das Sachsenwerk hervor ging), unterstützte Rüger eine Petition der Lockwitztalgemeinden vom 16. Dezember 1903 an die II. Kammer des sächsischen Landtags zum Bau einer elektrischen Vorortbahn. Zu dieser Zeit wurden auf der Lockwitztalstraße jährlich etwa 30.000 Personen und 950 Tonnen Güter, vor allem aus der Rügerschen Fabrik, mit Postkutschen befördert. Am 11. Juli 1904 kam es zu einer Versammlung im Kreischaer Gasthof "Erbgericht", wo ein Aktionskomitee zum Bau der Vorortbahn gebildet wurde, dem auch Otto Rüger angehörte. Rüger stiftete auf der ersten Sitzung des Komitees am 20. Juli 1904, genauso wie auch der königlich-sächsische Sanitätsrat Dr. F. Bartels, dem das Sanatorium in Kreischa gehörte, sofort 3.000 Mark. Am 15. November 1904 wurde schließlich aus den Gemeinden Kreischa, Lockwitz, Sobrigau, Gombsen, Lungkwitz, Niedersedlitz und Saida/Wittgensdorf der "Gemeindeverband der elektrischen Straßenbahn Niedersedlitz–Lockwitz–Kreischa" gegründet, in dessen Vorstand auch Rüger gewählt wurde. Otto Rüger erlebte den Bau und die Fertigstellung der Lockwitztalbahn nicht mehr. Der erste Spatenstich fand vier Tage nach seinem Tod, am 24. August 1905 statt. Bei der Eröffnungsfeier der Bahn nach nur sechs Monaten am 22. Februar 1906 in Kreischa, auf der Dr. Bartels die Festrede hielt, würdigte dieser in Gegenwart des damaligen königlich-sächsischen Kommissars für elektrische Bahnen und späteren Generaldirektors der Königlich-Sächsischen Staatseisenbahn, Richard Ulbricht (1849–1923) auch den langjährigen Förderer der Bahn, Otto Rüger. Otto Rüger wohnte zuletzt in der Lukasstraße 6 in Dresden und wurde auf dem Leubnitzer Friedhof begraben.

add_def_ver("v_o_martin","Otto Martin, Dresden","Verlag Otto Martin, Phot. Dresden- Löbtau, 1913 Reisewitzer Straße 18");

Gebr. Hörmann AG „Keksfabrik“, von Süden gesehen Briefkopf um 1930 Grabstätte Kaditz Im Jahre 1895 gründeten die Brüder Robert Leo Hörmann (1870–1907) und Max Ludwig Hörmann (1866–1919) auf der Dresdner Liliengasse die einst größte Waffelfabrik Deutschlands. Sie produzierten zunächst mit einigen Bäckern Leb- und Honigkuchen sowie Konditoreiwaren. Im Jahre 1897 verlagerten sie ihre Firma in die damalige Vorortgemeinde Mickten. Dort produzierten die Gebrüder Hörmann 1898 erstmals in Deutschland industriell Russisch Brot. Kurz vor Ausbruch des Ersten Weltkrieges waren bei „Hörmanns“ – seit 1911 firmierten sie als Gebrüder Hörmann AG – etwa 500 Arbeiter beschäftigt. Im Karree Kötzschenbroder, Trachauer und Sternstraße im 1903 nach Dresden eingemeindeten Mickten entstand in den Folgejahren die bedeutendste Waffelbäckerei Deutschlands. Verschiedene Jahreszahlen (etwa 1906, 1909, 1916) an den einzelnen Gebäudeteilen erinnern noch heute daran, dass die Hörmann-Brüder ihre Fabrikanlage stetig erweiterten. Hier wurden gefragte Waffeln und Biskuits mit diversen Füllungen hergestellt und weltweit verkauft. Bekannt waren vor allem die „Alpenstern“-Waffeln. Max Ludwig Hörmann, damals Direktor der „Gebrüder Hörmann AG“, ließ sich kurz vor Beginn des Ersten Weltkrieges an der Trachauer Wilder-Mann-Straße 29 die geräumige Hörmann-Villa bauen. Auf dem sogenannten Franzosenfriedhof Kaditz an der Serkowitzer Straße befindet sich die repräsentative Jugendstil-Grabstätte der Familie Hörmann. Nach dem Ende des Zweiten Weltkrieges war die große Hörmann-Fabrikanlage u. a. der Hauptsitz des VEB Dauerbackwaren Dresden, dessen angestrebte Privatisierung 1992 scheiterte.

add_def_ver("v_a_matthes","A. Matthes, Weisser Hirsch","Verlag A. Matthes, Weisser Hirsch, 1900 Alma Matthes, Weißwgesch. Bautznerstr. 41");

Das Unternehmen wurde 1868 von dem in Dresden geborenen Bruno Naumann (1844-1903) auf der Langen Gasse (heute Zinzendorfstraße) gegründet. Naumann hatte den Beruf eines Feinmechanikers erlernt und ließ sich nach mehreren Wanderjahren wieder in Dresden nieder. Da sich seine “Werkstatt für Maschinenschlosserei” gut entwickelte, wurde der Betrieb wenig später zur Kleinen Plauenschen Gasse, dann auf die Ammonstraße verlegt. Doch auch hier reichte der zur Verfügung stehende Platz schon bald nicht mehr aus, so dass sich Naumann zum Erwerb eines Grundstücks in der Friedrichstadt entschloss. Gemeinsam mit seinem Geschäftspartner Emil Seidel ließ sich Bruno Naumann einen großzügigen Werkskomplex an der Hamburger Straße 19 errichten, in dem 1884 die ersten Nähmaschinen, zunächst noch in Lizenzfertigung von Singer, entstanden. 1887 erweiterte das Unternehmen sein Profil und stellte nun auch Fahrräder der Marke “Germania” her. Ab 1899 konzentrierte man sich auf den Bau von Schreibmaschinen nach amerikanischem Patent. Nach dem Tod des Firmengründers 1903 wurde das Unternehmen von den Nachfolgern unter dem Traditionsnamen Seidel & Naumann fortgeführt und gehörte bis 1945 zu den wichtigsten Dresdner Großbetrieben. 1910 liefen erstmals die später international berühmten Schreibmaschinen der Marke “Erika” vom Band. Zu diesem Zeitpunkt waren über 2700 Beschäftigte im Werk angestellt, welches über eine eigene Krankenkasse, Betriebskantine und verschiedene soziale Einrichtungen verfügte. Der beim Luftangriff am 7. April 1945 schwer beschädigte Betrieb fiel 1946 unter die Enteignungsbestimmungen und wurde zwei Jahre später mit der Clemens Müller AG zu den Mechanik Schreibmaschinenwerke Dresden zusamengeschlossen. Ab 1951 firmierte das Werk unter dem Namen VEB Schreibmaschinenwerk Dresden. In der seit 1980 zum Kombinat Robotron gehörenden Firma wurden noch bis 1990 Schreib- und Rechenmaschinen hergestellt. Nach Abwicklung des Unternehmens durch die Treuhand verkaufte diese das Areal an einen Investor, der 1992/93 mit dem Abriss und der Rekonstruktion einiger Gebäude begann (Foto). Später befand sich hier bis 2010 das Technisches Rathaus mit Sitz des Stadtplanungsamtes und der Bauverwaltung (u. a. Hochbauamt, Vermessungs- und Katasteramt). Künftig sollen die Büroräume an private Interessenten vermietet werden. An der Fassade erinnert eine Gedenktafel an die 59 Betriebsangehörigen und Zwangsarbeiter, welche beim Bombenangriff 1945 ums Leben kamen.

Die Firma Jordan & Timaeus war eine der ersten Schokoladenfabriken in Sachsen. Sie wurde als Chocoladen- und Cichorienfabrik Jordan & Timaeus im Jahr 1823 von Gottfried Jordan (1791–1860) und August Friedrich Timaeus (1794-1875) gegründet. Geradezu exemplarisch steht sie dabei mit ihrer Entwicklung von der Manufaktur (mit der ersten gewerblich genutzten Dampfmaschine 1828 ) in der Gründerzeit zum Industriebetrieb. Im Jahr 1839 wurde hier die erste »Milchschokolade zu 1 Thaler per Pfund« entwickelt .

Erste Pläne für den Bau eines Dresdner Zentralbahnhofes kamen bereits in der Mitte des 19. Jahrhunderts auf. Der sächsische Vermessungsingenieur Karl Friedrich Preßler entwarf damals ein neues Verkehrskonzept für Dresden, welches die Zusammenlegung der einzelnen Bahnhöfe, die kreuzungsfreie Verlegung der Gleisanlagen auf einen Hochdamm sowie den Bau eines Elbhafens in der Friedrichstadt vorsah. Dieses Konzept wurde schließlich ab 1890 mit einigen Veränderungen in die Realität umgesetzt. Allerdings entschloss man sich, statt eines Hauptbahnhofes in der Friedrichstadt lediglich einen Güter- und Rangierbahnhof anzulegen sowie die Eisenbahnwerkstätten hier zu konzentrieren. Bereits 1875 war an Stelle des heutigen Rangierbahnhofes Friedrichstadt der Berliner Bahnhof einer privaten Eisenbahngesellschaft entstanden. Hier begannen und endeten die Fernzüge nach Berlin. Nachdem die Bahn wenige Jahre später vom sächsischen Staat übernommen worden war, begann eine umfassende Umgestaltung des Areals. Der ehemalige Personenbahnhof wurde zum Haltepunkt Friedrichstadt, da alle Fernzüge nun bis zum Hauptbahnhof geleitet wurden. Heute wird die Station an der Waltherstraße nur noch von der S-Bahn genutzt Unter Verwendung von Abraummaterial, welches beim Bau des Hafenbeckens des Alberthafens gewonnen worden war, ließ die sächsische Staatsbahn zwischen 1890 und 1893 einen 17 m hohen Ablaufberg anschütten, der unter Nutzung des natürlichen Gefälles dem Rangierbetrieb diente. Der Berg ist 2,5 km lang und verfügt über fünf Ablaufgleise mit einem Gefälle von 1:100. Die feierliche Einweihung des Rangierbahnhofes fand am 1. Mai 1894 statt. Zwischen 1924 und 1935 er folgten umfangreiche Modernisierungsmaßnahmen an den Bahnanlagen. U.a. entstand zum automatischen Abbremsen der Waggons eine Seilzuganlage am Ablaufberg. Hinzu kamen moderne Gleisbremsen und Standschutzgleise, um unkontrolliert abrollende Wagen rechtzeitig aufhalten zu können. Außerdem wurden die mechanischen durch elektromechanische Stellwerke ersetzt. Schwere Schäden richtete der Bombenangriff vom 17. April 1945 an, bei dem große Teile des Bahnhofes in Mitleidenschaft gezogen wurden (Foto). Der zunächst provisorisch wieder aufgenommene Rangierbetrieb konnte erst 1947 wieder unter Nutzung des reparierten Ablaufberges erfolgen. Weitere Verbesserungen brachte der Bau von drei modernen Gleisbildstellwerken ab 1964, die Einführung des elektrischen Zugbetriebes 1966 und die Einführung des Funksprechverkehrs. Moderne Weichenheizungen und der Umbau einiger Gleisanlagen erhöhten zusätzlich die Effektivität des Bahnhofes. In Spitzenzeiten konnten nun bis zu 5000 Güterwaggons am Tag abgefertigt werden. Für die Angestellten des größten Rangierbahnhofes der DDR entstanden verschiedene Sozialgebäude, eine Poliklinik am Emerich-Ambros-Ufer, ein Betriebskindergarten und Wohnheime. Nach der Wende reduzierte sich das Verkehrsaufkommen des Rangierbahnhofes Friedrichstadt deutlich. Um den veränderten Transportwegen gerecht zu werden, entschloss sich die Deutsche Bahn zum Bau eines neuen Güterverkehrszentrums, welches als Schnittstelle zwischen Schienen- und Straßenverkehr fungieren soll (Foto) . Dafür entstanden ein Terminal für den Kombinierten Ladungsverkehr und ein Stückgut-Frachtzentrum. Eine Novität war die 1994 zur Entlastung der Bundesstraße 170 eingeführte, inzwischen jedoch wieder eingestellte “rollende Landstraße” nach Lobosice in der Tschechischen Republik. Dabei wurden Lkws samt ihrer Ladung auf spezielle Transportwagen verladen und per Schiene zum Zielbahnhof transportiert. Seit 1998/99 hat hier auch das Logistikzentrum der Gläsernen VW-Manufaktur sein Domizil. Die vorgefertigten Bauteile werden per Güterstraßenbahn direkt zur Endmontage am Straßburger Platz gebracht. Eisenbahnwerkstätten (RAW Dresden-Friedrichstadt): Gleichzeitig mit dem Bahnhofsbau begann die Errichtung eines großen Werkstättenbahnhofes der Sächsischen Staatsbahn, welcher fast das gesamte Gelände zwischen Weißeritzufer und Rangierbahnhof einnahm. Die Arbeiten begannen am 6. September 1890 und waren im November 1894 abgeschlossen. Neben ausgedehnten Gleisanlagen entstanden große Richthallen, Schmiede, Lagerräume, Dienst- und Verwaltungsgebäude sowie mehrere Wohngebäude. 1894 konnten am Weißeritzufer (Emerich-Ambros- Ufer 54-72) fünf Eisenbahnerwohnhäuser bezogen werden. Wenig später folgten drei kleinere Gebäude in der Nähe der Straßenunterführung am Flügelweg sowie die Wohnhäuser Flügelweg Nr. 1-8. Die zum Teil mit Klinkerfassaden versehenen Gebäude sind bis heute im wesentlichen erhalten geblieben und stellen ein interessantes Zeugnis der Eisenbahn- und Sozialgeschichte dar. Nach dem Ersten Weltkrieg wurden auf dem Gelände des zur Deutschen Reichsbahn gehörenden Ausbesserungswerkes weitere Hallen gebaut. Nach Ausgliederung der Personen- und Güterwageninstandsetzung entstand 1935 ein neues Werk an der Hamburger Straße. Dieser Betrieb, offiziell als Bahnbetriebswerk Dresden bezeichnet, widmete sich vorrangig der Reparatur von Lokomotiven und Personenwagen. Zu den bis heute erhaltenen Bauwerken gehören das dreigeschossige Verwaltungsgebäude an der Hamburger Straße, eine 100 x 130 Meter große Werkhalle und einige Nebengebäude. 1945 zerstörten Bomben Teile des Areals, welches jedoch in der Nachkriegszeit wieder in Betrieb genommen werden konnte. Am Haupteingang erinnerte bis 2009 die historische Dampflokomotive 91 896 (Foto) an die Eisenbahngeschichte der Friedrichstadt. Heute befindet sie sich im sächsischen Eisenbahnmuseum Chemnitz-Hilbersdorf.

Die Chocoladen- und Cakaofabrik Ferdinand Lobeck & Co. befand sich zunächst als Mühle im Lockwitzgrund (1838 ) und siedelte im Jahr 1862 in die damalige Dresdnerstraße 19-22 (später Nr. 63-71) nach Löbtau um.

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Das Schusterhaus entstand um 1890 in der Nähe der neuen Weißeritzmündung an der Hamburger Straße 65. Beim Bau wurden dabei Spuren einer steinzeitlichen Siedlung entdeckt. Am 31. Juli 1897 zerstörte das große Weißeritzhochwasser das Gebäude fast völlig. Bereits kurze Zeit später begann der Wiederaufbau des Schusterhauses im neobarocken Stil als Concert- und Balletablissement (Foto). Im Erdgeschoss befanden sich die Restaurationsräume sowie das Bräustübel im bayrischen Stil, im Hintergebäude der Ballsaal mit zwei Seitenschiffen. Bis zum Beginn des Ersten Weltkrieges gehörte die Großgaststätte mit ihrem 2000 Besucher fassenden Saal zu den wichtigsten Vergnügungslokalen im Dresdner Westen. Während der Kriegsjahre musste der Gaststättenbetrieb vorübergehend eingestellt werden, da das Schusterhaus nun industriellen Zwecken bzw. als Lazarett diente. In den Zwanziger Jahren gelang es den Besitzern, an die Traditionen der Vorkriegszeit anzuknüpfen. Regelmäßig fanden wieder Tanzveranstaltungen, Sommerfeste und Varietéaufführungen im Schusterhaus statt. Ab 1940 wurden die Räume als Sammellager der Wehrmacht zweckentfremdet. Im März 1945 wurde das Gebäude bei einem Luftangriff schwer beschädigt und brannte teilweise aus. Die zuletzt noch als Lagerräume genutzten Ruinen wurden in den 1950er Jahren beseitigt.

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Die Cacao-, Chokoladen- und Zuckerwaarenfabrik Riedel & Engelmann wurde im Jahr 1888 von den Kaufleuten Oswald H. Riedel und Johannes C.R. Engelmann gegründet. Sie befand sich im sog. Schwerter-Haus in der Falkenstraße 54 im damaligen Vorort Plauen .

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Bild Name/Bezeichnung Adresse Baujahr Beschreibung
Erlenstraße 4 Dresden 2.JPG
Mietshaus Erlenstrasse 04!Erlenstraße 4
(Lage)
Mietshaus in halboffener Bebauung
Erlenstraße 6 Dresden.JPG Mietshaus Erlenstrasse 06!Erlenstraße 6
(Lage)
Mietshaus mit Hinterhaus in geschlossener Bebauung
Erlenstraße 7 Dresden.JPG Mietshaus Erlenstrasse 07!Erlenstraße 7
(Lage)
Mietshaus in geschlossener Bebauung
Erlenstraße 8 Dresden.JPG
Mietshaus Erlenstrasse 08!Erlenstraße 8
(Lage)
Mietshaus in halboffener Bebauung
Erlenstraße 9 Dresden.JPG Mietshaus Erlenstrasse 09!Erlenstraße 9
(Lage)
Mietshaus in Ecklage und geschlossener Bebauung
Erlenstraße 10 Dresden.JPG Mietshaus Erlenstrasse 10!Erlenstraße 10
(Lage)
Mietshaus in halboffener Bebauung
Erlenstraße 12 Dresden.JPG Mietshaus Erlenstrasse 12!Erlenstraße 12
(Lage)
Mietshaus in halboffener Bebauung
Erlenstraße 15 Dresden.JPG Mietshaus Erlenstrasse 15!Erlenstraße 15
(Lage)
Mietshaus in geschlossener Bebauung
Erlenstraße 16 Dresden.JPG Mietshaus Erlenstrasse 16!Erlenstraße 16
(Lage)
Mietshaus in geschlossener Bebauung
Erlenstraße 17 Dresden 2.JPG Mietshaus Erlenstrasse 17!Erlenstraße 17
(Lage)
Mietshaus in Ecklage und geschlossener Bebauung
Erlenstraße 18 Dresden.JPG Mietshaus Erlenstrasse 18!Erlenstraße 18
(Lage)
Mietshaus in geschlossener Bebauung
Erlenstraße 20 Dresden.JPG Mietshaus Erlenstrasse 20!Erlenstraße 20
(Lage)
Mietshaus in geschlossener Bebauung
Erlenstraße 22 Dresden 2.JPG Mietshaus Erlenstrasse 22!Erlenstraße 22
(Lage)
Mietshaus in Ecklage und geschlossener Bebauung
Erna-Berger-Straße 2 Dresden 2.JPG Mietvilla Ernabergerstrasse 02!Erna-Berger-Straße 2
(Lage)
Mietvilla mit Einfriedung
Erna-Berger-Straße 3 Dresden 2.JPG Villa Ernabergerstrasse 03!Erna-Berger-Straße 3
(Lage)
Villa mit Einfriedung
Erna-Berger-Straße 5 Dresden.JPG Doppelvilla Ernabergerstrasse 05!Erna-Berger-Straße 5/7
(Lage)
Doppelvilla mit Einfriedung
Erna-Berger-Straße 6 Dresden.JPG Mietvilla Ernabergerstrasse 06!Erna-Berger-Straße 6
(Lage)
Mietvilla mit Einfriedung
Erna-Berger-Straße 9 Dresden.JPG Villa Ernabergerstrasse 09!Erna-Berger-Straße 9
(Lage)
Villa mit Einfriedung
Erna-Berger-Straße 11 Dresden.JPG Mietvilla Ernabergerstrasse 11!Erna-Berger-Straße 11
(Lage)
Mietvilla
Erna-Berger-Straße 13 Dresden 1.JPG Mietvilla Ernabergerstrasse 13!Erna-Berger-Straße 13
(Lage)
Mietvilla
Erna-Berger-Straße 15 Dresden.JPG Mietvilla Ernabergerstrasse 15!Erna-Berger-Straße 15
(Lage)
Mietvilla mit Einfriedung
Erna-Berger-Straße 17 Dresden.JPG Mietvilla Ernabergerstrasse 17!Erna-Berger-Straße 17
(Lage)
Mietvilla
Eisenbahnbrücke eschenstraße dresden.JPG Eisenbahnbrücke Eschenstrasse!Eschenstraße
(Lage)
Eisenbahnbrücke
Eschenstraße 1 Dresden.JPG Mietshaus Eschenstrasse 01!Eschenstraße 1
(Lage)
Mietshaus in geschlossener Bebauung
Eschenstr3 dresden.jpg
Mietshaus Eschenstrasse 03!Eschenstraße 3
(Lage)
Mietshaus in geschlossener Bebauung
Eschenstr4 dresden.jpg Mietvilla Eschenstrasse 04!Eschenstraße 4
(Lage)
Mietvilla mit Einfriedung
Eschenstr5 dresden.jpg
Mietshaus Eschenstrasse 05!Eschenstraße 5
(Lage)
Mietshaus in geschlossener Bebauung
Eschenstraße 6 Dresden.JPG Villa Eschenstrasse 06!Eschenstraße 6
(Lage)
Villa mit Einfriedung
Eschenstr7 dresden.jpg
Mietshaus Eschenstrasse 07!Eschenstraße 7
(Lage)
Mietshaus in geschlossener Bebauung
Eschenstraße 8 Dresden.JPG Eschenstrasse 08!Eschenstraße 8
(Lage)
Eschenstr9 dresden.jpg
Mietshaus Eschenstrasse 09!Eschenstraße 9
(Lage)
Mietshaus in geschlossener Bebauung
Reithalle Fabricestrasse!Fabricestraße
Koordinaten fehlen! Hilf mit.
Reithalle
Fabricestraße 8 Dresden 5.JPG Militärgerichtsgebäude Fabricestrasse 08!Fabricestraße 8
(Lage)
ehem. Militärgerichtsgebäude, heute Standort der Bundesanstalt für Arbeitsschutz und Arbeitsmedizin
Fabricestraße 10 Dresden 2.JPG Reithalle Fabricestrasse 10!Fabricestraße 10
(Lage)
Reithalle
Fichtenstraße 1 Dresden.JPG Mietshaus Fichtenstrasse 01!Fichtenstraße 1
(Lage)
Mietshaus in geschlossener Bebauung
Fichtenstraße 2 Dresden Pauligemeinde 2.JPG Gemeindehaus Fichtenstrasse 02!Fichtenstraße 2
(Lage)
St.-Pauli-Gemeinde
Fichtenstraße 6 Dresden.JPG Mietshaus Fichtenstrasse 06!Fichtenstraße 6
(Lage)
Mietshaus in geschlossener Bebauung
Fichtenstraße 10 Dresden.JPG Mietshaus Fichtenstrasse 10!Fichtenstraße 10
(Lage)
Mietshaus in geschlossener Bebauung
Fichtenstraße 11b Dresden.JPG Doppelmietshaus Fichtenstrasse 11!Fichtenstraße 11b,
Hechtstraße 34
(Lage)
Doppelmietshaus in Ecklage und geschlossener Bebauung
Fichtenstraße 14 Dresden.JPG Mietshaus Fichtenstrasse 14!Fichtenstraße 14
(Lage)
Mietshaus in geschlossener Bebauung
Fichtenstraße 17 Dresden 2.JPG Mietshaus Fichtenstrasse 17!Fichtenstraße 17
(Lage)
Mietshaus in geschlossener Bebauung
Fichtenstraße 19 Dresden.JPG Mietshaus Fichtenstrasse 19!Fichtenstraße 19
(Lage)
Mietshaus in geschlossener Bebauung
Boehmert gedenkstein.JPG
Denkmal für Karl Böhmert Fischhausstrasse 12!Fischhausstraße 12
Forstabteilung 71
(Lage)
1899 Denkmal für Karl Böhmert, Landrichter und Sohn Viktor Böhmerts, Flurstück 2062/II, vor der Körperbehindertenschule
Fischhausstraße 12a Dresden.JPG Volksheim Fischhausstrasse 12a!Fischhausstraße 12a
Forstabteilung 71
(Lage)
ehem. Gaststätte „Heidepark“ (Volksheim) mit Nebengebäude des Vereins Volkswohl
Denkmal für einen Staatsminister Fischhausstrasse 12b!Fischhausstraße
Forstabteilung 71
Koordinaten fehlen! Hilf mit.
Denkmal für einen Staatsminister, im Heidepark
Fischhausstraße 12b Dresden Schulgebäude 2.JPG Schulgebäude Fischhausstrasse 12c!Fischhausstraße 12b
Forstabteilung 72
(Lage)
Schulgebäude
Fischhausstraße 14 Dresden Gaststätte 1.JPG Fischhaus Fischhausstrasse 14!Fischhausstraße 14/14a
Forstabteilung 72
(Lage)
Gaststätte mit Hintergebäude
Fischhausstraße 17 Dresden Hochbehälter mit Schieberhaus des Wasserwerkes.JPG Hochbehälter Fischhausstrasse 17!Fischhausstraße 17
(Lage)
Hochbehälter mit Schieberhaus des Wasserwerkes
Fischhausstraße 17b Dresden 2.JPG Wohnhaus Fischhausstrasse 17b!Fischhausstraße 17b
(Lage)
ehem. Beamtenwohnhaus in offener Bebauung
Förstereistraße 1 Dresden.JPG Mietshaus Forstereistrasse 01!Förstereistraße 1
(Lage)
Mietshaus in geschlossener Bebauung
Förstereistraße 3 Dresden.JPG Mietshaus Forstereistrasse 03!Förstereistraße 3
(Lage)
Mietshaus mit Laden in geschlossener Bebauung
Förstereistraße 5 Dresden 2.JPG Mietshaus Forstereistrasse 05!Förstereistraße 5
(Lage)
Mietshaus in ehemals geschlossener Bebauung
Förstereistraße 13 Dresden.JPG Mietshaus Forstereistrasse 13!Förstereistraße 13
(Lage)
Mietshaus in geschlossener Bebauung
Förstereistraße 14 Dresden.JPG Mietshaus Forstereistrasse 14!Förstereistraße 14
(Lage)
Mietshaus in geschlossener Bebauung